





कितने लोग यह सोचकर बैठ गये हैं कि प्रभु की कृपा से सबकुछ उपलब्ध होगा तो हमें कुछ भी नहीं करना है। यदि प्रभु-कृपा का ऐसा अर्थ लेते हैं कि आपको कुछ भी नहीं करना है, तो आप बड़ी भ्रांति में हैं। दूसरी और भी इसमें भ्रांति है कि प्रभु की कृपा सबके ऊपर समान नहीं है। लेकिन प्रभु-कृपा किसी पर कम और ज्यादा नहीं हो सकती। प्रभु के चहेते कोई भी नहीं है। और अगर प्रभु के भी चहेते हों तो फिर इस जगत में न्याय का कोई उपाय न रह जायेगा। प्रभु की कृपा का तो यह अर्थ हुआ कि किसी पर कृपा करता है और किसी पर अकृपा भी रखता है। ऐसा अर्थ लिया हो तो वैसा अर्थ गलत है। लेकिन किसी और अर्थ में सही है। प्रभु की कृपा से उपलब्ध होता है, यह उनका कथन नहीं है जिन्हें अभी नहीं मिला, यह उनका कथन है जिन्हें मिल गया है और उनका कथन इसलिये है कि जब वह मिलता है, तो अपने किये गए प्रयास बिलकुल ही असंगत मालूम पड़ते हैं। जब वह मिलता है, तो जो हमने किया था वह इतना क्षुद्र और जो मिलता है वह इतना विराट कि हम कैसे कहें कि जो हमने किया था उसके कारण यह मिला है? जब मिलता है तब ऐसा लगता हैः हमसे कैसे मिलेगा? हमने किया ही क्या था? हमने दिया ही क्या था? हमने सौदे में दांव क्या लगाया था? हमारे पास था भी क्या जो हम करते? था भी क्या जो हम देते? जब उसकी अनंत-अनंत आनंद की वर्षा होती है तो उस वर्षा के क्षण में ऐसा ही लगता है कि तेरी कृपा से ही, तेरे प्रसाद से ही उपलब्ध हुआ। हमारी क्या सामर्थ्य, हमारा क्या वश!
लेकिन यह बात उनकी है जिनको मिला। यह बात अगर उन्होंने पकड़ ली जिनको नहीं मिला, तो वे सदा के लिए भटक जायेंगे। प्रयास करना ही होगा। निश्चित ही, प्रयास करने पर मिलने की जो घटना घटती है वह ऐसा है, जैसे किसी का द्वार बंद है, सूरज निकला है, ओर घर में अंधेरा है। वे द्वार खोलकर प्रतीक्षा करें, सूरज भीतर आ जायेगा। सूरज को बांधकर भीतर नहीं लाया जा सकता, वह अपनी ही कृपा से भीतर आता है।
यह मजे की बात है, सूरज को हम भीतर नहीं ला सकते अपने प्रयास से, लेकिन अपने प्रयास से भीतर आने से रोक जरूर सकते हैं। द्वार बंद करके, आँख बंद करके बैठ सकते हैं। तो सूरज की महिमा भी हमारी बंद आँखों को पार न कर पायेगी। सूरज की किरणों को हम द्वार के बाहर रोक सकते हैं। रोक सकने में समर्थ हैं, ला सकने में समर्थ नहीं। द्वार खुल जाये, सूरज भीतर आ जाता है। सूरज जब भीतर आ जाये तो हम यह नहीं कह सकते कि हम लाए; हम इतना ही कह सकते हैं, उसकी कृपा, वह आया। और हम इतना ही कह सकते हैं कि हमने अपने ऊपर कृपा की हमने द्वार बंद नही किये।
हमारे प्रयास सिर्फ द्वार खोलना हैं, आना तो उसकी कृपा से ही होता है। लेकिन उसकी कृपा हर द्वार पर प्रकट होती है। लेकिन कुछ द्वार बंद हैं, वह क्या करे? बहुत द्वारों पर ईश्वर खटखटाता है और लौट जाता है; वे द्वार बंद हैं। मजबूती से हमने बंद किए हैं। और जब वह खटखटाता है, तब हम न मालूम कितने बहाने करके अपने को समझा लेते हैं।
एक बड़ा मंदिर, उस बड़े मंदिर में सौ पुजारी बड़े पुजारी ने एक रात स्वप्न देखा है कि प्रभु ने खबर की है स्वप्न में कि कल मैं आ रहा हूँ। विश्वास तो न हुआ पुजारी को। पुजारी को भरोसा तो न आया कि भगवान आयेगा, कभी नहीं आया। वर्षों से पुजारी है, वर्षों से पूजा की है, भगवान कभी नहीं आया। भगवान को भोग भी लगाया है, वह भी अपने को ही लग गया है। भगवान के लिये प्रार्थनाएं भी की हैं, वे भी खाली आकाश में- जानते हुये कि कोई नहीं सुनता – की हैं। सपना मालूम होता है। समझाया अपने मन को कि सपने कहीं सच होते हैं! लेकिन फिर डरा भी, भयभीत भी हुआ कि कहीं सच ही न हो जाये। कभी-कभी सपने भी सच हो जाते हैं, कभी-कभी जिसे हम सच कहते हैं, वह भी सपना हो जाता है।
