





पुण्यशीला पावन क्षिप्रा के पूर्वी तट पर स्थित उज्जयिनी जिसकी गाथा पुराणों में भी वर्णित है, जो प्राचीनकाल से भारतीय संस्कृति और ज्ञान की गौरव केन्द्रीय स्थली है, जिसका वर्तमान नाम उज्जैन है, उस देव भूमि में यह विराट आयोजन है जहां स्थित है महाकालेश्वर भगवान् शिव का वह दिव्यतम ज्योर्तिमय स्थान और विराजमान है महाकालेश्वर ज्योर्तिलिंग-
आकाशे तारके लिंग पाताले हाटकेश्वरः
मृत्युलोके महाकालः लिंगत्रय नमोऽस्तुते।
भगवान शिव तो तंत्र, मंत्र और यंत्र के आदि रचयिता हैं, जिनकी हर लीला निराली है, जो त्याग और आनन्द की प्रतिमूर्ति है। देव और दानवों ने सागर मंथन किया, लक्ष्मी मिली विष्णु को, उच्चैश्रवा ऐरावत इन्द्र को और भी सारे विविध रत्न अन्य देवताओं को, लेकिन विश्व को ग्रस लेने को उद्यत हलाहल विष विश्व रक्षार्थ शिव ने अपने कंठ में उतार लिया। शिव एक महान् प्रेमी, शिव सभी ललित कलाओं के देवता शिव एक वत्सल पिता, शिव एक अपरिग्रही वैरागी, प्रेम में आकंठ डूबे हुए भी वीतराग शिव का निवास हिमालय, ऐसे महाप्रभु की हर लीला निराली है। शिव जो दानी है जो प्रसन्न होकर हर भक्त को वरदान देते हैं। शिव ही देव हैं जो विधाता के लिखे लेख के विरूद्ध जो कुछ अदेय है सहज ही उसे प्रदान कर देते हैं।
जो काल से परे है, और जो व्यक्ति काल से ग्रसित है जिसकी आयु क्षीण हो गई है जो शारीरिक कष्टों से पीडि़त है उसे भी काल से छीन कर केवल शिव ही आयु प्रदान करते है। जो देवताओं के भी देव है, और राक्षसों के भी देव है, जो गृहस्थ के भी देव हैं और सन्यासियों के भी देव हैं ऐसे शिव की महिमा को बारम्बार प्रणाम।
इस महान शिवलिंग को यदि कोई शांत मन से एक दृष्टि से एकटक होकर देखे, तो उसे कुछ समय में ऐसा लगने लगेगा मानों शक्ति का प्रवाह शिवलिंग से प्रवाहमान हैं, और साधक अपना भूतकाल तो क्या पूर्व जन्म तक देखने में समर्थ हो सकता हैं।
इस शिवलिंग को उच्चकोटि के साधक सूक्ष्मता से देखें तो उसके चारों पार्श्व में विभिन्न स्तोत्र अंकित किये हुए हैं। उत्तर पार्श्व में श्रीसूक्त, पश्चिम में इन्द्रकृत स्वर्णावती स्तोत्र, दक्षिण पार्श्व में रावण कृत तांत्रोक्त कुबेर लक्ष्मी स्तोत्र एवं पूर्व पार्श्व में स्वर्ण लक्ष्मी सिद्धि प्रद स्तोत्र अंकित हैं। वाणी, कूप और तालाब में स्नान से पुण्य प्राप्त होता हैं। उससे अधिक पुण्य नदी में स्नान करने से प्राप्त होता है। नदियों में ताप्ती मे नहाने से दशगुणा पुण्य प्राप्त होता है। ताप्ती से गोदावरी, नर्मदा, गंगा में नहाने से उत्तरोत्तर दश गुणा पुण्य प्राप्त होता है। इन सबसे दशगुणा क्षिप्रा में स्नान करने से पुण्य प्राप्त होकर पाप का नाश होता हैं। इसलिए क्षिप्रा पापनाशिनी कहलाती है।
पौराणिक मान्यता है कि ‘मंगल, शनि ग्रह की शांति’, ‘ऋणमुक्ति और धन वैभव लक्ष्मी कामनापूर्ति हेतु’ सिद्ध स्थान क्षिप्रा के तट पर मंगल शनि नाथ का मन्दिर है। इसके आगे पीलिया खाल क्षिप्रा में मिलता है, जिसे खर्गता संगम कहते है। मंदिर एक टीले पर बना हुआ हैं मदिर में मंगलनाथ का धातु से निर्मित लिंग है। इसके पीछे बाल रूप में उमा तथा गणेश जी की मूर्तियां है। इस मन्दिर के उत्तर में मंगलनाथ की माता भोमेश्वरी का मंदिर है।
