





देव्योर्थ मातुं परिदेह रूपं,
ज्ञानोप मां वयी भवतुं श्रीयेवं।
आत्मानुभूति परमां सहितं सदेवं,
देव्योर्थ वातुं भवदेव सिंधुं।।
मेरे जीवन का उद्देश्य, मेरे जीवन का लक्ष्य है कि मैं उन रहस्यों को ज्ञात करूं जिन रहस्यों को विज्ञान नहीं मालूम कर सकता, नहीं जान सकता। पिछले पांच सौ वर्षों में विज्ञान तो बराबर प्रयत्नशील बना हुआ है मगर वह उस ज्ञान को समझ नहीं पाया कि एक गाय घास खाती है और घास दूध में कनवर्ट कैसे हो जाता है। आज तक विज्ञान घास को दूध में कनवर्ट नहीं कर पाया, एक माँ गेहूं की रोटी खाती है और दूध बन जाता है। यह विधान क्या है, यह विज्ञान नहीं समझ पाया, यह जरूरी नहीं कि प्रत्येक वस्तु विज्ञान समझ पाए। उसकी एक लिमिटेशन है, उसकी एक सीमा है।
मगर अपने व्यक्तित्व की कोई सीमा नहीं है। वह अनंत है और इतना अनंत है कि हम एक स्थान से पूरी दुनिया को देख सकते हैं और हम साधनाओं के द्वारा उन सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं जिसके द्वारा जान सकते हैं कि जगदम्बा क्या है, लक्ष्मी क्या हैं, सिद्धाश्रम क्या है और ऋषि, मुनि, योगी यति ये सब क्या हैं, क्या जीवतंता है, चैतन्यता क्या है, आखिर यह जीवन क्या है और मेरे जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य क्या है ?
जैसा कि गुरूदेव कहते हैं कि अपने जीवन को बहुत ऊंचाई पर उठा देना है तो किस प्रकार से ऊंचा उठाएं, क्या करें? सीढि़यों पर खड़े़ होने से तो ऊंचा नहीं हो पाएगा और गृहस्थ में रहते हुए बाल बच्चे पैदा करते हुए, घिसते, घसीटते हुए भी नहीं प्राप्त कर सकते। उसके लिए कहीं कुछ छोड़ना पड़ेगा, बहुत कुछ छोड़ना पड़ेगा। दस परसैंट भी छोड़ेंगे तो नब्बे परसैंट आप प्राप्त कर लेंगे और छोड़ेंगे ही नहीं तो कुछ प्राप्त नहीं कर पाएंगे और उसके बाद जब आपको लगेगा कि आपने हीरे तो गंवा दिए, केवल आप कोयले और कंकर पत्थर एकत्रित कर रहे थे, तब आपको एहसास हो पाएगा।
आज यदि मुझसे पूछा जाए कि आप गृहस्थ में भी रहे, संन्यास में भी रहे, आप अब क्या कर रहे हैं और यदि मैं जो साधकों और शिष्यों को दे रहा हूं उससे परे हट कर देखूं तो केवल घौंघे, पत्थर इक्कठे कर रहा हूं। बच्चों को रोटियां खिला रहा हूं, पत्नी को रोटी खिला रहा हूं। घर में मेरी पत्नी है, बच्चे हैं और वैसा ही है जैसे समुद्र के किनारे बैठे कंकर पत्थर, अपनी झोली में इकट्ठा करते रहे। परंतु वह जो मैंने साधना का ज्ञान प्राप्त किया था वे हीरे मोती थे और आज भी मुझे उसके ऊपर गर्व है। आज भी गर्व है अपने योगियों पर, संन्यासियों पर, अपने ज्ञान पर, अपनी चैतन्यता पर।
वह सबकुछ आप प्राप्त कर सकें और उन आयामों को देख सकें, उस पक्ष को देख सकें। देखेंगे तो जीवन अपने आप में उज्ज्वल बन जाएगा।
और आप मुझसे पूछें तो वृद्धावस्था जीवन में आती ही नहीं, होती भी नहीं। वह बस एक शब्द है। मानसिक न्यूनता जैसी कोई चीज होती नहीं, मृत्यु जैसा कोई शब्द है ही नहीं। देह समाप्त हो सकती है, मगर देह को खुद ही जीवन्त बना दें तो फि़र आत्मा तो समाप्त होती ही नहीं, उस आत्मा के ऊपर फि़र से देह का आवरण कर लेंगे। फि़र कायाकल्प कर लेंगे। अगर हमारे ऋषि मुनि दो हजार साल जीवित रह पाते थे तो हम क्यों नहीं रह पाते। हममें फि़र क्या कमी है ?
कमी है, हमारी साधना की कमी है जीवन में, गुरू वह ज्ञान नहीं दे पा रहा है आपको, आप साधनाओं में वह सिद्धि प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। आप साधनाओं में प्रयत्न नहीं कर पा रहे हैं। पूर्ण मनोयोग से उनमें जुट नहीं पा रहे हैं। पूरी तरह से जुटने की जरूरत है, आपको टुकड़े-टुकड़े को जीवंत होना है और सांस लेना वह कोई बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। आप पर आक्सीजन मास्क चढ़ा दिया जाए और अस्पताल में लिटा दिया जाए, वह जीवन नहीं। आप आक्सीजन ले रहे हैं वह जीवन कहलाता ही नहीं। जीवन वह कहलाता है जहां वक्षस्थल आपका पूर्ण पौरूषवान हो, शरीर ताकतवान और क्षमतावान हो और आप सब कुछ बैठे-बैठे देख सकें कि क्या घटनाएं घट रही हैं। उन पहलुओं को देख सकें, जो ज्ञान को समेटे हुए हैं। उन पर्वतों को देख सकें, उस हिमालय को देख सकें, उस मानसरोवर को देख सकें और उन उच्च कोटि की चीजों को देख सकें जो जीवन का मूल उत्स हैं। वे घौंघे- पत्थर नहीं हैं, वे हीरे हैं।
