





एक कवि एक गीत लिखता है। उसके गीत में जो भी शब्द होते हैं, वे सभी शब्द सामान्य होते हैं। उन शब्दों को हम रोज बोलते हैं। शायद ही उस कविता में एकाध ऐसा शब्द मिल जाये जो हम न बोलते हों। न भी बोलते हों, तो परिचित तो होते हैं। फिर भी कोई कविता शब्दों का सिर्फ जोड़ नहीं है। शब्दों के जोड़ से कुछ ज्यादा है।
एक व्यक्ति सितार बजाता है। सितार को सुनकर हृदय पर जो परिणाम होते है, वे केवल ध्वनि के आघात नहीं है। ध्वनि के आघात से कुछ ज्यादा हम तक पहुँच जाता है।
जीवन कुछ श्रेष्ठतर गणित पर निर्भर है। यहां जिन चीजों को हमने जोड़ा था, उनसे नई चीज पैदा हो जाती है, उनसे श्रेष्ठतर का जन्म हो जाता है, उनसे महत्त्वपूर्ण पैदा हो जाता है। क्षुद्रतम से भी महत्त्वपूर्ण पैदा हो जाता है।
जिंदगी साधारण गणित नहीं है। बहुत श्रेष्ठतर, गहरा, सूक्ष्म गणित है। ऐसा गणित है जहां आंकड़े बेकार हो जाते हैं। जहां गणित के जोड़ और घटाने के नियम बेकार हो जाते है। और जिस आदमी को गणित के पार, जिंदगी के रहस्य का पता नहीं है, उस आदमी को जिंदगी का कोई भी पता नहीं है।
इस महावाक्य में बड़ी अजीब बातें कहीं गई है। कहा है कि पूर्ण से पूर्ण निकल आता है, फिर भी पीछे पूर्ण शेष रह जाता है। साधारण गणित के हिसाब से बिलकुल गलत बात है। अगर हम किसी भी चीज में से कुछ निकाल लेंगे, तो उतना ही शेष नहीं रह सकता जितना था। कुछ कम हो जायेगा। हो ही जाना चाहिये, अन्यथा हमारे निकाले हुए का क्या हुआ? अगर मैं एक तिजोरी में से दस रूपये निकाल लूं, उसमें अरबों रूपये भरे हों, तो भी कम हो गये। दस पैसे भी निकाल लूं, तो भी कम हो गये। उतना ही शेष नहीं रह सकता जितना पहले था। कितनी ही बड़ी तिजोरी हो-कुबेर का खजाना हो-अगर दस नये पैसे भी हमने उसमें से निकाले, तो अब तिजोरी उतनी ही नहीं है, जितनी थी, कुछ कम हो गई। और कितना ही बड़ा खजाना हो, अगर हम दस कौड़ी भी उसमें डाल दें, तो अब उतनी ही नहीं रही जितनी थी। कुछ जुड़ गई और ज्यादा हो गई।
लेकिन यह सूत्र कहता है कि पूर्ण से पूर्ण निकल आता है, थोड़ा भी नहीं-दस पैसे नहीं निकालते, पूरी तिजोरी ही बाहर निकाल लेते हैं-पूर्ण से पूर्ण ही बाहर निकाल लेते है, फिर भी पीछे पूर्ण ही शेष रह जाता है। या तो किसी पागल ने कहा है, जिसे गणित का कोई भी पता नहीं। पहली कक्षा का विद्यार्थी भी जानता है कि हम कुछ निकालेंगे, तो पीछे कमी हो जायेगी। और थोड़ा निकालेंगे, तो भी कमी हो जायेगी। अगर पूरा निकाल लेंगे, तब तो पीछे कुछ भी नहीं बचना चाहिये। पर यह सूत्र कहता है कि कुछ नहीं, पूरा ही बच जाता है। तब निश्चित ही, तिजोरी को ही जो समझते है, वे इसे नहीं समझ पायेंगे। तब किसी और दिशा से समझना पड़ेगा।
जब आप किसी को प्रेम देते है, तो आपके पास प्रेम कम होता है? आप पूरा ही प्रेम दे डालते है, तब भी आपके पास कुछ कमी हो जाती है? नहीं। आदमी के पास इस सूत्र को समझने के लिये जो निकटतम शब्द है वह प्रेम है। उससे ही हमें पकड़ना पड़ेगा। सच तो यह है कि प्रेम आप कितना ही दे डालें, उतना ही बचा रहता है जितना था। उसमें कोई भी कमी नहीं आती। बल्कि कुछ तो कहते हैं कि वह और बढ़ जाता है। जितना आप देते हैं कि और-और उपलब्ध होता चला जा रहा है। जो अपने सारे प्रेम को फेंक दे बाहर, वह अनंत प्रेम का मालिक हो जाता है।
पूर्ण से पूर्ण निकल आये और पीछे पूर्ण ही शेष रह जाये, तो इसका अर्थ हुआ कि यह गणित से नहीं समझाया जा सकेगा, प्रेम से समझना पड़ेगा। इसलिये जो आंइस्टीन के पास समझने जायेंगे, वे नहीं समझ पायेंगे। मीरा के पास समझने जायें, तो शायद समझ में आ जाये। चैतन्य के पास समझने जायें, तो शायद समझ में आ जाये। क्योंकि यह किसी और ही आयाम की बात है, जहां देने से घटता नहीं।
