





एक समय की बात है, एक दिन हस्तिनापुर के राजा शांतनु गंगा नदी के तट के आस-पास शिकार करने के लिये निकले हुये थे। इतने में उनकी दृष्टि वहाँ एक सुन्दर कुमारी पर पड़ी, उन्हें वह कन्या विवाह के लिये उपयुक्त प्रतीत हुई। उन्होंने उसके समीप जाकर उससे विवाह का प्रस्ताव रखा। वह कन्या राजा द्वारा विवाह प्रस्ताव से खुश थी, परन्तु उसकी दो शर्त थी कि राजा शांतनु उससे यह सवाल कभी न करें कि वह कौन है, या वह ऐसा क्यों कर रही है, साथ ही वे उससे कभी बुरा व्यवहार और उस पर क्रोध न करें। राजा शांतनु ने उसकी शर्त स्वीकार कर ली और दोनों ने विवाह कर लिया। वे दोनों ही विवाह के पश्चात् सुखी जीवन व्यतीत कर रहे थे। परन्तु राजा को अपनी पत्नी का एक व्यवहार बहुत खलता था। वह यह कि जब भी उनकी कोई संतान होती, वह उसे जल में बहा देती थी। यह देख शांतनु व्यथित हो जाते थे परन्तु विवाह पूर्व दिये गये वचन के कारण वे भी विवश थे। जब आठवी संतान का जन्म हुआ तो राजा शांतनु से रहा नहीं गया उन्होंने अपना धैर्य खो दिया, इससे पहले कि उनकी पत्नी अपनी आठवीं संतान को जल में प्रवाहित करें, शांतनु ने आक्रोश में आकर अपनी पत्नी को कहा कि कोई माँ इतनी क्रूर कैसे हो सकती है कि वह स्वयं की ही संतान का अंत कर दे! तुम ऐसा क्यों करती हो? यह सुन उनकी पत्नी ने कहा ‘स्वामी विवाह-पूर्व किया वचन आज आपने तोड़ दिया है। मैं देवी गंगा हूँ, मुझे अपने पूर्व की सात संतानों को शापमुक्त करने के लिये उनका अंत करना पड़ रहा था और हमारी यह आठवी संतान इस शाप से मुक्त है, यदि आज आप मुझसे क्रोधित होकर यह प्रश्न नहीं करते तो हम तीनों सदा के लिये एक सुखी जीवन व्यतीत कर सकते थे, परन्तु अब मुझे जाना होगा, मेरे इस पुत्र का नाम गंगेय होगा और मैं इसे भी अपने साथ लेकर वही जा रही हूँ जहाँ से आयी थी।’’ यह कह देवी गंगा वहाँ से चली गई, राजा उन्हें बेहद प्रेम करते थे, पर गंगा जा चुकी थी। उन्हें अपने किये पर पश्चाताप हो रहा था कि यदि वे थोड़ा और धैर्य रख लेते तो शायद ऐसा न होता। उन्हें अपनी अर्धांगिनी पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिये था। इसके बाद वे दुखी रहने लगे परन्तु उन्होंने अपनी इस व्यक्तिगत स्थिति से अपने राजकार्य को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होने दिया। उन्होंने पहले की भांति ही पूर्ण दक्षता से अपना राज्य संभाला। उनकी प्रजा उनसे सदा प्रसन्न रहती और अपने राजा की खुशी की कामना करती थी। राजा शांतनु ने ऐसे अकेले ही की कई वर्ष व्यतीत कर दिये।
एक दिवस वे गंगा किनारे हिरण का शिकार करने निकले, वहाँ उन्हें एक अत्यन्त तेजस्वी बालक दिखा, उन्हें प्रतीत हुआ कि कहीं यह मेरा पुत्र गंगेय तो नहीं! उन्होंने देवी गंगा से उनके समक्ष प्रकट हो उनकी यह दुविधा दूर करने की प्रार्थना की। गंगा ने प्रकट हो उन्हें बताया कि यह बालक उन्हीं का पुत्र है, गंगेय शस्त्र विद्या व शास्त्र विद्या में निपुण हो गया है और साथ ही इसने देवव्रत की उपाधि भी प्राप्त कर ली है। अब आप इसे अपने साथ राजमहल ले जा सकते हैं, यह अब आपका उत्तराधिकारी बनने योग्य हो गया है, साथ ही इसे एक कर्त्तव्य निष्ठ शासक के समस्त दायित्व का पूर्ण ज्ञान है। हे राजन! मैं आपको आपका पुत्र सौंपती हूँ। यह सब सुन राजा शांतनु अत्यन्त प्रसन्न हुये वे शीघ्रता पूर्वक देवव्रत को अपने राजमहल ले गये।