आप एक बार भी उन्हें अपने जीवन में देखेंगे तो आपको ये सब अपने जीवन की चीजें बहुत मामूली लगने लग जाएगी। जीवन में एक ही क्षण दूसरी बार नहीं आ सकता। एक बार क्षण आ गया और उसे आपने नहीं पकड़ा तो आप चूक गए। मान लो इस क्षण मैं आपको साधना सिद्धि सफ़लता दीक्षा दे रहा हूं तो यह जरूरी नहीं कि आपके जीवन में दूसरा क्षण आए या मैं वापस आपको यह दीक्षा दूं, यह जरूरी संभव नहीं हैं। अगर चूक गए तो चूक गए आप। चूक गए तो बहुत बड़ी चीज चूक गए आप। छोटी मोटी चीज नहीं चूके। आज शायद आप इस बात को एहसास न करें, मगर एक दिन अवश्य करेंगे।
मैं आपको समुद्र के बीचों बीच कूदने की तैयारी करा रहा हूं। मैं नहीं चाहता कि आप समुद्र के किनारे बैठे रहें, आप डरपोक बने रहें, भीरू बने रहें। आप घबराएं नहीं कि अंदर कूदूंगा तो मर जाऊंगा, मर जाऐंगे तो मर जाएंगे, मगर यह गारंटी की बात है कि अगर निकलेंगे तो मोती लेकर निकलेंगे, घौंघे, पत्थर लेकर फि़र बाहर नहीं निकलेंगे।
और मेरा तो बराबर यही चिंतन रहता है कि मैं उन दीक्षाओं को, प्रयोगों को, उस ज्ञान को, उन प्रवचनों को स्पष्ट करूं। जितने क्षण हमारे पास हैं चाहे दो घंटे हैं, चार घंटे हैं तो इनमें जितना ज्यादा शिष्यों को दे सकूं, दूं। मैंने निश्चय कर लिया था कि बिलकुल शिविरों में नहीं जाऊंगा। मानस बना लिया था। सौ परसैंट सोच लिया था कि शिविरों में भाग नहीं लेना है। अगर साधक मेरे पास स्वयं आएंगे तो सिखा दूंगा।
मगर प्रेम की डोर एक ऐसी मजबूत होती है जिससे मजबूत कोई डोर होती ही नहीं। फि़र आप खींच लेते हैं उस डोरी को खींचते हैं तो मेरे पांव उठते हैं, फि़र सोचता हूं कि यह ज्ञान तो अंदर रह ही जाएगा फि़र क्या फ़ायदा होगा? फि़र मेरे सांस लेने से फ़ायदा भी क्या जब एक-एक सांस इस बात के लिए गिरवी रख दी है कि शिष्यों के लिए ही हर क्षण समर्पित हो, प्रत्येक सांस शिष्यों के लिए हो तो फि़र मैं सांस अकेला लूं उससे फ़ायदा भी क्या होगा ?
मैं ऐसा जीवन नहीं जी सकता कि पलंग पर लेटा रहूं और ए-सी- चलता रहे और मैं नींद लूं। ऐसा संभव नहीं हो पाता। जो कुछ अंदर है वह मैं देना चाहता हूं और इतना अधिक हिलोर है, समुद्र है कि मैं देता ही रहूं। पुस्तकों के माध्यम से, प्रवचनों के माध्यम से, कैसेटों के माध्यम से और आपको जीवित जाग्रत चैतन्य व्यक्तित्व बनाकर के। मैं चाहता हूं कि आपको कृष्ण और राम की तरह ऊंचा उठा सकूं।
वे भी एक व्यक्तित्व थे, एक सामान्य व्यक्तित्व यदि उन्हें आप एक इतिहास की दृष्टि से देखें। भगवान की दृष्टि से तो वह प्रणम्य हैं। मैं तो आपको भी प्रणाम करता हूं कि आप भी निश्चित ही उसी रूप में हैं। मगर आप उस जगह पहुंचेंगे तब पूरा संसार झुक जाएगा आपके सामने। जगह-जगह आपकी स्तुति हो पाएगी, जगह-जगह एहसास हो पाएगा कि हमारे पूर्वज क्या थे क्योंकि आप उन सिद्धियों, उन सफलताओं को प्राप्त कर पाएंगे और यदि आप नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं, न ही आपका अभ्यास है तो गुरू खुद की तपस्या के अंश से उसे आपक भीतर प्रवाहित कर दें।
कोई साधना शिविर होता है तो पांच पांच दिन तक सोता ही नहीं, क्योंकि समय ही नहीं मिल पाता रात्रि में नींद लेने का और दिन में सोने का सवाल ही नहीं होता। लेटता हूं तो फि़र यह कल्पना होती है कि कल यह दिवस है शिष्यों को क्या दूं, किस प्रकार से दूं। बीस चींजे मेरे मानस में होती हैं तो बीसों उतनी महत्वपूर्ण होती है। बीस में से क्या दूं, मगर ऐसा दे दूं कि फि़र उनको कुछ लेने की जरूरत रहे ही नहीं। मैं तो हर क्षण देने को तैयार हूं, आवश्यक है कि आप ग्रहण करें और ग्रहण करने के लिए कोई भी क्षण उपयुक्त हो सकता है। उसके लिए फि़र कोई जरूरी नहीं कि सिद्ध मुहूर्त हो क्योंकि जगदम्बा तो अपने आप में प्रत्येक क्षण चैतन्य हैं, गुरू तो हर क्षण देने के लिए तत्पर हैं।
शास्त्रों में कहा गया है कि आषाढ़ महीने में देव शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवोत्थान होगा या देव उठेंगे। अगर उस समय उठेंगे तो फि़र श्रावण के महीने में हम शिव की पूजा कैसे करते है। फि़र भगवान शिव तो सोए हुए हैं? फि़र शारदीय नवरात्रि में हम जगदम्बा की पूजा कैसे करते हैं, जगदम्बा तो सोई हुई हैं ?
