





प्रेम ही वह साधना है, जो आपको ब्रह्म से साक्षात्कार करा सकता है, समाज में मान-मर्यादा से जीने का स्थान दिला सकता है। प्रेम करने के लिए या प्रेम को पाने के लिए हमें सबसे पहले क्षमा करना सीखना अनिवार्य है, क्योंकि क्षमा करना ही सबसे कठिन कार्य है। जब हम समाज के मध्य रह रहे है, तो हमारे सामने प्रतिक्षण छल, कपट, झूठ आते ही रहते है, और यही से आरम्भ होती है हमारे जीवन की परीक्षा और एक अन्तर्द्वन्द्व। यदि हम इस छल-कपट भरे समाज में रहते हुए भी क्षमाशील एवं सहनशील बने रहे सकें, तो हमारे जीवन का रूख ही बदल जाएगा और हम प्रेम के रास्ते पर आगे बढ़ सकेंगे।
अब प्रश्न यह उठता है, कि प्रेम का कौन सा स्वरूप ऐसा है, जो जीवन के अन्तिम क्षण तक कायम रह सकता है, जिसके अन्दर हम खो जाएं, स्वयं का भान भी न रहे, कि हम कौन है, हमारा वजूद क्या है?
पति-पत्नी का या माता-पिता का अपनी संतान से प्रेम तो फिर भी स्वार्थ पर आधारित होता है। परन्तु एक प्रेम ऐसा भी है, जिसके लिए यह जीवन भी छोटा पड़ जाता है, मन ऊबता ही नहीं और जब हम उस नूर के प्रेम-पाश में बंधकर उसके लिए बेचैन है, उसकी एक झलक देखे बिना ऐसा लगता है, कि आज का दिन हमारे लिए कितना दुःखदायी है, कितनी बेचैनी है, कि बरबस ही होठों से यह शेर निकल पड़ता है-
इश्क तो एक दरिया है, जिसमें डूबकर ही जीवन का आनन्द पाया जा सकता है ओर यह प्रेम, यह मोहब्बत तो सिर्फ अपने इष्ट से ही की जाती है, अपने गुरूदेव से ही की जा सकती है, क्योंकि इस जहां में प्रेम करने के लिए, तो उनके अलावा कोई है ही नहीं।
जब इस सृष्टि का निर्माण हो गया ओर इस धरा पर प्राणियों का पदार्पण हुआ, तो उस समय प्रेम जैसा कोई शब्द नहीं था, एक दूसरे के प्रति कोई आकर्षण या सद्भाव भी नहीं था, मात्र पशुता थी। धीरे-धीरे सृष्टि के नियन्ता द्वारा ज्ञान का प्रकाश हुआ, तो सर्वप्रथम वर्णमाला (अ,इ,ऊ,क,ख,ग) का ज्ञान हुआ, फिर शब्द बना, फिर अर्थ और अर्थ के बाद धीरे-धीरे हृदय में भाव उत्पन्न हुआ और यही भाव ही तो हमें भगवान से मिला देता है अपने गुरूदेव से एकाकार करा देता है। भगवान तो भाव के भूखे होते है, जब भक्त विह्वल कण्ठ से अपने इष्ट को बुलाता है, तो उसे प्रभु तुरन्त दर्शन देते ही है।
प्रेम तो एक तपस्या है, साधना है, पूजा है। मीरा ने मारवाड़ में प्रेम की वीणा का ऐसा तार छेड़ा, कि पूरा मारवाड़ ही उस प्रेम में डूब गया। हालांकि उन्हें इस प्रेम के रास्ते में बहुत-बहुत ठोकरें लगीं, किन्तु वे तो प्रेम में इतनी मतवाली थी, कि उन्हें समाज की ठोकरों से पीड़ा नहीं होती थी। अपने प्रियतम के प्रेम में इतनी दीवानी थी, कि लोगों की गाली में उन्हें अपने कान्हा की बांसुरी सुनाई देती थी। इतिहास गवाह है, कि चाहे चैतन्य महाप्रभु हों, नरसी मेहता हों या सन्त तुकाराम, इन सभी ने प्रेम के बल पर ही प्रभु को पाया है।
प्रेम तो हम लोग भी करते है, किन्तु क्या प्रेम ऐसे ही होता है?
