





जब भी कोई व्यक्ति अपने आपको खोजने के लिये भीतर जायेगा तो पहले बुराइयों की खाईयां मिलेंगी और जब बुराइयों की खाईयां पार कर पाओगे, तभी भलाई के शिखर तक पंहुच सकोगे। इसलिये जो अपने आपको भला व्यक्ति मानकर बैठा है, वह भीतर जा ही न सकेगा। क्योंकि आपकी भले मानने की मान्यता ही डर पैदा करेगी कि यहां भीतर गये तो बुराईयों का सामना करना पड़ेगा और जो सामना करने से डरता है, वह कभी भीतर नहीं जा सकता। अगर आप अपने भीतर जाते हैं तो बड़ी आत्मग्लानि होगी, बड़ी आत्म निंदा जगेगी, लगेगा कि मुझसे बड़ा पापी संसार में कोई है ही नहीं। फिर आपको तकलीफ होगी, कष्ट होगा, पीड़ा होगी। इस संसार में अब तक मुझे ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसने स्वयं को जान बूझकर कष्ट में डाला हो। भीतर जाने का तात्पर्य ही है स्वयं की तकलीफें बढ़ाना, दुःखी होना, संतप्त होना।
वर्तमान समय में सांसारिक मनुष्य अपने बाहर भटक रहा है, फिर भी वह संतुष्ट नहीं हैं। बाहर भटकने का मतलब यह नहीं है कि आप संतुष्ट हो, दुःखी तो आप हो ही, भीतर गये तो और दुखी होना पड़ेगा। क्योंकि वहां अपनी बुराई की खाई से तुम्हारा साक्षात्कार होगा। इसलिये आप बाहर की चकाचौंध में जीते हो, अपने बुराईयों पर रेशमी लिबास डालकर जीते हो, अपनी ही बुद्धि से अपने आपको सही साबित कर बुराईयों को ढ़कने का पूरा प्रयास करते हो, वही व्यक्ति भलाई के शिखर को, गुणों के शिखर को प्राप्त कर पाता है जिसने बुराई की खाई को पार करने की हिम्मत जुटाई हो। जो साहस पूर्वक अपनी बुराई की खाई से गुजरा हो। जिसे संत होना है, उसे पहले पापी होना पड़ेगा, होना पड़ेगा का तात्पर्य है उसे पहले अपने पापों की खाई से गुजरना होगा। अपने बुराईयों से परिचित होना पडे़गा।
खाई से बचने के दो उपाय हैं या तो खाई में प्रवेश ही मत करो और खाई के बाहर ही अपनी जिंदगी बिता दो। जैसे भी हो अच्छे-बुरे, अमीर-गरीब, आस्तिक-नास्तिक वैसे ही जीवन बिता दो, आप वही जीवन जीना भी चाहते हो, जैसा आप हो, मेरा कहने का मतलब यह नहीं है कि आप सिर्फ बुरे ही हो, आपके भीतर सिर्फ कमियां ही कमियां हैं, ऐसा मैं नहीं कहता लेकिन आप अच्छा होने का प्रमाण भी नहीं दे पाओगे, और यदि आपने अच्छा किया भी है तो आपके बुराईयों का प्रतिशत अधिक है। मैं लाख प्रयास करूं दो दिन बाद आप फिर वहीं पहुंच जाते हो, मैं आपको बार-बार वहां से निकालने के लिये प्रयासरत हूं लेकिन आप मुझे अनसुना कर देते हो, आपकी बुद्धि इतनी तीव्र है कि मेरी बातों में भी अपनी बुद्धि से अर्थात् निकालते हो, जबकि ऐसा नहीं है कि आपके ऐसा करने से मैं रूक जाऊंगा मैं तो अपना प्रयास बार-बार करता ही रहूंगा, ठहरूंगा नही जब तक आप शिखर पर ना पहुंच जाओ। यदि आप वैसे जीवन बिता दोगे जैसे आप हो तो शिखर पर कभी नहीं पहुंच पाओगे। दूसरा उपाय यह है कि खाई में प्रवेश करो, प्रवेश करके गुजरना है, रूकना नहीं है। लेकिन खाई से मुक्त होने के लिये खाई से गुजरना ही पडे़गा।