देव सोए हुए नहीं हैं, वे तो सदैव चैतन्य हैं। वह तो हमारे अंदर जो ज्ञान है वह सोया हुआ है। उसको जीवित जाग्रत चैतन्य करके एक एक देवता की तस्वीर को जिंदा, जाग्रत करके सामने खड़ा कर सकें, वह ज्ञान, वह चेतना आपमें आनी चाहिए। वह ताकत आपकी आंखों में आनी चाहिए और वही ताकत आपको देना चाहता हूं मैं। फि़र आप देखेंगे कि उस आनंद का अलग ही मजा है, अपने आप में अलमस्त फ़कीरी है। गृहस्थी फि़र भी चलाते रहेंगे आप। गृहस्थ आपका चलना भी चाहिए। मैं आपको संन्यासी होने की दीक्षा नहीं दे रहा हूं। मैं आपको कह भी नहीं रहा हूं कि आप अपनी पत्नी को छोड़ दें या पति को छोड़ दें। मैं कह भी नहीं रहा हूं कि व्यापार छोड़ दें या नौकरी छोड़ दें। मैं कह रहा हूं कि वैसे घौंघे, पत्थर आप बटोरिए मत।
गोविंदपादायार्य चुपचाप सुनते रहे। उन्हें ज्ञात था कि इसने शिव साधना की है, इस बालक ने। और उस शंकराचार्य ने एक पूरी तरह संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत किया। इतना संघर्षपूर्ण कि एक आठ साल का बालक जब उसने संन्यास लिया तो घर वालों ने उसे अलग कर दिया, समाज ने अलग कर दिया क्योंकि समाज के बंधन उस समय बहुत मजबूत थे। समाज ने कहा तुम जाति से बाहर हो।
और उन्हीं दिनों उनकी मां की मृत्यु हो गयी जो कि जन्म देने वाली थी। उन्होंने अपने परिवार वालों को, कुटुंब वालों को कहा कि मेरा धर्म हैं कि मैं अपनी मां का दाह संस्कार करूं। मगर सबने कहा कि तुम, समाज से बाहर हो, हम तुम्हारी माता के दाह संस्कार में भाग नहीं लेंगे। तो शंकराचार्य ने सोचा यह कैसा समाज हुआ और इस समाज को मैं तभी मजबूत कर पाऊंगा जब मैं कुछ बनूंगा और अपनी मां की लाश को कंधो पर अकेला ढोकर, श्मशान में जाकर अकेले उसे मुखाग्नि दी।
कल्पना करें कितना दुःख, कितनी वेदना हुई होगी, कितनी तकलीफ़ हुई होगी उस आठ साल के बालक को। जब उस बालक ने भगवान शिव की साधना की तो स्वयं भगवान शिव ने कहा तेरा नाम आज से शंकर रहेगा, मगर पूर्णता प्राप्त करने के लिए तुम्हें नर्मदा के किनारे जाना पड़ेगा। वहीं पर तुम्हें गुरू मिलेंगे, गोविन्दपादाचार्य और जब तक तुम्हारे अंदर का एक एक अणु नहीं खुलेगा, नहीं जाग्रत होगा, जब तक अंदर की चेतना जाग्रत नहीं होगी, तब तक तुम्हारी सारी साधनाएं व्यर्थ हैं और तुम्हें और कोई साधना करनी ही नहीं है। ऐसा कह कर भगवान शिव अंर्तध्यान हो गए।
शंकर- आठ नौ साल का बालक, कहां केरल, कहां मध्य प्रदेश! नर्मदा के किनारे ओंकारेश्वर के पास में आज भी शंकराचार्य की गफ़ुा है। गोविंदपादाचार्य के पास जाकर उन्होंने कहा कि मैंने भगवान शिव की साधना की है और उन्होंने कहा है कि तुम्हें जीवन में पूर्ण सफ़लता प्राप्त होनी ही चाहिए और ऐसी होनी चाहिए कि उसके बाद जीवन में कोई साधना करने की जरूरत नहीं रहे।
शंकर ने कहा – मंत्र प्रामाणिक हैं या नहीं, सामने खड़े होकर मंत्र बोलते है या नहीं यह मैं देखना चाहता हूं। मैं देखना चाहता हूं कि किसी भी गृहस्थ को मैं पूर्णता तक कैसे पहुंचा सकता हूं, उनके जीवन के अभावों को कैसे दूर कर सकता हूं। और उससे भी बड़ी बात यह कि भगवान शिव ने कहा कि मेरी उम्र केवल 32 बर्ष है, इन 32 वर्षों में मैं उस जगह पहुंचना चाहता हूं जहां अपने आपमें संपूर्णता प्राप्त हो। बस केवल यही इच्छा है। मगर गोविंदपादाचार्य ने कहा कि जब तक तुम्हारे अंदर के सारे अणु, परमाणु विखंडित नहीं होंगे, जाग्रत नहीं होंगे, चैतन्य नहीं होंगे, तब तक तुम्हें अद्वितीयता प्राप्त नहीं हो पाएगी।
तुम्हारे जैसे साधना करने वाले और पच्चीस मिल जाएंगे और सैकड़ों लोग मिल जाएंगे, मगर संसार में तुम अकेले ही बनो, तुम्हारे जैसा कोई अद्वितीय बने ही नहीं, अगर तुम्हारी यह अभिलाषा, यह लक्ष्य है और अगर इस बात के लिए मेरे पास आए हो तो बहुत कठोर साधना करनी पड़ेगी और साधना करनी पड़ेगी एक शिष्य बन करके। केवल गुरू सेवा के अलावा तुम कुछ करो ही नहीं। मैं देखना चाहता हूं कि तुममें कितनी क्षमता है।
शंकर ने कहा- यह तो बहुत छोटी बात है, अगर आप कहें तो मैं अपना जीवन गुरूदेव आपके चरणों में समर्पित कर दूं। मैं चाहता हूं कि मेरे अंदर के सारे चक्र जाग्रत हो जाएं एक बार में ही और आप ही कर सकते हैं अपने पाद प्रहार से क्योंकि आपका नाम इस समय विश्व में विख्यात है। सारा विश्व इस बात को स्वीकार करता है कि आप उस ज्ञान को भी दे सकते हैं कुण्डलिनी जागरण होने के माध्यम से, चक्र जागरण होने के माध्यम से।
और आप लोगों की एक गलतफ़हमी दूर कर दूं कि कुण्डलिनी के सात चक्र नहीं होते कुण्डलिनी के एक सौ आठ चक्र होते हैं और उनमें से भी 64 चक्र केवल आपके मस्तिष्क में है। और जब वे पूरे चक्र जाग्रत होते हैं तभी पूर्णता प्राप्त होती है। पहले ज्ञान था मगर बाद में यह ज्ञान अधूरा बना रहा, एक शार्ट कट बना रहा कि ये सात मेन पाइंट हैं इन्हें स्पर्श कर लीजिए।
शंकराचार्य ने कहा- मैंने तो सुना था कि मूलाधार से सहस्त्रहार तक केवल सात ही चक्र है। तो गोविंदपादाचार्य ने कहा – इसलिए अद्वितीय नहीं बन सकते क्योंकि ज्ञान अधूरा है। तुमने शब्द प्रयोग किया अद्वितीय और मैंने कहा कि तुम्हें अद्वितीय बनाऊंगा। मगर अद्वितीय बनना है तो पूरे 108 चक्रों को जाग्रत करना पड़ेगा तुम्हारे। केवल सात चक्रों को जाग्रत करने से काम चलेगा ही नहीं और उसके लिए वह विधि तुम्हें देनी होगी, एक एक चक्र को पूर्णता के साथ जाग्रत करना पड़ेगा एक ही क्षण में एक ही झटके में और अगर ऐसा नहीं होता तो तुम जीवन में वह नहीं प्राप्त कर सकते जो तुम चाहते हो। इसलिए मैं यह जानना चाहता हूं कि तुम चाहते क्या हो।
