





सामान्य शब्दों में यदि कहा जाए तो दीक्षा आत्म संस्कार का ही दूसरा रूप है। मानव जीवन मायावी व्यवहार दोष और पाश से आबद्ध रहता है और इन कमियों के कारण ही उसका पूर्णत्व नहीं हो पाता। वास्तव में ही शिष्य पूर्ण शिव होते हुए भी जब उसकी आत्मा पर झूठ, पाप, छल का आवरण होता है तो वह अपने आप को अपूर्ण अनुभव करता है। यह कमी उसमें कई अशुभ भावनाओं का संचार करती हैं और उसके देह में विविध रोग हो जाते हैं।
उसकी आयु क्षीण हो जाती है। वह इन्हीं छल प्रपन्चों में घिरा रहता है साधना में सिद्धि या सफ़लता नहीं मिलने पर निराश हो जाता है। इस प्रकार की बद्ध आत्मा में ये तीन प्रकार के आवरण देह, आयु और भोग सदा रहते हैं और इन्हें दीक्षा के माध्यम से सदा के लिये हटाया जाता है, मलीन आत्मा का संस्कार किया जाता है और उसे चैतन्यता प्रदान की जाती है। इस प्रकार से वह साधक तेजस्विता तो प्राप्त कर सकते है, समस्त सांसारिक पापों को दूर कर साधनाओं में सफ़ल होने और अपने इष्ट के दर्शन कर सकने में सक्षम हो जाता हैं।
दीयते ज्ञान सदभावः, क्षीयते पजुभावना।
दानक्षपण संयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता।
अर्थात, जिसके द्वारा ज्ञान दिया जाता है और पशु भावना को क्षय किया जाता है, ऐसे गुरु प्रदत्त दान को दीक्षा कहते हैं।
गुरु का कार्य है कि वह शिष्य की आत्मा को अपने से अभिन्न कर दे और उसके पापों का शीघ्रतिशीघ्र नाश कर के उसे पूर्ण शुद्ध, चैतन्य एवम शिवमय बना देना। गुरु यह कार्य ज्ञान द्वारा, दीक्षा द्वारा और शक्तिपात द्वारा सम्पन्न करते हैं।
सबसे पहले गुरु ज्ञान द्वारा साधक को उसके वास्तविक स्वरूप को समझाता है। वास्तव में देखा जाये तो व्यक्ति का जीवन अशुद्ध, दूषित और विजय वासनाओं से युक्त होता है, उसकी आत्मा पर विभिन्न दोषों और पापों का आवरण पड़ा रहता है। फ़लस्वरूप शिष्य की आत्मा इन दोषों की वजह से माया में आविष्ट रहती है और प्रयत्न करने पर भी ना तो चैतन्य होती है और ना ही इष्ट के दर्शन कर पाती है। ऐसी स्थिति में गुरु ज्ञान के द्वारा उसे समझाता है कि यह पशु जीवन मामूली और सामान्य जीवन है। ईश्वर ने हमे यह मनुष्य जीवन दिया है तो ज्ञान और चैतना भी प्रदान की है और हम ज्ञान के द्वारा ही समझ सकते हैं किस माध्यम से हम इस पापमय और दोषमय जीवन को शुद्ध और चैतन्य बना सकते हैं। गुरु यह ज्ञान शिष्य को दीक्षा के रूप में प्रदान करते हैं।
इसके बाद गुरु दीक्षा संस्कार करते हैं और यदि सही अर्थों में देखा जाये तो शास्त्रों में आठ दीक्षा का कर्म बताया गया है जो कि प्रत्येक साधक के लिये आवश्यक है। इन आठों दीक्षाओं को प्राप्त करने के बाद ही साधक अपने सभी प्रकार के दोषों का निवारण कर सकता है। साधक को चाहिये कि वह क्रमशः इन दीक्षाओं को गुरु के द्वारा प्राप्त करे ।
