





भगवती दुर्गा की पूजा – आराधना के संबंध में जितने ग्रंथों की रचना की गई है, संभवतया किसी अन्य के संबंध में इतनी अधिक रचना नहीं है इसका कारण भगवती दुर्गा की आधारभूत शक्ति जिसमें सम्पूर्ण विश्व की सगुण-निर्गुण शक्तियों का स्वरूप है। अलग-अलग स्वरूपों में अलग-अलग कार्य है, भगवती दुर्गा ही जगत पालक, मायाधीश्वरी है तथा संहारकारिणी आद्या शक्ति भी है।
जीवन में सृजन और विखण्डन दोनों ही प्रक्रियायें साथ-साथ चलती रहती है, इन दोनों के बिना जीवन प्रक्रिया चल ही नहीं सकती, शुद्ध भावों से शक्तियों का विकास साधक के लिये महत्वपूर्ण है, वहीं कष्ट, पीड़ा, शोक, और दुःखों का नाश भी आवश्यक है, इसीलिये मंत्र ज्ञाता हो चाहे तंत्र ज्ञाता, साधना किसी भी स्वरूप में साधक करें, उसे देवी भगवती दुर्गा की साधना के बिना सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती।
भगवती दुर्गा ही मूल प्रकृति, ईश्वरी, परब्रह्म स्वरूपा, परमतेज स्वरूपा, सर्वेश्वरी, सर्वाधार है।
देवी और ईष्ट
साधना में इष्ट का बड़ा महत्व है, साधक जानते हैं कि वह अपने इष्ट स्वरूप को जिसे भी माने, उसका अत्यन्त प्रबल होना आवश्यक है, तभी वह अपने कार्यों में सफल हो सकता है, अपने व्यक्तित्व को, तेज को प्रबल बना सकता है, इष्ट बिना ज्ञान नहीं, शक्ति नहीं, पूर्णता नहीं।
ऋग्वेद में लिखा है, कि भगवती दुर्गा ही सभी उपास्य देवों में प्रधान है, देवी शक्ति से ही ब्रह्मा, विष्णु तथा रूद्र उत्पन्न हुये, इन्द्र, अग्नि तथा स्वास्थ्य के देव अश्विनी कुमारों को धारण किये हुये हैं, यह परम-शक्ति देवी तो-
‘‘निःशेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या’’
अर्थात् इस जगत में देवी के अतिरिक्त दूसरा कौन है, सब कुछ है जो भगवती दुर्गा का ही स्वरूप है, प्रकृति, माया, शक्ति सब देवी के पर्यायवाची है, इसीलिये जब तक इष्ट स्वरूप दुर्गा प्रबल नहीं है, तो साधक की सब साधनायें अधूरी है, यदि तत्काल कोई साधना सफल भी हो जाय तो जब तक इष्ट स्वरूप भगवती दुर्गा सिद्ध न हो जाय तब तक वह साधना-फल स्थायी नहीं रह सकता, क्योंकि साधना का आधार – शक्ति और शक्ति का आधार – भूत देवी भगवती जगदम्बा ही है।
साधक अलग-अलग नामों से अलग – अलग स्वरूप से पूजा करता है, पूजा लक्ष्मी स्वरूप में करें अथवा ज्ञान स्वरूप सरस्वती स्वरूप में करें, चण्डी, काली स्वरूप में करें, मूल स्वरूप तो दुर्गा साधना ही है।
यह सब तो देवी के असंख्य स्वरूप है, साधक अपनी समझ के अनुसार साधना करता है, और जब वह इस परम तत्व तक पहुंच जाता है, तो उसे सिद्धि प्राप्त होती ही है, अलग – अलग कार्यों हेतु अलग-अलग स्वरूपों में पूजा का शास्त्रोक्त विधान है, उसी रीति के अनुसार पूजा साधना सम्पन्न की जा सकती है।
दुर्गा का यह स्वरूप विशेष प्रबल तथा ज्वलनशील दाहक प्रयोग माना गया है, जो साधक राज्य बाधा, शत्रु बाधा, मुकदमे इत्यादि से विशेष दुःखी हो, चिन्ताओं का भार बढ़ता ही जा रहा हो, तो उसे इस स्वरूप की साधना अवश्य करनी चाहिये।