शंकराचार्य ने कहा- मैं छः चीजें चाहता हूं, यदि मुझे बोलने की अनुमति हो तो मैं छः तथ्यों की ओर आपका ध्यान, आकर्षित करना चाहता हूं। मैं केरल प्रदेश के ब्राह्मण का एक बालक हूं। बचपन में पिता की मृत्यु हो गई। मां का दाह संस्कार मैंने अपने कंधो पर ढोह कर किया और आपको ज्ञात है कि भगवान शिव की साधना इसलिए कि की मैं उस गुरू को प्राप्त कर लूं जो गुरू मुझे उस पूर्ण ज्ञान को दे सके। और पहली बार आपने यह बताया कि सात चक्र नहीं होते, 108 चक्र होते हैं। यह पहली बार सुन रहा हूं। छः तथ्य मेरे सामने हैं और मैं चाहता हूं कि मैं कायाकल्प कर सकूं, जिस समय भी चाहूं, मैं पूर्ण शरीर को परिवर्तित कर सकूं। मैं यह जान लेना चाहता हूं कि किस प्रकार एक सर्प पूर्ण कायाकल्प कर लेता है। भगवान शिव भी सर्प से प्यार करते हैं और भगवान विष्णु के ऊपर भी सर्पों की छाया रहती है। उस कायाकल्प विधि, को समझ लेना चाहता हूं कि किस प्रकार से वृद्धावस्था को यौवनावस्था में परिवर्तित किया जाए किसी का भी मेरा ही नहीं। और मनुष्य के ही रूप में नहीं, मैं जिस रूप में चाहूं वैसा बन सकूं। क्या ऐसा संभव है ? गोविंदपादाचार्य ने कहा- ऐसा संभव है।
शंकराचार्य ने दूसरी बात कही कि मुझे 32 साल उम्र मिली है। 32 में दस साल तो व्यतीत हो गए और 22 वर्षों में क्या मैं पूरे भारतवर्ष में अपने व्यक्तिव को, अपने ज्ञान को, अपनी चेतना को हजारों हजारों शिष्यों तक पहुंचा सकता हूं? क्या इतनी विद्वता और सारे शास्त्र एक साथ कंठस्थ हो सकते है ? कब तक मैं पढ़ता रहूंगा, यजुर्वेद, अर्थवेद, सामवेद, ऋग्वेद ? उन शास्त्रों का तो कई अंत ही नहीं है। उन उपनिषदों को मैं कब तक पढ़ता रहुंगा ? क्या कोई ऐसी साधना नहीं है जिसके माध्यम से समस्त मंत्र ही मेरे शरीर में अपने आप में प्राणमय बन जाएं ? एक एक रोम से मंत्र निकलने लग जाए। क्या कोई ऐसी क्रिया है ? क्या मैं ऐसा कर सकता हूं ? गोविंदपादाचार्य ने कहा- ऐसा तुम कर सकते हो।
शंकर को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा- मुझे तो सही ढंग से केरल की भाषा ही नहीं बोलनी आती, क्या में इतना अद्वितीय वक्ता बन सकता हूं कि मैं बोलूं और सामने वाला सम्मोहित हो जाए, मंत्र मुग्ध हो जाए, बात सुनने पर अपने आप में तन्मय हो जाए, लीन हो जाए ? कोई कहे और पूर्ण शास्त्र मेरे अंदर से प्रवाहित हो, कोई कहे उपनिषद का श्लोक और मेरे अंदर से पूर्ण उपनिषद प्रवाहित हो। उस प्रवाह में मुझे वेद मंत्र बोलना पड़े तो मैं बोल सकूं, मुझे सोचना नहीं पड़े कि यह यजुर्वेद का मंत्र है और इसे कैसे बोलुं। ऐसा मैं चाहता हूं। क्या मेरा पूरा शरीर मंत्रमय बन सकता है ? गोविंदपादाचार्य ने कहा- ऐसा बन सकता है क्योकि प्रत्येक रोम अपने आप में एक मुख होता है, लाखों मुख हैं।
सहस्त्राक्षी रेख पूर्वकः सहस्त्राक्षः सहस्त्र पादः
मनुष्य के लाखों मुंह है, लाखों हाथ हैं, लाखों चैतन्यताऐं है और आप यह सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं। शंकर ने कहा-चौथा एक और बिंदु, इस कुण्डलिनी जागरण के माध्यम से क्या में अप ने, पिछले सैकड़ों जन्मों को और अगले सैकड़ों जन्मों को एक साथ देख सकता हूं ? और देखूं ही नहीं, क्या मैं, इस जीवन को उन आने वाली बाधाओं से परे हटा सकता हूं, सफ़लता प्राप्त कर सकता हूं ? बाधाएं मेरे सामने आएं ही नहीं, कठिनाइयां नहीं आएं। जो कुछ मैंने चाहा है वह प्राप्त हो जाए। अगर मैंने सम्मोहन चाहा है, वशीकरण चाहा है तो सामने वाला पूर्ण वशीभूत हो। देखूं और वह सम्मोहित हो जाए। क्या कोई ऐसी विधि है ? क्या इसके लिए मुझे कोई दूसरा मंत्र जप करना पड़ेगा ? कोई दूसरी विधि है ?
गोविंदपादाचार्य ने कहा- एक ही विधि है। दूसरी विधि की जरूरत ही नहीं है और तुम क्या पूछना चाहते हो ? तो शंकर ने कहा- कि मेरी अंतिम इच्छा यह है कि आचार्य पद प्राप्त कर सकूं। उच्चकोटि का गृहस्थ बन सकूं, उच्च कोटि का कवि बन सकूं, उच्च कोटि का लेखक बन सकूं और मैं उस वशीकरण के माध्यम से पूरे ब्रह्माण्ड को जाग्रत करता हुआ चेतनायुक्त बना सकूं।
गोविंदपादाचार्य ने कहा- यह अंतिम बात नहीं पांचवी बात कही हैं तुमने, छठी और कुछ है बात तुम्हारी। शंकर ने कहा – मैं संकोच के मारे बोल नहीं पाया था। गोविंदपादाचार्य ने कहा जब गुरू और शिष्य के बीच में हवा भी नहीं होती, तो कोई पर्दा होता ही नहीं, तो फि़र संकोच तुम्हें रखने की जरूरत ही नहीं। तो शंकर ने कहा- क्या आज के युग में———- अभी केवल 700 साल हुए है शंकराचार्य को उत्पन्न हुए, कोई दस हजार, पच्चीस हजार साल नहीं हुए हैं। मैं खुद को छोटा सा बनाकर के अन्नमय कोष से प्राणमय कोष में परिविर्तित करके, किसी भी स्थान पर जा सकता है ? अगर मैं सिद्धाश्रम जाना चाहूं, तो क्या जा सकता हूं ? क्या मैं इंद्रलोक में जा सकता हूं ? क्या मैं भगवान शिव के कैलाश जाकर वैसे साक्षात दर्शन कर सकता हूं जैसे आपके कर रहा हूं ? क्या मैं ब्रह्म लोक में जाकर के जो उनके चारों मुख से वेद उच्चरित हो रहे हैं, उनको सुन सकता हूं ? क्या आज के युग में ऐसा संभव है?
