





वेदों में मनुष्य के जीवन को चार भागों में विभाजित किया गया हैं- ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम एवं संन्यास आश्रम। ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद गृहस्थ आश्रम में पदार्पण का नाम ही परिणय या विवाह हैं। जगत के छोटे से छोटे अणु से लेकर बड़े से बड़े पदार्थ का उद्भव इसी संयोग प्रक्रिया द्वारा होता हैं, चाहे वह मानव हो, पशु हो, पक्षी हो, लता, वनस्पति, या कुछ भी हो।
विवाह दो आत्माओं का संयोग हैं, यदि यह संयोग ठीक न बैठा तो गृहस्थ जीवन विषमय, कष्टकारी बन जाता है। इसीलिए विवाह के पूर्व नाम राशि का योग अथवा जन्म कुण्डली से वर-वधू के गुणों का मिलान किया जाता है कि क्या विवाह सफल रहेगा? स्वर्गमय आनन्द और वृद्धियुक्त घर की जो कल्पना की जाती है, उसका निर्धारण राशि योग, चक्र तथा जन्म कुण्डली के मिलान से गृहस्थ जीवन की भविष्यमय स्थितियों के बारे में ज्ञात करना सम्भव हो पाता हैं। यदि कुछ गृहस्थ जीवन में क्रूर स्थितियाँ भी आती हैं तो उसका पूर्ण समाधान भी संभव हो जाता हैं।
आज स्थिति यह हो गई है, कि 90 प्रतिशत विवाह असफल रहते है, आज का सामान्य गृहस्थ जीवन एक तनावपूर्ण, कलह और दुःख भरी जिन्दगी बन कर ही रह गया हैं इस सबका मूल कारण होता है, एक दूसरे को भली भांति न समझ पाना, और ऐसा तभी होता हैं, जब दोनों परिवारों में श्रेष्ठ संस्कारों का अभाव होता है। परन्तु जिस संस्कार की बात यहां हो रही हैं, वह आत्मा के स्तर का संस्कार होता है, अर्थात् पति एवं पत्नी का आत्मिक रूप से सामंजस्य, जो कि नितान्त आवश्यक होता हैं।
तभी वैवाहिक जीवन सुदृढ़ एवं सफल हो सकता है। इसके लिए दोनों पक्षों की न्यूनताओं को दूर करने के लिए प्राचीन समय में दैवीय सहायता का उपयोग किया जाता था, देवताओं से प्रार्थना की जाती थी, कि वे वर-वधू को आशीष प्रदान कर उन्हें जीवन में सुख, सौभाग्य, होनहार सन्तान, यश, सम्मान, वैभव, सुख, सुविधा, धर्म, साधुसेवा, दान आदि सुकृत्यों से धन्य करें।
विवाह करते समय आज कल प्रायः वर पक्ष कन्या में उसकी गृहकार्य दक्षता, विनम्रता, देहयष्टि, एवं दहेज आदि देखता हैं। इसी प्रकार वधू पक्ष वाले वर में सामाजिक प्रतिष्ठा, अर्थोपार्जन क्षमता आदि ही देखते हैं। जबकि यह बहुत सीमित दृष्टिकोण है। वर-वधु के मध्य परस्पर कई गुण ऐसे भी होते हैं, जो मेल नहीं खाते हैं, जिनका लौकिक और भौतिक रूप से समाधान करना अथवा हल ढूंढ निकालना सहज नहीं होता। यह तो ज्ञान दृष्टि युक्त ज्ञाता ही बता सकता है। यह संस्कार वर-वधू द्वारा ग्रह अनुकूलता दैवीय आशीर्वाद से एक दूसरे के प्रति आजीवन सौहार्दपूर्ण बने रहने की पात्रता एवं गुण प्राप्ति का संस्कार है।
विवाह संस्कार जीवन की परिवर्तनकारी श्रेष्ठतम निर्माण की प्रक्रिया हैं, और भावी जीवन की नींव होती है। भावी जीवन के सुखद निर्माण के लिए इस संस्कार को प्राप्त करना आवश्यक हैं, जिससे पति-पत्नी आजीवन, मित्रवत, एक दूसरे के सहयोगी बने रहें, सुख दुख में साथ चलें न कि एक ही छत के नीचे रहते हुए अशांतमय, कुंठित जीवन व्यतीत करें।
