





नित्य सुख ही मानव प्रयास का एकमात्र आदर्श है। जो मन के द्वारा शुद्ध है, जो शान्त है, जो अहंकार तथा ममता रहित एवं आत्मसंयमी है वही सारे पापों से मुक्त है। मनुष्य मां शक्ति की कृपा के द्वारा जीवन के परम पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। उसकी कृपा की प्राप्ति के लिए मानव को सदैव प्रयत्न करने रहना चाहिए। यहां तथा परलोक में सर्वत्र ही ऐसे साधक का कल्याण होता है। केवल मन को शिक्षित करने से साहस नहीं बढ़ेगा। हर अवसर पर व्यवहार में आने पर ही साहस की वृद्धि होगी। अभ्यास ये युक्त सुविकसित ज्ञान ही साधक को भय से मुक्त कर सकता है।
भय तो काल्पनिक असत्य वस्तु है। यह हर व्यक्ति की नैसर्गिक वृत्ति है, यहां तक की प्रकृति के तत्व, प्राणी, कीड़े तथा पृथ्वी के सभी भूत भय के वशीभूत हैं। यदि आप भौतिक अथवा आध्यात्मिक मार्ग में उन्नति करना चाहते हैं तो इस मन की व्याधि को अवश्य दूर भगाना होगा। भय पर विजय पा लेने पर मनुष्य सफलता के प्रशस्त मार्ग को प्राप्त करता है। भय पूर्ण वस्तुओं से मुक्त होने पर ही भय से मुक्ति मिल सकती है। मन को अनुशासित करना, अन्तरात्मा की शक्ति को व्यक्त करना, व्यावहारिक मामलों को हाथ में लेना, अपने ज्ञान को व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना-ये सभी भय पर विजय प्राप्ति के साधन हैं। ऐसा अनुभव करना चाहिए कि इस जगत में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जिससे साधक भय करे। आपको वीर, साहसी तथा शौर्य-सम्पन्न होना चाहिए।
भय ही दुख, हानि तथा अशान्ति का कारण है। डर की वृत्ति माता-पिता तथा कुल पर ही निर्भर है। यही इसकी व्यापकता का कारण है। वातावरण तथा शिक्षा का भी इसमें महत्वपूर्ण हाथ रहता है। अपने से अतिरिक्त किसी महती शक्ति का विचार ही भय का मुख्य कारण है। भयभीत होने पर मन का दृष्टिकोण सापेक्षतः बदल जाता है, मनुष्य की बुद्धि मारी जाती है, मन असन्तुलित हो जाता है, विचार तथा कार्यों में विषमता आ जाती है।
परन्तु भय पर विजय पायी कैसे जाय? जब कभी बच्चा भयभीत होता है तो आप कहते है कुछ भी डरने की वस्तु नहीं है। इस तरह आप भय की वस्तु का ही निषेध करते हैं। इस विधि में भी निषेध पहला कदम है। आप बच्चे को सत्य बात बतला देते हैं। इस तरह आप उसे समझा देते हैं कि उसकी कल्पना ने ही भय की भावना उत्पन्न की थी। आपको सत्य का निश्चय करना चाहिए। आपको इस ज्ञान का पूर्ण विकास करना चाहिए कि इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो भय उत्पन्न करे। साधारण दृश्य या विचित्र वाणी को सुनते ही चित्त अचंभित हो उठता है। अतः इस तरह की धारणा जमानी चाहिए कि ये सब वस्तुएं मिथ्या ही हैं तथा उनके परे के तत्व को जानना चाहिए। भय के पूर्णतः हट जाने पर कुछ भी आपको हानि नहीं पहुंचा सकता।
भय के निषेध से साधक भय की वस्तु पर ही विजय पा लेता है। आपको अपने मन में ही द्वैत को नहीं रखना चाहिए। आपको सदा विश्वप्रेम तथा विश्वबन्धुत्व का विकास करना चाहिए। शक्ति की गुरुता अथवा लघुता कहीं नहीं है। सुख-दुख कहीं नहीं है। कही भी भय नहीं है। यह प्रारम्भिक अवस्था है। सभी ब्रह्म के ही रूप है। सभी ब्रह्म में ही विलीन हो जाते हैं। इस नश्वर शरीर के साथ सारी आसक्ति का त्याग कर ताकि अर्न्वासी परमात्मा के साथ तादात्म्य सम्बन्ध स्थापित कर आप इस भावना का विकास कर सकते हैं। यह प्रक्रिया भय को पूर्णतः विदूर कर देती है तथा नित्य शान्ति को देने वाली है। अपनी आत्मा से भय की उत्पत्ति नहीं होती, आत्मज्ञान ही पूर्णतः भय को विनष्ट करता है। भक्ति-प्रधान साधक को ईश्वर में पूर्ण श्रद्धा रखनी चाहिए। उसे उसी की शरण में सर्व भाव से जाना चाहिए। पूर्ण विश्वास रहे कि ईश्वर ही एकमेव आश्रय तथा अवलम्ब है। आपको बहुत ही व्यावहारिक बनना चाहिए। जिनसे आप भयभीत है वीरता पूर्वक पहले उनका सामना कीजिए।
आपको ग्रन्थों में वर्णित सत्य के ऊपर विभिन्न व्याख्यानों पर ध्यान करना चाहिए। तभी आपका ज्ञान-नेत्र उन्मीलित होगा, आपको सन्मति प्राप्त होगी तथा आप सत्य को जान लेंगे। यही ईश्वर की पूजा है। यही ईश्वर की उपासना है। यहा आपको सभी बुराइयों से मुक्त करता है। मन से चिन्तन करते हुए, शरीर से अभ्यास करते हुए, सदा आध्यात्मिक विचारों पर मनन करते हुए तथा मन के उच्च स्तर में निवास करते हुए आप भय को तो दूर भगाएंगे ही, प्रत्युत ब्रह्म को भी प्राप्त कर लेंगें।
जिस तरह हिमालय तूफानों में अविचिलित रहता है उसी तरह ज्ञानी भी मान-अपमान, आदर-अनादर, लाभ-हानि, जय-पराजय से अविचलित रहता है। वह मनुष्य सुखी है जो गुरु की देख-रेख में है। वह मनुष्य सुखी है जो गुरु की सेवा करता है तथा उसके निकट ध्यान करता है। जो गुरु की सेवा करता है वह मार्ग जानता है। गुरु-कृपा के बिना जीवन मार्ग की सरलता की प्राप्ति नहीं हो सकती।
प्रेम, भक्ति तथा आत्म समर्पण के द्वारा ईश्वर के साथ योग प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग है। पूर्ण सच्चाई ही एकमेव शक्ति है जो आपको जीवन-लक्ष्य तक पहुंचाती है। शक्तियों की शक्ति, जो मन को शक्ति प्रदान करता है, ज्योतिषियों की ज्योति, जो मन को ज्योतित करता है, द्रष्टाओं का द्रष्टा, जो मन की वृत्तियों तथा कार्य-व्यापारों का साक्षी है, आधारों का आधार, जिस पर मन सुषुप्ति में विश्राम करता है, वह ईश्वर ही है।
ईश्वर जीवन, स्वास्थ्य, बल तथा शक्ति का उद्गम है। ईश्वर पर ध्यान करना ही सारी समस्याओं के लिए एकमात्र महौषधि है। मांसपेशियों की शक्ति बढ़ाना आपका लक्ष्य नहीं है। रोग रहित रह कर अपने जीवन को निरन्तर साधना ही आपका लक्ष्य है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,