नहीं! प्रेम ऐसे नहीं हो सकता, जिस प्रकार एक म्यान में एक ही तलवार रह सकती है, एक जंगल में एक ही शेर होता है और एक स्त्री का एक ही पति होता है, उसी प्रकार एक दिल में एक ही चीज हो सकती है, चाहे वह झूठ हो, छल हो, कपट हो, दिखावा हो या प्रेम हो और यदि ये सब है, तो इनके साथ प्रेम कैसे रह सकता है? क्या हमारे दिल में एक साथ इतनी चीजें रहते हुए किसी से प्यार हो सकता है, कभी नहीं, और जब हम प्यार नहीं कर सकते, तो भला प्रभु को कैसे पा सकते है। प्यार तो अपने आपको अपने प्रियतम के प्रति कुर्बान कर देना है। जिस प्रकार एक पतंगा अपने को समाप्त कर देता है, उसी प्रकार शिष्य गुरू को प्यार करके अपने अस्तित्व को मिटा कर अपने प्रियतम गुरूदेव के प्रति समर्पित हो जाए, उनके प्यार में अपने को डुबा दे, फिर भला आपको उस शक्ति पून्ज में डूबने से कौन रोक सकता है। करते रहिए साधना आप वर्षो तक, क्या हो जाएगा उससे? कौन सी शान्ति आप प्राप्त कर लेंगे? शक्ति तो गुरूदेव के पास है उन्हें प्रसन्न किए बिना कुछ भी प्राप्त करना सम्भव नहीं है।
‘शक्ति’ को पावर या ताकत भी कह सकते है। आज के युग में बिना शक्ति के जीवन नहीं चल सकता है। विज्ञान ने विद्युत के रूप् में शक्ति का आविष्कार किया। विद्युत का उत्पादन भाखड़ा नांगल से होता है, उस विद्युत शक्ति को रोकने के लिए या एकत्र करने के लिए पावर हाउस का निर्माण किया और फिर करोड़ो की संख्या में छोटे-बड़े ट्रान्सफॉर्मरों का निर्माण किया, जिसे एक नहीं बल्कि करोड़ो उपायों से लोगों की जरूरत के अनुसार वितरण किया, यानि मानव द्वारा निर्मित शक्ति को संभालने के लिए इतनी व्यवस्था करनी पड़ती है, जो कि बहुत ही कण मात्र है।
अब जरा सोचिए, क्या उस ब्रह्माण्ड की शक्ति को प्राप्त करना हमारे बस की बात है? क्या आप उसे रोकने की शक्ति रखते हैं?
‘नहीं’, ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण शक्ति तो गुरू ही अपने अन्दर समाहित कर सकता है। सृष्टि को चलाना तो सद्गुरू के हाथ में है, इसीलिए तो गुरू को ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहा गया है, बल्कि गुरू तो इनसे भी बहुत-बहुत आगे होते हैं।
ब्रह्मा ने यदि नर के रूप में जन्म लिया, तो गुरू ने नारायण बना दिया, विष्णु यदि पालनकर्ता है, तो गुरू ने अपने ज्ञान से उस नर-नारी के अन्दर तरह-तरह के ज्ञान प्रदान कर आविष्कारक बना दिया, शिव ने संहार का जिम्मा लिया, तो गुरू ने क्षमावान का। किन्तु जीवन का विशेष उपयोगी पाठ प्रेम का है, यह तो गुरू ने ही सिखाया, इसीलिए तो गुरू का स्थान सर्वोपरि है। और जब हमें यह मालूम होता है, कि गुरू में ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है, तो फिर हम थोड़े की लालसा क्यों करे, हमे तो सब कुछ भूलकर अपने आपको गुरूदेव के श्रीचरणों में विसर्जित कर देना चाहिए, गुरू की दृष्टि के लिए, सारे जहां के कल्याण के लिए है-
प्रेम करना है, तो अपने नारायण को करो। मीरा अपने नारायण की दासी थी। वह तो इतिहास की बात हो गई। कृष्ण के बारे में ‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरू’ कहा गया है, यह भी इतिहास की बात है और कहते है इतिहास अपने आपको दोहराता है-
मीरा भी भक्त भी हम और आप भी भक्त है। कबीर भक्त थे, जो अपने इष्ट को प्रियतम के रूप में देखते थे, उसी तरह सिद्धाश्रम के सारे गुरू भाई-बहन गुरूवर नारायण के दास है। आज फिर एक इतिहास की रचना हो रही है, फिर प्रेम के फुहार से सरोबार होने का समय आ रहा है। आज ‘निखिलं वन्दे जगद्गुरू’ के स्वर झंकृत हो रहे है।
यदि आज हम फिर चूक गए, अपने परिवार के बन्धन में फंस कर, धन के लोभ में पड़कर, तो भला सद्गुरू को कैसे पाएंगे? कैसे हम यह कह पाएंगे, कि हम तो केवल गुरूदेव के ही है।
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