





उपनिषदों के सूत्र कहते हैंः ‘स्मरण से ही अनुमान किया जाता है।’
‘इस आदि-अनादि संसार में करोड़ों धर्म इकट्ठा कर लिये जाते हैं पर समाधि के द्वारा वे नष्ट हो जाते हैं और शुद्ध धर्म बढ़ते हैं।’
इस सूत्र में दो शब्द बड़े कीमती हैं- कर्म और धर्म। जो हम करते हैं वह कर्म है और जो हम हैं वह धर्म हैं। धर्म का अर्थ है ‘हमारा स्वभाव’ और कर्म का अर्थ है ‘जो हम करते हैं।’ कर्म का अर्थ है, हमारा स्वभाव अपने से बाहर आ जाता है। कर्म का अर्थ है, हम अपने से बाहरी जगत में उतर गये हैं, अपने से अतिरिक्त किसी दूसरे से जुड़ गये हैं। स्वभाव का अर्थ है- “दूसरे से पृथक, जगत में बिना गये जो मैं हूँ, मेरा भीतरी रुप से जो होना है।” मेरे करने से उसका कोई संबंध नहीं है। मैं जो करता हूँ उससे वह निर्मित नहीं होता। जो मेरा स्वभाव है वह मेरे सब करने के पहले से मौजूद है।
कर्म में भूल हो सकती है, धर्म में कोई भूल नहीं होती। कर्म में चूक हो सकती है, धर्म में कोई चूक नहीं होती। ध्यान रखना, धर्म का मतलब यहाँ मजहब अथवा रिलीजन नहीं है। यहाँ धर्म का अर्थ है- गुण, स्वभाव। वह जो हमारा आंतरिक स्वभाव है, हमारा होना है, बीइंग है।
हम जितने कर्म करते हैं, स्वभाव उतना ही आच्छादित होता चला जाता है। हम जो-जो करते हैं, उससे हमारा होना दबता जाता है और धीरे-धीरे कर्म की परत इतनी मोटी हो जाती है कि हम यह भूल जाते हैं कि कर्मों के अतिरिक्त हमारा होना भी है।
अगर कोई आपसे पूछे कि आप कौन हैं? तो आप जो भी उत्तर देते हैं वह आपके कर्मों के वजह से है, धर्म के वजह से नहीं। आप कहते हैं मैं इंजीनियर हूँ, मैं डॉक्टर हूँ, मैं व्यापारी हूँ। यह ध्यान देने वाली बात है कि आपका व्यापार कर्म है। आप व्यापारी नहीं हैं, व्यापार करते हैं। कोई भी आदमी डॉक्टर कैसे हो सकता है? वह डॉक्टरी कर सकता है। कोई आदमी इंजीनियर कैसे हो सकता है? आदमी और इंजीनियर हो जाये! तो आदमी खतम ही हो गया। आदमी इंजीनियरिंग कराता है। यह उसका कर्म है, उसका होना नहीं है।
आप जो भी अपना परिचय देते हैं अगर गौर से देखेंगे तो पायेंगेः आप सदा अपने कर्म का परिचय देते हैं, कभी अपने होने की खबर नहीं देते। दे भी नहीं सकते, आपकी खबर आपको ही नहीं है। आप उतना ही जानते हैं जो आप करते हैं। करने का आपको पता है कि मैं क्या करता हूँ और क्या कर सकता हूँ। मैनें पीछे क्या किया है और मैं आगे क्या करने योग्य हूँ, आप यही खबर देते हैं। आपका सर्टिफिकेट, आप कर सकते हैं उसकी खबर देता है। आप क्या हैं उसकी नहीं। अगर आप कहते हैं मैं साधु हूँ तो इसका मतलब यह है कि आप साधुता करते हैं। कोई कहता है कि मैं चोर हूँ तो उसका मतलब वह चोरी करता है। एक का कर्म साधुता है, एक का कर्म चोरी है।
