





बगलामुखी साधना भारत की प्राचीनतम एवं दस महाविद्याओं में से एक है। कलियुग में तो इसका प्रभाव पग-पग पर देखा जा सकता है।
शत्रुओं पर हावी होने, बलवान शत्रुओं का मान-मर्दन करने, भूत प्रेतादि को दूर करने, मुकदमों में सफलता पाने एवं समस्त प्रकार से उन्नति करने में बगलामुखी यंत्र श्रेष्ठतम माना गया है। योगियों, तांत्रिकों, मांत्रिकों ने इस की भूरिभूरि प्रशंसा की है। जिसके हाथ पर यह यंत्र बंधा होता है, उस पर किया गया तांत्रिक प्रभाव निष्फल रहता है।
भारतीय तंत्र-मंत्र साहित्य अपने आप में अद्भूत, आश्चर्यजनक एवं रहस्यमय रहा है। ज्यों-ज्यों हम इसके रहस्य के मूल में जाते हैं, त्यों-त्यों हमें विलक्षण अनुभव होते हैं। इस साहित्य में कुछ तंत्र-मंत्र तो इतने समर्थ, बलशाली, एवं शीघ्र फलदायी हैं, कि देख कर चकित रह जाना पड़ता है। ऐसे ही यंत्रो में एक यंत्र है- बगलामुखी यंत्र’ जो प्रचण्ड तूफान से भी टक्कर लेने में समर्थ है।
भारत के लगभग सभी तांत्रिको ने एक स्वर से यह स्वीकार किया है, कि बगलामुखी यंत्र के समान और कोई अन्य विधान नहीं है, जो कि इतने वेग से और तुरन्त प्रभाव दिखा सके। एक तरफ जहां यह यंत्र शीघ्र ही सफलतादायक है, वहीं दूसरी ओर विशेष अनुष्ठान एवं मंत्र जप तुरन्त कार्य सिद्धि में सहायता प्रदान करता है।
ब्रिटेन के प्रसिद्ध तंत्र विशेषज्ञ श्री समरफील्ड ने यह मंत्र सिद्ध कर और इसका प्रभाव देख कर कहा था, कि पूरे विश्व की ताकत भी इससे टक्कर लेने में असमर्थ है, असहाय है। दुर्लभ ग्रन्थ ‘मंत्र महार्णव’ में लिखा है-
ब्रह्मास्त्रं च प्रवक्ष्यामि सद्य प्रत्यय कारणम्।
यस्य स्मरणमात्रेण पवनोऽपि स्थिरायते।।
अर्थात् ‘इस मंत्र को सिद्ध करने के बाद मात्र स्मरण से ही प्रचण्ड पवन भी स्थिर हो जाता है।’
इस यंत्र का ही यह प्रभाव है, कि इसे तंत्र-मंत्र के क्षेत्र में सर्वोपरि मान्यता मिलती रही है और इसके बारे में शोध और प्रयोग प्राचीन काल से बराबर होता रहा है। आश्चर्य की बात तो यह है, कि इस यंत्र का उपयोग जहां हिन्दू राजाओं ने अपने शत्रुओं के मर्दन के लिये किया, वहीं मुस्लिम शासकों ने भी इसका प्रयोग कर सफलता प्राप्त की। रिचर्डब्रन के इतिहास में उल्लेख मिलता है, कि औरंगजेब ने अपने शत्रुओं को परास्त करने के लिये बगलामुखी साधना कराई और सफलता प्राप्त की। हिन्दू शासकों में तो चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त और शिवाजी जैसे प्रतापी राजाओं ने इस मंत्र का प्रयोग और साधना अपने तांत्रिकों से करा कर शत्रुओं पर विजय एवं सफलता प्राप्त की।
इसकी साधना से मारण, वशीकरण, उच्चाटन एवं विद्वेषण प्रयोग भली-भांति सफलता पूर्वक सम्पन्न किये जाते हैं। जहां तक मेरा अनुभव है, इस मंत्र की साधना से बांज स्त्री को मनचाही सन्तान प्राप्त करने में सहायता दी जा सकती है, दरिद्र व्यक्ति को लखपति बनाने के लिये मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है और विपरीत मुकदमें में भी पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है, इसके साथ ही साथ शत्रुओं का मान-मर्दन कर उन पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
जो भी व्यक्ति इस साधना को सम्पन्न करना चाहे, उसे चाहिये, कि वह योग्य गुरू के निर्देशन में ही इस कार्य को सम्पन्न करें।
साधना काल में प्रत्येक साधक को दृढ़ता के साथ इससे सम्बन्धित नियमों का पालन करना चाहिये और उसे चाहिये, वह किसी प्रकार की शिथिलता न बरते।
साधना काल में ध्यान रखने योग्य बातें-
बगलामुखी यंत्र
भगवती श्री बगला का पूजन यंत्र साधना में आवश्यक है, जो कि ताम्र पत्र पर अंकित होता है। इसे पूजन प्रयोग तथा संजीवनी मुद्रा के साथ प्राण प्रतिष्ठा करके एक लाख या पांच लाख मंत्र जप से इसे सिद्ध किया जाता है।
स्वामी श्री अनन्तानन्दनाथ इस विद्या के श्रेष्ठ जानकार हैं और उन्होंने बगला महाशक्ति का रूद्रायामलोक्त अनुष्ठान सिद्ध किया हुआ है। केवल इस साधना से वे श्रेष्ठतम साधक, सम्पूर्ण भारत में विख्यात और सभी शास्त्रों के पारदर्शी विद्वान होने के साथ-साथ संगीत विद्या के श्रेष्ठतम उन्नायक हैं।
