





त्रिपुर सुन्दरी की साधना, जो कि श्री विद्या की साधना कही जाती है, शास्त्रों में वर्णित हैं कि जो व्यक्ति पूर्ण एकाग्रचित्त होकर यह साधना सम्पन्न करता है, उसे शारीरिक, मानसिक रोग और भयग्रस्तता प्राप्त नहीं होती है, वह दरिद्रता और मृत्यु युक्त जीवन नहीं जीता, वह व्यक्ति जीवन में पूर्ण रूप से धन, यश, आयु, भोग और मोक्ष को प्राप्त करता है।
साधना विधानः- सिद्धिदायक साधना को नवरात्रि के किसी भी दिवस में सम्पन्न किया जा सकता हैं। सर्वकामना सिद्धि युक्त त्रिपुर सुन्दरी महायंत्र, नवदुर्गा त्रिभुवन मोहिनी माला, एवं कल्पवृक्ष साफल्य फल आवश्यक हैं। प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर विशेष पूजन सामग्री से, जिसमें आसन, जलपात्र, गंगाजल, प्लेट, कुंकुम, अक्षत, पुष्प, पुष्पमाला, पंचामृत, कलावा, धूप, अगरबत्ती, दीपक, नैवेद्य, इलायची सामग्री एक पात्र में रख दें और एक थाली के मध्य स्वस्तिक बनाकर त्रिपुर सुन्दरी महायंत्र स्थापित करें और यंत्र के चारों ओर त्रिपुर सुन्दरी की शक्तियां-ज्ञान, क्रिया, कामिनी, कामदायिनी, रति, रतिप्रिया, नन्दा, मनोमालिनी, इच्छा, सुभगा, भगा, भगसर्पिणी, भगमाल्या, अनंग नगाया, अनंग मेखला और अनंग मदना का ध्यान करते हुए उसे पुष्प अर्पित करें।
तत्पश्चात् यंत्र पर कल्पवृक्ष साफल्य फल अर्पित करें। कल्पवृक्ष साफल्य आपके जीवन में जो न्यूनताएं है, उन न्यूनताओं को पूर्ण करने की प्रार्थना के साथ ही उसे अर्पित किया जाता है और यह सिद्ध कल्पवृक्ष साफल्य, त्रिपुर सुन्दरी महायंत्र के मध्य में अर्पित करें। इसके बाद त्रिपुर सुन्दरी महायंत्र पर सभी सामग्री एक-एक कर अर्पित करें।
जब यह पूजन समाप्त हो जाय, तब पुनः त्रिपुर सन्दरी का ध्यान करें, गुरु का ध्यान करें एवं कल्पवृक्ष साफल्य फल को अपने बाये हाथ में लेकर मुटठी में बंद कर और अतिविशिष्ट नवदुर्गा त्रिभुवन मोहिनी माला से निम्न मंत्र का त्रिपुर सुन्दरी की शक्तियों का ध्यान करते हुए 16 माला का जाप उसी स्थान पर बैठ कर सम्पन्न करें।
मंत्र जप के पश्चात् कल्पवृक्ष फल को अपने सिर से 16 बार घुमायें। जिससे सभी शक्तियों को आत्मसात कर सकें। इसके पश्चात् फल को कभी भी नदी में प्रवाहित कर दें और यंत्र व माला दीपावली तक अपने पूजा स्थान में रखें छठ पूजा के बाद सभी सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दें।
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