प्रजा भी अपने राजा के उत्तराधिकारी को देख प्रसन्न थी। सभी ऐसे तेजस्वी युवा को देख भाव-विभोर हो गये। शांतनु अपने पुत्र के रूप में एक योग्य उत्तराधिकारी पा कर खुश थे, परन्तु कई बार स्वयं का अकेलापन उन्हें खलता था और अपनी इस उदासीतना को दूर करने के लिये यमुना नदी के आस-पास अकेले भ्रमण पर निकल जाते थे। एक दिन शांतनु ऐसे ही यमुना के किनारे भ्रमण कर रहे थे, वहाँ उन्हें सत्यवती नाम की एक सुंदर कन्या दिखी, वह समीप ही रहने वाले मछुवारे की पुत्री थी। शांतनु उसके पिता के समक्ष उनकी पुत्री सत्यवती से अपने विवाह की वार्ता करने पहुँच गये। मछुआरा प्रसन्न था, परन्तु उसे एक शंका थी। राजा ने यह तुरंत भांप लिया और उसे उसकी परेशानी पूछी। मछुआरे ने शंकावश बताया कि ‘मैं चाहता हूँ कि मेरी पुत्री से उत्पन्न हुआ पुत्र आपके बाद आपके राज सिंहासन का उत्तराधिकारी बने, यदि आप मुझे इसका आश्वासन देते हैं, तो मैं सहर्ष अपनी पुत्री को आपको सौंप दूंगा।’ शांतनु यह सब सोचकर ही हताश हो गये कि वे कैसे देवव्रत से उसका यह अधिकार छीन ले? यह उचित नहीं होगा। परन्तु सत्यवती के बिना, अकेले जीवन व्यतीत करना उन्हें उद्देश्यहीन प्रतीत हो रहा था। वे ऐसे ही अकेले उदास बैठ कर दिन बिताने लगे। देवव्रत एक जिम्मेदार पुत्र था, उसे ज्ञात हो गया था, कि किसी कारणवश उसके पिता सदा खोये हुये व दुखी रहते हैं। देवव्रत ने महल के वरिष्ठ महामंत्री से पूछा कि क्यों उसके पिता इतने व्यथित हैं, वे सभी से क्या छिपा रहे है? तब महामंत्री ने देवव्रत को सत्यवती व उसके पिता द्वारा कही बात के बारे में बताया। महामंत्री ने बताया कि शांतनु के लिये देवव्रत अति प्रिय हैं, वे उन्हें अपने स्वार्थ के लिये अपने अधिकार से वंचित नहीं रखना चाहते।
अगले ही दिन, देवव्रत कौरव कुल के प्रमुख सदस्यों के साथ सत्यवती के पिता के यहाँ गये व उनसे उनकी पुत्री व राजा के विवाह से आपत्ति का कारण पूछा। मछुआरे ने बताया कि हस्तिनापुर प्रदेश की प्रजा के पास आप जैसा उत्तराधिकारी पहले से ही मौजूद है और आपके होते हुये, मेरी पुत्री की संतान को राज्य सिंहासन का अवसर नही मिलेगा, उसका जीवन तो सदा आपके अधीन रहेगा। यह सब सुन देवव्रत ने वचन दिया कि आपकी पुत्री से उत्पन्न पुत्र ही सदा शासन करेगा। लेकिन वह मछुआरा अभी भी पूर्णतया संतुष्ट नहीं हुआ, उसने देवव्रत से कहा कि ‘मुझे आपके द्वारा कहे वचनों पर जरा भी संदेह नहीं है लेकिन भविष्य में आपके पुत्रों का क्या होगा? देवव्रत अपने पिता के लिये कुछ भी करने को तैयार था। वे मछुआरे को कहते हैं कि ‘मैने राज सिंहासन में अपना अधिकार त्याग दिया है और अब आपकी यह चिंता भी मैं समाप्त कर देता हूँ’, वे एक भीषण प्रतिज्ञा लेते है कि ‘आज के दिन से मैं ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करने का प्रण लेता हूँ।’ यह शब्द सुनकर स्वर्ग से सभी देवतागण देवव्रत पर पुष्प वर्षा करते हैं और चहुं ओर से भीष्म! भीष्म! नाम गुंजायमान होने लगता है। मछुआरा भी उनके आगे नतमस्तक हो जाता है और प्रसन्नता पूर्वक अपनी पुत्री सत्यवती को राजा को सौंप देता है। देवव्रत अपनी माँ के रूप में सत्यवती को हस्तिनापुर ले आता है। वह पूरा वृतान्त अपने पिता को बताता है, शांतनु को अपने पुत्र की महानता पर आश्चर्य होता है, वे ऐसा पुत्र पाकर गद-गद हो उठते हैं। प्रजा भी भीष्म की जय-जयकार करती है। राजा शांतनु खुश होकर अपने पुत्र देवव्रत (भीष्म) को वरदान देते हैं, कि उसे कोई नहीं मार सकता जब तक वह स्वयं न चाहे, अर्थात् वे भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान देते हैं। शांतनु सत्यवती से विवाह कर लेते हैं और उनके दो पुत्र होते हैं। बड़ा पुत्र युद्ध मैदान में मारा जाता है। शांतनु की मृत्यु के बाद भीष्म छोटे भाई विचित्रवीर्य को राज सिंहासन देते हैं और उसके लिये राज्य का संरक्षण करते हैं।
एक दिन भीष्म अपनी माँ सत्यवती को बताते हैं कि काशी के राजा द्वारा उनकी तीन पुत्रियों का स्वयंवर कराया जा रहा है और विचित्रवीर्य भी विवाह उपयुक्त हो गया है और वे तीनों राजकुमारीयों को विचित्रवीर्य के लिये सहर्ष जीत लायेंगे।
सत्यवती उन्हें आशीर्वाद और आभार देती है, वह उन्हें विचित्रवीर्य के लिये जीत लाने को कहती है। भीष्म अकेले ही अपने रथ में जाते हैं और सभी विरोधी राजाओं को हराकर, राजकुमारियों को जीत लाते हैं। भीष्म तीनों राजकुमारी अम्बा, अम्बिका, अंबालिका को सत्यवती के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। सत्यवती प्रसन्न होती है। विवाह से पूर्व अंबा भीष्म को बताती है कि वह किसी अन्य से विवाह करना चाहती है और उस युवक ने भी उसे स्वीकार किया है, वह यह भी कहती है कि भीष्म व सत्यवती के अनुसार जो उचित है वे वही करे। भीष्म उसे किसी ओर से विवाह कर लेने की स्वीकृति दे देते हैं। विचित्रवीर्य अंबिका, अंबालिका से विवाह कर लेता है। वहीं अंबा जब अपने चुने हुये वर के पास विवाह के उद्देश्य से जाती है तो वह युवक उसे अस्वीकार कर देता है, क्योंकि वह भीष्म द्वारा किसी ओर से विवाह करने हेतु ले जायी गयी थी। अम्बा अत्यन्त क्रोधित होती है, वह भीष्म को ही अपनी इस अवस्था का दोषी ठहराती है, वह मन ही मन भीष्म का नाश करने का निश्चय लेती है। अम्बा परशुराम के पास जाती है क्योंकि उसे ज्ञात होता है कि परशुराम को क्षत्रियों के प्रति घृणा है। वह उनसे भीष्म का वध कर उसका बदला लेने की प्रार्थना करती है। परशुराम अंबा व अन्य ऋषियों के साथ हस्तिनापुर प्रस्थान करते हैं। वहाँ भीष्म उन्हें आदर पूर्वक मिलने आते हैं। भीष्म उनके वहां आने का उद्देश्य पूछते हैं, तब परशुराम भीष्म को अंबा से विवाह कर लेने के लिये कहते हैं।
परन्तु भीष्म इससे मना कर देते हैं, क्योंकि उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने का वचन दिया होता है। आदेश न मानने के कारण भीष्म और परशुराम में द्वंद युद्ध होता है, जो तेइस दिन तक चलता है और अंत में भीष्म की विजय होती है। परशुराम अम्बा को बताते हैं कि वे भीष्म को नहीं मना पाये। अब उसे सब कुछ भूल कर भीष्म की छत्रछाया में शरण ले लेनी चाहिये, यही उचित है। परन्तु अंबा उनका कहा नहीं मानती, वह बारह वर्षों तक भगवान शिव की कठोर तपस्या करती है। यह देख शिव प्रकट होते हैं और वरदान माँगने को बोलते है। अंबा भीष्म का सर्वनाश करने का वरदान माँगती है क्योंकि उसे लगता था कि भीष्म के कारण वह नारी होने के सभी सुख भोगने से वंचित रह गयी। भगवान शिव उसे ऐसा ही होने का वरदान देते हैं। अंबा कहती है कि भीष्म ने महान योद्धा परशुराम को भी पराजित कर दिया था, वह तो एक स्त्री है, वह कैसे उन्हें पराजित करे? भगवान शिव उसे बताते है कि अगले जन्म में वह द्रुपद के पुत्र शिखंडी के रूप में जन्म लेगी, तब वह उनसे युद्ध कर पायेगी।
