





तंत्र के संबंध में भ्रामक धारणाएं समाज में इतनी अधिक फैल गई है कि लोग तंत्र के नाम से घबराने लगे है। तंत्र का सीधा अर्थ मैली विद्या, तंत्र क्रिया का तात्पर्य मद्य, मांस, मीन, मुद्रा और मैथुन मान लिया गया है। गंदे रहने वाले, श्मशान में साधना करने वाले, लम्बे बाल बढ़ाने वालों को तांत्रिक मान लिया गया है। यह सब भ्रामक विचार है। विशुद्ध तंत्र तो जीवन की वह शुद्धतम क्रिया है, जो भगवान शिव के श्रीमुख से उच्चरित हुई थी और जिसमें शक्ति तत्व को जीवन में आत्मसात् कर जीवन की कमियों को दूर करने का विवरण है, विचार है, प्रक्रिया है, शुद्ध तंत्र के संबंध में मिथ्या धारणाओं को मिटाता यह विचारशील आलेख-
तंत्र साधना के मूल जनक भगवान शिव माने गये हैं। भगवान शिव ने ही आगम शास्त्र की रचना की। आगम शास्त्र में तंत्र साधनाओं का विवरण और निगम शास्त्र वेद-पुराण माने गये हैं। कलियुग में शक्ति साधना की आवश्यकता और भी अधिक है, इस कारण आज तंत्र साधना के सिद्धान्तों को पूर्ण रूप से समझना आवश्यक है।
जहां वेद शास्त्रों में, वैदिक मार्ग द्वारा जीवन की पूर्णता के लिये मोक्ष का मार्ग बताया गया है, जिसमें लौकिक वस्तुओं का धीरे-धीरे त्याग आवश्यक है, वहीं आगम शास्त्रों में प्रेय (अर्थात् भोग) और श्रेय (अर्थात् मोक्ष) दोनों को साथ-साथ प्राप्त करने का सुगम मार्ग बताया गया, इसलिये आगम शास्त्र को तंत्र शास्त्र या शक्ति भी कहा गया है।
‘तन्यते विस्तार्यते ज्ञानमनेन इति तन्त्रम्’-अर्थात् जिसके आधार पर ज्ञान का विस्तार किया जाता है, उसे तंत्र कहते हैं। तंत्र शब्द की उत्पति ‘तनु’ धातु से एवं ओर्णादिक‘ष्टून्’ प्रत्यय के योग से बना है। शैव सिद्धान्त के अनुसार जो तत्व एवं मंत्रों से समन्वित विविध विषयों का विस्तार से वर्णन करता है और साधक के लिये रक्षा कारक है, उसे तंत्र कहते है। तंत्र और वेद में कही भिन्नता नहीं है, दोनों का चरम लक्ष्य जीवन की पूर्णता प्राप्त करना है।
तंत्र मूल रूप से शाक्त उपासना का स्वरूप है, और तंत्र का उपयोग कुशलता से करना चाहिये। तंत्र मतानुसार तंत्र की शिक्षा दीक्षा गुरू मुख से प्राप्त होती है, तभी व्यक्ति श्रेष्ठ तांत्रिक बन सकता है। शंखिया विष का एक दाना भी जहर होता है, परन्तु उसका शोधन कर पोषक पदार्थ के साथ प्रयोग किया जाय, तो वह पुष्टि वर्धक और शक्तिदायक सिद्ध होता है। देशकाल, व्यवस्था और परिस्थिति के अनुसार आज तंत्र का शाक्त स्वरूप आवश्यक हो गया है।
शक्ति के बिना कोई भी पुरूषार्थ सफल नहीं हो सकता। प्रत्येक अणु-परमाणु में देवप्रदत शक्ति है, और वही उसका संचालन करती है और उस वस्तु का धर्म कहलाती है। अग्नि में ऊष्णता, प्रकाश व दाहकता उसकी शक्ति है और उसका धर्म भी है। ऊष्णता, प्रकाश और दाहकता से रहित अग्नि को अग्नि नहीं कहा जा सकता, अतः तंत्र के माध्यम द्वारा शक्ति की उपासना आवश्यक है। यह उपासना बहिर्मुखी भी हो सकती है और अन्तर्मुखी भी। मूलतः तंत्र साधना आत्म शक्ति को जाग्रत करने की क्रिया है।