गोविंदपादाचार्य ने कहा ये प्रश्न सारे, तुम्हारे नहीं हैं, ये प्रश्न भगवान शिव के हैं जो तुम्हें दिए गए हैं। तुम्हें रास्ता बताया है और यह बताया है कि तुम यह ज्ञान कहां से प्राप्त कर सकते हो। और ये छः की छः अपने आप में ऐसी विधियां है कि एक एक विधि में बीस साल लगते हैं। कोई छोटी चीज तुमने पूछी ही नहीं। ऐसा कैसे संभव है कि एक ही बार में सब कुछ संभव हो जाए। पूरा आकाशगमन, एक लोक से दूसरे लोक में जाने की क्रिया, संपूर्ण वेद वेदांत ज्ञान, चेतना, मंत्र अपने आप में प्रत्येक रोम-रोम से निकलते हो एक व्यक्तित्व इतना सम्मोहित कर सके, चेहरे को आपके कोई देखे और उसकी हिम्मत न रहे कि आपके सामने खड़ा रह सकें और ऐसा आचार्य बन सको कि विद्वता के क्षेत्र में तुम्हारे सामने कोई खड़ा नहीं हो सकें और तुम गृहस्थ जीवन को भी पूर्णता के साथ देखना चाहते हो और संन्यास जीवन को भी। अंतिम पराकाष्ठा तक पहुंचना चाहते हो और तुम चाहते हो कि तुम भगवान शिव को साक्षात देख सको कि वे कैलाश पर मां पार्वती से बात कर रहे हैं और तुमने प्रश्न किया कि क्या तुम विष्णु लोक, इंद्रलोक में विचरण कर सकते हो, क्या पूरा शरीर अंगूठे के आकार का हो सकता है ?
तो शास्त्रों में तो इसके बारे में कहा गया है कि प्रत्येक विधि अपने आपमें इतनी महान है कि एक ही विधि प्राप्त कर लें तब भी व्यक्ति अद्वितीय बन जाता है और उसमें भी बीस साल लगते हैं। तुम्हारे सामने जो ये संन्यासी शिष्य बैठे हैं, उनमें से किसी को, कोई मंत्र सिखा रहा हूं, किसी को कोई मंत्र सिखा रहा हूं, किसी को कोई और मंत्र सिखा रहा हूं। पंद्रह बीस साल से और तुमने आकर के एक साथ छः की छः चीजों को मांग लिया, मेरे सामने रख दिया। यह असंभव है। कोई गुरू यह ज्ञान दे ही नहीं सकता क्योंकि उनको मालूम ही नहीं है।
और गोविंदपादाचार्य ने कहा- आने वाली पीढि़यां फि़र सात चक्रों में उलझ जाएगी, उनको मालूम ही नहीं होगा कि 108 चक्र कहां होते हैं और जब ज्ञात ही नहीं तो कोई गुरू चक्रों को जाग्रत करेगा कैसे, और जाग्रत नहीं करेगा, तो फि़र रोम-रोम से मंत्र ध्वनि होगी कैसे और देह को प्राणों में परिवर्तित करेगा कैसे जिससे देह सुरक्षित रहे।
शंकर ने यही चाहा कि उसे यह सब प्राप्त हो कि वह प्रत्येक लोक में यात्रा कर सके एक सेकेण्ड में। यह कितना आनंददायक तथ्य, कितने आनंददायक प्रश्न है। क्या आपको अपने जीवन में कोई ऐसा गुरू मिला जो यह सब दे सके ? शंकर को मिला मगर गुरू मिलने से पहले उसने भगवान शिव की पूर्ण साधना की, एक पैर पर खड़े होकर के, पत्ते खाकर के। वह चाहता था कि उसे एक ही साधना करनी है उतनी उम्र उसके पास थी ही नहीं, उम्र केवल 21 या 22 साल बची थी और सोचा कि पूरे आर्यावर्त को अपनी मुट्ठी में कस लेना है। मंत्रमय बन जाना है, चेतनामय बन जाना है, पूरे ब्रह्माण्ड में यात्रा कर लेनी है और यह दिखा देना है कि मै आचार्य हूं। मैं दिखा देना चाहता हूं कि मेरे चेहरे में अपूर्व ओज है, मैं दिखा देना चाहता हूं कि इतनी चुंबकीय शक्ति है कि जिसको चाहूं अपने अनुकूल बना सकता हूं। चाहे वह कोई भी व्यक्तित्व हो, मेरे सामने खड़ा नहीं रह सके।
शंकर ने कहा- सबसे बड़ी बात तो यह कि मैं सारे 108 चक्रों को एक साथ जाग्रत करना चाहता हूं और मैं सीखूंगा तो आपसे ही क्योंकि इस विधि का और कोई गुरू ज्ञाता है ही नहीं। मृत देह को वापस जाग्रत करने का, संजीवनी ज्ञान और किसी के पास है ही नहीं। वृद्धावस्था में बिलकुल मृत्यु के सन्निकट आए व्यक्ति को पूरा जीवन दे दिया जाए, उसको ठीक कर दिया जाए वह विद्या किसी के पास नहीं है, उन लोकों में विचरण कर लिया जाए जो अद्भुत हैं, वह विद्या किसी के पास नहीं है। क्या मैं एक मरे हुए व्यक्ति को वापस जीवित कर सकता हूं ?
