





जीवन को जानना ही जब लक्ष्य बन जाता है, तभी जाकर सद्गुरू का द्वार खुलता है। मैं वही कहूंगा जो आप जान सकते हैं। लेकिन जानने से मेरा अर्थ है, जीना। जाने बिना जीवन जीना एक बोझ हे। इसमें कोई डूब तो सकता है पर उबरना मुश्किल है। जीवन को जानना ही जीवंत होना है तभी मनुष्य निर्भार, हल्का होता है और उड़ सकता है आकाश में। तभी पंख लगते हैं, तभी जंजीरे टूटती हैं।
लेकिन जानना कठिन है, किताबे पढ़ लेना, ज्ञान इकठठा कर लेना बहुत आसान। जो कठिनाई से बचता है वह धर्म से भी वंचित रह जायेगा। धर्म तो है ही उनके लिये जो असंभव में उतरने की तैयारी रखते हैं। धर्म कोई सोदा नहीं है। धर्म कोई समझोता भी नही हे। धर्म तो दांव है। धार्मिक लगा देता है स्वयं को दांव पर! और जो अपने को दांव पर लगाने को तैयार नहीं, वह जीवन के रहस्यों को जान नहीं पायेगा।
सभी कुछ दांव पर लगा दे कोई तो ही सद्गुरू के द्वार खुलते हैं। जीवन को दांव पर लगा देना ही सद्गुरू को प्राप्त करने की कुंजी है। अगर आप तैयार हों, तो उनकी जीवंत चोट आपके हृदय के तारों को भी हिला सकती हे। जो मेरे हृदय के कण-कण में बसे हैं वे आपके हृदय में निश्चिचत रूप से समाहित हो सकते हैं। इसकी संभावनायें हैं, अगर आप साथ दे तो सद्गुरू हृदय में समाहित हो सकते हैं।
आपके साथ की जरूरत तो होगी ही, क्योंकि आपका हृदय अगर बंद हे तो जबरदस्ती उसमें सत्य डालने का कोई उपाय नहीं है। यही एक चीज है जगत में जो जबरदस्ती नहीं दी जा सकती, जो आपके ऊपर थोपी नहीं जा सकती, जो आपको पहनाई नही जा सकती। इसके लिये आपका राजी होना, हृदय के द्वार खोलना अनिवार्य शर्त है, आपका खुला होना, आपका ग्राहक होना, आपका आमंत्रण, आपका अहोभाव से भरा हुआ हृदय होना आवश्यक हे। जैसे पृथ्वी वर्षा के पहले पानी के लिये प्यासी होती है और धरती में दरारे पड़ जाती हैं इस आशा में धरती जगह-जगह अपने ओंठ खोल देती है कि वर्षा हो और उसे वह अपने हृदय में समाहित कर सके। ऐसा ही हृदय जब आपका बनेगा तो सदगुरू को प्रवेश मिल पाता है। अन्यथा सदगुरू तो आपके द्वार से आकर लौटने को विवश हो जाते हैं। बहुत बार लौटें हैं , बहुत जन्मों-जन्मों से।
आप नये नहीं हैं, आपका पहली बार जन्म नहीं हुआ है इस पृथ्वी पर, कुछ भी नया नहीं है, आप बुद्ध के चरणों में भी बैठ कर सुने हैं, आपने कृष्ण को भी देखा हे, आप जीसस के पास भी उठे-बेठें हैं, लेकिन फिर भी दुर्भाग्य रत आपका आप वंचित रह गये अपने जीवन को जानने से जीवन के सत्य से! क्योंकि कभी भी आपका हृदय तैयार नहीं था। इसी कारण आपके पास से बुद्ध, महावीर, कृष्ण की सरिता बहती निकल गई। यदि आज भी आप नहीं जागे तो प्यासे रह जाओगे।
