





वह है, उनकी ‘अन्नपूर्णा सिद्धि’। गढ़वाल में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति बचा होगा, जिसने शिवानन्द आश्रम की यात्रा नहीं की होगी और भोजन नहीं किया होगा। सभी शिष्य अत्यन्त नम्र, विनीत और आग्रह करके भोजन कराते हैं, जबकि पूरे आश्रम में किसी प्रकार का कोई खाद्य पदार्थ नहीं है। जो वैज्ञानिक दृष्टि कोण की रट लगाए रहते हैं, उनके लिए इस आश्रम का द्वार सदैव खुला है, वे जाकर अपनी बुद्धि आजमा सकते हैं।
स्वामी शिवानन्द जी पूज्यपाद सद्गुरूदेव निखिलेश्वरानन्द जी के शिष्य रहे हैं और कई वर्षों तक उनके साथ रह कर उनकी सेवा करते हुए साधनाऐं संपन्न की थी। उनके द्वारा ही स्वामी शिवानन्द जी को अन्नपूर्णा साधना प्राप्त हुई थी और सिद्ध होने पर आज्ञा दी थी कि तुम्हें गढ़वाल में ही कहीं पर आश्रम स्थापित करना है और गरीब लोगों के लिए अन्न, धन जुटाना है। गरीब बच्चों की शिक्षा व्यवस्था करनी है एवं साथ ही आध्यात्मिक चेतना भी जाग्रत करनी है। आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व जब सद्गुरूदेव गृहस्थ रूप में उनके आश्रम पहुँचे थे, तो एकदम जड़वत् खड़े के खड़े ही रह गए, उनकी आँखों से अश्रुधार निकलने लगी और वे गुरूदेव के चरणों में प्रणिपात हो गए। इस अवसर पर सद्गुरूदेव के साथ ही गए एक शिष्य ने लिखा है कि आश्रम में ही एक कुटिया थी, कुटिया में न तो किसी प्रकार का बर्तन था और न ही किसी प्रकार का कोई खाद्य पदार्थ था। बाहर भोजन हो रहा था, उस कुटिया में शिष्य आते, जमीन पर हाथ रखते, और जिस पदार्थ की कामना करते उससे संबंधित पदार्थ उनके हाथ के सामने उपस्थित हो जाता और वह शिष्य उसे परोसने बाहर चला जाता। इसी सिद्धि के आधार पर स्वामी शिवानन्द जी ने इलाहाबाद के एक कुम्भ मेले के अवसर पर दस हजार साधुओं को भोजन कराया था। अन्नपूर्णा साधना आज भी योगियों के पास सुरक्षित है और साधना द्वारा उसे सिद्ध किया जा सकता है, परन्तु इसके लिए साधक का सुसंकल्पों से पूर्ण होना आवश्यक है।
सिद्धि लक्ष्मी अन्नपूर्णा मात्र अन्न या धान्य प्राप्ति की ही देवी नहीं हैं, वह तो अन्न के साथ ही गृहस्थ और भौतिक उन्नति के लिए आवश्यक संस्कार भी साधक को प्रदान करती है। यह कहावत मशहूर है जैसा होगा अन्न, वैसा होगा मन जैसा होगा पाणी, वैसी होगी वाणी अर्थात् अन्न मात्र कोई पेट भरने वाली वस्तु नहीं है, अपितु व्यक्ति के समस्त संस्कारों और जीवन में पग- पग पर किये गए कृत्य, उसके ग्रहण किए गए अन्न से ही निर्मित होता है। यदि अन्न पवित्र होगा, शुद्ध होगा, सद्वृत्ति से उपार्जित होगा, तो निश्चय ही उसे ग्रहण करने वाले में बुद्धि, संस्कार, सद्वृत्ति का विकास होगा। शास्त्रों में कहा गया है- अन्नब्रह्मं अर्थात् अन्न गेहूं या चावल के ढ़ेर को ही नहीं कहते बल्कि अन्न तो साक्षात् ब्रह्म का स्वरूप है, जिससे पूरे शरीर का निर्माण हुआ है, जिससे पूरे शरीर को जीवन शक्ति प्राप्त होती है। आर्य परिवारों में बालकों को यह शिक्षा दी जाती है कि भोजन करने से पूर्व भगवान को स्मरण कर भोजन अर्पित करें और यह अन्न ईश्वर रूपी प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना ही दिव्यता का सूचक है। भोजन कई प्रकार के होते हैं, तामसिक, राजसिक और सात्विक-इसी के अनुसार उग्र, तेजस्वी और सरल व्यक्तित्व बनता है। भक्ष्य अभक्ष्य में भेद न करने वालों की बुद्धि भी वैसी ही हो जाती है, जबकि जो सही साधक और सात्विक भाव से ईश्वर का पूजक होता है, वह इस बात को जानता है कि अन्न का मन से कितना गहरा संबंध है और वह सात्विक आहार ही ग्रहण करता है। जिससे उसमें सत् तत्व की वृद्धि होती है और सत्रूपी ईश्वर से तदात्मय के भाव में निरन्तर वृद्धि होती है।
