





भगवान कृष्ण ही सौन्दर्य प्रदायक पुरूषोत्तम हैं, कृष्ण की आकर्षण प्रदायक मन्मथ, कृष्ण ही सम्मोहन, वशीकरण के देव केशव हैं, इच्छा पूर्ति गोविन्द हैं, कृष्ण ही शत्रुबाधा, ग्रहबाधा, विजय सिद्धि प्रदायक मधुसूदन, देवेश जर्नादन हैं। कृष्ण का ही स्वरूप ऋषिकेश स्वरूप है जो पूर्ण गृहस्थ सुख प्रदायक है। कृष्ण साधना से ही श्रेष्ठ संतान प्राप्ति होती है और उस रूप में वे बाल गोपाल कहे जाते हैं। ऐसे भगवान श्रीकृष्ण की साधना के लिए जन्माष्टमी पर्व और एक प्रकार से पूरा भाद्रपद श्रेष्ठ मुहूर्त कल्प है।
श्रीमद्भागवत् के अनुसार भगवान हजारों रूपों में समुद्र की लहरों की भांति प्रकट होते हैं। वे लीलाधारी युग पुरूष, मन्वंतर पुरूष और शक्ति वेश आदि रूप में प्रकट होते हैं। ये सभी अवतार सांसारिक रूप में उस समय की स्थितियों के अनुकूल क्रिया करते हैं और इनका कार्य केवल एक ही होता है कि संसार में भटके हुए प्राणियों को पुनः श्रेष्ठ मार्ग पर लाना तथा संसार में चल रही विभ्रम की स्थिति और राक्षसी प्रवृत्तियों का नाश कर पुनः सुकर्म धर्म की स्थापना करना।
पुराणों के अनुसार स्वयंभूत मनु के काल में प्रजापिता स्तूप एवं उनकी पत्नी त्रष्णी को ब्रह्मा से विशेष आज्ञा प्राप्त हुई और उन्होंने कई वर्षों की तपस्या की तथा उन्हें तीन वरदान प्राप्त हुए और उन्होंने यही वर प्राप्ति की कि हर युग में भगवान उन के यहां जन्म लें। सतयुग में त्रष्णी गृभा के रूप में, त्रेतायुग के पूर्व काल में आदित्य और कश्यप के गर्भ से वामन देव के रूप में तथा त्रेता युग के ही उत्तर काल में दशरथ और कौशिल्या के गर्भ से राम के रूप में तथा द्वापर युग में वासुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में भगवान कृष्ण ने अवतरण किया।
इसके साथ ही एक कथा यह भी आती है कि जब पृथ्वी भू-देवी पाप और अत्याचारों से अत्यन्त व्यथित हो गई और पूरे भूमण्डल पर अत्याचार बढ़ने लगे, यज्ञ और धर्म की हानि होने लगी तब पृथ्वी ने गौ माता का रूप धर प्रजापिता ब्रह्मा की प्रार्थना की। ब्रह्मा ने सभी देवी-देवताओं के साथ श्वेत दीप पर पुरूष सूक्त के श्लोकों से भगवान विष्णु की प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर यह वरदान दिया कि मैं शीघ्र ही यदुवंश में कृष्ण के रूप में अवतरित होकर पृथ्वी को पाप से मुक्त कराऊंगा तथा पुनः धर्म का राज्य स्थापित होगा।
इसी रूप में द्वापर युग में भाद्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्द्ध रात्रि को रोहिणी नक्षत्र में भगवान का अवतार हुआ। यह रात्रि कालरात्रि से भी महान् रात्रि है जहां भगवान का वास्तविक रूप से प्रकटीकरण हुआ। कृष्ण भगवान ही षोडश कला सम्पन्न विष्णु के पूर्ण अवतार स्वरूप हुए हैं, जिनके जीवन के प्रत्येक दिन एवं घटना का विधिवत् वर्णन मिलता है। भगवान कृष्ण का नाम भक्तवत्सल कहा गया है। क्योंकि वे भक्तों के हृदय में निवास करते हैं और भक्त भगवान के हृदय में निवास करते हैं।
कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उस दिन भगवान कृष्ण का अवतरण हुआ था, अपितु कृष्ण जन्माष्टमी एक विशेष मुहूर्त है जब कृष्ण पक्ष आधा बीत चुका होता है और आधा बाकी रहता है। अर्द्धरात्रि का समय सामान्य रूप से काल समय माना गया है। उस काल समय में नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों की स्थिति एक विशेष प्रकार से होती है। केवल आरती, भजन करने से कृष्ण जन्माष्टमी पर्व नहीं मनाया जा सकता, अपितु उस समय विधि-विधान सहित पूजन कर, संकल्प लेकर जो तांत्रोक्त- मांत्रोक्त क्रिया सम्पन्न की जाती है, वह महत्वपूर्ण है।
जन्माष्टमी के निमित्त भगवान कृष्ण के विशिष्ट पूजन की सभी सामग्री एकत्र कर लें। रात्रि या प्रातः जब भी आप पूजन करना चाहें, स्नान करके पूजा कक्ष में पीला या कृष्णमयी आसन बिछाकर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें। अपने सामने चौकी के ऊपर श्वेत वस्त्र बिछा दें, उस पर भगवान कृष्ण का चित्र अथवा उनकी प्रतिमा स्थापित करें। अपनी बाईं ओर धूप और दीप जला लें। इसके बाद हाथ जोड़कर भगवान गणपति का स्मरण करें-
