





– क्या हैं वे द्वार ?
किस प्रकार उनका उन्मीलन संभव है ?
साधना क्षेत्र के अत्यन्त गूढ़ रहस्यों का विवेचन—–
काया सता की चेतन प्रयोगशाला में जीवनपर्यन्त अनुसंधान करने वाले प्राचीन ऋषियों ने जीवात्मा के मानवीय कलेवर को अपनी दिव्य दृष्टि से पांच भागों में विभक्त किया है। योग में सूक्ष्म शरीर के पांच कोश यही हैं। कोश अर्थात, खजाना भण्डार। मानव अस्तित्व की सारी प्रसुप्त क्षमताओं के केन्द्र यही कोश हैं, जिनके जागरण के फलस्वरूप साधक परमसत्ता से आत्म-साक्षात्कार कर लेता है। ऋग्वेद के पंच ऋषि भी यही हैं –
‘‘अग्निऋषिः पावमानः पांजन्यः पुरोहितः।’’
त्मीमहे महागयम
अर्थात यह अग्नि, ऋषि है, यह पवित्र करने वाली है और पंच कोशों की मार्गदर्शक है। हम इस महाप्राणा की शरण में जाते हैं। पंच कोश साधना की महिमा देवी भागवत में भी गाई गई है –
पंचप्राणाधिदेवी या पंचप्राण स्वरूपिणी।
प्राणाधिक प्रियतमा सर्वाभ्यः सुन्दरीपरा।।
अर्थात, पंच कोश सम्पदा के पांच स्वरूप ही पंच प्राण हैं, इन प्राणों की अधिष्ठात्री देवी भगवती ही हैं, वे ही पराशक्ति सर्वांग सुन्दरी हैं तथा भगवान को प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। छान्दोग्योपनिषद के महर्षि इन पांच कोशों को स्वर्ग लोक के पांच द्वारपालों के रूप में देखते हुए कहते है, कि इन्हें प्रसन्न करने पर ही उस ब्रह्मपुरुष तक पहुंचना संभव है –
‘‘तेषा एते पंच ब्रह्म पुरुषा स्वर्गस्य, लोकमय, द्वारपालस्य, एतानेकं पंच ब्रह्म पुरुषात्।’’
कोश का एक अर्थ आवरण भी है। इन आवरणों को क्रमशः हटाते रहने पर अन्ततः जीवसता का ‘रसौ वै सः’ वाला कारण शरीर प्रधान आनन्दमय कोश का स्वरूप प्रत्यक्ष होता है और साधक अपने ईश्वर स्वरूप का दर्शन व आस्वादन कर धन्य हो उठता है।
ये सभी पंच कोश सूक्ष्म हैं, अर्थात् इन्द्रियों से परे, अप्रत्यक्ष, अदृश्य हैं। अतः सामान्य प्रत्यक्षवादी मानव को इनका आभास भला किस प्रकार मिल सकता है ? उसके लिए तो उसे अध्यात्म की गहराइयों में प्रवेश करना ही पड़ेगा, तभी वह चेतना के विशाल महासागर में डूब कर इन पंच कोशों की विराट सत्ता से साक्षात्कार कर सकेगा। फिर भी बुद्धि से परे होने के बाद भी प्रत्यक्षवादी आध्यात्म वेताओं ने मानव की सूक्ष्म संरचना के विषय में ज्ञान देने का प्रयास किया है। शरीर संरचना विज्ञान के अनुरूप ही इन पांच कोशों के प्रभाव क्षेत्र को देखा गया है, उनकी उपस्थिति का आभास किया है और उन्हें प्रत्यक्ष अनुभूति में आने योग्य भी स्वीकार किया है –
अन्नमय कोश:- इसी पहले आवरण में साधारण जीव का निवास है, इसी कोश में आधारित भौतिक शरीर इस मृत्यु लोक के भोगों को भोगता है, अर्थात सुख-दुःख आदि का अनुभव करता है। इस शरीर का आधार प्राण, केवल ‘अन्न’ है। प्रारम्भिक साधक के लिए अन्नमय कोश की शुद्धि आवश्यक है, इसके बिना साधना जगत में प्रवेश नहीं हो सकता। भोजन, आचार-विचार व वातावरण की शुद्धि की इसकी प्रारम्भिक भूमिका है।
अन्नमय कोश की चमत्कारी अन्तःस्त्रवी ग्रंथियां प्रभावित होकर व्यक्तित्व की विविध क्षमताओं को उभारती हैं, अतः योगवेताओं के अनुसार आवश्यक हॉरमोन्स को बढ़ाना एवं अनावश्यक को कम करना अन्नमय कोश की साधना से संभव है।