अन्न के तामसिक या सात्विक होने पर ही इतिश्री नहीं हो जाती, अपितु यह भोजन का निर्माण करने वाले व्यक्ति के आचार, विचार, संस्कार, पवित्रता-अपवित्रता आदि का भी भोजन पर प्रभाव पड़ता है। महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था। धर्मराज युधिष्ठिर एकछत्र सम्राट हो गये थे। श्रीकृष्ण चन्द्र की सम्मति से अपने भाईयों तथा रानी द्रौपदी के साथ युद्धभूमि में मृत्यु शय्या पर पड़े प्राणत्याग के लिये सूर्य उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते परम धर्मज्ञ भीष्म पितामह के समीप आये। युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म पितामह उन्हें वर्ण, आश्रम तथा राजा प्रजा आदि के विविध धर्मों का उपदेश प्रदान कर रहे थे। यह धर्मोंपदेश चल ही रहा था कि रानी द्रौपदी को हंसी आ गयी। ‘बेटी ! तुम हँसी क्यों ?’ पितामह ने उपदेश बीच में ही रोक कर पूछा।
द्रौपदी ने संकुचित हो कर कहा- ‘मुझसे भूल हुई। पितामह मुझे क्षमा करें।’ पितामह बोले बेटी ! कोई भी शीलवती कुल वधू गुरूजनों के सम्मुख अकारण नहीं हँसती। तुम गुणवती हों, सुशीला नारी हों। तेरी हँसी अकारण हो नहीं सकती। संकोच छोड़कर तू अपने हँसने का कारण बता।’ हाथ जोड़कर द्रौपदी बोली-‘दादाजी ! यह बहुत ही अभद्रता की बात है किन्तु आप आज्ञा देते हैं तो कहनी पड़ेगी। आपकी आज्ञा मैं टाल नहीं सकती। आप धर्मोपदेश कर रहे थे तो मेरे मानस में यह बात आयी कि ‘आज तो आप धर्म की ऐसी बात की व्याख्या कर रहे हैं, किन्तु कौरवों की सभा में जब दुःशासन मुझे नंगी करने लगा था, तब आपका यह धर्मज्ञान कहाँ चला गया था। मुझे लगा कि यह धर्म का ज्ञान आपने पीछे सीखा है। मन में यह बात आते ही मुझे हँसी आ गई। आप मुझे क्षमा करें।’ पितामह ने शान्तिपूर्वक समझाया- बेटी ! इसमें क्षमा करने की कोई बात नहीं है। मुझे धर्म ज्ञान तो उस समय भी था, परन्तु दुर्योधन का अन्यायपूर्ण अन्न खाने से मेरी बुद्धि मलिन हो गयी थी, इसी से उस द्युतसभा में धर्म का ठीक निर्णय करने में असमर्थ हो गया था। परन्तु अब अर्जुन के बाणों के लगने से मेरे शरीर का सारा मलिन रक्त निकल गया है। दूषित अन्न से बने रक्त के शरीर से बाहर निकल जाने के कारण अब मेरी बुद्धि शुद्ध हो गयी है। इससे इस समय मैं धर्म का तत्व ठीक से समझता हूं और उसका विवेचन कर रहा हूं। साधक के जीवन में भी अन्न का महत्व बहुत ही श्रेष्ठतम होता है। अन्नपूर्णा जीवन में अन्न, धन्य एवं सकल भोज्य पदार्थों को प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजित हैं।
आज भी भारत में कई ऐसे योगी हैं जिन्हें अन्नपूर्णा सिद्धि है – गढ़वाल का एक महत्वपूर्ण शहर है ‘टिहरी’ और इससे थोड़ी ही दूर पर एक महत्वपूर्ण आश्रम है जिसके स्वामी को यह सिद्धि है। जो व्यक्ति यह सिद्धि प्राप्त कर लेता है, स्वार्थ प्रयोजन में इरादा नहीं रखते हैं, उन्हें ही इस साधना को संपन्न करने का संकल्प करना चाहिए। जो प्रदर्शन के चक्कर में नहीं पड़ते हैं, या जो धन अर्जन के उद्देश्य से ऐसी सिद्धि की आकांक्षा रखते हैं, उन्हें यह सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। इस साधना के सिद्ध होने पर साधक को कभी भी अन्न, धन्य की कमी नहीं होती। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देवी अन्नपूर्णा की कृपा उसके ऊपर बरसती रहती है। कभी भी घर से कोई भूखा नहीं जाता और न ही घर में किसी वस्तु का अकाल पड़ता है।
