





हमारे चारों ओर एक ऐसी भी दुनिया है, जो दिखाई नहीं देती लेकिन उतनी ही वास्तविक है, जितनी कि यह धरती। इस अदृश्य दुनिया के अनदेखे प्राणी बराबर इस प्रयत्न में रहते हैं, कि वे अपनी कामनायें, इच्छायें पूरी कर सकें।
भारतीय जनमानस सदैव से यह मानता रहा है कि जिस व्यक्ति की अकाल मृत्यु हो जाये, वह मरने के बाद भूत-प्रेत, पिशाच आदि बन जाता है अथवा जिस व्यक्ति का मरणोपरांत उचित रूप से संस्कार न किया जाये, तो वह भी अतृप्त भटकता रहता है। अधिकांश रूप से अकाल मृत्यु में ही ऐसी स्थितियां बनती हैं, आज के दौर में ऐसी पैशाचिक शक्तियों की अत्यधिक वृद्धि हुयी है। क्योंकि वर्तमान में वाहन दुर्घटना, रोग, हत्या आदि से मनुष्य ग्रसित है, ऐसे आकस्मिक घटनाओं के पश्चात् उस मृतक व्यक्ति की मुक्ति अथवा उसके आगे के जीवन की क्रियाओं में गति देने का जो नियम, विधान हमारे पूर्वजों ने निर्धारित किया था, उसकी उपेक्षा ही पैशाचिक शक्तियों के वृद्धि का मूल कारण है। इसीलिये वह जीवात्मा आगे के जीवन में प्रवेश ना पाकर भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्म आदि योनियों में भटकता रहता है और अपनी कामनाओं को पूरा करने के लिये नैतिक-अनैतिक प्रयास करता रहता है।
अपूर्ण इच्छाओं, वासनाओं के कारण भी व्यक्ति इन योनियों में भटकता है, इसलिये भारतीय संस्कृति में तृष्णाओं से मुक्त होने की बात कहीं गयी है। जिससे मृत्योपरान्त सरलता से आगे की गति प्राप्त हो सके।
भूतों के अस्तित्व के संबंध में पूरे विश्व में शोध चल रहें हैं और सत्य तो यह है कि तथा कथित आधुनिक व विकसित माने जाने वाले पश्चिमी देशों में भूत-प्रेत संबंधी विश्वास हमारे समाज से कहीं अधिक दृढ़ है। जितनी रहस्यात्मकता, विचित्रता पश्चिम के देशों में जुड़ी है, उसके सामने तो भारत की घटनायें नगण्य हैं।
इन पैशाचिक योनियों का संसार अत्यंत ही पीड़ादायक है। यह संसार जो छल-कपट से भरा है और जिससे ऊबकर व्यक्ति प्रायः आत्महत्या कर लेता है, वह यह नहीं जानता कि इससे परे जो जगत है, उसमें इससे भी ज्यादा व्याभिचार, छल-कपट, हिंसा है। इतर योनियां मानव से अधिक मुक्ति के लिये छट-पटाती हैं, मानव के पास तब भी यह शरीर है, वह बहुत कुछ कर सकता है, परन्तु इन इतर योनियों के पास तो वह भी नहीं है।
ये इतर योनियां निरन्तर अपनी मुक्ति के लिये छट-पटाती हैं, अपनी अपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिये भटकती हैं, कभी स्त्री को अपना माध्यम बना कर उसका शारीरिक-मानसिक शोषण करती हैं, तो कभी किसी पुरूष को ऐसे कार्यो में लिप्त करती हैं, जो पूरी तरह अनुचित होता है। इन्हीं प्रेतादि के प्रभाव में आकर व्यक्ति ऐसे कार्यो में लिप्त हो जाता है, जो उसके जीवन की दशा-दिशा ही पूरी तरह बदल देते हैं।
इन पैशाचिक शक्तियों का प्रभाव इतना व्यापक होता है कि ये शक्ति व्यक्ति के मति को भ्रष्ट कर देती हैं, इतर योनियों से पीड़ित व्यक्ति विवेकहीन हो जाता है, वह उचित-अनुचित का संज्ञान नहीं कर पाता। जिसके कारण वह ऐसे कार्यो में लिप्त हो जाता है, जो उसे नीच से नीच स्थिति में पहुंचा देती है। उसके सम्पूर्ण पारिवारिक, सामाजिक जीवन को तहस-नहस कर देती है, और ये परिवार के सदस्यों की मृत्यु का कारण भी निर्मित करती हैं, जो सदस्य कमजोर, असहाय होता है उसके मृत्यु का कारण भी बनती हैं। आपने अपने आस-पास ऐसे परिवारों को देखा होगा, जहां पर किसी ना किसी पारिवारिक सदस्यों कि आकस्मिक मृत्यु लगातार कुछ वर्ष के अन्तराल पर होती रहती हैं। ऐसी क्रियायें एक निश्चित योजना के तहत ये इतर योनिया पूरा करती हैं, जिससे उनकी पैशाचिक शक्तियों में वृद्धि होती रहती है।
मुख्य बात तो यह कि सामान्य मनुष्य यह समझ ही नहीं पाता कि उसके परिवार और जीवन पर किसी ऐसी दुष्ट शक्तियों का प्रकोप है, जो सम्पूर्ण रूप से उसका विनाश व हृास करना चाहती है।