उपनिषदों में बताया गया है कि व्यक्ति को सबसे पहले समय दीक्षा लेनी चाहिए। इस दीक्षा को प्राप्त करने का अधिकार सभी को है, वह चाहे भोगी हो, विषयवासनाओं से युक्त हो या फि़र पशु जीवन से आबद्ध हो। इस दीक्षा के द्वारा गुरु उसे उसके वास्तविक जीवन से परिचित कराते हैं और बताते हैं कि किस तरह इस पशु जीवन से ऊपर उठा जा सकता है और मानव जीवन प्राप्त किया जा सकता है।
इस दीक्षा के माध्यम से उसके ह़ृदय में ज्ञान का विकास होने लगता है और वह यह चिन्तन करने लगता है कि मेरे जीवन का क्या उद्देशय है, मैं अब तक क्या करता आ रहा हूं और मुझे पूर्णता प्राप्ति के लिये क्या करना चाहिये। जब शिष्य के मन में ऐसे विचार उठेंगे तभी वह आगे बड़ने के लिये तैयार होगा। समय दीक्षा के द्वारा ही इस प्रकार के विचारों का बीज संस्कार होता हैं ।
गुरु जब यह देख लेते हैं कि शिष्य के मन में विचारों का प्रवाह चल रहा है, उसे इस बात का ज्ञान होने लगा है कि भोग क्या है, जीवन क्या है, शरीर दोष क्या है तो उसे यह दीक्षा प्रदान करते हैं।
इस दीक्षा के द्वारा गुरु शिष्य को तीनों प्रकार के दोषों से परिचित करातें हैं, देह दोष के द्वारा शरीर माया से आबद्ध हो जाता है, उसे पवित्रता और अपवित्रता का भान नहीं रहता, उसे शुद्धता अशुद्धता का भान नहीं होता तब ज्ञान के द्वारा उसे शरीर को पवित्र बनाने की क्रिया समझायी जाती है। उसको यह भी समझाया जाता है कि आयु दोष के द्वारा व्यर्थ का देह से लगाव, व्यर्थ का भाग दौड़, हाय तौबा छल कपट, झूठ और व्यभिचार के द्वारा देह का क्षय ही होता है और यदि एक बार देह का क्षय होता है तो उसका सुधार बहुत कठिन होता है। तीसरे प्रकार का दोष भोग होता है जिससे सुख दुख का अनुभव होता रहता है।
वह पल में प्रसन्न होता है और दूसरे ही पल दुखी हताश और चिन्तित भी हो जाता है। इसलिये इनको किस प्रकार दूर किया जाता है या जीवन के इन दोषों को दूर करने की क्या क्रिया है, इसी को कर्म कहते हैं। इस प्रयोग या उपाय से ही वह तीनों प्रकार के दोषों से मुक्त होने की क्रिया का अभ्यास करने लगता है।
इन दोनों दीक्षाओं को देने के बाद गुरु यह देखते हैं कि शिष्य भोगार्थी है या मोक्षार्थी। जो ग़ृहस्थ में आबद्ध है उन्हें भोगार्थी दीक्षा दी जाती है और इस दीक्षा के द्वारा यह समझाया जाता है कि किस प्रकार से सोलह संस्कार सम्पन्न करते हुए ग़ृहस्थ और भोग में लिप्त रहते हुए साधक अपने आप को शुद्ध और चैतन्य बनाये रखता है, किन युक्तियों से वह इस माया के बीच निरन्तर विचरण करते हुए भी पवित्र बना रह सकता है, किस प्रकार से पत्नी के साथ रहता हुआ भी शुद्ध, चैतन्य बना रह सकता है और अपनी आत्मा पर भोग का परदा नहीं पड़ने देता। वशिष्ठ आदि ऋषि भी पत्नी के साथ जीवन यापन करते हुए भी सर्वथा शुद्ध और चैतन्य बने रहे।
