





शुभाशीर्वाद
मन सारा समय विचारों के प्रवाह में बहता रहता हैं, कई बार तो बिल्कुल ही विसंगत विचार आते रहते हैं। एक दूसरे से उनका किसी भी तरह सम्बन्ध नहीं होता है, पर फिर भी विचार तो आ ही रहे हैं। यह विचारों का प्रवाह चलता ही रहता है, चलता ही रहता है। ऐसे विचारों से भरे हुए मन का ध्यान MEDITATION में थोड़ी देर ठहर जाना, बहुत बड़ी बात हैं।
आपने भी यह महसूस किया होगा, बस में, ट्रेन में सफर करते हुए या किसी पब्लिक जगह पर कोई बच्चा आपके पास अचानक आ जाए, वह घुटने पर हाथ रखकर आपकी ओर देखता रहे, देखकर हँसने लग जाए, तो उसकी उस हँसी में, उसके उस तरह आपके पास आकर आपको छूने में आपको कितना आनन्द और खुशी की अनुभूति होती हैं।
उस बच्चे को इससे कोई मतलब नहीं है कि आप कौन हो। उन्हें अगर कोई अच्छा लगे, तो झट से उसके पास जाते हैं उन्हें अगर मौका मिल जाए, तो किसी के भी पीछे घूमते रहते हैं। बालक जैसे निर्दोष हो जाओ। मनुष्य अगर बच्चे से कुछ सीख लेता है, क्योंकि वह सरल है, मासूम है, निर्दोष है, उसमें सीखने की हर समय प्रवृत्ति होती हैं। ठीक उसी तरह आपके ध्यान की गहराई जितनी बढ़ती जाएगी, तुम्हारे भीतर का बच्चा उतना ही बाहर आने लग जाएगा। आप उतने ही सहज, सरल और मासूम होने लग जाओगे।
गुरु निश्चित होकर प्यार और भरोसा करता है, इसीलिए तो वह गुरु है। गुरु निश्छल और सरल होकर अपने बालक की तरह शिष्य से प्यार करता हैं भले ही शिष्य के भीतर कितना ही मलिन भाव हो गुरु के प्यार के फलस्वरूप ही उसकी मलिनता गलने लगती हैं और उतरोतर शिष्य उच्चता की ओर अग्रसर होता रहता हैं। मनुष्य के जीवन में श्रेष्ठता और पूर्णता प्राप्ति के लिए परिर्वतनकारी समय आता ही है, किन्तु सामान्य मनुष्य उसके आगाज से अनभिज्ञ रहता है। आलसी व्यक्ति अवसर की प्रतीक्षा करते-करते ही सारी उम्र व्यतीत कर देते हैं और उन्हें कभी भी स्वयं की अज्ञानता से उपयुक्त अवसर की प्राप्ति नहीं होती। जबकि बुद्धिमान व्यक्ति हर क्षण को अमूल्य समझकर व्यर्थ नहीं जाने देता। बुद्धिमान व्यक्ति की तरह साधक को समय के छोटे-छोटे क्षण का मूल्य एवं महत्त्व समझना चाहिए। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वाले को चाहिए कि वे अपने किसी भी काम को टालने की प्रवृत्ति न रखकर उसे आज ही सम्पन्न करें। शारदीय नवरात्रि का प्रारम्भ त्रिवेणी संगम इलाहाबाद नवदुर्गा शक्ति साधना महोत्सव के रूप में सम्पन्न होगा और इस महा पर्व की पूर्णता मर्यादा पुरूषोत्तम राम की जन्म भूमि पुरूषोत्तम शक्ति साधना से हो सकेंगी। इस नवरात्रि महापर्व में शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी शक्तिरूपेण कात्यायनी साधना, चन्द्रघण्टेती ललिताम्बा साधना, गौरी लक्ष्मी मांतगी साधना और त्रिपुर सुन्दरी साधना को पूर्ण आत्मसात करने के श्रेष्ठतम दिव्य दिवस हैं।
साधक के जीवन में सफलता के लिए जहाँ परिश्रम और पुरूषार्थ की आवश्यकता होती है, वहीं समय का सामंजस्य भी आवश्यक है। श्रम तभी संपत्ति बनता है, जब वह समय में संयोजित कर दिया जाता है और समय तब ही संपदा के रूप में संपन्नता एवं सफलता ला सकता है, जब उसका श्रम के साथ सदुपयोग किया जाता है। कर्मयोग से मल, भक्तियोग से विक्षेप तथा ज्ञानयोग से जीवन की विषमता दूर होती है। किसी एक योग को आधार बना लेना श्रेयष्कर रहता हैं तभी जीवन में समन्वयता का योग निर्मित करता हैं। उज्जैन की पावन भूमि इसलिए चेतना युक्त है क्योंकि समुद्र मंथन से निकले अमृत की बूंदों से यह धरती पावन बन पाई हैं इसीलिए महाकुंभ पर्व सम्पन्न होता हैं, इसी दिव्य भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने सांदीपन ऋषि से दीक्षा ग्रहण कर गुरु की चेतना से ही योगेश्वर स्वरूपमय बन पायें। केरला प्रान्त के रहने वाले शंकराचार्य ने गोविन्दपादाचार्य जी से ज्ञान प्राप्त कर पुराणों,उपनिषदों की रचना के साथ चार मठो की स्थापना की, कालीदास ने यही पर ज्ञान चेतना प्राप्त कर महान कवि और रचनाकार के ज्ञान से सरोबार हो पायें। ऐसी दिव्यतम तेजमय अलौकिक भूमि पर कार्तिक लक्ष्मी मास में विशिष्ठ तरह की साधनायें और चिंतन को आत्मसात करने से साधक का जीवन योगमय शंकर युक्त बनने की क्रिया की ओर अग्रसर हो सकेंगा।
24 अक्टूबर से 28 अक्टूबर पंच दिवसीय कुबेर वैभव लक्ष्मी महाकाल शक्ति साधना महोत्सव का आयोजन महाकालेश्वर मंदिर प्रांगण उज्जैन (म-प्र-) में स्वामी सच्चिानन्द जी महाराज के दिव्य आशीर्वाद और सद्गुरुदेव के सानिध्य में सम्पन्न होगा जिससे साधक प्रतिदिन योगा प्राणायाम, मंत्र जाप, साधना पूजा, स्नान, पूर्वजों के पिण्ड दान और तर्पण क्रिया को सम्पन्न कर नवग्रह शिव-शक्ति दुर्गा मंत्रों से आपूरित यज्ञ हवन और महाकालेश्वर रूद्राभिषेक सम्पन्न कर दिव्यतम शक्तिपात दीक्षाओं को आत्मसात कर सकेंगें। इस क्रिया से नारायण, शिव-गौरी शक्ति को आत्मसात कर जीवन की विषमताओं और न्यूनताओं और विषपूर्ण स्थिति को पूर्णरूपेण समाप्त कर सकेंगें।
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