पुण्य के सभी शिखर पाप से घिरे हैं। गुलाब के फूल के चारों ओर कांटे ही कांटे हैं। उन कांटों से भयभीत मत होना। जबकि यह प्रयास करना है कि कांटों से बचते हुये, अपने आपको सुरक्षित करते हुये पुण्य के शिखर तक पहुंचना है। अर्थात् आप जब किसी धार्मिक, सामाजिक, जनकल्याण का काम करने जाते हैं तो आपके आस-पास के लोग रोकते हैं कि क्या व्यर्थ में गुरू के पास जा रहा है, वहां कुछ नहीं मिलेगा तुझे, समाज खाने को नहीं देगा, तुम्हें रोटियां नहीं देगा। तुम्हारे परिवार का पोषण नहीं करेगा, मां-बाप रोकेंगे माला फेरने से भोजन उपलब्ध नहीं होता। आपके आस-पास का वातावरण दूषित है, इतना दूषित है कि आपको प्रत्येक क्षण पाप की ओर अग्रसर कर रहा है, आप विचार करेंगे तो आपको स्वयं में मालूम पड़ जायेगा कितना दूषित वातावरण है। इन्हीं से पाप रूपी कांटो से बचते हुये पुण्य के शिखर तक जाना है। ध्यान रखना जितनी गहरी खाई होगी, उतना ही ऊंचा शिखर निकट होगा। इसलिये न तो निंदा से घबराना, न भयभीत होना, न आत्मग्लानि अनुभव करना, न ऐसा समझना कि अब क्या होगा?
मैं तो पापी हूं! अगर आप पापी हैं तो कहीं ना कहीं पुण्य भी छुपा होगा और ढूढोंगे तो देर-सबेर मिल ही जायेगा। इस खाई में पड़ना ही मत। इससे सिर्फ गुजरना है। क्रोध आ जाये तो आने दो, कामवासना सताये तो सताने दो, इससे लड़ना मत। इसमें सिर्फ गुजरने की क्रिया सम्पन्न करनी है, इसी भाव के साथ कि यह खाई है और इससे गुजरना है, इसमें कोई रस लेने का प्रयास मत करना, रस लोगे तो उस दलदल में फंस जाओगे। फिर कितने वर्ष लगेंगे तुम्हें वहां से निकलने में, ये आप पर निर्भर है, अगर आप समझ गये उसी क्षण तो पार हो जाओगे। लेकिन रस लेने के बाद समझना आसान ना होगा। इसलिये सिर्फ गुजरना है। जिस प्रकार राही गुजरता है उसी प्रकार, अगर मैं जा रहा हूं धूप की तरफ और बीच में छाया पड़ती है तो मैं सिर्फ इससे गुजरता हूं। इसमें क्या लड़ना ? इस छाया से क्या करना है? मैं जानता हूं कि छाया के बाद सूर्य का प्रखर प्रकाश है, पार हो जाने का रास्ता है।
बूंद अगर सागर में गिर जाये तो खोजी भी जा सकती है। बड़ी छोटी चीज है, मुश्किल पड़ेगी, कठिनाई होगी फिर भी खोजते-खोजते किसी दिन बूंद मिल सकती है। लेकिन अगर बूंद में सागर गिर जाये, तो खोज का उपाय ही न रहा। कैसे खोजोगे ? सब विचार चकनाचूर हो जाते हैं। बूंद में सागर का गिरना विचार शक्ति की सीमा से पार चला जाता है। जब सागर बूंद में गिर जाता है——ऐसी कोई घटना भौतिक जगत में घटती नहीं, लेकिन इस आत्मिक जगत में घटती है। ऐसा नही है कि सिर्फ आप ही जाकर परमात्मा से मिलते हो। बल्कि ऐसा भी है कि परमात्मा आकर आपसे मिल जाता है। आप से एकाकार हो जाता है। बूंद को तो सिर्फ तैयार होना है, जिस दिन तैयार हुआ उस दिन सागर गिर पड़ता है। फिर बूंद को कहां खोजियेगा? वह तो अब सागर बन गया। अब तो बूंद का अस्तित्व ही ना बचा। लेकिन धार्मिक आदमी अक्सर बूंद बनकर सागर की खोज पर निकलता है, जब कि सागर यहीं मौजूद है। धार्मिक आदमी कहता है कि ईश्वर की खोज पर जा रहे हैं। ज्यादा बेहतर होता कि ईश्वर की खोज पर न जाते, हृदय के द्वार खोलते, ताकि ईश्वर गिर सके। मगर हृदय के द्वार बंद हैं और हिमालय की यात्रा चल रही है। मक्का और मदीना और काशी की यात्रा चल रही है। कहीं भी घूम आओ, कुछ भी कर लो, यदि हृदय के द्वार बंद हैं तो सागर उसमें नहीं गिर सकता। इसमें सागर का दोष नहीं है।