आनंद रो रहा था, जिस दिन बुद्ध के प्राण छूटने थे, छाती पीट रहा था। और बुद्ध ने कहा जरूरत से ज्यादा में तेरे पास रहा पूरे चालीस वर्ष में तेरे साथ था तो अब रोता क्यों है! मेरे मिटने से इतना परेशान क्यों हो रहा है? तो आनंद ने कहा है, इसलिये परेशान हो रहा हूं कि आप मेरे पास थे और मैं मिट ना पाया। अगर मैं मिट जाता तो आपको मेरे भीतर प्रवेश मिल जाता। चालीस साल नदी मेरे पास बहती रही और में प्यासा रह गया। मेरे से बड़ा दुर्भाग्यशाली, अभागा संसार में कोई है ही नहीं इसलिये अब रोता हूं, क्योंकि यह आवश्यक नही कि यह नदी दोबारा किस जन्म में मिलेगी और कब तक प्यासा मुझे भटकना पड़ेगा। आपने बुद्ध को दफनाया, महावीर को दफनाया, जीसस, कृष्ण, क्राइस्ट, सबको आप दफना कर जी रहें हैं, वे हार गये आपसे। पता नही आप कितने और बुद्धों को दफनायेंगे! अभी और कितने बुद्धों को आपके साथ मेहनत करनी पड़ेगी। में आपसे वही कहूंगा जो मैंने जाना है! अगर आप भी स्वयं में को खुलापन बना सकें, तो आप भी सद्गुरू को जान सकेंगे। ऐसा नहीं है कि कोई बहुत कठिनाई है! कठिनाई तो एक ही हे और वह आप हें।
जो बुद्ध ने जाना हो, महावीर ने, कृष्ण ने जाना हो, वह सभी आप भी तो जानते हैं! गीता में पढ़ कर आपको ऐसा नहीं लगता कि ये बातें तो हमें भी मालूम हैं? मालूम आपको भी हे, पर सिर्फ बुद्धि तक ही आपको मालूम है। आपके हृदय तक उनकी आवाज नहीं पहुंची, आपके हृदय तक वह बीज नहीं पहुंच पाया और बुद्धि पर रखे हुये विचार वैसे ही होते हैं, जेसे पत्थर पर कोई बीज(पौधा) को रख दे। वह बीज तो होता है, लेकिन पत्थर पर रखा रहता है। अंकुर नहीं फूट सकता। अंकुर फूटना हो तो बीज को पत्थर से गिरना पड़ेगा, जमीन खोजनी पड़ेगी। और जमीन की भी ऊपर की सतह ठीक नहीं होती, क्योंकि अंकुर फूटने के लिये और गीली जमीन चाहिये। थोड़ा जमीन के भीतर पहुंचना होगा।
जिज्ञासु व्यक्तियों के पास बहुत कुछ होता है, लेकिन पत्थर पर रखे हुये बीजों की भांति। जमीन भी ज्यादा दूर नहीं होती, लेकिन थोडी यात्रा उनसे होती नहीं है, वे वहीं पड़े रहना चाहते हैं, उन्हें भय होता है कि गिरे तो मिट जायेंगे। इसलिये जो सिर्फ जिज्ञासा से जीते हैं, वे विद्वान बन जाते हैं, पंडित बन जाते हैं, ज्ञानी बन जाते हैं, लेकिन कुछ अंकुरित नहीं हो पाता उनके भीतर, कोई नवीनता नहीं आती। कोई नये फूल नहीं खिलते, कुछ भी नया नहीं होता वे जैसे होते हैं वैसे ही रह जाते हैं। यदि आप भी सिर्फ जिज्ञासु हैं तो यात्रा नहीं हो पायेगी।
संसार में अगर सबसे ज्यादा कोई चीज दी जाती हे, तो वह मार्गदर्शन है! और सबसे कम अगर कोई चीज ली जाती है, तो वह भी मार्ग-दर्शन है, सभी देते हैं, लेता कोई भी नहीं है! जब भी आपको मौका मिल जाये किसी को सलाह देने का तो आप चूकते नहीं। यह जरूरी नहीं है कि आप सलाह देने योग्य हों। यह जरूरी नहीं है कि आपको कुछ पता भी है या नहीं लेकिन जब किसी को सलाह देनी हो तो शिक्षक होने का मजा छोड़ना मुश्किल हो जाता हे।
शिक्षक होने में सिर्फ इतना ही मजा है कि आप तत्काल ऊपर हो जाते हैं मुफ्त में और दूसरा नीचे हो जाता है। अगर कोई आपसे दो पेसे मोगने आये तो दो पैसे देने में कितना कष्ट होता है! क्योंकि कुछ देना पड़ता है जो आपके पास है। लेकिन सलाह देने में जरा भी कष्ट नहीं होता क्योंकि जो आपके पास हे ही नहीं, उसको देने में केसा कष्ट! आपका कुछ खो ही नही रहा है। बल्कि आपको कुछ मिल रहा है। मजा मिल रहा है, अहंकार मिल रहा है।
