





मन को संतुलित एवं एकाग्र बनाने के लिए व्यक्ति को चाहिए की वह श्रद्धा और उत्साह से निरंतर अभ्यासरत रहे, नित्य के अभ्यास युक्त आसन से शांति के साथ एकांत में बैठ कर मन के संकल्प-विकल्प को दूर करें, थोड़े समय के लिए भी जब मन निश्चल हो जाए तब ‘उन्मनी मुद्रा’ द्वारा नेत्र बंद कर भृकुटी के बीच ध्यान करे, और अपने मन को एकाग्र कर अपनी कल्पना से भृकुटी के मध्य में प्रकाश को देखने का प्रयत्न करे, मानो कि आप इस स्थान को अन्दर आंखे खोल कर देख रहे हैं। परन्तु इतना ध्यान रखें कि इस समय मन में या मस्तिष्क में किसी प्रकार का विचार न आने दे।
2-4 मिनट के लिए ही सही, आप सहज भाव से अंदर देखते रहें, शांत चित्त से बैठे रहें, और कुछ समय तक इसी क्रम से कुछ समय ध्यान करते रहने के बाद आपके संकल्प बल से भूमध्य में अवश्य ही प्रकाश उत्पन्न होने लगेगा, प्रारंभ में भले ही यह धुंधला सा और छोटा सा होगा परन्तु धीरे-धीरे अभ्यास के बाद यह प्रकाश का रूप दीप-शिखा, टिमटिमाता जुगनु, धूप, बल्ब आदि जैसे दिखाई देने लगेगा।
जैसा प्रकाश दिखाई दे, उसे वैसे ही स्थिर रखने का प्रयत्न करें। ज्यों-ज्यों स्थिरता आती जाएगी यह प्रकाश अधिक से अधिक स्वच्छ होता जाएगा। इस ज्योति को ‘दिव्य नेत्र’ या ‘सूक्ष्म चक्षु’ कहते है, ये ज्योति अंदर सदा ही विद्यमान रहती है परन्तु साधारण मनुष्यों को यह नहीं दिखाई पड़ती। इसी दिव्य नेत्र के द्वारा आप ध्यानस्थ होकर संसार में कहीं पर भी कुछ भी घटित होने वाले कार्य या घटना को देख सकते है। इसको प्राप्त करने के लिए शरीर में स्थित मर्मस्थलों के बारे में जानकारी आवश्यक है। इन मर्मस्थलों को चक्र भी कहा जाता है, प्रत्येक का ‘मूल’ तथा ‘शक्ति केन्द्र’ सुषुम्ना में है जो कि मानव को दिव्य नेत्र देने में सहायक है, ये चक्र ज्ञान वाहक तथा गतिवाहक सूत्रों से बनी नाडि़यों से और इसी के माध्यम से व्यक्ति अन्नमयकोष से प्राणमय कोष में प्रवेश कर सकता है।
कुण्डलिनी हमारे प्राणों में व्याप्त धन विद्युत का जब देह की ‘ऋण विद्युत’ के साथ मानिसक शक्ति के द्वारा सम्मिश्रण होता है तब उससे जो दिव्य प्रकाश उत्पन्न हो कर आंतरिक अनुभूतियाँ करता है उसे ही कुण्डलिनी कहा गया है। यह निर्विवाद है कि यह एक अपूर्व दिव्य ज्योति है जिसकी सहायता से देह के आंतरिक रहस्य और विश्व बाहृ स्थूल रहस्यों को प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है।
कुण्डलिनी जागरण के रूप कुण्डलिनी जागरण के रूप के प्रारम्भ में आंतरिक प्रकाश प्रकट नहीं होता किन्तु प्राण अपना कार्य इन चक्रों में प्रारम्भ कर देता हैं, अर्थात मूलाधार में स्थित अपान-प्राण ध्यान की ठोकर खाकर यहां की नाडि़यों को मथित करके मूलाधार से लेकर सुषुम्ना तक चीटियों के रेंगने जैसी गति या कम्पन करता है या कभी-कभी गर्म जल के बहने जैसी क्रिया उत्पन्न हो जाती है, कभी यह स्पर्श अत्यंत शीतल होता है