



आपके मन को झकझोरने
प्रकृति को नये रूप से निहारने
आनन्द-मद में जीवन नहलाने
मन की इच्छाओं को पूर्ण करने


जीवन में हास्य, विनोद, आनन्द व तृप्ति प्राप्त हो जाना कोई सामान्य सी बात नहीं होती, यह तो जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि है, जिसे प्राप्त करने के लिये बड़े-बड़े योगियों और ऋषियों-मुनियों ने कठिन से कठिन तप किये है, तब जाकर वे पूर्ण कहलाये और यह दिखा दिया, कि यदि व्यक्ति दृढ़ निश्चयी और आत्मविश्वासी हो, तो वह तप व साधना के बल पर क्या कुछ नहीं कर सकता, और जब ऐसा होगा, तो उसके चेहरे पर एक ओज, एक उमंग, एक आह्लाद, एक प्रसन्नता स्वतः ही झलकने लग जायेगी….. और यही तो वास्तविक सौन्दर्य है।
सौन्दर्य किसी नारी, अप्सरा या प्रकृति का नाम नहीं है, वे तो केवल सौन्दर्य के प्रतिमान है। ‘जिसे देखकर आप अपने-आप को चिंतामुक्त अनुभव करने लगें और आनन्द की स्थिति उत्पन्न होने लगे, सही अर्थो में वही सौन्दर्य है।’
आज सौन्दर्य प्रसाधनों के माध्यम से व्यक्ति सौन्दर्यशाली बने रहने का प्रयास करता है, तरह-तरह के विटामिन्स खाता है। सौन्दर्य विशेषज्ञ भी सौन्दर्य का स्थायी हल ढूंढने के प्रयास में रत हैं, किन्तु आज तक स्थायी उपाय प्राप्त करने में असफल ही हैं। यह जरूर है कि सर्जरी के माध्यम से चेहरे व शरीर की झुर्रियों को समाप्त करने में डॉक्टर सफल हुये है, किन्तु यह चिकित्सा अत्यन्त महंगी है और अत्यन्त कष्ट साध्य भी, जिसे अपनाना प्रत्येक व्यक्ति के सामर्थ्य की बात नहीं है।
यदि हम अपना थोड़ा-सा ध्यान ऋषि परम्परा द्वारा आविष्कृत उपायों पर डालें, तो हमें पता चलेगा कि सौन्दर्य का स्थायी उपाय उन लोगों ने बहुत पहले ही ढूंढ निकाला है। हमारे प्राचीन ऋषि धन्वन्तरी, अश्विनी, च्यवन आदि ऐसे व्यक्तित्व हुये है, जिन्होंने अपने पूरे जीवन को इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु लगा दिया कि-
आखिर जीवन का वास्तविक तथ्य क्या है?
कैसे अपने-आप को ओजस्वी, यौवनवान और सौन्दर्यवान बनाया जा सकता है?
किस प्रकार बुढ़ापे को जवानी में बदला जा सकता है?
किस प्रकार अपने पूर्ण शरीर का कायाकल्प किया जा सकता है?
‘कायाकल्प’ का तात्पर्य उस सदाबहार तरोताजगी, अद्वितीय सौन्दर्य और उस मस्ती से है, जो जीवन में आनन्द का बीज बो दे, 60 वर्ष के वृद्ध को भी 16 वर्षीय पूर्ण सौन्दर्य प्रदान कर दे, क्योंकि व्यक्ति मन से भी अधिक मन पर थोपे गये विचारों से बूढ़ा हो जाता है और उसका सारा सौन्दर्य ही ढल जाता है….. जीवन में इस आनन्द का होना ही सौन्दर्य-वृद्धि है।
सौन्दर्य तो आधार है जीवन का, ईश्वर का दिया हुआ वरदान है, जिसका प्राप्त होना जीवन की श्रेष्ठता, पूर्णता कही जाती है। जितने भी ग्रंथ, वेद, पुराण लिखे गये, उन सब में सौन्दर्य का विस्तृत विवेचन हुआ है।
….वसंत मन की सख्त जमीन पर किसी स्त्रोत के फूट पड़ने का ही तो अवसर है, जिसमें खुद भी भीग लें और को भी भिगो दें। यही तो होती है यौवन की अठखेलियां यौवन, एकाएक उतर आने वाली कोई घटना नहीं होती है। पहले तो अठखेलियां ही आती है, अठखेलियों के आने से वह ‘यौवन’ आता है, जो सही अर्थो में यौवन होता है। हर वर्ष की भांति, वसंत की ही तरह यौवन को हर वर्ष नूतन करते रहने का पर्व होता है यह।
वसंत का पर्व, प्रकृति किसी पाठशाला में, जीवन के किसी पाठ की कक्षा लगाकर नहीं, उत्सव रच कर समझाना चाहता है, और जैसा कि पहले कहा, कि व्याख्याओं के दुरूह चक्र से पृथक हो स्वयं साधक को ही एक व्याख्या करने योग्य धारणा बना देती है। नृत्य और संगीत के ऐश्वर्य में खोता हुआ दिखता यह पर्व अपने बाह्य आवरण में जितना अधिक विलासमय है, उतना ही आंतरिक पक्ष से गंभीर भी। क्या आंतरिक गांभीर्य के अभाव में यह संभव भी हो सकता है, जीवन में वास्तविक विलास उतर सकें? आंतरिक गांभीर्य की अनुपस्थिति तो केवल वसंत को ही नहीं, किसी में उत्सव को एक फूहड़ प्रदर्शन व कोलाहल में बदल देती है। इसी से आवश्यक है कि साधक एक ओर जहां जीवन के बाह्य पक्षों का श्रृंगार करे, वहीं उससे भी अधिक तल्लीनता से अन्तर्पक्ष का भी श्रृंगार करे। वसंत इन दोनों ही बातों को एक साथ, एक ही घड़ी में सम्पन्न करने का अवसर प्रदान करता है और तभी तो अनंग साधना पर्व होता है।
सुन्दर होना, सुन्दर दिखना, सुन्दरता का सम्मान करना, उसकी प्रशंसा और सराहना करना मानव का धर्म है।
अनिन्द्यं अद्वितीयं च सौन्दर्य यान्ति निश्चितम्।
साधनां सौन्दर्याख्याय कांक्षन्त्यपसरो¿पि यत्।।
‘निश्चित रूप से साधना के द्वारा अनिन्द्य सौन्दर्य प्राप्त किया जा सकता है, अप्सराएं भी सुन्दरतम बनने के लिये सौन्दर्य साधना करती हैं।’
प्रकृति में हर वर्ष वसंत आ सकता है तो जीवन में हर वर्ष नवीनता, सौन्दर्य, आह्लाद, प्रेम, काम और रति आ सकते है, आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम मन से हर समय युवा बने रहें और स्वागत करें, जीवन के प्रत्येक आनन्द-क्षण का।
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