जो मनुष्य साधक शनिवार को क्षाता नदी के क्षिप्रा में संगम स्थान पर वहां स्थित नवग्रह मंदिर में स्थिति शनिदेव की पूजा करता है, उसे शनि की दशा से मुक्ति मिलती है। तीन प्राचीन नदियां- नर्मदा, चर्मण्वती और क्षाता अमरकण्टक से निकली हैं। क्षाता यहां वह क्षिप्रा में मिल गई। उस तीर्थ को क्षाता-सगंम कहते हैं। यहां सूर्य भी चिंता मुक्त हुए थे।
‘कालसर्प योग शांति’, ‘नागबलि-नारायण बलि’ के लिए सिद्ध तीर्थ-सिद्धवट भैरव क्षेत्र में स्थित सिद्धवट का वही महत्व है जो गया तथा प्रयाग में अक्षयवट का है। स्कन्दपुराण में वर्णन है कि कार्तिकेय ने तारकासुर का वध करने के बाद अपनी शक्ति यहां क्षिप्रा में फेकी थी जो पाताल चली गई इसलिये इसे शक्तिभेद तीर्थ भी कहते हैं। नदी में स्नान कर तर्पण करने से सृष्टि में व्याप्त पितरों को तृप्ति होती है। क्षिप्रा के तट पर तथा उसके-पास अनेक तीर्थ हैं जैसे-सुन्दर कुण्ड, पिशाचमोचन, नीलगंगा, कर्कराज, गया तीर्थ, गोमती कुण्ड, धर्मराज सर, त्रिवेणी पर शनितीर्थ, च्यवनाश्रम, नागालय, पुरूषोत्तम मन्दिर आदि। इस पृथ्वी पर क्षिप्रा स्वर्ग में ज्वरघ्नी, महाद्वार में पापघ्नी और पाताल में अमृतसम्भवा कहते हैं।
महाकाल क्षेत्र में यात्रान्तर्गत तीर्थों का पुण्यफल वर्णन इस प्रकार हैं।
1- जो मनुष्य वटयक्षिणी की पीले फूल से पूजा करता है उसे सिद्धि प्राप्त होती ही है।
2- पिशाचमुक्तेश्वर में स्नान करने से मनुष्य के कुल की पिशाच-योनि से मुक्ति हो जाती है।
3- क्षिप्रा स्थित गुहेश्वर के दर्शन से मनुष्य के सब पाप इस प्रकार दूर हो जाते हैं, जैसे साँप की केंचुली साँप से अलग हो जाती है।
4- जो मनुष्य क्षिप्रा-स्नान कर गुरु के निर्देश से मंत्र जाप करता है वह यमलोक से मुक्त होकर रुद्रलोक को प्राप्त होता हैं।
5- क्षिप्रा स्नान कर जो हवन पूजन करता है उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता हैं।
6- क्षिप्रा के जल से महादेव का अभिषेक करने से मनुष्य की व्याधिया समाप्त होती हैं।
7- क्षिप्रा जल से तर्पण करने से पूर्वजों की आत्मा मुक्त होकर सिद्धाश्रम में प्रवेश करती हैं।
8- महामाया के दर्शन पूजन से भक्त या साधक सभी तरह के भौतिक सांसारिक सुखों की प्राप्ति में सर्वेसर्वा महामाया युक्त हो जाता हैं। जीवन द्वैष व वैमनष्यता शत्रुता विहीन हो जाता है।
9- तीन या पांच दिन तक साधना, पूजन, मंत्र जाप, करने से साधनाओं में सिद्धियां प्राप्त होनी प्रारम्भ होती हैं।
लक्ष्मी गौरी के तेजमय श्रेष्ठ मुहूर्त पर रविपुष्य योग, कालाष्टमी, शक्ति दिवस से आपूरित दिवसों पर वह भी उज्जैन में सद्गुरुदेव के सानिध्य में पांच दिवसीय साधना शिविर में समर्पित साधक और शिष्य जीवन की दुर्भिक्षता, न्यूनता, गरीबी, रोग-शोक, से युक्त जीवन के दोष, पाप, कष्ट, पीड़ा निवारण हेतु आध्यात्मिक साधनात्मक वातावरण में दिव्य पवित्र तपोभूमि पर साधना, आराधना, पूजा-अर्चना, स्तुति, वन्दना, आदि कर सकेगें। उस महादेव की जो वहां साक्षात् स्वरूप में विराजमान हैं। उज्जैन में सर्वथा प्रथम बार महाकालेश्वर धाम में दिव्यतम आयोजन होगा। जब जीवन के पुण्य उदय होते हैं तब ही ऐसे पूर्ण आत्मिय चैतन्ययुक्त साधनात्मक शिविर में साधक साधना संपन्न सकेगें, और ऐसे आयोजनों में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हो सकेगा।