लेकिन होना क्या है? आपके भीतर क्या है? जब आप माँ के गर्भ से पैदा नहीं हुये थे, तब साधु क्या था? चोर क्या था? इंजीनियर क्या था? डॉक्टर क्या था? माँ के गर्भ में अगर कोई इनसे पूछता कौन हो? तो वे बड़ी मुश्किल में पड़ जाते। क्योंकि तब वे इंजीनियर थे नहीं, डॉक्टर भी नहीं थे, व्यापार कुछ किया नहीं था। तो कोई उत्तर नहीं आ सकता था।
आज ब्रेनवाश, मस्तिष्क धोने के ज्यादा उपाय खोज लिये गये हैं। आप कहते हैं मैं इंजीनियर हूँ, आपके मस्तिष्क को साफ किया जा सकता है और जब क्लीनिंग ठीक से हो जाये, फिर आपसे पूछें, कौन हो? तो आप खाली रह जायेंगे। क्योंकि वह जो इंजीनियर होना था वह स्मृति में था। पढ़े थे, लिखे थे, सर्टिफिकेट पाया था, सब कुछ किया था। यश-अपयश पाया था, यह सब स्मृति में था और वह धो दी गई है, साफ कर दी गई है। अब आप कोई उत्तर नहीं दे सकते कि आप कौन हैं? लेकिन हैं। स्मृति के धुल जाने से आपका होना नष्ट नहीं किया जा सकता लेकिन कर्म की रेखायें साफ की जा सकती हैं।
उपनिषदों के सूत्र कहते हैं: अनादि संसार में करोड़ो कर्म इकट्ठा कर लिये जाते हैं।
स्वभावतः! प्रतिदिन, प्रतिपल कर्म इकट्ठे किये जा रहे हैं। उठते, बैठते, श्वास लेते समय कर्म हो रहा है। हम सोते हैं, स्वप्न देखते हैं, कर्म हो रहा है। कोई भी साधक, शिष्य, मनुष्य कर्म छोड़कर भाग नहीं सकता, क्योंकि भागना भी एक कर्म है। कहाँ जायेगा? जंगल में बैठ जायेगा जाकर? बैठना भी एक कर्म है। आँख बन्द कर लेंगे? आँख बन्द करना भी कर्म है। कुछ भी करिये, जहाँ करना है, वहाँ कर्म है।
तो प्रतिपल न मालूम कितने कितने कर्म किये जा रहे हैं। उनकी छाया, उनकी स्मृति, उनकी रेखा, उनका संस्कार भीतर छूटता जाता है। जो भी आप कर रहे हैं वह आपके होने पर इकट्ठा होता जा रहा है। जैसे कोई ऑडियो को रिकार्ड कर लिया जाये और फिर जब उसे बाद में सुना जाये तो उसमें जो-जो भर गया है रिकार्ड की रेखाओं में, वह पुनरुज्जीवित होकर प्रकट होने लगता है। ठीक इसी प्रकार आपका मन आपके सब कर्मों की संगृहीत संहीता है; जहाँ सब इकट्ठा है। जो-जो आपने किया है, उस सबकी आपके ऊपर रेखायें खिंच गई हैं और ये रेखायें अनन्त जन्मों की हैं। यह भार बड़ा है और आप उसी को फिर से दोहराते रहते हैं। करीब-करीब आपकी हालत भी उस घिसे ऑडियो रिकार्डर की तरह है, कि आवाज फंस गई है और आप उसे बार-बार चलाये जा रहे हैं। वही लकीर दोहरा रही है बार-बार।
इसलिये तो जिंदगी में इतनी ऊब है, इतनी बोरडम है, होगी ही। क्योंकि नया कुछ होता नहीं। सुई आगे बढ़ती ही नहीं। पीछे लौटकर देखें अपनी तीस-चालीस साल की जिंदगी। क्या किया है आपने? एक ही ऑडियो रिकार्ड बजा रहे हैं। वही रोज दोहरता जाता है, पुनरुक्त होता चला जाता है। इसी को भारतीय मनिषियों ने आवागमन कहा है। वही प्यार, वही घृणा, वही क्रोध, वही मित्रता, वही शत्रुता, वही धन का कमाना और फिर सब करके एक दिन हवा का झोंका आया और जो ताश का महल बनाया था वो सब गिर गया।