तांत्रोक्त साधनाओं में देवी शक्ति को प्रधान माना गया है और देवी के विभिन्न स्वरूपों को सिद्ध किया जाता है।
शिव: शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभावितुं,
न चेदेवं देवो न खलु कुषलः स्पन्दितुमपि,
प्रणन्तुं स्तोतुवां कथमकृतपुण्यः प्रभवति।।
शिव, शक्ति से युक्त होकर ही सृजन, पालन, व संहार में समर्थ होते हैं, यदि वे शक्ति रहित हैं तो स्पन्दन भी नहीं कर सकते है, इसीलिये सारे देव, शक्ति से युक्त होकर ही उपास्य हैं। तंत्र साधना में जैसे-जैसे विकास हुआ वहां इनमें भेद होता गया। एक स्वरूप उपासना का रह गया, जिसमें भक्ति मार्ग द्वारा शक्ति की उपासना की जाती है, दूसरे में मंत्र क्रिया प्रक्रिया द्वारा शक्ति को साक्षात् सिद्ध किया जाता है… और यह वाममार्ग तंत्र साधना कहलाने लगी।
वाममार्ग के अनुसार शक्ति तंत्र के माध्यम से काली, दुर्गा, चण्डिका की तीव्र साधना आवश्यक है। कालान्तर में शिव को मूल आधार मानते हुए शिव के शुक्ल वर्ण के अनुरूप उमा, गौरी, सरस्वती, लक्ष्मी जैसी गौरांग शक्तियां पूजित हुई तथा शिव के कालरूप के कारण जो कृष्ण्-वर्णीय हैं, उस कारण काली, चण्डी, दुर्गा, चामुण्डा, कृष्णा इत्यादि की साधना होने लगी।
तंत्र शास्त्र में मंत्र शुद्धि द्रव्य, व्यवहार, स्थान को दृष्टिगत रखते हुये सक्षम गुरू से ‘शाक्त दीक्षा’ ग्रहण कर गुरू, देवी (शक्ति) और मंत्र में एकात्म भाव रखते हुये बीज, कवच, न्यास, मुद्रा, मातृका पूजन विशेष से सम्पन्न किया जाता है।
शक्ति के तीव्रतम स्वरूप काली की साधना में शव साधना, पंचमुण्ड साधना एवं बली का स्वरूप अवश्य ही है, लेकिन इस साधना को सात्विक रूप से ही सम्पन्न किया जा सकता है, क्योंकि कोई भी साधना अतिमानवीय होने पर शास्त्र सम्मत नहीं हो सकती और ना ही सिद्ध होती है।
तंत्र साधनाओं में मुख्य रूप से षोड़ष कुल देवियों का विशेष पूजन माना गया है, इसमें वैष्णवी, ब्रह्माणी, कालिके, इन्द्राणी, यमी, वाराही, ईशानी, नरसिंही, चामुण्डा, वारूणी, कालापी, कुरूकुलिया, नारायणी, कौमारी, पराजिता तथा अपराजिता विशेष हैं।
तंत्र के अष्ट नायिकाओं की भी उपासना विशेष रूप से की जाती है, ये हैं-बालिनी, कामेश्वरी, विमला, अरूणा, मेदिनी, जयन्ती, सर्वेश्वरी, कोलेशी है।
तंत्र साधना का नाम आते ही वाममार्ग सिद्धान्त अनुसार पंचमकार को विशेषकर प्रधानता दी जाती है। सामान्य तांत्रिक ये बताता है, कि तंत्र साधना पंचमकार के बिना सम्पन्न हो ही नहीं सकती है, लेकिन वास्तविक स्थिति कुछ और ही है।
वास्तव में कुलार्णव तंत्र में लिखा है कि
मद्यं मांसं च मीनं च मुद्रा मैथुनमेव च।
मकारापंचकं प्रादुर्योगिनां मुक्तिदायकम्।।
अर्थात् मद्य, मांस, मीन, मुद्रा और मैथुन ये पांच मकार योगियों को पूर्ण सिद्धि और मुक्ति प्रदान करने वाले है।
यहीं पर आकर तंत्र के स्वरूप की व्याख्या गलत की गई। वास्तव में इन सभी वस्तुओं का मूल, शाब्दिक अर्थ से न लेकर, इनके तात्विक स्वरूप को देखना चाहिये।