ये इतर योनियां मायावी व चतुर भी होती है, ये व्यक्ति के बौद्धिक व वैचारिक शक्ति को भी प्रभावित करती हैं, जिसके कारण व्यक्ति का ध्यान ही इनकी ओर नहीं जाता। यदि जाता भी है तो ये भ्रमित कर देती हैं। इन शक्तियों से प्रभावित व्यक्ति अथवा परिवार सरलता से इनके प्रभाव को समझ नहीं पाते हैं, यदि समझ भी जाते हैं, तो उनके समाधान हेतु कोई साधनात्मक क्रिया में अनुरक्त सरलता से नहीं हो पाते हैं, इसके लिये व्यक्ति को दृढ़ मानसिक शक्ति की आवश्यकता होती है।
ये कई रूपों में हानि पहुंचाती है, व्यापार, परिवार, धन, पुत्र-पुत्रियों के कुसंस्कार आदि स्वरूपों में ये अपना प्रभाव दिखाती हैं, कभी-कभी द्वेष, ईर्ष्या आदि के कारण भी मनुष्य को परेशान करती है। जैसे जीवित रहने पर उस भूत को आपने कभी किसी कारण दुःख या कोई पीड़ा दी है, तो वह भूत आपसे बदला लेने के लिये अब आपको इस स्वरूप में कष्ट पहुचांता है।
बहुत से ईर्ष्यालु व्यक्ति, रिश्तेदार, मित्र आदि इस तरह के भूत-प्रेत बंधन क्रिया भी सम्पन्न करवाते हैं, जिसके कारण भी जीवन नारकीय बन जाता है। कारण अनेक हो सकते हैं, स्वरूप भी अनेक हो सकते हैं। कारण और स्वरूप कोई भी हो इन तामसिक शक्तियों के कारण व्यक्ति का जीना दूभर हो जाता है, और वह दर-दर की ठोकरे खाता हुआ अंततः वह समाप्ति की ओर अग्रसर हो जाता है।
भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार का गूढ़ार्थ रहस्य यही है कि हिरण्याकश्यप रूपी पैशाचिक शक्तियों पर मनुष्य विजय प्राप्त कर अपने जीवन को सकारात्मक ऊर्जा से युक्त कर सके, देव शक्तियों के माध्यम से जीवन में विजय प्राप्त कर ले।
पैशाचिक शक्तियां भी हिरण्याकश्यप की भांति है, जिसे ना आप देख सकते हो, ना समझ सकते हैं, ना ही उनकी क्रियायें अनुभव में आती हैं, ये स्थितियां ऐसी होती हैं, जहां शत्रु अस्पष्ट होता है और गुप्त शत्रु, भय की दशा में स्थिति कितनी भयावह हो जाती है, इसकी तो कोई कल्पना ही नहीं कर सकता। केवल भुक्त भोगी ही समझ सकता है।
यह साधना इन्हीं सब स्थितियों का मुंह तोड़ जवाब है, साधक को चाहिये कि वह अपने जीवन को निर्भय बनाने वाली इस साधना को सम्पन्न करने के लिये दृढ़ संकल्प लें। इस साधना से साधक ऐसी किसी भी तामसिक शक्ति के प्रकोप से मुक्त होता है, साथ ही यदि उस पर किसी के द्वारा तंत्र बाधा, बंधन, मैली आदि क्रियायें सम्पन्न की गयी है, तो वे भी पूर्णतः समाप्त होती है। वास्तव में तंत्र बाधा भी इन्हीं इतर योनि शक्तियों का प्रकोप है।
भगवान नृसिंह असुरी शक्तियों के प्रकोप को पूरी तरह समाप्त कर जीवन में निर्भयता प्रदान करते हैं, साथ ही साधक सुखी, शांत एवं उन्नतशील होता है।
नृसिंह जयन्ती 30 अप्रैल गुरूवार को रात्रि 8 बजे के पश्चात् साधक पश्चिम मुख बैठ साधना प्रारम्भ करें। इस साधना हेतु साधक के पास ताम्रपत्र पर अंकित नृसिंह यंत्र एवं पिशाच दोष निवारण माला होना आवश्यक है।
यह साधना 2 दिनों की है। साधक को चाहिये कि प्रातः ब्रह्ममुहुर्त में लाल आसन ( लाल कपड़ा आसन पर ) बिछाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। धूप तथा घी का दीप जलाकर पंचपात्र से तीन बार आचमन करें-
ऊँ केशवाय नमः, ऊँ माधवाय नमः, ऊँ नारायणाय नमः
सामने चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर ताम्र पत्र पर कुंकुम या केशर से षट्कोण बनाकर उस पर प्राण प्रतिष्ठित नृसिंह यंत्र स्थापित करें। साधना काल में दीपक जलते रहना चाहिये। यंत्र के चारो दिशाओं में निम्न मंत्र उच्चारण के साथ तिलक लगायें-
श्री खण्डचन्दनं दिव्यं गन्धाड्यं सुमनोहरं।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दंन प्रतिगृहृताम्।।
अक्षतान्, पुष्पमालां धूपं दीपं समर्पयामि नमः।
पूजन के पश्चात् दाहिने हाथ में जल लेकर सभी पैशाचिक, तामसिक शक्तियों के शमन का संकल्प करें फिर निम्न मंत्र का 3 माला जप दो दिन तक करें-
मंत्र
।। ऊँ उग्रवीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं नृसिंह
भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्यं नमामि।।
साधना पूर्ण होने पर गुरू आरती सम्पन्न कर लें व सद्गुरूदेव से साधना सफलता की प्रार्थना करें, इसके पश्चात् सभी सामग्री को लाल कपड़े में बांध कर किसी निर्जन स्थान पर जमीन में दबा दें।
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