





शुभाशीर्वाद !
विश्वास करना मनुष्य की प्रवृति हैं संसार के समस्त कार्यो को पूरा करने के लिए विश्वास ही माध्यम है मनुष्य जानता हैं कि इस जीवन यात्रा में अकेले सारे कार्य वह नहीं कर सकता और नहीं विश्वास के बिना संसार में चल सकता है। विश्वास के फलस्वरूप ही श्रद्धा उत्पन्न होती है और जहाँ ये दोनों ही प्रकाश और पूर्णिमा रूपी चन्द्रमा की शीतलता के रूप में साथ-साथ चलती है वहीं जीवन में निरन्तर वृद्धि होती है। इनमें से किसी एक भाव की न्यूनता होने पर जीवन ऊबड़-खाबड़ कंटीला असन्तुलित सा हो जाता है और इससे जीवन में अनेक-अनेक विषमताये उत्पन्न होती है और इन्हीं स्थितियों के फलस्वरूप जीवन दुःख-विषाद और बाधाओं से घिरने लग जाता है और जीवन में प्रकाश के स्थान पर अंधकार रूपी अन्तहीन बाधाये बनी रहती है और चन्द्रमा की शीतलता के स्थान अमावस्या की कालिमा आ जाती है प्रमुख रूप से ऐसी स्थितियों का निर्माण कर्त्ता व्यक्ति स्वयं होता है।
इसीलिए सांसारिक व्यक्ति का झुकाव ईश्वर और गुरु के प्रति रहता है क्योंकि वह पूर्ण सर्वज्ञ-शान्ति प्रदाता है, सद्गुरु शाश्वत रूप से इन प्रज्ञाओं को जगाने वाला ब्रह्म स्वरूप होता है। गुरु ही अपने शिष्य को अहम् ब्रह्मास्मी का ज्ञान कराता है कि वह अकेला ही पूरी सृष्टि में ब्रह्म स्वरूप में है अर्थात् हर व्यक्ति निर्माण कर्त्ता, पालन कर्ता और पूर्णता कर्त्ता है। जीवन की तीनों ही क्रियाओं में निरन्तरता का प्रवाह बना रहे और इस प्रवाह में किस तरह अविरलता बनी रहे यही चेतना प्राप्त करने के लिए शिष्य को गुरु धारण करना पड़ता है तथा उससे पूर्ण रूप से सर्म्पकित रहना होता है जिससे की जीवन में गतिशीलता बनी रहे।
व्यक्ति स्वयं जानता है यदि जीवन में गति नहीं है और एक ही तरह की स्थिति यथावत् बनी रहती है तो वहाँ पर जिस तरह से जमीन पर छोटे-छोटे गड्ढो में पानी पड़ा रहने पर सड़ान्ध मारता है और उस सड़ान्ध से बीमारी के रूप में अनेक तरह के कीड़े और जीव-जन्तु उत्पन्न हो जाते है वैसा ही व्यक्ति का जीवन बदबू और सड़ान्ध युक्त बन जाता है इसके साथ अनेक-अनेक तरह के दुःख विषाद, कष्ट-रोग मय स्थितियाँ जीवन में स्थायी रूप से आ जाती है शिष्य को इस तरह की स्थितियों को निरन्तर काटने और समाप्त करने का भाव चिंतन और चेतना गुरु प्रदान करता है। इसीलिए ईश्वर और सद्गुरु के प्रति श्रद्धा और विश्वास की निरन्तरता का भाव बना रहना आवश्यक है।
सद्गुरुदेव डॉ नारायण दत्त जी श्रीमाली जी के अवतरण दिवस 21 अप्रैल को उत्सव के रूप में मनाने के पीछे साधक का स्वयं का आत्मीय रूप में स्वार्थ भाव होता है प्रथमतः श्रद्धा और विश्वास में उसका हित चिंतन होता है कि वह भी गुरु के समरूप अपने आपको श्रेष्ठता से स्थापित कर सके तथा पूर्ण रूपेण पशुवत जीवन से निवृति प्राप्ति हेतु, साथ ही मानसरोवर रूपी शीतलता को रोम-रोम में आत्मासात करने के लिए और जीवन की श्रेष्ठ कामनाओं की पूर्ति के लिए कामदा एकादशी दिवस पर भगवान सदाशिव की तपो भूमि पाशुपतये ज्योंर्तिलिंग व हिमालय की कन्दराओं में अवस्थित नेपाल में 19-20-21 अप्रैल 2013 को राम जानकी मंदिर प्रांगण, राजा भर्तुहरि की तपोभूमि मंगलापुर जिला बुटवल नेपाल में सद्गुरु चैतन्य अमृत महोत्सव के रूप में सम्पन्न होगा।
सद्गुरुदेव की आज्ञा अनुसार धार्मिक स्थलो पर साधनात्मक शिविरों का आयोजन किया जाता हैं इसके पीछे उनका मन्तव्य दिव्य तेजमय तपोभूमि पर साधनाऐं करने से सद्गुरु और ईश्वर का पूर्ण वर्चस्व रूपी आर्शीवाद साधक को प्राप्त होता है। जिससे की साधक संसार में ज्ञान बुद्धि से पूर्ण सचेष्ट और प्रज्ञावान हो सके और साथ ही शारीरिक और आत्मिक शक्ति से बलशाली बन सके। साथ ही धन-धान्य रूपी लक्ष्मी से अपने जीवन को सरोबार कर सके। इसीलिए महा सरस्वती, महाकाली, महालक्ष्मी के त्रिगुणात्मक पिण्ड स्वरूप में पूर्णरूपेण वैष्णो देवी को आत्मसात कर सके इसी हेतु साधनात्मक शिविर का आयोजन त्रिकूटा पहाड़ी पर अवस्थित माता वैष्णो देवी के तेजमय मंदिर प्रागंण में 8-9 जून 2013 को कटरा वैष्णो देवी में सम्पन्न होगा। सद्गुरुदेव के गृहस्थ जीवन में पदार्पण के शुभ मंजुल महोत्सव शिविर में वे ही साधक भाग ले जिनमें सही अर्थो में गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा हो और वे त्रिगुणात्मक रूप में अपने जीवन की उन्नति-प्रगति चाहते है। इसीलिए पंजीकरण (Registration)) अनिवार्य है जिससे की साधको के लिए सुव्यवस्था की जा सकें।
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