योगिनी तंत्र में इन पंच मकारों के संबंध में विवरण आया है। मदिरा के संबंध में लिखा है- जो सहस्त्रार पद्मरूपी पात्र में भरी हो और चन्द्रमा की कला तत्व से स्त्रावित हो वही पीने योग्य सुरा है, जिसको पीने से अशुभ कर्मो का प्रवाह नष्ट हो जाता है तथा साधक परम तत्व-ज्ञान प्राप्त कर मुक्ति प्राप्त करता है। ऐसे ही व्यक्ति योगी-मुनि बन पाते हैं। अतः सुरा का तात्पर्य सामान्य मदिरा नहीं, अपितु शक्ति का अमृतत्व है, जो कुण्डिलनी में सहस्त्रार से सिंचित हो।
मांस के संबंध में लिखा है, ‘मा’ शब्द सब प्रकार के रस प्रिय वस्तुओं का स्वरूप है, और जो साधक इन सभी की बलि देकर अर्थात् इन्हें त्याग कर हवन करता है, और इसमें संयम बरतता है, वही साधक अपने साधना रूपी खड्ग से यह बलि देकर पूर्णता प्राप्त कर सकता है, वही साधक मांसाहारी है।
आज भी श्रेष्ठ यज्ञों में देवी पूजन में नारियल का होम किया जाता है या बलि दी जाती है, किसी पशु की नहीं।
मीन अर्थात् मछली से तात्पर्य है, कि जब हम किसी प्रकार की तांत्रिक क्रिया सम्पन्न करते हैं, तो छः प्रकार की मछलियों -अहंकार, दम्भ, मद, पशूता, मत्सर, द्वेष, शरीर में विचरण करने वाले इन छः प्रकार के दोषों (मछलियों) को नष्ट कर, अपने आपको शुद्ध कर, देवता की आराधना करते हैं। यदि मछली का भक्षण करने मात्र से तांत्रिक क्रियाएं संभव हो जातीं, तो आज आधे से अधिक देशवासी तांत्रिक होते।
मुद्रा का तात्पर्य है आंतरिक भावों को प्रकट करना। मुद्राओं के द्वारा साधक आठ प्रकार की कष्टदायक मुद्राओं (भावों) -आशा, तृष्णा, जुगुप्सा, भय, घृणा, घमण्ड, लज्जा, क्रोध, इनका त्याग कर अपने शरीर तत्व को इतना अधिक ऊपर उठा लेता है, कि वह अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने में समर्थ हो जाता है, और उसे सिद्धि प्राप्त हो जाती है।
मैथुन का तात्पर्य है, मिलना या संभोग। परन्तु संभोग, यहां स्त्री और पुरूष का नहीं है। स्त्री का तात्पर्य कुण्डलिनी शक्ति है,जो भीतर स्थित है और इसका स्थान मूलाधार है, सहस्त्रार शिव का स्थान है, इस शिव और शक्ति के मिलन को ही मैथुन कहा गया है। साधना की प्रक्रिया द्वारा अपने शरीर तत्व को उस स्थिति तक पहुंचा देना, कि शक्ति तत्व पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाय-वहीं वास्तविक मैथुन है।
तंत्र शास्त्र के अज्ञानी तत्वों द्वारा इन पंच मकारों का अर्थ अपनी इच्छानुसार निकाल कर गलत प्रयोग किया गया, इसलिये आज तंत्र को हेय दृष्टि से देखा जाता है, जबकि मूल रूप से तो सिद्धि प्राप्त करने की यही विशिष्ट प्रक्रिया है।
तंत्र साधना में शक्ति के दैवीय स्वरूप को अविनाशी तत्व माना गया है। इसे वेदों में ऊँकार, अर्धमात्र तथा गायत्री में प्रणय माना जाता है। तंत्र साधना केवल साधन, ऐश्वर्य, शक्ति, बल राज्य प्राप्ति, शत्रु नाश, आपत्ति, ‘परमानन्दोपलब्धि’ के लिये सम्पन्न करनी चाहिये, क्योंकि यही तो तंत्र और शक्ति के समायोजन का हेतु है, लक्ष्य है।
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