मगर जैसे बच्चे तत्काल फिर से पत्ते ईकट्ठा करके मकान बनाने लगते हैं, वैसे ही हम तत्काल नया जन्म लेकर फिर पत्तों का मकान बनाने में लग जाते हैं। इस बार और मजबूत बनाने की कोशिश करते हैं। मगर मकान वही है, ढ़ांचा वही है, मन वही है। हम फिर से वही कर लेते हैं और उसी तरह अस्त होते रहते हैं। यह सूरज ही नहीं है जो रोज सांझ को डूबकर सुबह फिर से उग आता है। आप भी ऐसे ही उगते-डूबते रहते हैं। संसार शब्द का अर्थ होता है चाक, व्हील जो घूमता रहता है एक ही धूरी पर।
यह जो अनंत कर्म ईकट्ठे कर लिये जाते हैं, वे समाधि के द्वारा नष्ट हो जाते हैं।
यह थोड़ा समझने जैसा है क्योंकि अनेक लोग ऐसा सोचते हैं कि अगर बुरे कर्म इकट्ठे हो गये हैं तो अच्छे कर्म करके उनको नष्ट कर दें, वे गलती में हैं। बुरे कर्मों को अच्छे कर्म करके नष्ट नहीं किया जा सकता। बुरे कर्म बने रहेंगे और अच्छे कर्म और इकट्ठे हो जायेंगे। वे काटते नहीं हैं, एक-दूसरे को। काटने का कोई तरीका नहीं है।
एक आदमी ने चोरी की, फिर वह पछताया और साधु हो गया। तो साधु होने से उसके चोरी का कर्म और उसके संस्कार जो उसके भीतर पड़े थे, वे कटते नहीं हैं। कटने का कोई तरीका नहीं है। साधु होने का अलग कर्म बनता है, अलग रेखा बनती है। चोर की रेखा पर से साधु की रेखा गुजरती ही नहीं है। चोर से साधु का क्या लेना-देना।
आप चोर थे, आपने एक तरह की रेखायें खींची थीं; आप साधु हो गये, ये रेखायें उसी स्थान पर नहीं खींची जा सकती हैं जहाँ चोर की रेखायें खींची थी। क्योंकि साधु होना मन के दूसरे कोने से होता है, चोर होना मन के दूसरे कोने से। आपके चोर होने की रेखाओं पर साधु होने की रेखायें और आच्छादित हो जाती हैं, कुछ कटता नहीं है। बस चोर के ऊपर साधु सवार हो जाता है।
चोर ठीक था एक लिहाज से और साधु भी ठीक था एक लिहाज से। यह जो चोर और साधु की आंतरिक कलह उत्पन्न होती है, यह एक सतत् आंतरिक कलह है क्योंकि चोर अपनी कोशिश जारी रखता है और साधु अपनी कोशिश। और हम इस तरह न मालूम कितने रुप अपने भीतर में इकट्ठे कर लेते हैं। जो एक-दूसरे को काटते नहीं बल्कि पृथक ही निर्मित होते हैं। इसलिये ही उपनिषदों के सूत्र कहते हैं कि “समाधिकेद्वारावेसबकटजातेहैं।”
कर्म से कर्म नहीं कटता, अकर्म से कर्म कटता है। कर्म से कर्म और भी सघन हो जाता है, अकर्म से कर्म कटता है और अकर्म समाधि में उपलब्ध होता है, जब कि कर्ता रह ही नहीं जाता। जब हम चेतना की उस स्थिति में पहुँचते हैं जहाँ सिर्फ होना ही है, करना बिल्कुल नहीं है; जहाँ कुछ करने की लहर भी नहीं उठती कभी; जहाँ बीइंग है, डूइंग नहीं। उस होने के क्षण में अचानक हमें पता चलता है कि वास्तव में जो कर्म हमने किये थे, वे हमने किये ही नहीं। कुछ कर्म थे जो शरीर ने किये थे, वो शरीर जाने। कुछ कर्म थे जो मन ने किये थे, वो मन जाने, असल में हमने कोई कर्म किये ही नहीं थे। इस बोध के साथ ही समस्त कर्मों का जाल कट जाता है। आत्मा का भाव समस्त कर्मों का कट जाना है।
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