यद्यपि इस साधना की तीन पद्धतियां प्रचलित हैं, जिसमें रूद्रायामलोक पद्धति कठिन होने के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ कही जाती है और इस प्रकार का मंत्र प्रयोग करके किसी भी क्षेत्र में पूर्ण सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
स्थानाभाव से मैं बगलामुखी साधना का पूर्ण प्रयोग यहां नहीं दे रहा हूं, परन्तु प्रामाणिक बगलामुखी मंत्र और अत्यन्त गोपनीय ब्रह्मास्त्र विद्या स्पष्ट कर रहा हूं-
विनियोग
अस्य श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद् ऋषये नमः शिरसी। त्रिष्टुप छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी देवतायै नमो हृदये। ह्लीं बीजाय नमो गुह्मे। स्वाहा शक्तिये नमः पादयोः। ऊँ नमः सर्वांग श्री बगलामुखी-देवता-प्रसाद सिद्धयर्थे न्यासे विनियोगः।
आह्वान
ऊँ ऐं ह्यीं श्रीं बगलामुखी सर्व-दुष्टानां मुखं स्तम्भिनी सकल-मनोहारिणि अम्बिके इहागच्छ सन्निधिं कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।
ध्यान
सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांषुकोल्लासिनीम्।
हेमावांगरूचिं शषंकमुकुटां सच्चम्कस्त्रग्युताम्।।
हस्तैमुद्गरपाशवज्ररसनाः सम्बिभ्रती भूषणै।
व्याप्तागो बगलामुखी त्रिजगतां संस्तम्भिनी चिन्त्येत्।।
मंत्र
।। ऊँ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय
जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ऊँ स्वाहा।।
( OM Hleem bagalamukhi Sarwadustanam
Watcham Mukham Padam Stambhay Jihwam
Kilay Buddhim Vinashay Hleem om Swaha )
वस्तुतः इस छत्तीस अक्षरों वाले मंत्र में गजब की शक्ति और प्रभाव है, जो कि विश्व में अन्यतम है। इसका एक लाख या पांच लाख मंत्र जप कर इसे सिद्ध कर लिया जाता है और फिर पुरश्चरण के लिये चम्पक-कुसुम से दशांश यज्ञ तथा इसका दशांश तर्पण करना चाहिये।
जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा हो या परेशानी हो, व्यापार में दिवालिया होने की स्थिति आ रही हो या शत्रु हावी हो रहे हों या मुकदमें में विजय की संभावना क्षीण हो, तो इस प्रकार का अनुष्ठान सम्पन्न करना या कराना चाहिये।
बगलामुखी साधना के संबंध में कहा गया है, कि ‘बगलामुखी माला मंत्र’ अपने आप में पूर्ण है और जो साधक मात्र एक माला नित्य बगलामुखी माला मंत्र का जप कर लेता है, उसके जीवन में कोई बाधा व्याप्त नहीं होती। पाठकों के हित के लिये यह परम गोपनीय मंत्र भी मैं इन पन्नों के माध्यम से पहली बार उजागर कर रहा हूं-
बगलामुखी माला मंत्र
।। ऊँ नमो भवगती ऊँ नमो वीरप्रतापविजयर्भगवति बगलामुखी मम सर्वनिन्दकानां सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय बलीं मुद्रय मुद्रय बुद्धिं विनाशय विनाशय अपरबुद्धिं कुरू कुरू आत्मविरोधिनां शत्रुणां शिरो, ललाट मुख्, नेत्र, कर्ण, नासिकारू, पद अण अण, दन्तोष्ठ, जिह्वा, तुल्, गुह्या, गुदा, कटि, जानु, सर्वांगेषु केशादिपादपर्यन्तं पादादिकेशपर्यन्तं स्तम्भय स्तम्भय खें खीं मारय मारय, परमंत्र, परयंत्र परतंत्राणि छेदय, छेदय आत्मंत्रतंत्राणि रक्ष रक्ष, ग्रहं निवारय, व्याधिं विनाशय विनाशय दुःखं हर हर दारिद्रयं निवारय निवारय सर्वमंत्रस्वरूपिणि,
दुष्टग्रह, भूतग्रह पाषाणग्रह,सर्वचाण्डालग्रह,
यक्षकिन्नरकिम्पुरूषग्रह भूतप्रेत, पिशाचानां, शाकिनी,
डाकिनीग्रहाणां पूर्वदिशां बन्धय बन्धय, वार्तालि मां
रक्ष रक्ष, दक्षिण दिशां बन्धय बन्धय, किरातवार्तालि
मां रक्ष रक्ष, पश्चिम दिशां बन्धय बन्धय, स्वप्नवार्तालि
मां रक्ष रक्ष, ऊर्ध्वदिशां बन्धय बन्धय बगला परमेश्वरी मां
रक्ष रक्ष सकलरोगान् विनाशय विनाशय, शत्रु पलायनामज
प्रयोजनमध्ये राजजनस्त्रीवशां कुरू कुरू, शत्रुन् दह दह,
पच पच, स्तंभय स्तंभय मोहय मोहय, आकर्षय आकर्षय,
मम शत्रुन् उच्चाटन उच्चाटन, हुं फट् स्वाहा।
वस्तुत यह मंत्र सिद्ध करने के बाद यदि साधक इसका नित्य प्रयोग करता है, तो उसे जीवन में किसी भी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता है।
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