जिससे सारा देह रोमांचित हो जाता है तो कभी प्राण इस वेगवती अवस्था में साधकों के हाथ पैर वेग के साथ उठते बैठते हैं, झटके लगते है और कोई कोई साधक तो अपने आसन से उछल कर दूर जा गिरता है, कई साधकों को ऐसी स्थिति में घंटे की आवाज या चिडि़यों की ची-ची, ढोल, वीणा या मेघ गर्जन आदि के शब्द सुनाई देता हैं, ये सारी स्थितियां इस बात ही द्योतक होती है कि साधक की कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो गयी है।
जब यह प्रकाश का वेग मूलाधार से आगे की ओर बढता है तो धीरे-धीरे चित्त का संबंध देह से छूट कर अंतर्गत से जुड़ जाता है, तब उसके मन में एक अपूर्व शांति और आनन्द का अनुभव होने लगता है। शरीर स्थित कई चक्रों का मूलाधार सुषुम्ना है जो अत्यंत सूक्ष्म, ज्ञानवाहक एवम् गति-वाहक नाड़ी युगल के रूप् में मेरूदण्ड के भीतर छिपी हुए रहती हैं, आगे चलकर यह नाड़ी युगल मेरूदण्ड से बाहर आकर कई स्थानों पर नाड़ी-गुचछक के रूप् मे बन जाती हैं, ये ही ‘नाड़ी गुचछक चक्र’ कहलाते हैं।
यदि व्यक्ति ध्यान लगाने का अभ्यास करता है तो उसे यह चक्र जामुनी रंग का दिखाई देता है जिसमें ललिमा विशेष रूप से झलकती है, यह पृथ्वी तत्व प्रधान चक्र है जो हाथी के सूंड की तरह बना हुआ है इसी को मूलाधार चक्र कहा जाता है, साधक को सर्वप्रथम यही से अभ्यास करके इस चक्र के दर्शन करने का प्रयत्न करना चाहिए।
प्रारंभ में प्रयत्न करने पर साधक को दीप शिखा के समान रोशनी, धुंधला सा प्रकाश या कभी-कभी ज्वाला सी भी दिखाई देने लग जाती है, कुछ साधकों को यह चक्र सर्प के आकार का भी दिखाई दिया है, और कुछ को शालिग्राम की काली पिंड जैसा भी अनुभव हुआ है। प्रारंभिक अवस्था में यहां पर कभी प्रकाश दिखाई दे देता है और कभी ये प्रकाश लुप्त हो जाता हैं।
प्रारंभिक स्थिति
जब साधक प्राणायाम के द्वारा मूलाधार को स्पर्श करता है तो कुछ विचित्र अनुभव स्वभावतः होने लगता हैं, जैसे पसीना आ जाना, भय से शरीर कम्पित होना, अर्ध-मूर्च्छा सी आ जाना, नसें खिंचना, पिशाब हो जाना, अथवा प्राण निकलते हुए से अनुभव होना आदि स्थितियां प्रारंभ में हो जाती हैं, इससे साधक को घबराना नहीं चाहिए, यदि ऐसी स्थिति हो जाए तो साधक को दो-चार रेचक प्राणायाम कर लेना चाहिए जिससे कि यह सब कुछ शांत हो जाता है। कभी-कभी साधक को सुन्दर प्राकृतिक दृश्य, देवताओं या सिद्धों के दर्शन और अच्छे दृश्य भी दिखाई दे जाते हैं।
गुदा से ऊपर अंदर गणेश चक्र तक बड़ी आंतों का और सुषुम्ना के तंतुओं का संगठित रूप ही ‘‘मूलाधार चक्र’’ कहलाता है। प्रारंभ में प्रयत्न करने पर व्यक्ति इसके दर्शन कर सकता है।
यह चक्र मूलाधार चक्र के लगभग चार अंगुल ऊपर मेरूदंड के सम्मुखी भाग में, मूत्रश्य, गर्भाश्य मलाश्य के मध्य में जो शुक्र कोष नामक ग्रंथि है वहीं पर देखा जा सकता है, सात्विक अवस्था में यह नीलम के कटोरे से भरे गंगाजल के समान दिखाई देता है, इसमें से समस्त देह तथा प्राणों की तृप्ति और शांति देने वाली भाप उठती रहती है, इस चक्र पर संयम करने से ब्रहमचर्य साधना में विशेष सहायता मिलती है, इस चक्र पर वैराग्य युक्त भावना का प्रकाश दल कर साधक काम पर विजय प्राप्त कर सकता हैं।
