





समाधि में, जिनको हमने बड़े-बड़े कर्म, छोटे कर्म, अच्छे कर्म, बुरे कर्म-कितने-कितने बांटे थे, विभाजन किये थे, नीति और अनीति, सदाचार और अनाचार-सब के सब व्यर्थ हो जाते हैं। जाग कर समाधि में पता चलता है कि एक बड़ा स्वप्न था-लंबा, अनंतकालीन, अनादि-लेकिन स्वप्न था, और मैं सिर्फ मौजूद था, मैं प्रविष्ट नहीं हुआ था, बाहर ही खड़ा था।
इसलिये सब कट जाता है कर्म, और धर्म का उदय होता है।
जब कर्म कट जाता है-जो हम करते थे, वह कट जाता है-तब हमें पता चलता है, जो हम हैं, जो हमारा होना है, स्वभाव है। स्वभाव है धर्म।
‘उत्तम योगवेता इस समाधि को ‘धर्म-मेघ’ कहते हैं, क्योंकि वह मेघ की तरह धर्मरूप हजार धाराओं की वर्षा करती है।’
धर्म-मेघ बड़ा प्यारा शब्द है। मेघ तो हमने देखे हैं। आषाढ़ आता है और मेघ घिर जाते हैं आकाश में। लेकिन पूरी घटना का हमें खयाल नहीं है। वे जो आकाश में मेघ घिर जाते हैं आषाढ़ में, और मोर नाचने लगते हैं। और जमीन, जगह-जगह दरारें बन जाती हैं, ओंठ खोल देती है अपने, अपने हृदय तक पानी की बूंदों को पी जाने के लिये अपने द्वार तोड़ देती है सब तरफ से। और प्यासी धरती बहुत दिन से प्रतीक्षा में थी, प्यासे वृक्ष तड़फ रहे थे मछलियों की तरह-जैसे रेत में किसी ने उनको फेंक दिया हो। फिर घिरते हैं बादल, और फिर उन काले मेघों की छाया में वर्षा शुरू हो जाती है, और एक नृत्य सारी प्रकृति पर छा जाता है।
धर्म-मेघ ऐसी ही आषाढ़ की भीतर घटी घटना है। ऐसी कि जन्मों-जन्मों से प्राण प्यासे थे, दरारें पड़ गई थी, कोई प्यास बुझाने वाला पानी न मिला था। पीते थे पानी, उससे प्यास केवल बढ़ती थी, बुझती नहीं थी। बहुत पानी पीए, और बहुत घाटों की यात्रा की, और न मालूम क्या-क्या खोजा और पकड़ा, लेकिन सब बार आशा निराशा हुई, हाथ कुछ लगा नहीं। वह धरती पूरे प्राणों की फटी-प्यासी, अभीप्सा से भरी, समाधि के क्षण में पहली दफा उसके ऊपर मेघ घिरते हैं, समाधि के क्षण में पहली दफा आषाढ़ आता है भीतर और अमृत की एक वर्षा-सिर्फ प्रतीक है-अमृत की एक वर्षा भीतर होने लगती है, आत्मा नही जाती है, और अनंत-अनंत धाराओं में उन मेघों से अमृत गिरने लगता है।
यह सिर्फ प्रतीक है। घटना इससे बहुत बड़ी है। न तो अमृत कहने से कुछ पता चलता है उसके बाबत, लेकिन फिर भी थोड़ी सी सूचना मिलती है, कि मेघ घिर गये ऊपर, और उनसे वर्षा होने लगी, और जो प्यासी थी आत्मा जन्मों-जन्मों से वह तृप्त हो गई।
‘उत्तम योगवेत्ता इस समाधि को धर्म-मेघ कहते हैं, क्योंकि वह मेघ की तरह धर्मरूप हजार धाराओं की वर्षा करती है।’
लेकिन धर्म-मेघ क्यों कहते हैं?