अन्नपूर्णा लक्ष्मी साधना के लाभ विश्वामित्र प्रणीत ‘तंत्र सार’ में अन्नपूर्ण साधना के निम्न लाभ बताऐ हैं-
1- इस साधना के सिद्ध करने के बाद व्यक्ति सिद्ध योगी बन जाता है, उसे महादेवीयों के दर्शन प्राप्त होने लगते हैं, जिससे उसका साधनात्मक स्तर निरन्तर बढ़ता जाता है।
2- अन्नपूर्णा साधना सिद्धि होने पर कई सिद्धियां तो साधक को यों ही प्राप्त हो जाती हैं।
3- साधक जहां भी रहता है, उसे मनोवांछित भोज्य पदार्थ उपलब्ध होता है, कितने ही लोग क्यों न हों, वह सबको आतिथ्य सत्कार देने में समर्थ होता है।
4- अन्नपूर्णा साधना को संपन्न करने के बाद साधक द्वारा ग्रहण किया हुआ अन्न उसके शरीर, बुद्धि और मन की शुद्धि कर उसे योग पथ पर आरूढ़ करता है।
5- एक बार भी यदि इस साधना को संपन्न कर लिया जाय, तो साधना के बाद, घर में जो अन्न पकता है, उस अन्न को ग्रहण करने वाले सभी सदस्यों के अन्दर सद्विचारों का, सुसंस्कारों का, पवित्र भावनाओं का, आपसी प्रेम आदि सद्गुणों का जागरण होता है। घर स्वर्ग तुल्य हो जाता है, क्लेश समाप्त हो जाते हैं, सभी के अन्दर परिवर्तन होता है और संतान सन्मार्ग पर चलकर उन्नति करती है।
6- अन्नपूर्णा सिद्धि करने के बाद साधक के लिए सिद्धाश्रम का मार्ग स्वतः ही खुल जाता है। 7- यह मात्र घर में अन्न की कमी को पूर्ण करने की साधना नहीं, अपितु घर में सुसंस्कारों का सूत्रपात्र करने की साधना है, शरीर एवं मन के विकारों को दूर करने की साधना है, क्योंकि अन्नपूर्णा की कृपा से साधक के घर अन्न, मात्र फिर अन्न नहीं रह जाता अपितु एक दिव्य प्रसाद बन जाता है, जिसको ग्रहण करने के बाद रोग, शोक, संताप, दुःख दारिद्रय, दैन्य आदि कुछ भी ठहर नहीं सकते।
यह साधना किसी पुष्य नक्षत्र अथवा गुरुवार से प्रारंभ की जा सकती है। साधक रेशमी पीली धोती धारण कर बैठें, घी का दीपक व अगरबत्ती जलायें। किसी पात्र मे पुष्पासन देकर ‘अन्नपूर्णा सिद्धि यंत्र’ स्थापित करें। इसके दायीं और ‘जवारे शिखा’ तथा यंत्र के बायीं ओर ‘सुकमा’ को स्थापित करें। इसके बाद सात जायफल रख दें और पास में कलश के ऊपर सूखा नारियल रख दें।
विनियोग
अब दाहिने हाथ में जल लेकर विनियोग करें।
ऊँ अस्य श्री अन्नपूर्णा महादेवी हृदय स्तोत्र महामंत्रस्य श्री महाकाल भैरव ऋषि उष्णिक् छन्दः महाषोढ़ा स्वरूपिणी महाकाल सिद्धा श्री अन्नपूर्णा अम्ब देवता, हृीं बीज, हूं शक्ति, क्रीं कीलकं, श्री अन्नपूर्णा अम्ब प्रसादात समस्त पदार्थ प्राप्त्यर्थे विनियोग।
न्यास
जल को भूमि पर छोड़ दें, तथा पूरे शरीर के अंगों को दाहिने हाथ से स्पर्श करते हुए शरीर में, अन्नपूर्णा का स्थापन करते हुए न्यास संपन्न करें।
श्रीमहाकाल भैरव ऋषये नमः शिरसि
उष्णिक् छन्दसे नमः मुखे
जवारे स्वरूपिणी महाकाल सिद्धि हृदये
श्री अन्नपूर्ण अम्ब देवतायै नमः
उदरे
हृीं बीजाय नमः लिंगे
हृीं शक्तये नमः पादयो
क्रीं कीलकाय नमः नाभौ
समस्त पदार्थ प्राप्त्यर्थे मंत्र जपे प्राप्यै
विनियोगाय नमः सर्वां
इसके बाद ‘अन्नपूर्णा धान्य माला’ से निम्न मंत्र की 11 माला नित्य 30 दिन तक संपन्न करनी चाहिए।
साधना समाप्ति के बाद यंत्र को कपड़े में लपेट कर जहां अन्न भण्डार रखते हों, वहां रख दें तथा अन्य सभी सामग्री को जल में विसर्जित कर दें।
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