पर जो मोक्षार्थी हैं उन्हे उच्च प्रकार की दीक्षा के लिये तैयार किया जाता है जिससे कि वे आगे चल कर गुरु पद प्राप्त कर सकें और विश्व के अन्य लोगों के पापों को दूर कर उन्हें शुद्ध मार्ग दिखा सकें। यहां मोक्षार्थी का तात्पर्य उन लोगों से है जिन्होंने अपना पूरा जीवन गुरु के चरणों में समर्पित कर दिया है, जो इस प्रकार की विषय वासनाओं और भोग आदि के चक्र में नहीं पड़ना चाहते हैं।
इन दोनों प्रकार की दीक्षाओं का कर्म अलग अलग है और गुरु यहीं पर देख लेते हैं कि शिष्य को किस किस प्रकार की दीक्षा देनी है और उसे आगे बढ़ाने के लिये कौन सा तरीका उचित है। जो भोगार्थी हैं, उन्हें गुरु तीन प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने की शक्ति देता है। मन्त्रेश्वर पद की प्राप्ति, मंत्र पद प्राप्ति और पिण्ड सिद्धि।
गुरु ऐसे साधक को अपना मंत्र प्रदान करता है और निरन्तर जपने की क्रिया समझाता है। इससे साधक के अन्दर के सारे पाप और दोष दूर हो जाते हैं और वह ज्यादा से ज्यादा गुरु में लीन होने की ओर अग्रसर होता है। इसके बाद मंत्र पद प्राप्ति में गुरु उस शिष्य को अपने पास बिठा कर अपने सन्यास जीवन के तत्व मन्त्र को प्रदान करता है और इस तत्व मन्त्र के द्वारा साधक गुरु में पूरी तरह से लीन हो जाता है। वह विभिन्न भोगों को भोगता हुआ भी उसमें आसक्त नहीं होता।
तीसरे पिण्ड सिद्धि के द्वारा गुरु उसकी भोग भूमि के समस्त बीजों को नष्ट कर देता है और उसे खड़ग सिद्धि, अंजन सिद्धि, पादुका सिद्धि का कर्म समझा देता है। ऐसा साधक धीरे धीरे अपनी आत्मा को पूरी तरह से पहचानने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। ऐसा कर के ही साधक पूर्णतः गुरुमय हो कर आगे की दीक्षा के लिये तैयार होता है। ऐसी स्थिति ही साधक के आध्यात्मिक उत्कर्श के लिये रास्ता तैयार करती है।
गुरु जब इन तीनों ही प्रकार की दीक्षा प्रदान करने के उपरांत यह परख लेते हैं कि शिष्य अब पूर्ण रूप से गुरुमय हो चुका है, इस पर अन्य कोइ प्रभाव नहीं पड़ता, दूसरे जब गुरु की निंदा, आलोचना या अपमान करते हो तो उसके चित्त पर प्रभाव नहीं पड़ता है, तब उसे शाम्भवी दीक्षा प्रदान करते हैं।
इस दीक्षा के भी दो भेद हैं। पहले शिष्य को सबीज दीक्षा दी जाती है और जब वह इस साधना के द्वारा अपने अन्तर में प्रवेश करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है और अपनी आत्मा को पूर्ण रूप से पहचान लेता है, तब उसे निर्बीज दीक्षा प्रदान की जाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक सभी प्रकार की साधनाओं मे प्रवेश करने की आज्ञा प्राप्त कर लेता है। ऐसी दीक्षा प्राप्त करने के बाद वह तंत्र, तांत्रिक क्रिया, कापालिक क्रिया, श्मशान क्रिया, भैरव क्रिया, महाकाली क्रिया और संहार क्रिया का भी अधिकार प्राप्त कर लेता है क्योंकि गुरु इस बात से निश्चिन्त होते हैं कि शिष्य बिना विचलित हुए अपने लक्ष्य की और निरन्तर अग्रसर होता रहेगा और उसे अवश्य प्राप्त करेगा ।