समय चक्र की गति किसी के लिये नहीं रूकती, श्रेष्ठ अवसर का सही समय पर सदुपयोग करने से पूरे परिवार सहित इसमें भाग लेकर भौतिक सुखों की प्राप्ति एवं आध्यात्मिक साधनाओं में पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकेगें।
कैलाश सिद्धाश्रम साधक परिवार ने इस आयोजन को सम्पन्न करने का जिम्मा उठाया है तो सभी पत्रिका पाठकों, साधकों, शिष्यों से आग्रह है कि वे अपना पंजीकरण शीघ्र करायें। जिससे उनसे सम्बंधित साधनात्मक चैतन्य सामग्री और ठहरने, भोजन, प्रसाद, विश्राम की सुव्यवस्था की जा सकें।
24 अक्टूबर 2013 गुरुवार को सायं काल तक उज्जैन पहुँचना अनिवार्य है। देश के प्रत्येक शहर से उज्जैन पहुंचने के लिए एक्सप्रेस और सुपरफास्ट बस, रेलगाड़ीयों की सुगम व्यवस्था है।
24 अक्टूबर शारीरिक मानसिक आत्मिक शुद्धि के साथ साधनात्मक शिविर का प्रारम्भ।
25 अक्टूबर क्षिप्रा नदी में गुरुदेव के सानिध्य में स्नान, पिण्ड दान, तर्पण और कालसर्प मुक्ति साधना।
26 अक्टूबर प्रत्येक साधक द्वारा नवग्रह और शिव शक्ति दुर्गा मंत्रों से आपूरित नागबली-नारायण बलि यज्ञ हवन।
27 अक्टूबर मंदिर प्रागण में प्रत्येक साधक द्वारा दुग्ध युक्त महाकालेश्वर रुद्राभिषेक।
28 अक्टूबर उदय कार्तिकेय दिवस पर परमहंस स्वामी सद्गुरुदेव द्वारा शक्तिपात दीक्षायं।
इसके साथ ही नित्य प्रतिदिन योगा, प्राणायाम, मंत्र-जप, साधना पूजा, प्रवचन, भजन आरती सम्पन्न होगी। साथ ही दोनों समय सात्विक प्रसाद और भोजन की व्यवस्था गुरुदेव द्वारा प्रदान की जायेगी।
पूर्व में ही ऐसी व्यवस्था कर आये कि 28 अक्टूबर सांध्य आरती के बाद सीधे घर को प्रस्थान कर सकें जिससे की गुरुदेव के सानिध्य में पवित्र दिव्य अलौकिक स्थानों पर जो साधना, योगा, प्राणायाम, मंत्र जाप, पूजन, हवन, दीक्षा, अभिषेक सम्पन्न किये है उसका पूरा लाभ आप को जीवन भर अक्षुण्ण बना रहे। इसीलिए इधर-उधर ना भटक कर सीधे घर को लौटना श्रेयष्कर रहता है।
वे ही पंजीकरण करवायें जो भगवान महादेव की अमृतरूपी चेतना और गौरी स्वरूपा लक्ष्मी शक्ति से अपने आप को आपूरित करना चाहते है।
केवल पति-पत्नी द्वारा सयुक्त रूप से शिविर में भाग लेने पर शुल्क में रियायत सम्भव हैं।
जो अपनी स्वयं की बुद्धि-ज्ञान और विवेक से जीवन में कर्मशील रहते हैं। अपने स्वयं के निर्णय से ही जीवन में क्रियाशील रहते है।
पूर्व में ही पंजीकरण अनिवार्य हैं। जिससे की आप ही से सम्बन्धित साधना सामग्री मंत्र सिद्ध चैतन्य की जा सकें। (पंजीकरण शुल्क: (15000) (Rs. Fifteen Thousand Only)
महाकाल मंदिर प्रांगण उज्जैन में ही DORMITORY अर्थात हॉल में सामूहिक रूप से ठहरने और विश्राम की व्यवस्था की गयी है जिससे पारिवारिक और आत्मिक वातावरण बन सकें।
दोनों समय सात्विक भोजन-प्रसाद, चाय, साधना सामग्री पूजन हवन, अभिषेक, दीक्षा, पवित्र क्षिप्रा नदी में स्नान मंत्र जप दीक्षा का शुल्क सम्मिलित हैं।
शिविर स्थलः- श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रांगण उज्जैन (म- प्र-)
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,