विवाह को दाम्पत्य सूत्र बन्धन भी कहा जाता हैं, परन्तु यह तो एक वैचारिक दृष्टिकोण है। यदि किसी चीज को प्रारम्भ में ही बन्धन मान लिया जाए, तो वह आजीवन बन्धन ही लगती है, और परिणाम स्वरूप मिलता हैं अवसाद, कलह। ठीक इसके विपरीत यदि उसे बन्धन न मानकर एक बन्धन मुक्त होने की क्रिया के रूप में देखें, तो वही स्थिति सुखद बन जाती है। यह तो अपना अपना दृष्टिफलक होता हैं, जो व्यक्ति को सुख या दुःख का अनुभव कराता है, और इस दृष्टिफलक के पीछे होते हैं उसके संस्कार, वे संस्कार जिसे गुरु ही प्रदान कर सकते हैं। पाणि ग्रहण संस्कार इसी चेतना को और गुरु के आशीर्वाद को प्राप्त करने का एक क्रम हैं।
यदि सुक्ष्मता से देखा जाए, तो शास्त्रों में जितने भी देवता हैं वे सभ युग्म रूप में हैं- अर्थात यदि शिव हैं तो पार्वती हैं।, विष्णु हैं तो लक्ष्मी भी हैं, राम हैं तो सीता भी हैं, नारायण हैं तो भगवती भी हैं। यदि विवाह सफल हो जाए, तो दोनों का ही आत्मिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास सम्भव होता हैं। क्योंकि तब वे एक दूसरे के बाधक न होकर, एक दूसरे के सहायक या सहयोगी होते हैं।
विवाह के पूर्व अथवा विवाहपरांत कभी भी वर-वधू स्वयं उपस्थित होकर अथवा अपना संयुक्त फोटो भेजकर पाणि ग्रहण संस्कार दीक्षा और गृहस्थ सुख वृद्धि दीक्षा, अखण्ड सावित्री सौभाग्य वृद्धि दीक्षा, कामदेव रति दीक्षा, मेनका सौन्दर्य दीक्षा प्राप्त करने से इन पंच स्थितियों को पति-पत्नी में चेतना से स्थापित किया जाता हैं जिससे गृहस्थ जीवन उक्त स्थितियों से श्रेयष्कर रूप में निर्मित होने की ओर अग्रसर होता हैं। पति-पत्नी को चाहिए कि यथा शीघ्र ‘शिव वस्तक’ एवं ‘गौरा वस्तक’ को धारण करें।
‘शिव पार्वती पाणिग्रहण’ में इंगित किए गए दिव्य ऊर्ध्वरित मंत्रों से सिद्ध हैं। इन दोनों वस्तकों को लॉकेट रूप में धारण करें। किसी भी प्रदोष दिवस के दिन पति को चाहिए कि वह अपने हाथ से ‘गौरा वस्तक’ पत्नी के गले में पहना दें, तथा पत्नी ‘शिव वस्तक’ को अपने पति के गले में पहना दे। इस लॉकेट को दोनों को कम से कम तीन माह तक अवश्य धारण करना चाहिए। जिससे सांसारिक जीवन में एक दूसरे के प्रति आत्मीय और प्रेमभाव और सौभाग्य वृद्धि के साथ-साथ रिश्तों में मधुरता का संचार निर्मित होता हैं। पति-पत्नी दोनों को जीवन में आनन्द और रस की प्राप्ति होती हैं जिससे जीवन सुगंधमय और चेतना युक्त बनता हैं।
यदि आपके परिवारिक जीवन में बोझिलता तनाव अकारण शक, संदेह, प्रेम सामजस्य के अभाव की अर्नगल स्थितियाँ बनी हुई हैं। उन्हें शीघ्रताशीघ्र गौरा वस्तक और शिव वस्तक अवश्य ही धारण करना चाहिए।
परम पूज्यनीय प्रिय गुरुदेव कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी और माता जी शोभा देवी के सुखमय गृहस्थ जीवन के 32 वर्ष पूर्ण होने के शुभ अवसर 7 जुलाई 2013 को आनन्द महोत्सव का आयोजन किया गया हैं।
इस शुभ व श्रेष्ठ अवसर पर आकर शिव स्वरूप गुरु व शोभायमान माताजी का साक्षी भूत रूप से आर्शीवाद प्राप्त कर अपने जीवन को शिव पार्वती युक्त सौभाग्यमय बना सके और जीवन में गणपति, कार्तिकेय, रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ की अक्षुण्णता प्राप्त कर सकें।
इन दिवसों में गुरुजी और माताजी से व्यक्तिगत रूप से भेंट कर अपने जीवन को आनन्दमय और सुखमय तथा सभी मनोकामनाओं से युक्त करने हेतु मार्गदर्शन प्राप्त कर अपने गृहस्थ जीवन को शिव गौरी युक्त बनाने की ओर अग्रसर हो सकेगें। इस पावन पर्व पर कैलाश सिद्धाश्रम दिल्ली में आप सभी सपरिवार सहृदय भाव से आमंत्रित हैं। मानस पुत्र-पुत्रियों के लिए महाप्रसाद की व्यवस्था की गई हैं।
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