इस दीक्षा को प्राप्त करते ही शिष्य के शरीर के चक्र जाग्रत होना प्रारम्भ हो जाता है वह अपने देह से विमुक्त हो जाता है और उसे साक्षात शिव के दर्शन होने लगते हैं। उसके लिये ध्यानस्थ होना कोई मुश्किल बात नहीं रहती। ऐसा होते ही साधक अपने मस्तिष्क को विचार शून्य बनाने की क्रिया सीख लेता है और वह अपने गुरु की क़ृपा से आगे की दीक्षा के लिये तैयार हो जाता है ।
यह दीक्षा अपने आप में अत्यधिक महत्वपूर्ण है। स्वछंद तन्त्र में बताया गया है कि इस दीक्षा को प्राप्त करते ही शिष्य में शक्ति का संचार होने लगता है और एक ही झटके में सभी चक्र जाग्रत हो जाते हैं। एक प्रकार से देखा जाये तो आत्मा में प्रकाश फ़ैल जाता है और उसे भूत और भविष्य की सिद्धि स्वतः प्राप्त हो जाती है। ऐसी दीक्षा से अपनी आत्मा में गुरु को स्थापित करने की क्रिया आ जाती है जिसके द्वारा वह सहस्त्रार चक्र को जाग्रत करने में सफ़ल हो जाता है। ऐसा होते ही वह पूर्ण रूप से शिवमय हो जाता है और अपने आज्ञा चक्र में शिव को स्थापित कर लेता है। उसका सारा शरीर रोग मुक्त हो जाता है और आत्मा में प्रसन्नता का सागर लहराने लगता हैं।
ऐसी दीक्षा प्राप्त होते ही साधक तीव्रता से साधनाओं में स्वतः सिद्धियां प्राप्त करने लगता है, ध्यान अवस्था में दस महाविद्यायें उसके सामने ऩृत्य करती रहती हैं। एक प्रकार से देखा जाये तो शिष्य स्वयं गुरु पद पर आसीन होने की तैयारी करने लगता है।
इसके बाद गुरु की क़ृपा से शिष्य को विद्या दीक्षा दी जाती है। इस दीक्षा बत्तीस वर्णात्मक के द्वारा शिष्य को समस्त संसार के सभी मंत्रों का समायोजन प्राप्त हो जाता है। जितने वर्ण हैं, जितने स्वर हैं, उन सभी पर उसका पूर्ण अधिकार हो जाता है। उसे आगे के जीवन में कुछ भी साधना करने की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि एक प्रकार से सभी मन्त्रों पर उसका पूर्ण अधिकार हो जाता है।
गुरु इस प्रकार की दीक्षा के साथ ही साथ उसे अणिमादि दीक्षा भी देते हैं। अणिमा, महिमा, गरिमा आदि आठों प्रकार की सिद्धियां उसे स्वतः प्राप्त हो जाती है। उसमें सूक्ष्म रूप धारण करने की शक्ति आ जाती है, उसे काल सिद्धि और वचन सिद्धि प्राप्त हो जाती है, संसार में घटित होने वाली समस्त घटना उसके नजरों के सामने होती हैं और उसे श्राप और वरदान देने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस दीक्षा को प्राप्त करने का अधिकार साधक के उसके उच्चकोटि दीक्षा पुण्यों के प्रभाव, से गुरु चरणों में पूर्णता लीन हो कर ही प्राप्त होता है।
अभिषेक पांच कलशों से होता है। ये कलश क्रमशः दक्षिण, उत्तर, पश्चिम, पूर्व और ईसान कोण में स्थापित होते हैं, इस अभिषेक या दीक्षा का तात्पर्य साधक उन आठों प्रकार की सिद्धियों का भोग करने में समर्थ हो पाता है, वह पूर्णता भोगों में लीन होते हुए भी सर्वथा निर्विकार और निर्लिप्त रहता है। गुरु इन पांचो कलशों के द्वारा तत्व, तत्वेश्वर, निव़ृत, शान्ति और भोग इन पांचों को पूर्णता प्रदान करते हुए उसे सर्वज्ञ विध्यांग सिद्धि प्रदान करते हैं। ऐसा होने पर साधक स्वयं का ब्रह्माण्ड में विस्तार कर लेता है, सारा ब्रह्माण्ड उसके मुंह में समाहित होता है और वह जीवन की उच्च अवस्था प्राप्त कर लेताहै।
