





वास्तव में मनुष्य जीवन में दिन प्रतिदिन हजारों बंधन जाने अनजाने बढ़ते रहते हैं और मनुष्य उन बंधनों के रूप में मोह कामना वासना में इतना अधिक लिप्त हो जाता हैं कि उससे परे हट कर वह जीवन देख ही नहीं सकता। मोह और तृष्णा ईश्वर का दी हुई एक ऐसी क्रिया है जिससे मनुष्य इस संसार को चलाता रहता है लेकिन ईश्वर ने भी संभवतया नहीं सोचा होगा कि मनुष्य इसमें ही इतना अधिक लिप्त हो जाएगा कि वह केवल शत्रुता, तृष्णा, वासना के बारे में ही सोचता रहेगा और अपना जीवन एक कूपमाण्डूक की तरह व्यतीत कर देगा।
जब इन बातों से मनुष्य ऊपर उठता है तब वह कर्मशील बनता है। जब तक कर्म कर्तव्य से जुड़ा रहता है तब तक वह कर्म सात्विक होता है और जीवन में संन्यास भाव कहलाता है लेकिन जब आसक्ति से जुड़ जाता है तब मनुष्य स्वतंत्रता प्राप्त करना है। अपनी इच्छा से जीवन का प्रत्येक क्षण जी सके इसी को संन्यास कहा गया हैं।
संन्यास भी एक प्रकार से कर्म का ही स्वरूप है। व्यक्ति के पिछले जन्मों के कर्म व्यक्ति की आत्मा के वासना संस्कार में जुड़े रहते हैं और इस जन्म में भी समय-समय पर व्यक्ति विशेष के साथ जुड़े होने वाले व्यवहार के आधार से कर्म ही बनते है। अब इसमें इस जन्म के कर्म जोड़ भी सकते हैं और इस जन्म के जो कर्म है उन्हें जुड़ने से रोक भी सकते हैं।
जो भी कर्म वासना रूप में स्मृति में रह जाता है वही तो बंधन है। चाहे वह प्रेम का बंधन हो, घृणा का बंधन हो, शत्रुता का बंधन हो अथवा मित्रता का बंधन हो, संतान के प्रति प्रेम का बंधन हो अथवा अन्य व्यक्तियों के साथ अलग-अलग प्रकार के सम्बन्ध हो क्योंकि कर्म तो एक क्षण भर की क्रिया है। एक बार जो बोल दिया, जो कर दिया वह कर्म बन जाता है। इस प्रकार कर्म तो समाप्त हो गया लेकिन उसका बंधन अपना संस्कार छोड़ जाता है और वह स्थायी रूप में चित्त में प्रतिष्ठित हो जाता है। आगे कि क्रियाएं जो करते हैं वह इसी कर्म की वासना के बंधन से करते है। आज से पन्द्रह वर्ष पहले किसी से शत्रुता हो गई अथवा किसी से मित्रता हो गई अथवा प्रेम हो गया अथवा घृणा हो गई उसे निभाते ही चलते जाते है तब जीवन में स्वतंत्रता कैसे आ सकती हैं।
गीता के बुद्धि योग में भी यही कहा गया है कि कर्म से फल की इच्छा निकालने का अर्थ यही है कि स्वयं को फलस्वरूप परिणाम से ना जोड़ा जाए। कर्म को केवल कर्म के रूप में किया जाए, क्योंकि इसमें संदेह ही नहीं है कि कर्म करे और उसका फल प्राप्त नहीं हो। लेकिन जब हम फल के बारे में ही विचार करते रहते है तो सही रूप से कर्म नहीं कर पाते। उसका सही रूप से फल भी नहीं मिल पाता।
संन्यास धर्म का विशेष विवेचन भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट रूप से किया है। उन्होंने कर्म को संन्यास से जोड़ा और कहा कि कर्म, अकर्म, विकर्म इन तीनों स्थितियों में से कर्म को छांटना पड़ता है। कृष्ण ने कहा कि कर्म को समझना चाहिए, विकर्म को समझना चाहिए और अकर्म को समझना चाहिए। उन सब में से कर्म अंश को निकालकर उपयोग में लाना चाहिए। इसलिए श्रीकृष्ण ने कहा है कि-
कर्मण्यकर्म चः पश्येचेदकर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान् मनुष्येषु नरः पापैर्विमुच्यते।।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म जो अकर्म देखें तथा अकर्म में जो कर्म देखे वह बुद्धिमान है। अकर्म ब्रह्म का नाम है तथा कर्म माया का नाम है। ज्ञान के आधार पर माया कर्म चलाती है। यह दृष्टि ही कर्म बंधन से छुडाने वाली होती है। यह श्लोक ही कर्मण्येवाधिकरास्ते—-का स्पष्टीकरण है जो कि ईशावास्य के मंत्र के आधार पर भगवान ने यहाँ स्पष्ट किया है।
मंत्र है-
अन्धं तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपास्ते।
ततोऽपि ते अंध तम य उ विधायां रताः।।
इस श्लोक से सीधा अर्थ है कि दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति के जीवन में मुक्ति का भाव नहीं आ सकता है। एक स्थिति में वह कर्म बंधन में दिन-रात लगा हुआ है और दूसरी स्थिति में वह ब्रह्म भाव में रात-दिन लगा हुआ है। एक घर-परिवार, समाज में जकड़ा हुआ है तो दूसरा केवल साधना-तपस्या में ही उलझा हुआ है। जबकि जीवन का वास्तविक उद्देश्य दोनों ही स्थितियों में स्वतंत्रता प्राप्त करना है। जब तक मानसिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती तब तक व्यक्ति का जीवन पशु की तरह ही बीतता है चाहे वह कैसे भी वस्त्र पहन लें, कैसा भी खान-पान कर ले। आंतरिक बुद्धि से ही और आंतरिक स्वतंत्रता से ही एक विशेष दृष्टि प्राप्त होती है। जिसे अंतर्चक्षु जागरण कहा गया है। यह चक्षु जाग्रत हो जाते है तो व्यक्ति स्वतंत्र हो जाता हैं।
इसीलिए हजारों वर्षों पूर्व महर्षि पाराशर ने संन्यास, संन्यासी और जीवन के दस नियम बताये। ये नियम व्यवहार में लाने योग्य नियम है और जो व्यक्ति इन नियमों का पालन करता है। वह संन्यासी बनकर जीवन का आंनद प्राप्त कर सकता है। वह छोटे गांव में रहें अथवा बड़े शहर में वह नौकरी व्यवसाये करें, वह स्त्री अथवा पुरूष हैं इसमें कोई अन्तर नहीं पड़ता।
इसीलिये महर्षि पाराशर कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति संन्यासी बन सकता है उसे जीवन में भागने की आवश्यकता नहीं है। उनके द्वारा दिये गये दस सूत्र हैं। 1- सार्व भौमिक सत्य, 2- ज्ञान कर्म और धन का प्रवाह, 3- ज्ञान कर्म और धन की दिशा, 4- फल की प्राप्ति, 5- नम्रता और शौर्य, 6- प्रभावशाली नेतृत्व, 7- स्त्री शक्ति का जागरण, 8- श्री, सरस्वती और शक्ति, 9- संगठन, 10- आत्मीयता।
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