प्राणमय कोश:- अन्नमय कोश को पार करने पर प्राणमय कोश का क्षेत्र आता है। वस्तुतः इन दोनों कोशों का सम्मिलित स्वरूप ही यह स्थूल शरीर है। प्राणमय कोश का आधार ‘वायु’ है और यही ‘वायु’ जीवन है। वायु के स्तम्भन व कुम्भक से इनकी चंचलता मिट जाती है। ‘वायु’ पर आश्रित होने के कारण ही इस प्राणमय कोश में प्रवेश करते ही साधक चंचल हो उठता है, उसका मन साधना में बहुत जल्दी लगता भी है और उचट भी जाता है। ‘प्राणायाम’ से इस शरीर का शुद्धिकरण हो जाता है।
प्राणमय कोश की जैव विद्युत संस्थान से संगति बिठायी जाती है। शरीर में लगभग पच्छत्तर हजार अरब कोश हैं और सभी में स्थायी विद्युत ऊर्जा है। सांस लेते समय प्राणवायु के द्वारा वायुमण्डल में व्याप्त विद्युत आवेश को हर प्राणी फेफड़ों व त्वचा द्वारा अवशोषित करता रहता है। त्वचा, जननेन्द्रिय, आंखों व मुखमण्डल से यह विद्युत ऊर्जा निरन्तर उत्सर्जित होती रहती है।
प्राणशक्ति का यह समुच्चय प्राणमय शरीर की संरचना करता है, इसमें होने वाली न्यूनता या अधिकता व्याधि के रूप में दिखाई देती है। आध्यात्मिक क्षेत्र में यही प्राण ऊर्जा जीवन शक्ति को संचित करने तथा उसके अधोगामी प्रवाह को रोककर ऊर्ध्वगामी बनाने की भूमिका निभाती है। फलस्वरूप प्रसुप्त सामर्थ्य, संकल्प तथा इच्छा शक्ति का जागरण होकर असंभव कार्य सम्पन्न होने लगते हैं।
मनोमय कोश:- प्राणमय कोश की सीमा पार कर मनोमय राज्य में प्रवेश मिलता है। यहां मनोबल बढ़ता है, भृकुटि पर तनाव सा होने लगता है, नाभि से खिंचाव होकर ‘स्वतः कुंभक’ आरम्भ हो जाता है, साथ ही साथ स्वतः ‘खेचरी मुद्रा’ भी सिद्ध होने लगती है। यहीं पर मंत्र सिद्धि की प्रारम्भिक भूमिका भी बनती है। दिव्य आत्माएं, जो साधक के गुरु मण्डल सम्प्रदाय की होती हैं, उनसे सम्पर्क होने लगता है। मनोमय कोश मानवी जैव चुम्बकत्व की शरीर में सूक्ष्म रूप में प्रकृति रूप में विद्यमान है।
ब्रह्माण्डव्यापी महासमुद्र में इसी चुम्बकीय बल के अधिपत्य स्वरूप ग्रह-नक्षत्र परस्पर सन्तुलित व क्रियाशील बने हुए हैं। मानव शरीर में यह चुम्बकीय ऊर्जा द्विध्रुवीय चुम्बक की भांति है, जिसका उत्तरी सिरा ग्रहण कर्ता है तथा दक्षिणी सिरा निःसर्ग कर्ता है। मूलतः यह चुम्बकीय बल शरीर में सुषुम्ना के मूलाधार रूपी दक्षिणी व सहस्त्रर रूपी उत्तरी ध्रुव के रूप में स्थित है।
इसी चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव के कारण मनुष्य के मुखमण्डल के चारों ओर आभा मण्डल का निर्माण होता है, जिसे देखकर ही योगीजन सामने वाले की अन्तश्चेतना को परखते व प्राणसम्बल प्रदान करते हैं। इस मनोमय कोश को ध्यान, योग व एकाग्रता से ही साधा जा सकता है। इच्छाशक्ति के चमत्कार इसी जैव चुम्बकत्व की अधिक मात्रा के परिणाम हैं। आज भी शक्तिपात, प्राणसंचार, अध्यात्म चिकित्सा व आशीर्वाद के रूप में समर्थ गुरु अपने आश्रितों को लाभान्वित करते रहते हैं।
विज्ञानमय कोश:- मनोमय कोश से आगे बढ़ने पर विज्ञानमय कोश मिलता है। यहां ‘भाव’ की प्रधानता रहती है। ‘मन’ की चंचलता मिट कर शान्ति मिलने लगती है, यह मन की ‘विश्राम स्थली’ भी है। यहीं पर दिव्य अनुभूतियां होती हैं। सद्गुरुदेव के दर्शन जो पहले छाया रूप में थे, अब उनमें दिव्यरूपता दिखाई देती है। शरीर प्रकाशवान दिखता है और साधक को कभी-कभी ऐसा लगता है, कि उसकी सभी शक्तियां समाप्त हो गई हैं, कुछ भी प्रदर्शन भाव नहीं रहता।