और सद्गुरू जो देते हें वह कोई सलाह, कोई मार्ग-दर्शन देने का मजा नहीं है। वह बड़ी पीड़ा है क्योंकि जो गुरूमुख से मिलता है वह अनुभव होता है, वह जान कर दे रहा होता है, वे बांट रहे होते हैं- कुछ बहुत हार्दिक, बहुत आंतरिक, संक्षिप्त इशारे होते हें लेकिन सागर के समान गहरे! बहुत हल्की सी चोटें हैं, लेकिन प्राण-घातक हैं। और अगर राजी हो जायेंगे तो तीर सीधा हृदय में चुभ जायेगा और जान लिये बिना न रहेगा। जान लेकर ही रहेगा। तब ही बीज अंकुरित हो पायेगा और आप छायादार वृक्ष, कल्प वृक्ष बन सकेंगे।
भगवान विष्णु के दस-अवतारों में श्रीकृष्ण अवतार सबसे सर्वश्रेष्ठ ओर सर्वप्रिय हैं। जो आज भी जन-जन के नायक हैं। उनके सम्पूर्ण जीवन में जीवन के सभी रंग, सभी तत्वों का समावेश है। शास्त्रों ने एक मत होकर उन्हें सम्पूर्ण माना है, जीवन के भौतिक पक्षों के प्रति भी और जीवन के आध्यात्मिक पक्षों के प्रति भी। भगवान श्रीकृष्ण कुशल तंत्रवेत्ता और साधक भी थे, जिन्होंने शिष्य रूप में अपने गुरू सांदीपन के सानिध्य में अनेक साधनाओं को सम्पन्न किया। अनेक राक्षसों का वध, अपने गुरू के मृत पुत्र को जीवित करने जैसी अनेक क्रियायें चौसठ कला पूर्ण व्यक्तित्व से ही निर्मित की। ऐसे योगेश्वर युग पुरूष जिन्हें जगदगुरू कहा गया हो उनके अवतरण का अवसर तो स्वतः ही सिद्ध मुहुर्त है। यह पर्व तो सही मायने में उत्साह, उल्लास, उमंग से युक्त होने का उत्सव है।
जीवन के विविध रंगों से युक्त भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण दिवस के चेतन्य अवसर पर चौस्ठ कला पूर्ण कृष्णत्व धन लक्ष्मी साधना महोत्सव 05-06 सितम्बर 2019 को ग़हडोल में सम्पन्न होगी। और यही वह चैतन्य अवसर होगा जब साधक अपने जीवन की सभी न्यूनताओं , परेशानियों , बाधाओं , दरिद्रता, अभाव को वेद मंत्रों से चैतन्य किये गये हवन कुण्ड में आहूत कर सकेगा। जिससे साधक के सम्पूर्ण जीवन में जीवन के सभी रंग, युद्ध, वीरता, शौर्य, प्रेम, मित्रता, सम्मोहन, आकर्षण, वैभव-ऐश्वर्य के सभी तत्वों का समावेश हो सके। और साथ ही कली मंत्र अंकन व विशिष्ट दीक्षायें प्राप्त कर सकेंगे।
जीवन उनका ही सफल एंव सतुष्ट होता हे, जिनके पास अपनी बुद्धि ओर अपना विवेक होता है। और वे ही समस्त भौतिक सुखों के अधिकारी होते हैं जो काल की गति को समझने में समर्थ हों, संतान सप्तमी के पूर्णत्व दिवस पर अपने सांसारिक जीवन को सभी शक्तियों से युक्त करने हेतु मा समलेश्वरी की तेजमय तपोभूमि पर 19-20 सितम्बर को समलेश्वरी धनदा लक्ष्मी महोत्सव सम्बलपुर उड़ीसा में सम्पन्न होगा। आद्या शक्ति के तेजमय तपोभूमि पर हवन, दीक्षा, अभिषेक, साधना, अंकन के माध्यम से जीवन की सभी व्याधियों के शमन के साथ ही समलेश्वरी चेतना शक्ति से आपूरित होकर भोतिक जीवन के आवश्यक लक्ष्मी तत्व को आत्मसात करने से आर्थिक सुदृढ़ता के साथ ही सभी भौतिक सुखों को पूर्णता से भोग सकेंगे।
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