क्योंकि स्वभाव की वर्षा पहली दफा स्वयं पर होती है। धर्म यानी स्वभाव। अब तक जो भी जाना, पर-भाव था। कभी सौंदर्य दिखा, तो किसी और में, कभी प्रेम पाया, तो किसी ओर से, सुख मिला, दुःख मिला, सदा किसी और से, सब जानकारी किसी और की थी, अपना कोई अनुभव न था। पहली दफा अपनी ही वर्षा अपने ऊपर! अब तक सारी वर्षा दूसरे की थी-कोई और, वह दूसरा ही महत्त्वपूर्ण था। पहली दफा दूसरी हट गया और स्वयं की ही वर्षा स्वयं पर होने लगी। जैसे अपना ही झरना टूटा, जैसे अपनी ही धारा फूटी, जैसे अपने ही स्त्रोत को पाल लिया, और अपने पर ही अपनी वर्षा होने लगी।
धर्म-मेघ का अर्थ है, स्वभाव बरसने लगा। खुद उसमें नहा गये, डूब गये, ताजे हो गये, नये हो गये। सारे कर्म, सारे कर्मो की धूल, अनंत-अनंत यात्राओं का उपद्रव, सारा कचरा जो ऊपर इकट्ठा हो गया था, सब बह गया। रह गई सहजता, स्पांटेनिटी, रह गये स्वयं, और कुछ भी न बचा।
एक लिहाज से इसे हम कह सकते हैं, परम धन्यता। परम संपदा। और परम दरिद्रता। अगर संसार को सोचें, तो यह आदमी संसार से बिलकुल दरिद्र हो गया। अगर परमात्मा को सोचें, तो यह आदमी परम धन को पा गया।
जब आप अकेले ही हो, और कुछ भी न हो-कपड़ा-लत्ता भी नहीं, मकान भी अपना नहीं, जमीन भी अपनी नहीं, कुछ भी अपना नहीं, सिर्फ खुद ही बचे। इससे ज्यादा दरिद्र….। भिखारी के पास भी खुद से कुछ ज्यादा होता है। थोड़ा होता होगा, लेकिन होता है, खुद से कुछ ज्यादा। एक लंगोटी सही, लेकिन वह भी संपदा होती है। एक भिखारी भी इतना भिखारी नहीं है कि अकेला ही हो, कुछ भी न हो।
बुद्ध ने अपने भिक्षु को कहा कि संसार की तरफ से जो हो जाये भिखारी, आत्मा की तरफ से हो जाता है स्वामी, आत्मा की तरफ से जो हो जाये स्वामी को कभी नहीं दिया। हमने भिक्षु को उस सिंहासन पर बिठा दिया जहां हमने किसी सम्राट को कभी नहीं बिठाया। भिक्षु आदृत हो गया शब्द। कभी-कभी भाषा में भी……।
अब भिक्षु शब्द का मतलब तो भिखारी ही होता है। और किसी को भिखारी कह दो, झगड़ा हो जाये। लेकिन बुद्ध ने अपने परम धन्य शिष्यों को भिक्षु कहा। और जिसको भिक्षु कह दिया, वह धन्यभागी हो गया। कभी-कभी भाषा में ऐसे लोग बड़ी अड़चने डाल जाते है। बुद्ध जैसे लोग भाषा को अस्तव्यस्त कर जाते है। भिखारी का मतलब साफ था। खराब कर दिया। नया ही अर्थ दे दिया। भिक्षु हो गया सम्राट। सम्राट भिक्षु के पैरों में गिरे है। तो यह भिक्षु-परम गरिमा हो गई।
धर्म-मेघ समाधि एक तरफ से बना देगी भिखारी, एक तरफ से बना देगी सम्राट।
‘इस समाधि द्वारा वासनाओं का समूह पूर्णतः लय को प्राप्त होता है और पुण्य-पाप नाम के कर्मो का समूह जड़ से उखड़ जाता है।’
ध्यान रखना, पुण्य-पाप दोनों। यही उपनिषद के चिंतन की गहराई है। पुण्य-पाप दोनों का समूह। वह जो अच्छा किया था वह भी, जो बुरा किया था वह भी, दोनों का समूह जड़ से कट जाता है।
यह मत सोचना कि परमात्मा के पास जब पहुंचेंगे, तो अपने पुण्य का बैंक बैलेंस साथ लिये रहेंगे। कि धर्मशाला बनवाई थी एक, क्या हिसाब रखा उसका? कि एक मंदिर बनवा दिया था! कि इतने ब्राह्मणों को भोजन करवा दिया था! उसका हिसाब अगर लेकर पहुंच गये, तो दरवाजे पर भला स्वर्ग लिखा हो, भीतर नर्क ही पायेंगे, कोई स्वर्ग मिलने वाला नहीं है।
पाप और पुण्य इस जगत की भाषा में ऊंच-नीच हैं। पाप बुरा है, पुण्य अच्छा है। समाज की दृष्टि से ठीक है, लेकिन उस परम दृष्टि में पाप-पुण्य दोनों ही व्यर्थ है, क्योंकि वहां कर्ता होना पाप है, अकर्ता होना पुण्य है। वहां तो सीधी बात है एक कि वहां जो अकर्ता है, निरहंकारी है, वही प्रवेश कर पायेगा। वहां तो वही प्रवेश कर पायेगा जो है ही नहीं, जो मिट गया और शून्य होकर जा रहा है। अगर थोड़े से भी आप है, तो रास्ता बहुत संकरा है, आप प्रवेश न कर पायेंगे।
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