अन्त में गुरु अपने शिष्य को आचार्याभिषेक दीक्षा प्रदान करते हैं और सकलीकरण संस्कार के द्वारा उसके अन्तर का पूर्ण अभिषेक करते हैं। इसके बाद गुरु ब्रह्म शक्तिपात करके उसे आचार्य पद प्रदान करते हैं। ऐसा होने पर वह जन्म-मरण से मुक्ति प्राप्त कर लेता है और समस्त प्रकार की साधनाओं में सिद्धि प्राप्त करता हुआ सिद्धाश्रम में प्रवेश पा लेता है और जीवन की उन्मुक्त अवस्था को प्राप्त करता हुआ एक तरह से समस्त सिद्धियों का स्वामी बन जाता है।
शक्तिपात यों तो क्रम से गुरु अपने शिष्य को इन सभी दीक्षाओं से सम्पन्न करते रहते हैं परन्तु बीच बीच में थोड़ी थोड़ी मात्रा में शक्तिपात देते हुए अन्त में ब्रह्म शक्तिपात प्रदान करते हैं। यह एक तीव्र शक्तिपात है और शिष्य एक झटके में सर्वोच स्थान प्राप्त कर लेता है। ऐसा होने पर ही शिष्य सही अर्थों में गुरुमय, शिवमय और ब्रह्ममय हो पाता है।
उपरोक्त सभी दीक्षाओं का जो क्रम समझाया गया है, साधक इन दीक्षाओं को इसी क्रम में प्राप्त करता हैं पर जो ग़ृहस्थ हैं, जो भोगार्थी हैं, उन्हें बार बार दीक्षा लेनी चाहिये, समय समय पर गुरु दीक्षा, मन्त्र दीक्षा और शक्ति दीक्षा प्राप्त करते रहना चाहिए। शक्ति दीक्षा में लक्ष्मी दीक्षा, काली दीक्षा, मातंगी दीक्षा आदि महा विद्याओं से सम्बन्धित दीक्षायें होती हैं और साधक को निरन्तर इन दीक्षाओं में भाग लेना चाहिये।
दीक्षा का तात्पर्य यह नहीं है कि एक बार गुरु दीक्षा लेने के बाद उसके जीवन में दीक्षा की आवश्यकता नहीं रहती, अपितु जो ग़ृहस्थ हैं, जो भोगार्थी हैं उनकी आत्मा पर निरन्तर आवरण पड़ते रहते हैं और इस प्रकार बार बार दीक्षा लेते रहने से वे आवरण हटते रहते हैं और साधक या शिष्य शुद्ध, चैतन्य तथा निर्मल बना रहता है।
वास्तव में यह हमारे जीवन का सौभाग्य ही कहा जाना चहिये कि हम में ज्ञान दीक्षा का चिन्तन पैदा होता है और उसके द्वारा हम गुरु को पहचान कर निरन्तर उनकी सेवा करते हुए, उनके कार्यों को करते हुए, उनकी आज्ञाओं का पालन करते हुए, उनके चरणों में लीन होते हैं। ऐसा गुरु प्राप्त होने पर उनके सानिध्य में क्रमशः इन सभी दीक्षाओं को प्राप्त करना चाहिये, ऐसा होने पर ही मानव जीवन की सफ़लता होती है और साधक स्वतः ऐसी विशिष्ट सिद्धिओं को प्राप्त करता है, जो कि अपने आप में असंभव कही जाती हैं। आठों प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करने और जीवन में पूर्णता प्राप्त करने के लिये निरन्तर प्रयास करते रहने की क्रिया को ही दीक्षा कहते हैं।
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