





ऊँ न कर्मणा न पृजयाघनेन त्यागैनैके अमृततत्व मानषुः
परेण नाक निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति।
वेदांत विज्ञान सुनिश्चितार्था सन्यासयोगाद् यतः शुद्ध सत्वा
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यति नारायण सर्वे।।
उपरोक्त श्लोक में जहां ‘त्याग’ कहा गया है वहां वास्तव में त्याग का तात्पर्य भौतिक अर्थों में धन सम्पदा अथवा परिवार का त्याग नहीं अपितु मन, कर्म वचन से गुरु-चरणों में ‘सर्मपण’ का ही भाव है, और यही संन्यास की भी आधारभूत भावभूमि होती है। इसका कोई अर्थ नहीं है कि संन्यास गेरूए वस्त्र के साथ अथवा बिना गेरूए वस्त्र का है, मुख्य बात तो उस समर्पण की है जो साधक ने गुरुचरणों में किया होता है। ‘सम्यक’ रूप से जो कुछ भी गुरु के प्रति ‘न्यस्त’ किया गया हो वही संन्यास है, शास्त्रों में गुरु-आज्ञा को सर्वोपरि कहा गया है। संन्यास तो स्वयं में प्रत्येक बद्धता से मुक्त होने की क्रिया है, जीवन के व्यर्थ के लाग-लपेट को छोड़ देने की घटना है, चित्त को उन्मुक्त करने का प्रयास है और ऐसा सब कुछ निश्चय ही किसी परिभाषा में बद्ध नहीं हो सकता।
श्लोक का अर्थ है कि उस गुरु तत्व, उस परम तत्व को न कर्म के आधार पर, न सेवा के आधार पर, न प्रज्ञा के आधार पर अपितु केवल त्याग की भावना के आधार पर ही प्राप्त किया जा सकता है। मुनिजन अपनी हृदय रूपी गुहा में प्रविष्ट होकर जिस परम तत्व का ध्यान करते है, जिसे वेदान्त एवं विज्ञान के आधार पर परब्रह्म कहा गया है, जिसको केवल संन्यास एवं योग के आधार पर ही जीवन में प्राप्त किया जा सकता है- यही उपरोक्त श्लोक का मूल भाव है। पुष्पांजलि अर्पण तो केवल बाह्य पक्ष है, गूढ़ तथ्य तो यह है कि जब साधक स्वयं संन्यस्त भाव के माध्यम से, पुष्प के समान निर्मल और सुरभित होकर गुरु-चरणों में स्वयं का विसर्जन कर देता है, तभी वह उस ब्रह्मलोक को प्राप्त कर सकता है, जिनको प्राप्त करने के पश्चात ही मनुष्य मलिनता और दूषितता के चक्र से मुक्त हो पाता है।
यह विडम्बना है कि आज संन्यास गेरुए वस्त्र पहनने का ही पर्याय हो गया है, किन्तु इस प्रकार का निर्देश न तो पूज्य सद्गुरुदेव ने कभी दिया और न ही शास्त्रों में ही गेरूए वस्त्र पहनने को अथवा घर- परिवार छोड़ देने को संन्यास कहा गया है। गेरुए वस्त्र तो केवल एक बाह्य उपादान होते है संन्यास ग्रहण करने वाले साधक के लिए, जिससे उसे यह सदैव स्मरण रहे कि उसने अपने सम्पूर्ण जीवन को गुरु के प्रति अथवा ज्ञान-प्राप्ति के प्रति अर्पित कर दिया है। जहां साधक इसी जगत में रहता हुआ, गृहस्थ जीवन जीता हुआ भी चित्त से सदैव उन्मुक्त रहता है।
यह चित्त से उन्मुक्त रहना ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि होती है। न केवल आध्यात्मिक जीवन के लिए वरन भौतिक जीवन के लिए भी चित्त का उन्मुक्त होना ही सर्वश्रेष्ठ स्थिति है। चित्त से उन्मुक्त रहने वाला व्यक्ति ही इस जगत के व्यर्थ के द्वन्द्वों से मुक्त रह सकता है। जिसे निर्विकार मन कहा गया है वह स्थिति भी चित्त के उन्मुक्त होने के पश्चात जीवन में समाहित हो सकती है। जिसे कमल पत्रवत जीवन कहा जाता है, वह भी इसी चित्त की उन्मुक्ति और बौद्धिक संन्यास की प्राप्ति के बाद सम्भव हो पाता है और ऐसा उन्मुक्त व्यक्ति ही जीवन के भौतिक सुखों का उपभोग कर सकता है।
यूं तो सामान्य गुरु, व्यक्ति को केवल आसक्ति छोड़ने और ममता त्यागने जैसे घिसे-पिटे उपदेश ही दे सकता है लेकिन जो सद्गुरु होते है उनकी दृष्टि में जीवन का कोई भी पक्ष उपेक्षणीय नहीं होता है। यदि जीवन ही आधा अधूरा रह गया तो उसका क्या लाभ? गुरु-चरणों में खिले हुए, मुस्कुराते हुए और सुगन्ध को बिखरते हुए पुष्प ही चढ़ाए जाते है, न कि बासी, मैले-कुचले हुए अथवा अर्ध विकसित पुष्प।
संन्यास, जीवन रूपी पुष्प के न केवल प्रस्फुटन, अपितु पूर्ण विकास को ही सम्भव करने की घटना होती है और जब ऐसे खिले हुए पुष्प रूपी शिष्य आकर गुरु-चरणों में अत्यन्त हर्ष और उल्लास से लिपट जाते है, तभी गुरु को पूर्ण प्रसन्नता व तृप्ति होती है।
संन्यास की सम्पूर्ण व्याख्या को न केवल गुरु चरणों में बैठ कर समझा ही जा सकता है, अपितु जीवन में उतारा भी जा सकता है। ऐसा करना शिष्य का केवल कर्तव्य ही नहीं है, वरन उसके लिए अत्यावश्यक धर्म भी है क्योंकि प्रत्येक साधना का सृजन संन्यस्त भाव भूमि को ध्यान में रख कर ही हुआ है। कोई भी साधक जब साधना के क्षेत्र में प्रविष्ट होता है, उन क्षणों में एक ‘संन्यासी’ होता है।
कैसे साधक अपने नित्य के जीवन को यथावत जीते हुए भी साधना के क्षणों में ‘संन्यासी’ बन सकें? कैसे उसके जीवन में बौद्धिक संन्यास की वह भावभूमि समाविष्ट कर सके जो अपने आपमें आनन्द की पराकाष्ठा कही गई है ? जिसमें यह बन्धन नहीं है, कि आप क्या थे? संन्यास तो वह तत्व है कि आप क्या बनने जा रहे है, संन्यास तो अन्तर्मन में नवीन ज्योति जगाने की प्रक्रिया है। जीवन में जो भी बनें, आप सभी शिष्य-साधक अद्वितीय बनें, सामान्य जीवन जीना तुम्हारे लिए उचित नहीं है, क्योंकि सामान्य जीवन जीने के लिए तुम पैदा भी नहीं हुए हो।
गृहस्थ मर सकता है, संन्यासी कभी मरता नहीं, संन्यासी न्यूनताओं में जीवित नहीं रहता, वह किसी से कुछ मांगता नहीं, वह सीधे गुरु-ज्ञान से प्राप्त करता है। मैं तो आपको अधिक से अधिक राजसी बनाना चाहता हूं, अधिक से अधिक सम्पन्न बनाना चाहता हूं, जिससे आप में कोई कमी न रहें।
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