तो गोविंदपादाचार्य ने कहा- तुम तब ऐसा कर सकते हो जब एक पूर्ण गुरू तुम्हें मिले, जब उस गुरू के प्रति पूर्ण तुम्हारी श्रद्धा भावना हो और वह पूर्ण प्रसन्न होकर तुम्हारे चक्रों को जाग्रत कर दें। शंकर ने कहा- मैं तैयार हूं।
गोविदंपादाचार्य ने कहा- नहीं। यह आज संभव नहीं है, और यह भी जरूरी नहीं कि तुम मंत्र जप करो। मगर यह पुरूषोत्तम मास के सिद्धिदात्री दिवसों में ही संभव है। उस विशेष मुहूर्त के न पहले न बाद में, सिद्धि तभी प्राप्त हो सकती है। इतनी उच्चकोटि की दीक्षा तभी मिल सकती है। इससे पहले नहीं मिल सकती। तुमने सारे शास्त्रों को एक साथ इकट्ठा करके रख दिया है, यह एक मनुष्य के दिमाग का विचार नहीं हो सकता ? इतने उच्चकोटि के प्रश्न तुम्हारे मानस में नहीं आ सकते, किसी के मानस में आज तक आए ही नहीं एक साथ। न ऋग्वेद में आया, न यजुर्वेद में आया, न अथर्ववेद में आया, न सामवेद में आया, न उपनिषद में आया न पुराण में आया। यह किसी और के मस्तिष्क के प्रश्न है। भगवान शिव के अलावा कोई और इस ज्ञान को बता ही नहीं सकता जिससे एक मृत व्यक्ति को जीवित कर सकें, चेतना दे सकें, रोग रहित कर सकें, अपने आप को चुंबकीय कर सकें और कुण्डलिनी के 108 चक्र जाग्रत कर सकें।
मैंने स्वयं जब गोविंदपादाचार्य और शंकराचार्य के इस भाष्य को पढ़ा तो आश्चर्यचकित रह गया कि क्या हम सब अभी तक अंधेरे में भटक रहे हैं, क्या मैं अपने शिष्यों को समझ नहीं पा रहा हूं। अपने शिष्यों को एकबार में ही नहीं सब दे दिया जाय कि उनका चेहरा अपने आप में बहुत सम्मोहक बन जाए, इतनी ताकत आ जाए, फि़र यह जरूरत रहे ही नहीं कि यह मंत्र जप करें, या वो साधना करें।
शंकराचार्य ने कहा- मुझे कोई साधना करनी ही नहीं, क्योंकि उम्र ही मेरे पास कम है। मुझे और कोई साधना चाहिए ही नहीं क्योंकि भगवान शिव ने कहा है कि इन छः तथ्यों से मिलकर ही सर्वांगपूर्ण व्यक्तित्व बन सकता है और यह साधना चूक गए शंकर तो तुम जीवन चूक जाओगे, पूरा जीवन खोखला और निरर्थक हो जाएगा और भगवान शिव ने यह भी कहा कि यह घ्यान रखना कि वरदान मांगना गुरू से तो एक ही मांगना, कि मेरे पूरे 108 चक्र जाग्रत हो केवल सात चक्र नहीं। वे तुम्हें बहलाए, भटकाएं, कुछ भी करें तुमने मेरी साधना की है मैं तुम्हें उसी जगह पहुंचा रहा हूं जहां तुम्हें यह सब प्राप्त हो सकता है। वही गुरू तुम्हें संजीवनी विद्या दे सकता है, वे गुरू मृत व्यक्ति को जीवित कर के प्रत्येक रोम-रोम में किस प्रकार से अग्नि ज्वाला पैदा की जा सकती है, वे जानते है कि वरदान देने की क्रिया कहां से आ सकती है, शाप देने की क्रिया कहां से आ सकती है यदि कुण्डलिनी पूरी जाग्रत है तो जो आप बोले वह सत्य हो ही। उसको वरदान कहते हैं और यदि आपने क्रोध में किसी को कह दिया तो वह भस्म होगा ही समाप्त होगा ही, चाहे वह आपका कैसा भी प्रबल शत्रु हो, यह वरदान देने का और शाप देने का ज्ञान तभी आ सकता है चेतना तभी आ सकती है जब आपका पूरा शरीर एवं कुण्डलिनी जाग्रत हो।
गोविंदपादाचार्य ने कहा- ऐसा हो पाने के लिए आवश्यक है कि तुम पूर्ण तन्मयता से गुरू सेवा एवं समर्पण करो। क्या तुम ऐसा कर सकोगे ? शंकराचार्य ने कहा- अगर मेरे जीवन के 22 साल बचे हैं तो आप कहें तो मैं 20 साल भी आपकी सेवा करने को तैयार हूं। एक साल भी फि़र मेरे लिए सब कुछ प्राप्त करने के लिए बहुत होगा। मगर मैं यह अवसर नहीं चूकना चाहता क्योंकि फि़र गोविंदपादाचार्य जैसे, आप जैसे गुरू मुझे नहीं मिलेंगे। फि़र भगवान शिव की मेरी वह आराधना बेकार जाएगी, फि़र जो इस जीवन में चाहता हूं कि सारे रहस्य देखूं वह नहीं हो सकेगा। मैं चाहता हूं सारे विद्वान मुझसे परास्त हो, मेरे सामने खड़े ही नहीं रह सकें।
और शंकराचार्य ऐसे ही बने उनके सामने कोई विद्वान टिक नहीं पाया चाहे वो काशी में रहे, भोज में रहे, उज्जैन में रहे। इसीलिए वे आचार्य कहलाए। मंडन मिश्र को भी उनके सामने हारना पड़ा, उनके चरणों में झुकना पड़ा जो कि उस समय का, संसार का श्रेष्ठ विद्वान था और शंकर एक स्थान से कायाकल्प करके दूसरे स्थान में जा सके। जब मंडन मिश्र और शंकर का शास्त्रार्थ हुआ तो मंडन मिश्र ने कहा मैं तुम्हें बहुत उच्च कोटि का विद्वान नहीं मानता हूं क्योंकि मैं संसार का श्रेष्ठ विद्वान हूं मुझे सारे वेद कंठस्थ हैं, पुराण कंठस्थ हैं, शास्त्र कंठस्थ है। आप जो भी कहें वह श्लोक मैं उच्चरित कर सकता हूं, आप मुझसे शास्त्रार्थ करें।
शंकराचार्य ने कहा- मैं आया ही इसलिए हूं क्योंकि जो कुछ मैंने प्राप्त किया है, वह तुम प्राप्त कर ही नहीं पाए हो, इसलिए मैं तुमसे जीत जाऊंगा। मंडन मिश्र की पत्नी विदूषी थी। तो शंकराचार्य ने जब मंडन मिश्र को पराजित किया तो मंडन मिश्र की पत्नी ने प्रश्न किया और कहा कि पत्नी, पति की अद्धार्गिंनी होती है, मुझे आप हराएंगे, तभी मंडन मिश्र पराजित माने जाएंगे। मंडन मिश्र की पत्नी ने गृहस्थ जीवन से संबंधित प्रश्न पूछा तो एक राजा के शरीर में कायाकल्प द्वारा प्रवेश करके शंकराचार्य ने गृहस्थ को भी देखा कि गृहस्थ क्या होता है। और मंडन मिश्र और उसकी पत्नी को पराजित होकर उनका शिष्य बनना पड़ा।
और शंकर ने गृहस्थ भी देखा, संन्यास जीवन को भी देखा, ब्रह्म लोक और रूद्र लोक भी देखा, अपने ऊपर चुंबकीय आकर्षण भी पैदा किया और सारे शरीर को मंत्रमय भी बनाया और पूरे भारतवर्ष में, पूरे आर्यावर्त में शंकर जैसा एक व्यक्तित्व ही बना और हम आज भी कहते हैं कि शंकर भाष्य जैसा ग्रंथ बन ही नहीं सकता, अगले दस हजार साल तक भी वैसा ग्रंथ बन ही नहीं सकता और शंकर जैसा व्यक्तित्व भी वापस पैदा नहीं हो सकता।
यह क्या चीज है ? हम कब तक घिसटते हुए जीवन व्यतीत करते रहेंगे ? आपने अपने जीवन में पोथियां पढ़ी कि सात चक्र हैं- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा चक्र और सहस्त्रार चक्र और जाग्रत एक भी नहीं हुआ और पोथियां पढ़-पढ़ के हजारों लोगों ने कुण्डलिनी जागरण करने की क्रिया शुरू कर दी। मगर क्या गोविंदपादाचार्य गलत थे ? क्या शंकर भाष्य गलत है ?
