





जब-जब भगवान श्री कृष्ण के लीलाओं का वर्णन मिलता है, तब-तब माता यशोदा का नाम जरूर लिया जाता है। वे भगवान श्रीकृष्ण की पालक माता थीं। फाल्गुन माह में कृष्ण पक्ष षष्ठी को माँ यशोदा जयन्ती के रूप में मनाया जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, माता यशोदा और नंदराज ने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी। वे अपने जीवन में ईश्वर को पुत्र रूप में प्राप्त करना चाहते थे। उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें यह वरदान दिया कि वे अपने अगले जन्म में श्रीकृष्ण के माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे। यही कारण है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अवतार लिया, तो वे नंदबाबा और माता यशोदा के घर में बालक के रूप में आये।
माता यशोदा को यह सौभाग्य इसलिये भी प्राप्त हुआ क्योंकि वे केवल प्रेम के रूप में भगवान को देखती थीं। उनके लिये कृष्ण भगवान नहीं, बल्कि उनकी गोद में खेलता हुआ नटखट बालक था। वे न तो श्रीकृष्ण से कोई वरदान मांगती थीं और न ही उनकी शक्ति को देखकर उनकी पूजा करती थीं। उनके प्रेम में केवल निश्छल स्नेह और ममता थी।
वात्सल्य और स्नेह की बात करते हैं तो यशोदा माता की ममतामयी छवि उभर जाती है। उन्होंने पूरे संसार के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत किया है कि जन्म देने वाली से पालने वाली माँ का दर्जा ऊँचा होता है। उन्होंने अपने निश्छल स्नेह की ताकत से दिल के रिश्ते को खून के रिश्ते से भी ज्यादा मजबूत बना दिया। तभी तो संसार के पालनहार नारायण स्वयं बाल रूप धारण करके यशोदा मइया की ममता के अधीन हो गये।
इस दिवस पर माता यशोदा और उनकी गोद में बाल स्वरूप भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार यह दिवस माता यशोदा और बाल कृष्ण जी का व्रत और पूजन करने से संतान संबंधी सभी परेशानियाँ दूर होती हैं और साथ ही सभी मनोकामनायें पूर्ण होतीं हैं। इस दिन महिलाएँ अपनी संतान की दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य के लिए पूजन और व्रत करती हैं।
संतान सुख सुसंस्कार चेतना प्राप्ति दीक्षा
वात्सल्य शक्ति का स्वरूप पूर्ण रूप से नारी को ही समर्पित होता है, क्योंकि किसी भी शिशु की सृजनकर्ता वही तो होती हैं। एक बीज से एक वृक्ष बनने की साक्षी वही तो होती है। इसी कारणवश करूणा को ‘माँ’ की संज्ञा प्रदान कर नारी को अभिनंदन करने का प्रयास किया गया है।
एक स्त्री का जीवन तभी पूर्ण होता है जब वह मातृत्व को ग्रहण करती है। यदि एक स्त्री के विवाह के बाद भी कोई संतान नहीं हो या उसका पुत्र या पुत्री नहीं हो तो समाज उसे हेय दृष्टि से देखता है और यदि वह माँ बनने के लायक न हो तो उसे बांझ, अपशकुनी जैसे कटु शब्दों को भी सहन करना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर संतान संस्कारों के अभाव में गलत मार्ग का चयन कर लेती हो, वह अनेक अर्नगल क्रियाओं में संलिप्त हो जाये और उससे बड़ी बात माता-पिता का सम्मान ना करती हो। ऐसी स्थितियां अत्यधिक कष्टदायक होती हैं। जिस पुत्र के कंधों पर प्रौढ़ावस्था का भार था, जब वह ही हाथ छुड़ा कर भागता हो, तो फिर माता-पिता किस के सहारे जीवन यापन करें।
इस दिवस को पूर्ण फलदायी हेतु भगवान कृष्ण समान श्रेष्ठ संतान प्राप्ति की चेतना आत्मसात करने से यदि आप संतानहीन हैं या फिर आपकी संतान कुमार्गी हो गईं तो इन सभी समस्याओं से निवारण हो सकेगा। संतान सुख सुसंस्कार चेतना प्राप्ति दीक्षा ग्रहण करने से तेजस्वी संतान की प्राप्ति संभव हो पाती है, साथ ही संतान में संस्कारों की वृद्धि होती है। इसके द्वारा बुद्धि और चित्त श्रेष्ठ चिंतन ग्रहण कर एकाग्रता, मेधावी, तेज-तर्रार, वाक्-चातुर्यता के गुण से युक्त होता है और सूर्य तत्व की प्राप्ति से तेजिस्वता युक्त होता है, उसमें सफल व्यक्तित्व के समस्त गुणों का समावेश होता है तथा माता-पिता को हर स्वरूप में संतान सुख की प्राप्ति होती है।
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