इसे ‘नाभि चक्र’ भी कहते है। यह नाभि प्रदेश में मेरूदंड के सामने स्थित है। मनुज्य का देह केन्द्र नाभि है, यहां पर हजारों नाडि़यां आकर मिलती हैं और यहीं से ये नाडि़यां पुनः निकल कर ऊपर-नीचे सभी अंग-प्रत्यंग तक जाती है, जिससे नाडि़यों का एक चक्र सा बन जाता है, इसी चक्र को ‘मणिपुर चक्र’ कहते हैं। यह चक्र अग्नि तत्व प्रधान है और इसका आकार उगते हुए सूर्य के समान दिखाई देता है, गर्भ में स्थित भ्रूण को पालक रस इसी केंद्र से मिलता है जिससे गर्भ बढ़ता है अतः यह स्पष्ट है कि इस केंद्र के मार्ग से देह में प्रविष्ट होने पर सम्पूर्ण शरीर का विज्ञान प्राप्त किया जा सकता हैं। मणिपुर चक्र के दर्शन साधक को होने पर वह पूर्ण रूप से संयमित और योगी बन जाता हैं। कुछ साधकों ने मणिपुर चक्र के पास सूर्य और चन्द्र नामक दो चक्र और माने हैं। सूर्य चक्र नाभि से कुछ ऊपर दक्षिण भाग की तरफ़ जिगर में स्थित है। यह अग्नि तत्व प्रधान हैं और यहां जब साधक ध्यानस्थ होता है तो हज़ारों सूर्य एक साथ उगे हों, ऐसा दिव्य प्रकाश दिखाई देता है। ‘‘चन्द्र चक्र’’ नाभि से कुछ ऊपर तिल्ली या प्लीहा में स्थित है, यहां से जो रस निकलता है वह हमारे भोजन को पचाने में सहायक होता है वहां पर जब साधक अपने ध्यान को केन्द्रित करता है तो उसे अत्यंत शीतल मंद प्रकाश अनुभव होता है।
सीने के दोनों फेफडों के मघ्य ‘रक्ताशय’ नामक मांस पिंड के भीतर एक छोटे से रिक्त में यह चक्र विद्यमान हैं। ये रिक्त स्थान हाथ की सब से छोटी ऊंगली के पोर के सामने छोटे अंगूर जितना लम्बा-चौड़ा होता है और इसी में यह चक्र विद्यमान होता है। जब साधक की प्रथम दृष्टि इस पर पड़ती है तो उसे खिले हुए कमल की कलिका के समान ये चक्र दिखाई देता है। इसमें से शुक्र तारे के समान प्रकाश निकलता हुआ अनुभव होता है और इसका रंग गुलाबी वायु प्रधान होता है, यहीं पर ध्यान केन्द्रित करने पर साधक को आत्मा-परमात्मा का दर्शन होने लगता है और उसे दिव्य नेत्र प्राप्त होता है। ऐसा दर्शन होने पर आत्मा की अनुभूति अहंकार रहित हो जाती है, सही रूप में देखा जाए तो जीवात्मा का निवास इसी स्थान में है। प्रसिद्ध योगी श्री अरविन्द ने जीवात्मा की स्थिति यही मानी है। कुछ योगियों ने अनाहत चक्र के दायीं ओर एक विशुद्ध चक्र के नीचे दक्षिण स्तन के अंदर एक मनश्र चक्र की स्थिति मानी है जिसे ‘‘लोवर माइंड’’ कहा जाता है। यहीं पर प्रभाव देकर अंर्तमन को जाग्रत किया जा सकता है। यह चक्र हृदय के ऊपर कंठ प्रदेश में हंसली नामक हड्डी के अन्दर थायरोयड ग्रंथि के पास स्वर यन्त्र या टैन्टूए में है, यह चक्र अंदर से सफ़ेद और बाहर आसमानी