गोविंदपादाचार्य ने शंकर से कहा- मैं तुम्हें अद्वितीय बनाऊंगा, मैं बताऊंगा कि तुम कैसे अपने शरीर को दूसरे शरीर में परिवर्तित कर सकते हो, मैं बताऊंगा कैसे रोगी को वापस जीवन दे सकते हो। मैं तुम्हें बता सकता हूं पूर्ण संजीवनी विद्या किसे कहते हैं, मैं तुम्हें सिखाऊंगा। मैं तुम्हें बता सकता हूं कैसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर एक क्षण में जा सकते हैं। मैं सिखा सकता हूं कि कैसे उस काल को देख सकते हैं कि एक जीवन पहले या दो जीवन पहले तुम क्या थे आगे दो जीवन में क्या है और दो घंटे बाद क्या घटना घटित होने वाली है और सारा वेद सारे उपनिषद, सारे शास्त्र अपने आप तुम्हारे शरीर में समाहित कर सकता हूं। मगर यह हो सकता है केवल पुरूषोत्तम मास में।
और मैं भी इस दिवस पर जब संन्यासी शिष्यों के पास जाता हूं तो वे कहते हैं कि आज तो आप केवल 108 कुण्डलिनी जागरण की दीक्षा दीजिए। इसके अलावा हमें कुछ चाहिए ही नहीं आज क्योंकि ऐसा दिन फि़र वापस जीवन में आ ही नहीं सकता और आज के दिन हम वह प्राप्त ही नहीं कर पाएं तो सब व्यर्थ है। हम बीस साल से तीस साल से केवल आपके नाम का स्मरण कर रहे हैं कोई साधना नहीं कर रहे हैं, आप दीजिए तो यह उच्चकोटी की दीक्षा दीजिए। और अगर मैं उनको दे सकता हूं वह दीक्षा तो मेरे गृहस्थ शिष्यों में क्या कमी है, उनको क्यों नहीं दूं। उन संन्यासी शिष्यों में क्या विशेषता है और गृहस्थ शिष्यों में क्या न्यूनता है ?
ये छः की छः साधनाएं जो शंककराचार्य ने एक ही दीक्षा के द्वारा अपने गुरू गोविंदपादाचार्य से प्राप्त की ये अपने आपमें अद्वितीय हैं, देव दूर्लभ हैं, श्रेष्ठतम हैं और प्रत्येक संन्यासी के लिए अगर आवश्यक हैं तो प्रत्येक गृहस्थ के लिए तो और भी आवश्यक है जिससे कि पहले से उन्हें पता लग जाए कहां समस्याएं आने वाली है, पल-पल जो हमारे सामने मां, बाप, भाई, बहिन मरते जा रहे है उनको हम संजीवनी विद्या दे सकें। रोज अर्थी जाती है, हम कुछ नहीं कर पाते। हम जानना चाहते हैं कि भगवान शिव का साक्षात स्वरूप क्या है ? हम उन्हें देख नहीं पाते और केवल ऊँ नमः शिवाय का जप करते रहते हैं। शंकराचार्य ने पूछा- क्या मैं अपनी आंखों से कैलाश पर्वत देख सकता हूं, क्या ब्रह्मलोक देख सकता हूं, क्या इंद्रलोक देख सकता हूं, क्या उन अप्सराओं को देख सकता हूं, क्या सिद्धाश्रम को देख सकता हूं ? और गोविंदपादाचार्य ने कहा- अवश्य देख सकते हैं। सिद्धिदात्री के अवसर पर आप मेरे पास आना, मैं अवश्य तुमको वह दीक्षा दूंगा।
और संन्यासियों के लिए यह दीक्षा महत्वपूर्ण है तो गृहस्थ के लिए भी महत्वपूर्ण है। गृहस्थ भी अपने आप में उतना ही कठिन जीवन है जितना संन्यास है, संन्यास से ज्यादा कठिन गृहस्थ है तो मैं अपने गृहस्थ शिष्यों को उस जगह क्यों नहीं पहुंचाऊं जहां सन्यासी शिष्यों को पहुंचा रहा हूं। उनके लिए भी मेरा वही धर्म वही कर्तव्य है, संन्यासियों के लिए यह दिवस महत्वपूर्ण है तो गृहस्थ के लिए भी अद्वितीय है। मगर अद्वितीय तब है जब आप गुरू से पुरूषोत्तम मास में दीक्षा प्राप्त कर पुरुज से पुरूषोत्तम बनने की क्रिया को आत्मसात कर सकें। और यह साधनाएं यह दीक्षा आपको कहीं और मिल नहीं सकती, बार-बार ऐसा गुरू मिल नहीं सकता जो एक साथ छः की छः क्रियाओं को प्रदान कर सके, बार-बार ऐसी जीवन में स्थिति बन नहीं सकती, बार-बार ऐसी चेतना मिल नहीं सकती, बार-बार ऐसा कोहिनूर मिल नहीं सकता और यह दीक्षा मैंने पिछले पचास साल में दी ही नहीं। देना संभव ही नहीं था, क्योंकि शिष्य उस स्थिति तक पहूंचे नहीं थे कि ग्रहण कर सकें। मगर मैं कोई ज्ञान दबा कर रखना नहीं चाहता और क्रोधा और जिद मुझे इस बात पर आई कि संन्यासियों ने कहा ऐसी दीक्षा हम प्राप्त कर सकते हैं। मैंने कहा- अगर तुम प्राप्त कर सकते हो तो मेरे गृहस्थ शिष्य भी प्राप्त कर सकते हैं। उनको भी मैं यह दीक्षा दूंगा हर हाल में दूंगा।
उन्होंने कहा – ये तो मल-मूत्र से भरे शरीर हैं। मैंने कहा- मैं इन्हें प्राणमय बना दूंगा। अगर यह देह है, मल-मूत्र से भरी है तो मैं इसे प्राणमय बना दूंगा जहां अन्नमय कोष की जरूरत ही नहीं रहे, खाने की जरूरत ही नहीं रहे, पीने की जरूरत ही नहीं रहे। अन्नमय कोष को प्राणमय कोष में परिवर्तित ही तो करना है, परिवर्तित करने से ये उस जगह पहुंच जाएंगे जहां तुम पहुंच हुए हो, उसके बाद वे छः की छः साधनाएं उन्हें एक साथ दे दूंगा।