अंबा अग्नि में कूद आत्मदाह कर लेती है, क्योंकि उसे जल्द से जल्द भीष्म का वध करना था और जैसे शिव ने कहा था उसका पुनर्जन्म शिखंडी के रूप में हो जाता है। अम्बिका व अम्बालिका के एक-एक पुत्र होता है, धृतराष्ट्र और पाण्डु, धृतराष्ट्र के कौरवों के रूप में सौ पुत्र होते हैं व पाण्डवों के रूप में पाण्डु के पाँच पुत्र होते हैं। भीष्म धृतराष्ट्र और पाण्डु की तरह ही उनके पुत्र हो जाने पर उन सभी का पालन-पोषण व उन की शिक्षा-दीक्षा का श्रेष्ठ निरक्षण करते हैं। कौरवों व पाण्डवों के बचपन की वैमनस्यता उनके बड़े हो जाने पर भी जारी रही। भीष्म कौरवों को खासकर कि दुर्योधन को सदा यही समझाने का प्रयत्न करते कि जो उनका (पाण्डवों) है, उन्हें सौंप दें वरना वे स्वयं के लिये ही मुसीबत मोल ले लेगा। परन्तु कौरव नहीं मानते। आगे चलकर इसी कारण कौरव व पाण्डवों के बीच अठारह दिनों तक चलने वाला महाभारत का युद्ध हुआ। युद्ध प्रारंभ होने से पहले पाण्डवों में ज्येष्ठ युधिष्ठिर अपने पितामह भीष्म के समक्ष आशीर्वाद लेने आये। भीष्म को कौरव व पाण्डव दोनों ही अत्यधिक प्रिय थे, परन्तु महाभारत के समय वे कौरव सेना प्रमुख थे क्योंकि उस समय कौरवों के पिता धृतराष्ट्र का शासन था। नौ दिवस तक दोनों सेनाओं में युद्ध चला, दसवें दिवस पर शिखंडी (जो अर्जुन का मित्र था) को ढाल बनाकर उसकी आड़ में अर्जुन ने भीष्म पर निशाना साधा, क्योंकि अर्जुन को शिखंडी के पिछले जन्म के बारे में ज्ञात था व भीष्म पितामह को भी ज्ञात था कि शिखंडी पहले एक स्त्री था। इसीलिये उस पर निशाना साधना अनुचित होगा।
भीष्म अब अपनी मृत्यु को देखने के लिये तैयार थे, परन्तु शिखंडिन के हाथों अपना अंत नहीं चाहते थे। पर जो तीर उन्हें लगा वह बहुत गहरा था, उन्हें ज्ञात था कि यह निशाना उनके परम शिष्य अर्जुन का था और भीष्म गिर पड़े, अर्जुन के बाणों से भीष्म की शैय्या बन चुकी थी। दोनों सेनाये युद्ध रोक कर अपने परम प्रिय पितामह के चारों और जमा हो गयी, भीष्म ने अर्जुन से कहा कि उन्हें अपने सिर नीचे के सहारा चाहिये, अर्जुन ने तुरन्त तीन बाण उनके शीश के नीचे लगाये और उनके समीप धरती में निशाना साधकर उन्हें जलपान कराया। भीष्म खुश थे। युद्ध पुनः प्रारम्भ हो गया। क्योंकि भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान था, वे शेष दिनों के युद्ध के दर्शक बने। अंत में पाण्डवों की विजय हुई।
पाण्डवों में ज्येष्ठ युधिष्ठिर, भीष्म के समीप उनके आशीर्वाद लेने आये और भीष्म ने उन्हें कुशल शासक के कर्त्तव्यों का ज्ञान दिया। यह कह कर उन्हें अपनी सभी जिम्मेदारियों का पूर्ण होने का संकेत मिल गया था और यही वह शुभ समय था, जो भीष्म पितामह ने अपनी मृत्यु के लिये निश्चित कर रखा था।
इस प्रकार भीष्म ने अपने दीर्घकालीन जीवन में अपने पिता के लिये एक सुपुत्र, अपनी माता व भाई के लिये एक कुशल संरक्षक, उनके आगे की दोनों पीढि़यों के लिये श्रेष्ठतम गुरु व पितामह के रूप में निःस्वार्थ भाव से सभी उत्तरदायित्वों को पूर्ण किया।
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