स्थूल दृष्टि से इसकी स्नायु रसायनों से संगति मानी जा सकती है, परन्तु यह अन्तश्चेतना के गहन अन्तराल में निहित वे दिव्य संरचनाएं हैं, जिनका प्रत्यक्ष संबंध ब्राह्मी चेतना से होता है। ये स्नायु रसायन मस्तिष्क व सुजुम्ना के महत्वपूर्ण केन्द्रों से संबंधित होते रहते हैं और उत्तेजित किये जाने पर प्रसुप्त केन्द्रों को जगाने की विलक्षण सामर्थ्य रखते हैं।
मस्तिष्कीय सत्व के दस लाख में से मात्र एक भाग का प्रतिनिधित्व करने वाले ये सूक्ष्म स्नायु मानव मन की अचेतन, चेतन व अधिचेतन परतों को उत्तेजित कर विलक्षण प्रतिभाओं, आविष्कार, दिव्य सन्देश व प्रेषण आदि के रूप में अपनी सक्रियता प्रकट करते हैं। सद्गुरु के सान्निध्य में विशिष्ट योग साधनाओं द्वारा इन सभी को सक्रिय बना कर अतीन्द्रिय क्षमताओं का धनी व अद्वितीय आनन्द की अनुभूति करने वाला समर्थ योगी बना जा सकता है।
आनन्दमय कोश:- यह सबसे अन्तिम द्वार है, जिसमें प्रवेश करते ही जो विशेष परमानन्द प्राप्त होता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यहीं पर समाधि के भेद स्पष्ट होने लगते हैं। हमारा ‘कारण शरीरी’ विज्ञानमय और आनन्दमय कोश का ही सम्मिलित स्वरूप है। साधक सम्मिलन के सब केन्द्र यहीं पर हैं। आनन्दमय कोश व सहस्त्रार चक्र परस्पर अन्योन्याश्रित सूक्ष्म संरचनाएं हैं, जो तत्वेत्ताओं की दृष्टि से ‘रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम’ नामक विद्युत स्फुलिंगों के फव्वारों से मेल खाती हैं। चेतना की उच्चतम स्थितियां इसी संस्थान की सक्रियता पर निर्भर है, क्योंकि लाखों न्यूरॉन्स शरीर से इसमें प्रवेश करते व यहीं से मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों में जाते हैं। वाणी से सम्बन्धित केन्द्र, श्रवण, दृश्य, स्मृतियां आदि सभी के केन्द्र बिन्दु यहीं पर अवस्थित हैं। परन्तु यह परम सत्य है कि इस पूरे संस्थान का मात्र पांच प्रतिशत ही वैज्ञानिक जान सके हैं, अन्य शेष प्रसुप्त अवस्था में ही है, जिन्हें मात्र समर्थ गुरु ही जाग्रत व चैतन्य कर सकते हैं।
भक्ति और शक्ति के समन्वय का प्रतीक यह आनन्दमय कोश साधना क्षेत्र के अत्यन्त गूढ़ रहस्यों को अपने भीतर छिपाये हुए है। मानव के भाव पक्ष को उभारने एवं उसे महामानव, ईश्वर बनाने का पुरुषार्थ यहीं पर सम्पन्न होता है।
दीक्षा: पंच कोश जागरण की सहज प्रक्रिया
इन्हीं पांच कोशों को अध्यात्म जगत में विभिन्न यौगिक क्रियाओं व साधनाओं के द्वारा आवरण मुक्त कर साधक अपनी असीम सामर्थ्य व ऋद्धि-सिद्धियों के प्रत्यक्ष रूप को देखकर विस्मित हो उठता है। इसके लिए मंत्र जप, ध्यान, प्राणायाम, बंध-मुद्रा आदि का अभ्यास करना पड़ता है। शास्त्रों में इसके लिए हठयोग, राजयोग, लययोग, भक्तियोग, कर्मयोग इत्यादि चौरासी योगों के अवलम्बन बताये गए हैं, जिन्हें साधक अपनी पात्रता व रुचि के अनुरुप अपनाकर इस पंच कोश साधना में प्रवृत होते हैं।
परन्तु समर्थ सद्गुरु का आश्रय मिलने पर शिष्य को इनमें से किसी भी योग व दुष्कर साधनाओं में प्रवृत होने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जिन कष्टकर साधनाओं द्वारा पंच कोशों को जाग्रत करने के लिए सामान्य साधक पूरा जीवन दांव पर लगा देते हैं, उसे दीक्षा रूपी तीव्र वेग के द्वारा सद्गुरु एक ही झटके में सम्पन्न कर देते हैं, शिष्य को उसके अन्तर की यात्रा पूरी करा देते हैं, ताकि उसका बाहर भटकता मन उन्मनी होकर अन्तस की ओर लौट आये।