यही कशमकश मेरी उन संन्यासियों के साथ चली। वे सब उत्सुक होकर सोचते हैं कि यह बिलकुल एक नयी पगडंड़ी, नया रास्ता बना रहे हैं, जिनको देना ही नहीं चाहिए, उनको दे रहे हैं एक दुर्लभ ज्ञान कि वे गृहस्थ कल को कुछ भी कर लेंगे। और मैं उनको कहता हूं कि मैं चाहता हूं मेरे गृहस्थ शिष्य इतने सक्षम बने कि कुछ भी प्राप्त कर सकें और संसार में उन जैसा किसी का व्यक्तित्व ही न हो। यही चाहता हूं मैं। वे कहते है यह जिद है आपकी। और मैं कहता हूं कि अगर जिद नहीं है, हठ नहीं है तो पौरूष भी क्या है आपका। कोई संन्यासियों का ठेका थोड़ी ही ले रखा है कि वे ही सब कुछ करेंगे। गृहस्थ शिष्यों से भी मेरा उतना ही प्रेम है जितना संन्यासी शिष्यों से है, शायद उनसे भी ज्यादा है क्योंकि गृहस्थ शिष्य पैरों से आकर लिपट जाते हैं, एक क्षण भी आंखों से आंसू निकलने के बाद छूटते नहीं हैं, इतना आप शिष्य प्यार करते हैं।
जब मैंने उन संन्यासी शिष्यों से कहा कि मैं यह दीक्षा तुम्हें दे रहा हूं तो उन गृहस्थों को भी दूंगा। तो वे बोले- क्या सारे गृहस्थ शिष्यों को देंगे ? मैंने कहा- मैं एक-एक गृहस्थ शिष्य को दूंगा, मां के पेट में एक-एक बच्चा जो होगा, उसको भी दूंगा। बाहर ही नहीं जो अंदर पेट में होगा, उसे भी दूंगा। तो ऐसी दीक्षा मैं दे सकता हूं, आवश्यकता है आपके समर्पण की, प्रेम की, दृढ़ता की। आप इन साधनाओं को चाहे चमत्कार कहिए, चाहे विश्वास करिये, चाहे विश्वास न करिये, आप विश्वास नहीं करेंगे तो ये आपके जीवन के पाप हैं जो आपके सामने आकर खड़े होंगे। जीवन में कई रूपों में पाप सामने आकर खड़े होते हैं, कभी बेटे के रूप में पाप आते हैं, कभी अविश्वास के रूप में, कभी पत्नी के रूप में आते हैं जो आपको साधना करने से रोकते हैं, कभी संशय के रूप में पाप सामने आकर खड़े हो जाते हैं।
ये जीवन की न्यूनता है क्योंकि आप गृहस्थ जीवन में हैं। मगर मैं भी गृहस्थ हूं। यदि मैं इन सिद्धियों को प्राप्त करके सफ़लता प्राप्त कर सकता हूं तो आप भी कर सकते हैं और आपको मैं करवाऊंगा ही, हर हालत में करवाऊंगा। जो आपके अंदर अंधकार है उसे दूर करने की आवश्यकता है। संशय आपके जीवन का अंग है कि मैं जिंदा हूं या मरा हुआ हूं। जिसको संशय है वह जीवन में कुछ कर नहीं सकता। सियार जीवन में शेर बन नहीं सकते और शेर बनना है तो हुंकार करनी ही पड़ेगी, उछल कर हाथी पर प्रहार करना ही पड़ेगा, उसके मस्तिष्क को फ़ाड़ना पड़ेगा ही। तभी शेर बन सकते हैं।
और आपको मैं शूकर या सियार बनाना नहीं चाहता हूं, आपको मैं शेर बनाना चाहता हूं कि आप दहाड़ें तो शत्रु सामने टिक ही नहीं सके और यह मेरी जिद है, हठ है तो है कि यह दीक्षा दूंगा पूर्णता और चैतन्यता के साथ दूंगा, केवल पुरूषों और स्त्रियों को ही नहीं अगर पेट में बालक है तो उन्हें भी यह दीक्षा दूंगा। आप आगे बढ़ कर गुरू से यह दीक्षा प्राप्त कर सकें, श्रेष्ठतम बन सकें। अद्वितीय बन सकें और जीवन में वे छः की छः स्थितियां प्राप्त कर सकें जो शंकराचार्य ने प्राप्त की ऐसी ही कामना करता हूं, हृदय से आशीर्वाद देता हूं।
समस्त 108 कुण्डलिनी जागरण दीक्षा पूरे जीवन का सौभाग्य है। सिद्धाश्रम में बैठे योगियों संन्यासियों के लिए भी यह दुर्लभ है और गृहस्थ शिष्यों के लिए तो संभव ही नहीं है कि प्रत्येक रोम से मंत्र उच्चरित हो और जो संभव नहीं है वहीं मैं संभव करके दिखाऊंगा।
जो संभव नहीं है वही जीवन में करके दिखाना है। मेरा पूरा जीवन एक जिद पर जिंदा रहा है, एक संघर्ष पर जिंदा रहा है, एक निश्चय पर जिंदा रहा है। जो और मना करेंगे वह काम करूंगा ही मैं क्योंकि मेरा पूरा जीवन विद्रोही रहा है और अंतिम क्षण तक विद्रोही रहेगा। आप मुझसे कुछ लेकर जाए एक अद्वितीय चीज लेकर जाएं, ऐसी दुर्लभ चीज लेकर जाएं कि किसी योगी को, यति को, तांत्रिक को, गुरू को बताएं तो वह टुकुर-टुकुर ताकता रहे कि ऐसा कैसे संभव हुआ। यह ज्ञान कहीं मिल नहीं पाएगा, किसी ग्रंथ में नहीं मिल पाएगा। यह केवल इस जीवित ग्रंथ में मिल पाएगा और कहीं नहीं मिल पाएगा। संभव ही नहीं है।
और यह मेरी जिद है कि आपको अद्वितीय बनाना है। अद्वितीय का अर्थ है कि आपके समान दूसरा कोई न हो। ऐसे ही आप अद्वितीय बन सकें इस दीक्षा के माध्यम से ऐसा मैं आशीर्वाद देता हूं, कल्याण कामना करता हूं।
– गुरुदेव कैलाश चन्द्र श्रीमाली
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