सावन मास की पूर्णता के साथ श्रावण पूर्णिमा और रक्षेश्वर पर्व का विशिष्ट योग अवश्य ही प्रत्येक साधक के जीवन का उज्ज्वलतम पृष्ठ होगा। क्योंकि ऐसे ही विशिष्ट योगों में ही शिष्य के जीवन निर्माण की श्रेष्ठ क्रियायें सद्गुरू के द्वारा सम्पन्न होती है। जो साधक ऐसे विशिष्ट अवसरों का लाभ प्राप्त कर पाते हैं, वे ही भौतिक और आध्यात्मिक सुख के अधिकारी होते हैं। अन्यथा आज का सामान्य मानव तो इन अवसरों को भी अनर्गल क्रिया-कलापों में व्यतीत कर देता है इसीलिये वह जीवन में दुःखी, संतप्त, परेशान, असफल, रोग ग्रस्त रहता है। आज के इस प्रतिस्पर्धा के युग में व्यक्ति को कितना श्रम करना पड़ता है इससे हर कोई परिचित है फिर भी हमें उचित सफलता नहीं मिल पाती। ऐसे अवसरों पर दैवीय शक्तियों की चेतना को आत्मसात करने से जीवन प्रत्येक दृष्टि से सफलता की और बढ़ता है और साधक अपनी सभी न्यूनताओं पर विजय प्राप्त कर लेता है। ऐसे ही विशिष्ट अवसर पर प्रेम, आह्लाद, आनन्द, प्रसन्नता को सृजन कर जीवन में स्थापित करने के साथ ही भौतिक और आध्यात्मिक सुखों को रक्षित करने हेतु सावन शिव शक्ति लक्ष्मी वृद्धि साधना महोत्सव 29- 30 अगस्त मधुबनी बिहार में सम्पन्न होगा। यह विशिष्ट अवसर निश्चित रूप से प्रत्येक साधक-साधिका के जीवन में सुवृद्धि, चेतना, प्रेम और जीवन रक्षक सद्गुरू की चेतना से आपूरित करने में समर्थ होगा।
भिन्न-भिन्न स्थानों पर आज भी ‘कृष्णलीला’, श्रीमद् भागवत् कथा तथा रासलीला जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, और इन कार्यक्रमों के माध्यम से कृष्ण के जीवन पर तथा उनके कार्यों पर प्रकाश डाला जाता है। लेकिन यह सिर्फ उनके बारे में जानकारी प्राप्त करने की क्रिया होती है, वास्तव में आवश्यकता इस बात की है कि कृष्ण चरित्र को जीवन में उतारें, यह प्रत्येक साधक के जीवन की सार्थकता होगी कि वह उन मार्गो पर चलें जो सोलह कला पूर्ण है, वह मार्ग है साधना का, तप का, संयम का, त्याग का।
ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, वैराग्य ज्ञान गुणों से आपूरित षोड़श कला पूर्ण कृष्णत्व धन लक्ष्मी साधना महोत्सव 05-06 सितम्बर 2015 को शहडोल में सम्पन्न होगी। जिससे आप कृष्ण के समान महामानव के रूप में धर्म-पालन, अध्यात्म विचार, ज्ञान-विज्ञान, मैत्री, गुरू भक्ति, मातृ-पितृ भक्ति, पत्नी-प्रेम, स्त्री जाति के प्रति आदर, राजनीति, गृहस्थ रण-कौशल में सफल हो सके और जीवन के सभी कंस रूपी बाधाओं, दोषों को समाप्त कर गृहस्थ के महासंग्राम में कृष्ण के समान भक्ति, शक्ति, बुद्धि, पराक्रम तथा नीति से युक्त होकर आध्यात्मिक और भौतिक पक्ष के साथ लक्ष्मी की शक्तियों से योगेश्वरमय चेतनाओं को पूर्णता से प्राप्त कर सकेंगे।
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