रंग का होता है, इसके सोलह छल्ले होते है, इसलिए विशुद्ध चक्र को सोलह दलिय कमल कहा गया है। यहीं से गान विद्या के आधारभूत स्वर प्रकट होते है। अतः यह मान्यता है कि यहां पर संयम करने से साधक दिव्य श्रुत बन जाता है क्योंकि यही स्थान शब्द ब्रह्म, मध्यमा अवस्था या बैखरी रूप कहा गया है। यहां पर ध्यानस्त होने से व्यक्ति भूख-प्यास को हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त कर सकता है।
यह चक्र भू-मध्य में स्थित ललाट कोटर के गर्त में है, दूसरे शब्दों में यह चक्र दोनों भोहों के बीच में है जहां स्त्रियां बिंदी लगाती हैं। इस चक्र का आकार दीप शिखा के समान होता है। इस चक्र का महत्व विशेष है क्योंकि इस पर प्रकाश डालने से और इस चक्र को साधने से व्यक्ति हजारों मील दूर के दृश्य को देखने में समर्थ हो पाता है, यहीं ध्यान को केन्द्रित करने पर सिद्धों के दर्शन होते हैं। यहां पर जब साधक ध्यानस्थ हो जाता है तो उसका स्थूल देह का व्यवधान मिट जाता है और अंतरिक्ष में घूमने वाले सिद्धों के दर्शन कर सकता है। जब साधक संयम कर आज्ञा चक्र पर प्रकाश डालने में समर्थ हो जाता है तब वह प्रत्येक प्रकार का संकल्प पूर्ण कर किसी भी प्रकार की शक्ति प्राप्त कर सकता हैं। इसी को शिव का ‘‘तृतीय नेत्र’’ कहा जाता है। जिसके माध्यम से उन्होंने मदन दह किया था। भूमध्य के अन्दर इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाडि़यां परस्पर मिलती है और इसलिए इनको त्रिवेणी संगम, ज्ञान नेत्र या भ्रामरी गुहा कहा जाता है।
इसे ‘दशम द्वार’ या ‘ब्रह्मरंध्र’ भी कहते हैं। यह स्थान कनपटियों से दो-दो इंच अंदर भृकुटी से लगभग तीन इंच अन्दर, बड़े मस्तिष्क के मध्य में कंठ में ‘काक’ से दो उंगल ऊपर मस्तिष्क स्थित महाविचार नामक महाछिद्र में एक ज्योति पुंज के रूप में स्थित रहता है। यह सूर्य के समान प्रकाशवाला और अंदर से मरकरी लाइट के समान दिखाई देता है, सही रूप में जीवात्मा का मोक्ष द्वार यही है, और बिरले योगी सहस्त्रार चक्र पर अधिकार प्राप्त कर सके हैं।
योग शास्त्र में कहा गया हैं कि जो योगी सहस्त्रार में स्थिति प्राप्त कर लेता है वह पूर्ण रूप से स्वच्छंद, शोक और बंधन से मुक्त हो कर मनोवांछित जीवन प्राप्त कर सकता है, मृत्यु इनके नियंत्रण में होती है और जब चाहे तभी मृत्यु इनके पास आने कि हिम्मत कर सकती है, ऐसे योगियों को अणिमादी, अष्ट सिद्धियां, नव निधियां और समस्त प्रकार की विभूतियां प्राप्त हो जाती है। ऐसा साधक परम विज्ञानी, त्रिकालदर्शी बना जाता है।
वस्तुतः ऐसा जीवन की वास्तविक श्रेष्ठ और दिव्य जीवन कहा जा सकता है जो स्व-प्रयत्नों से या गुरु कृपा से अथवा शक्तिपात के माध्यम से कुण्डलिनी जागरण कर मानव जीवन को सार्थक करें।
विशेष : अगले अंक से क्रमश: प्रत्येक चक्र की साधना प्रस्तुत की जायेगी।
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