तो अपने निकट के पुजारियों को उसने कहा कि सुनो, बड़ी मजाक मालूम पड़ती है, लेकिन बता दूं। रात सपना देखा कि भगवान कहते हैं कि कल आता हूँ। दूसरे पूजारी भी हंसे; उन्होंने कहा, पागल हो गये! सपने की बात किसी और से मत कहना, नहीं तो लोग पागल समझेंगे। पर उस बड़े पुजारी ने कहा कि कहीं अगर वह आ ही गये! तो कम से कम तैयार तो कर लें। नहीं आया तो कोई हर्ज नहीं, आया तो हम तैयार तो मिलेंगे।
तो मंदिर धोया गया, पोंछा गया, साफ किया गया; फूल लगाए गये, दीये जलाए गए; सुगंध छिड़की गई, धूप-दीप सब; भोग बना, भोद्वजन बने। दिन भर में पुजारी थक गए; कई बार देखा सड़क की तरफ, तो कोई आता हुआ दिखाई न पड़ा। और हर बार जब देखा तब लौटकर कहा, सपना सपना है, कौन आता है, हम पागल बने। अच्छा हुआ, गांव में खबर न की, अन्यथा लोग हँसते।
सांझ हो गई। फिर उन्होंने कहा, अब भोग हम अपने को लगा लें। जैसे सदा भगवान के लिए लगा भोग हमको मिला, यह भी हम ही को लेना पड़ेगा। कभी कोई आता है! सपने के चक्कर में पड़े हम पागल बने, हम-जानते हुए पागल बने। दूसरे पागल बनते हैं न जानते हुए, हम…हम जो जानते हैं भलीभांतिः कभी कोई भगवान नहीं आता। भगवान है कहां? बस यह मंदिर की मूर्ति है, ये हम पुजारी हैं, यह हमारी पूजा है। फिर सांझ उन्होंने भोग लगा लिया, दिन भर के थके हुए वे जल्दी ही सो गये।
आधी रात गये कोई रथ मंदिर के द्वार पर रूका। रथ के पहियों की आवाज सुनाई पड़ी। किसी पुजारी को नींद में लगा कि कोई रथ आ गया। उसने जोर से कहा, सुनते हो, जागो! मालूम होता है जिसको हमने दिन भर प्रतीक्षा की, वह आ गये रथ के पहियों की जोर-जोर की आवाज सुनाई पड़ती है। दूसरे पुजारियों ने कहा, पागल, अब चुप भी रहो; दिन भर पागल बनाया, अब रात ठीक से सो लेने दो। यह पहियों की आवाज नहीं, बादलों की गड़गड़ाहट है। और वे सो गए, उन्होंने चर्चा कर ली। फिर किसी पुजारी की नींद खुली, फिर उसने कहा कि मालूम होता है वह आ गये भगवान जिसकी हमने प्रतीक्षा की! कोई द्वार खटखटाते है। लेकिन दूसरों ने कहा कि कैसे पागल हो, रात भर सोने दोगे या नहीं? हवा के थपेड़े हैं, कोई द्वार नहीं थपथपाता है। फिर वे सो गए।
फिर सुबह वे उठे, फिर वे द्वार पर गए। किसी के पद-चिन्ह थे, कोई सीढ़ियां चढ़ा था, और ऐसे पद-चिन्ह थे जैसे अलौकिक जो बिलकुल अज्ञात थे। और किसी ने द्वार जरूर खटखटाया था। और राह तक कोई रथ भी आया था। रथ के पहियों के चिन्ह थे। वे छाती पीटकर रोने लगे। वे द्वार पर गिरने लगे। गांव की भीड़ इकट्ठी हो गई। वह उनसे पूछने लगे, क्या हो गया है तुम्हें? वे पुजारी कहने लगे, मत पूछो। हमने व्याख्या कर ली और हम सो गए। परमात्मा द्वार खटखटाए, हमने समझा हवा के थपेड़े हैं। उनका रथ आया, हमने समझी बादलों की गड़गड़ाहट है। और सच यह है कि हम कुछ भी न समझे थे, हम केवल सोना चाहते थे।
सारांश यही है कि भगवान तो सभी के द्वार खटखटाते है। उनकी कृपा तो सब द्वारों पर आती है। लेकिन हमारे द्वार बंद हैं। और कभी हमारे द्वार पर दस्तक भी दे तो हम कोई गलत सोच विचार कर लेते हैं।
पुराने दिनों के लोग कहते थे, अतिथि देवता हैं। थोड़ा गलत कहते थे। देवता अतिथि है। देवता रोज ही अतिथि की तरह खड़े हैं। लेकिन द्वार तो खुला होना चाहिये! उसकी कृपा सब पर है। भगवान की कृपा से ही सब मिलता है, हमारे प्रयास सिर्फ द्वार खोलना है, सिर्फ मार्ग की बाधाएं अलग कर पाते हैं; जब वह आता है, अपने से आता है।
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