आपके पास सिवाय प्रेम के और कोई ऐसा अनुभव नहीं है जिससे समझने की पहली चोट हो सके। पता नहीं, प्रेम का अनुभव भी है या नहीं, क्योंकि सौ में से निन्यानवे को वह भी नहीं है। अगर आपको प्रेम दे देने से कुछ कमी मालूम पड़ती हो, तो आप समझ लेना कि आपको प्रेम का कोई अनुभव नहीं है। अगर आप प्रेम किसी को देते हों ओर भीतर लगता हो कि कुछ खाली हुआ, तो आप समझ लेना कि जो आपने दिया है वह कुछ और होगा, प्रेम नहीं हो सकता। वह फिर तिजोरी की ही दुनिया की कोई चीज होगी। वह पैसे लगते में तुलने वाली चीज होगी। आंकड़ों में आंकी जा सके, तराजू में तौली जा सके,
जो भी नापा जा सकता है, उसमें से कुछ भी निकालियेगा, तो घट जायेगा। जो नहीं नापा जा सकता, अमाप है, वहीं केवल कितना ही निकाल लीजिये, तो पीछे उतना ही बचेगा जितना था।
हम एक बहुत ही साधारण गणित की दुनिया में जीते है, जहां देने से सब चीजें कम हो जाती है। इसलिये डर स्वाभाविक है। और कठिनाई यह है कि प्रेम के अलावा और कोई अनुभव नहीं हैं जो इम्मेजरेबल है। और तो सब मेजरबेल है, जो भी हमारे पास है सब नापा जा सकता है। हमारा क्रोध नापा जा सकता है, हमारी घृणा नापी जा सकती है, हमारा सब नापा जा सकता है। सिर्फ एक अनुभव है प्रेम का, जो कि अमाप है। वह भी हम सबके पास नहीं है। इसीलिये तो हम परमात्मा को समझने में बड़ी कठिनाई अनुभव करते हैं।
जो आदमी प्रेम को समझ लेगा, वह परमात्मा को समझने की फिक्र ही छोड़ देगा। क्योंकि जिसने समझा प्रेम को, उसने समझा परमात्मा को। वे एक ही गणित के हिस्से हैं। वे एक ही डायमेंशन, एक ही आयाम की चीजें हैं।
जिसने पहचाना प्रेम को, वह कहेगा, परमात्मा न भी मिले तो चलेगा। क्योंकि प्रेम मिल गया, तो काफी है। बात हो गई। परिचित हो गये हम उस श्रेष्ठतर जगत से, जहां ऐसी चीजें होती हैं जो बांटने से घटती नहीं, बढ़ती हैं। कितना ही दे डालो, उतनी ही शेष रह जाती हैं, जितनी थीं।
और ध्यान रहे, जिस दिन ऐसा अनुभव होता है कि मेरे पास ऐसा प्रेम है, जो मैं दे डालूं, तो भी उतना ही बचता है जितना था, उसी दिन दूसरे से प्रेम की मांग क्षीण हो जाती है। क्योंकि कितना ही प्रेम मिल जाये, मेरा बढ़ नहीं सकता। ध्यान रहे, जिस चीज को देने से घट नहीं सकता, उस चीज को लेने से बढ़ाया नहीं जा सकता। यह एक ही साथ होगा।
जब तक मैं दूसरे से प्रेम मांगता हूँ- और हम सब मांगते ही नहीं बूढ़े भी मांगते हैं। हम सब प्रेम मांगे चले जाते हैं। हमारी पूरी जिंदगी प्रेम की भिक्षा है।
मनोवैज्ञानिक तो कहते हैं कि हमारी सारी तकलीफ एक है, हमारा सारा तनाव हमारी सारी चिंता एक है। और वह चिंता इतनी है कि प्रेम कैसे मिले! और जब प्रेम नहीं मिलता तो हम फिर प्रेम के ही परिपूरक खोजते रहते हैं। लेकिन हम जिंदगीभर प्रेम खोज रहे हैं, मांग रहे हैं।
क्यों मांग रहे है? आशा से कि मिल जायेगा, तो बढ़ जायेगा। इसका मतलब फिर वह हुआ कि हमें फिर प्रेम का पता नहीं था। क्योंकि जो चीज मिलने से बढ़ जाये, वह प्रेम नहीं है। कितना ही प्रेम मिल जाये, उतना ही रहेगा जितना था।
जिस आदमी को प्रेम के इस सूत्र का पता चल जाये, उसे दोहरी बातों का पता चल जाता है। एक, कितना ही मैं दूं, घटेगा नहीं। कितना ही मुझे मिले, बढ़ेगा नहीं। कितना ही! पूरा सागर मेरे ऊपर टूट जाये प्रेम का, तो भी रत्तीभर बढ़ती नहीं होगी। और पूरा सागर मैं लुटा दूं, तो भी रत्तीभर कमी नहीं होगी।
पूर्ण से पूर्ण निकल आता है, फिर भी पीछे पूर्ण शेष रह जाता है। परमात्मा से यह पूरा संसार निकल आता है। छोटा नहीं-अनंत, असीम। छोर नहीं, ओर नहीं, आदि नहीं, अंत नहीं-इतना विराट सब निकल आता है। फिर भी परमात्मा पूर्ण ही रह जाता है पीछे। और कल यह सब कुछ उस परम अस्तित्व में वापस गिर जायेगा। वापस लीन हो जायेगा, तो भी वह पूर्ण ही होगा। नहीं कोई घटती होगी, नहीं कोई बढ़ती होगी।
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