





भगवान विष्णु ने श्री धन्वंतरि का अवतार संसार को आयुर्वेद का ज्ञान देने और प्राणियों को रोगमुक्त व आरोग्यता प्रदान करने के लिये लिया था। भगवान धन्वंतरि ने अवतरण के पश्चात अपने मन्तव्य की व्याख्या में कहा कि-
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःख-तप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।।
अर्थात्, न मैं राज्य चाहता हूँ, न स्वर्ग और न मोक्ष। मैं तो दुःख से संतप्त समस्त जीवों के दुःख का नाश चाहता हूँ।
‘गरूण पुराण’ के अनुसार- एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास गये और अनेक व्याधियों से ग्रस्त प्राणियों के निरोगी होने का उपाय पूछा। तब श्री विष्णु ने कहा-“मैं इन्द्रदेव से आयुर्वेद को प्राप्त कर धन्वंतरि अवतार में सभी लोकों को स्वस्थ बना दूंगा। मैं कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी वीरवार हस्त नक्षत्र के दिन बनारस(काशी) में धन्वंतरि के रुप में अवतार लेकर आयुर्वेद का उद्धार करूंगा।”
इस प्रकार भगवान विष्णु ने दो बार ‘श्री धन्वंतरि अवतार’ लेकर अर्थात् समुद्र मंथन के समय अमृत कलश लेकर देवताओं की रक्षा की, जिससे पुनः उन्हें अपना बल-पराक्रम प्राप्त हो सका और वे असुरों को पराजित कर पाये। और दूसरी बार काशीराज धन्व के यहाँ जन्म लिया और समस्त पृथ्वीवासी के समस्त दुःखों का नाश कर आरोग्य जीवन प्रदान किया।
वर्तमान में शारीरिक रोगों के साथ ही मानसिक विकार व क्लेश साधक की काया को शनै-शनै नष्ट करने लग जाते हैं। जहाँ शारीरिक व्याधियां मावन देह को बाहरी रुप से कष्ट देती हैं, वहीं अवसाद, चिंता, नकारात्मक विचार, अत्यधिक सोचना, हीन-भावना, जैसी मानसिक स्थितियां शरीर को अंदर ही अंदर रोगी बना देती हैं। ‘रोग-शोक नाशकारी धन्वंतरि दीक्षा’ प्राप्त कर साधक बल-पराक्रम सम्पन्न बन सकारात्मक सोच से युक्त हो जीवन को सफल बना सकेंगे। ‘शारीरिक कष्ट-पीड़ा हरण श्री धन्वन्तरी साधना’ सम्पन्न कर स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ मानसिक चिंता व अवसाद जैसी स्थियियों का अंत होगा, आयुर्वेद के क्षेत्र में अपनी पढ़ाई-कैरियर बनाने वाले विद्यार्थियों को भी यह साधना-दीक्षा सम्पन्न करनी चाहिये।
शारीरिक कष्ट-पीड़ा हरण श्री धन्वन्तरी साधना
साधना सामग्रीः ‘धनवन्तरी यंत्र’, ‘रोग शमन गुटिका’, ‘धन्वन्तरी आरोग्य शक्ति माला’
साधना विधि: इस साधना को धन त्रयोदशी पर अर्थात् इस वर्ष 06 नवम्बर, किसी भी एकादशी, सौभाग्य पंचमी 14 नवम्बर, रविवार अथवा गुरूवार के श्रेष्ठ दिवसों में सम्पन्न करने का विधान है। यह 11 दिनों की साधना है। साधक को साधना काल में एक समय ही अन्न ग्रहण करना चाहिये तथा मंत्र जप पूर्ण कर ही आसन से उठना चाहिये। यदि किसी कारणवश उठना पडे तो पुनः हाथ-मुंह धोकर आसन पर बैठ जायें। यथासंभव दिन भर मौन रहें।
साधक स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें और काले रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें। घी का दीपक जला दें। अब अपने सामने किसी बाजोट पर लाल रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाकर उस पर ‘धनवन्तरी यंत्र’ स्थापित करें व संकल्प लेकर ‘धन्वंतरी यंत्र’ का पंचोपचार पूजन करें। अब यंत्र की बायीं ओर चावलों की एक ढेरी बनायें और उस पर ‘रोग शमन गुटिका’ स्थापित करें व उसका पूजन करें। धन्वन्तरी का ध्यान करते हुए यंत्र पर पुष्प अर्पित करें।
सत्यं च येन निरतं रोगं विधूत, अन्वेषितं च
सविधिं आरोग्यमस्य। गूढं निगूढं औषधयरुपम्,
धन्वन्तरीं च सतत प्रणमामि नित्य॥
तत्पश्चात भगवान गणपति का ध्यान कर पांच मिनट तक ‘ऊँ गं गणपतये गं नम:’ का जाप करें। फिर ‘धन्वन्तरी आरोग्य शक्ति माला’ से निम्न मंत्र की 7 माला मंत्र जाप करें। साधना पूर्ण होने के बाद सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दें।
मंत्र
॥ ऊँ अमृतं धन्वन्तरी आरोग्य कायाकल्पं ऊँ फट्॥
Om Amritam Dhanvantari Aarogaya Kaayaakalpam Om Phat
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