





ऋग्वेद में लिखा है ‘न ऋते त्वम क्रियते कि चनारे’ अर्थात् हे गणेश जी! तुम्हारे बिना कोई भी कार्य प्रारम्भ नहीं किया जाता है। गजानन को वैदिक देवता की उपाधि दी गई है। ऊँ के उच्चारण से वेद पाठ प्रारम्भ होता है। ऊँ में गणेश की मूर्ति सदा स्थित रहती है। गणेशजी आदिदेव हैं। वैदिक ऋचाओं में उनका अस्तित्व हमेशा रहा है। गणेश पुराण में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के द्वारा उनकी पूजा किये जाने का उल्लेख मिलता है, आइए, जाने कि उनके प्रतीकों का क्या महत्त्व है?
मूषक-भगवान गणेश की शारीरिक बनावट के मुकाबले उनका वाहन बहुत छोटा चूहा है। चूहे का काम किसी चीज को कुतर डालना है। वह चीर-फाड़ कर उसके अंग-प्रत्यंग का विश्लेषण कर देता है। गणेश बुद्धि और विद्या के अधिष्ठाता हैं। तर्क-विर्तक में उनकी कोई सानी नहीं है। इसी प्रकार मूषक भी तर्क-वितर्क में पीछे नहीं हैं। काट-छांट में उसका कोई सानी नहीं है। इसलिये उसके इन्हीं गुणों को देखकर उन्होंने उसे अपना वाहन चुना।
सूंड- गणेशजी की सूंड हमेशा हिलती-डूलती रहती है, जो उनके सचेत होने का संकेत है। उसके संचालन से दुःख, दारिद्रय समाप्त हो जाते हैं।
अनिष्टकारी शक्तियां डर कर भाग जाती हैं। यह सूंड बड़े-बड़े दिग्पालों को भयभीत करती है। वहीं देवताओं का मनोरंजन भी करती है। इस सूंड से गणेशजी ब्रह्माजी पर पानी एवं फूल बरसाते हैं। सूंड के दाई और बाई ओर होने का भी अपना महत्त्व है। ऐसी मान्यता है कि सुख-समृद्धि हेतु उनकी दाई ओर मुड़ी सूंड वाली प्रतिमा की पूजा करनी चाहिये। वहीं शत्रु को परास्त करने या ऐश्वर्य पाने के लिये बाईं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिये।
लम्बोदर-गणेशजी का पेट बहुत बड़ा है। इसी कारण इनको लम्बोदर भी कहा जाता है। लम्बोदर होने के कारण यह है कि वे हर अच्छी और बुरी बात को पचा जाते हैं और किसी भी बात का निर्णय तुरंत और सूझबूझ के साथ लेते हैं। वे सम्पूर्ण वेदों के ज्ञाता है। संगीत और नृत्य आदि विभिन्न कलाओं के भी ज्ञाता हैं। ऐसा माना जाता है कि उनका पेट विभिन्न विद्याओं का कोष है।
लम्बे कान- श्री गणेश लम्बे कान वाले हैं, इसलिये उन्हें गजकर्ण भी कहा जाता है। लम्बे कान वाले भाग्यशाली होते हैं। लम्बे कानों का एक रहस्य यह भी है कि वह सबकी सुनते हैं और अपनी बुद्धि और विवेक से ही किसी कार्य का क्रियान्वयन करते हैं। बड़े कान चौकन्ने रहने का भी संकेत देते हैं।
मोदक – बड़े पेट वालों को मीठा वैसे भी पंसद होता है, इसलिये मोदक उन्हें प्रिय है, क्योंकि वह आनन्द का भी प्रतीक है वह ब्रह्मशक्ति का प्रतीक है क्योंकि मोदक बन जाने के बाद उसके भीतर क्या है, दिखाई नहीं देता। मोदक की गोल आकृति गोल और महाशून्य का प्रतीक है। शून्य से सब उत्पन्न होता है और शून्य में ही अंततः सब विलीन हो जाता है।
दांत – भगवान परशुराम से युद्ध में गणेश जी का एक दांत टूट गया था। टूटे दांत की लेखनी बनाकर उन्होंने महाभारत का ग्रंथ लिखा।
पाश- गणेशजी के हाथ में पाश है। यह राग, मोह और तमोगुण का प्रतीक माना जाता है। इसी पाश से वह पाप समूहों और सम्पूर्ण प्रारब्ध को आकर्षित कर अंकुश से इनका नाश कर देते हैं।
परशु – इसे गणेशजी अपने हाथ में धारण करते हैं। यह तेज धार का होता है, जो तर्कशास्त्र का प्रतीक है।
वदमुद्रा-गणपति प्रायः वरमुद्रा में दिखाई देते हैं। यह सत्वगुण का प्रतीक है। इसी से भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।
इस प्रकार गणेश जी का सारा व्यक्तित्व निराला है। उनके आंतरिक गुण भी उतने ही अनूठे हैं जितना उनका बाहरी व्यक्तित्व। गणेशजी के सभी प्रतीक सिखाते हैं कि हम अपनी बुद्धि को जाग्रत रखें, अच्छी-बुरी बातों को पचाएं, पापों के शमन के लिये सद् तर्कों की धार रखें तथा तमोगुण पर विजय हासिल कर सत्वगुणों का विस्तार करें तो हमारे जीवन में भी गणेश घटित होंगे।
उच्छिष्ट गणपति प्रयोग
वाद, विवाद, मुकदमा, लड़ाई, शत्रु-बाधा, भय-नाश, जुए में जीत इत्यादि कार्यो के लिये उच्छिष्ट गणपति की साधना सम्पन्न की जाती है।
विनियोग
ऊँ अस्योच्छिष्ट गणपति मन्त्रस्य कंकोल ऋषिः विराट् छन्दः उच्छिष्ट गणपति देवता सर्वाभीष्टसिद्धये जपे विनियोगः।
इस प्रकार संकल्प लेकर चार भुजा वाले, रक्त वर्ण, तीन नेत्र, कमल दल पर विराजमान, दाहिने हाथ में पाश एवं दन्त धारण किये हुये, उन्मत्त मुद्रा स्थिर उच्छिष्ट गणपति का ध्यान करना चाहिये। इसके पश्चात् आठ मातृकाएं-ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवो, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा एवं लक्ष्मी। इनकी आठ दिशाओं में स्थापना कर पूजन करना चाहिये। पूजन हेतु उच्छिष्ट गणपति चित्र, उच्छिष्ट गणपति यन्त्र, अष्टमातृका प्रतीक की स्थापना कर विधिवध पूजा होनी चाहिये। प्रसाद स्वरूप में लड्डू का अर्पण करना चाहिये।
तत्पश्चात् निम्न उच्छिष्ट गणपति मन्त्र का जप ग्यारह दिन तक करना चाहिये।
मंत्र अनुष्ठान के पश्चात् साधक को हवन अवश्य करना चाहिये। हवन में घी, शहद, शक्कर तथा खील (लाजा) से वशीकरण क्रिया सम्पन्न होती है, पुष्प एवं सरसों के तेल का हवन करने से शत्रुओं का विद्वेषण होता है।
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