तभी तो वह अहसास कर सकेगा, कि वह तो सदा से ही अक्षय कोष के मुख पर बैठा था, ठीक उसके नीचे ही रत्नों का भण्डार छिपा हुआ था। नेति, धोती की क्रियाएं भी तब आवश्यक नहीं, न घण्टों आंख मूंदकर बैठना है, न श्वास को किसी प्रकार दबा कर कष्ट झेलना है, योग की इन बाह्य क्रियाओं से जूझने का प्रयोजन ही नहीं, क्योंकि सद्गुरुदेव द्वारा प्रदत ‘चक्र जागरण दीक्षा’ तो ऐसा बीज है, जो एक बार बस मन में पड़ जाय, तो फिर वह अपनी जिवीविषा से कैसी भी सख्त धरती क्यों न हो, उसको तोड़ कर अंकुरित हो ही जाता है।
करुणा का यह अजस्त्र प्रवाह शिष्य की क्षुद्र देह में बद्ध प्राणों को असीम ब्रह्माण्ड में विस्तारित कर देता है, कभी प्रेम के माध्यम से, कभी अपनत्व के माध्यम से, तो कभी शक्तिपात के माध्यम से और शिष्य अपने अनजाने में ही अन्तः स्थित सभी कोशों को पार करता हुआ उस विराट ब्रह्मानन्द सिन्धु में निमग्न हो जाता है, जो उच्चकोटि के योगियों-संन्यासियों को भी दुर्लभ हैं। आवश्यकता है तो मात्र शिष्य की बाल सुलभ निर्मल चित्तवृति, सद्गुरु चरणों में अगाध विश्वास व परम सत्य को पाने की अदम्य पिपासा की – शेष तो सद्गुरुदेव इस विलक्षण दीक्षा के रूप में स्वयं ही प्रदान कर देते हैं।
मेरे 108 रुप हैं और प्रत्येक रूप अपने आपमें पूर्ण, चैतन्य, शीघ्र सिद्धिदायक, मंगलमय एवं अप्रतिम प्रभाव एवं परिणाम देने में समर्थ हैं। जो काम साधक नहीं कर सकता, जो कार्य साधना के द्वारा सम्पन्न नहीं हो पाता, जो परिणाम प्रयोगों से प्राप्त नहीं हो पाता, वह मेरे द्वारा हो ही जाता है।
मुझे प्राप्त करने के लिए न तंत्र की जरूरत है, न मंत्र की आवश्यकता है, न क्रिया-कलापों की जरूरत है, न विधि-विधानों की आवश्यकता, केवल एक स्पर्श से ही क्षण भर में सब कुछ अघटित पूर्ण रूप से घटित हो जाता है, बशर्ते योग्य एवं तेजस्वी गुरु के अंगूठे का स्पर्श व्यक्ति या साधक के ललाट पर, आज्ञा चक्र पर हो। जीवन का श्रेष्ठतम स्वरूप हूं मैं, समस्याओं के निराकरण में पूर्ण रूप से अप्रतिम हूं मैं, दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने में समर्थ हूं मैं, अशुभ एवं दरिद्रता को समाप्त करने में पूर्ण रूप से अप्रतिम हूं मैं, क्योंकि पलक झपकते ही सब कुछ आलोड़न-विलोडन करने में समर्थ हूं मैं। ऊंचे से ऊंचे योगियों, ऋषियों, महर्षियों, तपस्वियों ने एक स्वर से स्वीकार किया है, कि कलियुग में प्रत्येक गृहस्थ व्यक्ति के लिए वरदान स्वरूप हूं मैं। जो अभागे हैं, दुर्भाग्यशाली हैं, वे ही मुझे प्राप्त करने में हिचकिचाते हैं, हीला-हवाला करते हैं, सोचने-विचारने में समय बरबाद करते रहते हैं।
मैं तो आद्याशक्ति पराम्बा हूं, जो पलक झपकते ही सब कुछ करने में समर्थ हैं, वज्र की तरह कठोर, तफूान की तरह शत्रुओं पर प्रहार करने में समर्थ, फूल से भी कोमल एवं विश्वास रखने वालों को अटूट सम्पदा देने में समर्थ—– मैं धीमी एवं सहज प्रक्रिया हूं, साधक की श्रद्धा, विश्वास एवं निष्ठा पर मैं टिकी हूं। मैं धीमे पर मनोवांछित फल देने में समर्थ हूं। जिसमें जितना ही मुझ पर, गुरु पर एवं मंत्र पर विश्वास होगा, मैं उतनी ही फलप्रद रहती हूं।
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