देवी दुर्गा कल्याणी स्वरूप है, जिनके तीव्र प्रभाव से दुष्टात्माओं का नाश हो जाता है और प्रबल से प्रबल शत्रु भी वश में होकर दास स्वरूप बन जाता है।
यह प्रयोग एक तांत्रिक प्रयोग है और रात्रि को ही सम्पन्न किया जाता है, इसके लिये कुछ विशेष सामग्री तथा विशेष अनुष्ठान की आवश्यकता रहती है, सामग्री सभी व्यवस्था पहले से कर लेनी चाहिये, एक बार साधना प्रारंभ करने के पश्चात् बीच में उठने का विधान वर्जित है।
साधना सांयकाल के पश्चात् स्नान कर शुद्ध लाल वस्त्र धारण करें, अपने पूजा स्थान में अथवा एकान्त कमरे में यह प्रयोग सम्पन्न कर सकते हैं, अपने सामने देवी का विकराल स्वरूप का चित्र स्थापित कर सिन्दूर से चित्र पर तिलक कर स्वयं भी तिलक लगायें और आसन ग्रहण करें।
अपने सामने ‘‘चण्डी यंत्र’’ शुद्ध रूप से धो कर घी लगा कर पौंछ कर काले तिलों की ढेरी पर स्थापित करें, एक ओर एक कलश स्थापित कर उस पर नारियल रखें, सर्वप्रथम कलश पूजन सम्पन्न कर भैरव का ध्यान कर मौली बांध कर एक सुपारी भैरव स्वरूप स्थापित करें, अब एक ओर धूप तथा दूसरी ओर दीपक जला कर एक कटोरे में देवी के सामने खीर का प्रसाद रखें, अब इस साधना में साधक वीर मुद्रा में बैठ कर पूजन कार्य प्रारंभ करें, साधक का मुंह दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिये, सर्वप्रथम देवी से प्रार्थना कर पूजन की आज्ञा प्राप्त कर ध्यान करें।
ध्यान मंत्र-
ऊँ ह: ऊँ सौं ऊँ हौं ऊँ श्रीं हीं क्लीं श्रीर्जयजय चण्डिका चामुण्डे चण्डिके
मम सकल मनोरथं देहि सर्वोपद्रवं निवारय नमो नमः।।
अपने सामने यंत्र के चारों ओर ‘‘21 तांत्रोक्त फल’’ एक वृत में स्थापित करें, ऊपर लिखे ध्यान मंत्र को बोलते हुये काले तिल और सरसों, सिन्दूर, मिलाकर प्रत्येक बार ध्यान मंत्र का जप कर एक तांत्रोक्त फल पर चढ़ायें, इस प्रकार 21 तांत्रोक्त फलों पर यह प्रयोग सम्पन्न करना है, ये 21 तांत्रोक्त फल जीवन की 21 बाधाओं के स्वरूप है, जब यह प्रयोग पूर्ण हो जाये तो अपने ललाट पर चंदन से त्रिपुण्ड तिलक बनायें तथा चण्डिका महा मंत्र का जप कार्य प्रारंभ करें।
चण्डी महामंत्र
।। ऊँ ऐं हृीं क्लीं फट् ।।
इस प्रकार 11 माला जप कर पूजन कार्य सम्पन्न करें तथा यह मंत्र जप मौन रूप से नहीं अपितु जोर-जोर से बोल कर सम्पन्न करना चाहिये, इस मंत्र जप के मध्य में ही देवी के चण्डी स्वरूप के दर्शन होते हैं, साधक उसी मुद्रा में जप कार्य सम्पन्न करता रहे।
जब साधना पूर्ण हो जाय तो नमस्कार इत्यादि सम्पन्न कर आरती उतार कर, सामने रखे हुये खीर के प्रसाद को ग्रहण करना चाहिये।
तंत्रोक्त फल, सरसों तथा तिल को दूसरे दिन किसी एकान्त स्थान पर जाकर गाड़ देना चाहिये, यह सर्व दुःख नाशक चण्डी सिद्धि प्रयोग सम्पन्न करने से भय, बाधा का पूर्ण रूप से नाश हो जाता है।
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