





तुम्हें बीज बनना है…. और बीज बनोगे, तभी तुम आगे जाकर छायादार वृक्ष बन सकते हो, मगर तब बन सकते हो, जब बीज धरती के अन्दर मिल जाये। यदि बीज कहे, कि मैं माटी में मिलना नहीं चाहता, तो बीज छायादार पेड़ नहीं बन सकता, और जब वह माटी में मिल जायेगा, तब उसमें निश्चित रूप से अंकुर फुटेगा और आगे चलकर वह छायादार पेड़ बन सकेगा, जिसके नीचे हजारों-हजारों व्यक्ति बैठ सकेंगे।
मैं हर क्षण तुम्हारें साथ हूं, तुम कहीं अकेले नहीं हो, इस वीरान पगडण्डी पर तुम्हें अपने आप को अकेला समझने की जरूरत नहीं है, क्योंकि तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हें ब्रह्म तक पहुंचाना है, निश्चित रूप से मैं तुम्हें ब्रह्म के दर्शन कराने हैं और इस जीवन में हीं तुम्हें जन्म मरण के इस भय से, इस समस्या से मुक्त कर देना है।
मैं पूर्ण हूं और तुम मेरे सामने पूर्ण होने के लिये बैठे हो। आवश्यकता है इस बात की, कि तुम उस जगह पर खड़े रह सको, जहां से छलांग लगानी है, ज्यों ही छलांग लगाई, तुम समुद्र में विसर्जित हो जाओगे और समुद्र अपनी बांहे फैलाकर तुम्हें अपने सीने में समेट लेगा, क्योंकि मैं तो प्रत्येक स्थिति में तुम्हारे सामने हूं।
जो भी बने अद्वितीय बनें, सामान्य जीवन जीना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। सामान्य जीवन जीकर तुम खुद का नाम तो डुबोते ही हो, मेरा नाम भी डुबोते हो। कोई देवता या भगवान पैदा नहीं होते, बनते हैं। जन्म आपके हाथ में नहीं था, लेकिन अगर जन्म लेकर आपको गुरू मिल जाये, तो फिर आप अद्वितीय बन सकते हैं-राम बन सकते हैं, कृष्ण बन सकते हैं।
तुम खाली बूंद हो और तुम्हें समुद्र बनना है। आज तुम समुद्र में मिलोगे, तो कल तुम मेघ बनकर आकाश में छाओगे। आज तुम समुद्र में मिलोगे, तो कल उमड़-घुमड़ कर बादल बन सकोगे, और जब बादल बनकर हवाओं के साथ बहोगे, वर्षा करोगे, तो फिर नदियां बहेंगी, और नदियां सैकड़ों-सैकड़ों खेतों को लहलायेंगी, सैकड़ों किसानों के चेहरों पर खुशियां पेदा करेंगी, सैंकड़ों प्रकार से इस भूमि को उज्जवल करेंगी और फिर वापस समुद्र में विसर्जित हो जायेंगी। और ऐसा करने के लिये आवश्यक है, कि तुम अपने आप को गुरू के प्राणों में विसर्जित कर सको।
तुम बगुले मत बनो, हो सकता है तुम्हारे आस-पास बगुले खड़े हो पर तुम राज हंस बनो तभी मेरा विशेषता हो पायेगी तभी मेरा गुरूत्व हो पायेगा।
इस ढंग से कोई हीरे नहीं लुटाता जिस ढंग से मैं ज्ञान आप पर लुटा रहा हूं। यह आपका सौभाग्य है, कि मैं आपको उस जगह तक ले जाना चाहता हूं, कि पूरे विश्व में आप विजयी हों, आप सफलता युक्त बन सकें। और मैं अपने शब्दों पर दृढ़ हूं। और मैं आपको अद्वितीय बना रहा हूं। एक सूर्य अस्त हो, तो कई और सूर्य यहां उगे हुये हैं जो रोशनी कर देंगे।
अणु से विराट बनने की क्रिया केवल गुरू जानता है, मनुष्य से देवता बनाने की क्रिया केवल गुरू जानता है, मूलाधार से सहस्त्रार तक पहुंचाने की क्रिया केवल गुरू जानता है और इसीलिये जीवन का आधार केवल और केवल गुरू ही होता है।
गुरू से प्राणगत संबंध होने चाहिये, देहगत नहीं। यदि यहां गुरू की तबियत ठीक नहीं हैं और आपका मन बड़ा बेचैन होता हो, बड़ी छटपटाहट महसूस होती हो, ऐसा लगे कि कुछ खाली-खाली सा है और मालूम नहीं होता हो कि यह वेदना क्यों है, यह छटपटाहट क्यों है, किस कारण से है…. यही तो प्राणगत और आत्मा के संबंध होते है।
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