





इसलिये कहा गया है-
चंचल और अस्थिर मन जिन-जिन विषयों की ओर जाता है, मन को उन्हीं विषयों में निहित कर आत्मा में स्थिर कर देता है।
श्रेष्ठ व स्पष्ट चिंतन और उसमें निरंतरता की कमी ही हमारे अपने लक्ष्यों तक न पहुंचने का मुख्य कारण है। स्पष्टता का तात्पर्य हम अपने जीवन को कैसे जीना चाहते हैं ? जीवन में क्या प्राप्त करना चाहते हैं ? प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये स्पष्ट चिंतन विकसित करने के लिये समय देना चाहिये। स्पष्ट चिंतन विकसित करने के लिये साधक को इन बिन्दुओं पर विचार करना चाहिये। अपना आंकलन, विश्लेषण जैसे बिन्दुओं पर विचार करने पर स्वयं समझ पायेगें। हम क्या बनना चाहते हैं? यह जीवन के सिद्धांतों और मूल्यों का निर्धारण करना है। जिसके आधार पर आप जीवन जीना चाहते हैं। हम क्या करना चाहते हैं?
एक बार जब आप सिद्धांतों और मूल्यों की पहचान कर लेते हैं, तो आप यह तय कर सकते हैं कि आप अपने जीवन के मूल्यों में कैसे वृद्धि कर सकते हैं। कार्य क्षेत्र कोई भी हो सकता है, यह किसी के लिये प्रतिबंधित नहीं है। लेकिन यहां इस विषय पर सोचने की आवश्यकता है कि हमारा चिंतन किस रूप में है अधोगति अथवा ऊर्ध्वगति। हम क्या पाना चाहते हैं? इसमें सम्पत्ति, अनुभव, उपलब्धियां आदि शामिल है। यह आवश्यक है कि इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिये चुने गये सिद्धांतों और मूल्यों में विरोधाभास ना हो। यदि वे सिद्धांत विरोधी हैं तो ना ही लक्ष्यों की पूर्ति होगी और ना ही वो प्रसन्नता आ पायेगी, जिन्हें आप प्राप्त करना चाहते हैं। अपितु स्थापित मूल्यों का ह्रास होगा जिससे आपके जीवन और आपकी आत्मिक भावना पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
स्पष्ट विचार के लिये लक्ष्य निर्धारित होना बहुत ही आवश्यक है, जब लक्ष्य ही नहीं हैं तो स्पष्ट विचार कहां से आयेगा? कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका कोई लक्ष्य ही नहीं है। बिना लक्ष्य के जीवन पशुत्व समान है। एक सन्यासी अध्यापक का काम करता था, वह बहुत ही सुंदर था। उसके विद्यार्थियों में एक रूपवान लड़की भी थी, लड़की समय के साथ-साथ सन्यासी के प्रति आकर्षित होने लगी थी। धीरे-धीरे आकर्षण प्रेम परिवर्तित होकर जुनून में बदल गया। वह अपने अध्ययन में ध्यान ना देकर सिर्फ सन्यासी के बारे में सोचती रहती थी। उसने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिये अपना मानस बना लिया। एक दिन अध्ययनरत छात्रों के मध्य ही, उसने सबके समक्ष अपने प्रेम का संन्यासी से आग्रह किया और उससे विवाह का प्रस्ताव रखा। यह सुनने पर सन्यासी ने बिना आश्चर्यचकित हुये कहा- ओह! ऐसा है क्या और व्याख्यान पुनः प्रारम्भ कर दिया। सन्यासी की इस प्रतिक्रिया ने उस युवती को बहुत क्रोधित कर दिया, उसने फिर हस्तक्षेप कर उसे बोला कि मैं आपसे पढ़ नही सकती, आपके सिवा मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है।
संन्यासी ने शांतचित्त से स्पष्ट रूप से कहा- यह तुम्हारा जुनून ही तुम्हारी दुविधा का कारण है। तुम भले ही एक छात्र से प्रेमिका बन गयी हो, लेकिन मैं अभी भी सन्यासी ही हूं। जितनी तुम्हारी इच्छा मुझसे विवाह करने की है, उतनी ही मुझमें सन्यास धर्म का पालन करने की श्रद्धा है। सन्यासी का लक्ष्य निर्धारित था, वह अपने सिद्धांत और जीवन के मूल्यों के प्रति गंभीर और स्पष्ट था। इसलिये त्वरित उसने बिना संकोच किये अपना पक्ष स्पष्ट रूप से रख दिया।
जो अपने लक्ष्य के प्रति स्पष्ट होते हैं। वे बिना किसी अवरोध के अपने सिद्धांतों पर चलते रहते है। जीवन की अनुकूल- प्रतिकूल परिस्थितियों से वे विचलित नहीं होते, बल्कि उसका त्वरित समाधान कर आगे की ओर बढ़ जाते हैं। व्यक्ति के लक्ष्य, चिंतन, विचार, सिद्धांत जितने स्पष्ट होते हैं। उतना ही उनके व्यक्तित्व व जीवन में निखार आता है। स्पष्ट चिंतन और जीवन के लक्ष्य को निर्धारित करने के लिये इन बिन्दुओं पर विचार करें-
ध्यान के माध्यम से चित्त शांत होता है, जिससे स्पष्ट चिंतन विकसित करने में बहुमूल्य योगदान प्राप्त होता है। ध्यान मन को केन्द्रित करके तेज और स्पष्ट विचारों में वृद्धि करता है। संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो प्रयत्न और प्रयास से प्राप्त न की जा सके। प्रयत्न और प्रयास से ही वैज्ञानिकों ने आज इतनी उन्नति की है। प्रयत्न और प्रयास से ही सन्त भगवन्त बने हैं, प्रयत्न और प्रयास से ही आत्मा परमात्मा बनती है। इसलिये प्रत्येक कार्य करने के लिये सम्यक प्रयास अनिवार्य है। क्योंकि प्रयत्न और प्रयास से ही सुख-समृद्धि और शांति की प्राप्त होती है। प्रयत्न या प्रयास से ही साधक को साधना की सिद्धि प्राप्त होती है।
अर्थात् प्रयास करते हुये साधक ध्यान के माध्यम से अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। संकल्प में तो वह शक्ति होती है जो पत्थर में भी परमात्मा प्रकट कर लेता है, फिर आत्मा में परमात्मा स्थापित करना कौन सी बड़ी बात है। संकल्प शक्ति से ही एकलव्य ने पत्थर की मूर्ति से धनुष विद्या सीख ली थी। संकल्प शक्ति से ही राम ने बलशाली रावण को परास्त कर दिया था। संकल्प शक्ति से ही भारत आजाद हुआ था। संकल्प शक्ति से ही सभी कार्य पूर्ण सफल होते हैं। इसलिये किसी भी कार्य को करने से पूर्व संकल्प होना अनिवार्य है। लेकिन इतना ध्यान रखना कि जो संकल्प करो उसे पूरा अवश्य करना। भले ही संकल्प छोटा लो लेकिन उसे पूर्ण करने का प्रयास करना।
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