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः।।
धूम्रकेतुर्गणाध्क्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि।।
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विध्नस्तस्य न जायते।।
संकल्प- दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प तथा कुंकुम लेकर पूजन का संकल्प करें। संकल्प के पश्चात् जल को भूमि पर छोड़ दें।
कलश पूजन-पंचपात्र में जल भरकर अपनी दायीं ओर स्थापित करें व उसमें वरूण देवता का आवाहन करें-
सर्वेसमुद्राः सीरतस्तीर्थानि जलदा नदाः।
आयान्तु देव पूजार्थं दुरितक्षयकारकाः।
इसके बाद ‘वं वरूणाय नमः’ मंत्र बोलते हुए गन्ध, अक्षत व पुष्प को कलश में डाल कर तीर्थों का आवाहन करें-
गंगे च यमुने चैव गौदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सिन्नधिं कुरू।।
प्रसन्नो भव। वरदो भव। अनया पूजया
वरूणद्या वाहिता देवता प्रीयन्तां न मम।
पवित्रीकरण- इसके बाद पंचपात्र के जल को आचमनी से बायें हाथ में लेकर दायें हाथ से अपने ऊपर छिड़कते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
ऊँ अपवित्रः पवित्रे वा सर्वास्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षः सः बाह्याभ्यतरः शुचिः।।
गुरुपूजन-दोनों हाथ जोड़कर गुरुदेव का ध्यान करें-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुदेवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
इसके बाद गन्ध, अक्षत, पुष्प तथा धूप-दीप से पंचोपचार पूजन करें। फिर सामने चौकी पर भगवान गोविन्दम् यंत्र स्थापित करें तथा षोडशोपचार पूजन करें-
ध्यान
वंशी विभूषित करान्नव नील दाभात्,
पीताम्बरादरूण बिम्ब फलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादर बिम्ब नेत्रत्,
कृष्णात् परं किमपि तत्त्वमहं न जाने।।
श्रीकृष्णाय नमः ध्यानं समर्पयामि।
आसन- पुष्प लेकर किसी थाली में आसन के रूप में
गोविन्दम् यंत्र पर समर्पित कर निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्व शान्तिकरं शुभं,
आसनं च मया दत्तं गृहाण परमेश्वर।
श्रीकृष्णाय नमः आसनं समर्पयामि।
पाद्य- दो आचमनी जल यंत्र पर चढ़ा दें-
गंगोदकं निर्मलं च सर्व सौगन्ध्य संयुतम्,
पाद प्रक्षालनार्थाय दत्तं ते प्रतिगृह्यताम्।
श्रीकृष्ण नमः पाद्यं समर्पयामि।।
अर्घ्य- किसी पात्र में जल लेकर, उसमें कुंकुम तथा अक्षत मिलाकर अर्घ्य प्रदान करें-
अर्घ्यं गृहाण देवेश गन्ध पुष्पाक्षतैः सह,
करूणा कर मे देव गृहाणाऽर्ध्यं नमोऽस्तुते।
श्रीकृष्णाय नमः अर्घ्य समर्पयामि।
आचमनीय- आचमनी से तीन बार जल यंत्र पर चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
सर्व तीर्थ समानीतं सुगन्धिं निर्मलं जलं,
आचम्यतां मया दत्तं गृहाण परमेश्वरं
श्रीकृष्ण नमः आचमनीयं समर्पयामि।
मधुपर्क- कांसी अथवा चांदी के पात्र में मधु,
घृत, दही मिलाकर यंत्र पर चढ़ायें-
इदं मधुपर्क श्रीकृष्णाय निवेदयामि नमः।
स्नान- आचमनी से जल चढ़ाते हुए निम्न मंत्र उच्चरित करें-
वृन्दावन विहारेण श्रान्ते विश्रान्ति कारकं।
चन्द्रपुष्कर पानीयं गृहाण पुरूषोत्तम।।
श्रीकृष्णाय नमः स्नानं समर्पयामि।
वस्त्र- निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए उत्तम कोटि का पीला वस्त्र तथा उत्तरीय वस्त्र भगवान को पहना दें तथा उनके स्थापन निमित्त जो आसन है, उस पर स्थापित करें-
इदं परिधेय वस्त्रं उत्तरीय वस्त्रं च
श्रीकृष्णाय निवेदयामि नमः
ऊँ पंच नधः सरस्वती मपियन्ति सहस्त्रतसः।
सरस्वती तु पंचधा सो देशेऽभवत्सरित्।
श्रीकृष्णाय नमः पंचामृत स्नानं समर्पयामि।
पंचामृत से स्नान के पश्चात गोविन्दम् यंत्र को शुद्ध जल से स्नान कराकर पोंछ लें। निम्न वस्तुओं को अब यंत्र पर चढ़ायें।
आभूषण- हार, मुकुट-मणि, कड़े आदि गहने यंत्र को पहनाते हुए इस मंत्र को बोलें-
इमानि भूषणानि श्रीकृष्णाय निवेदयामि नमः।
गन्ध– केशर, कपूर मिश्रित चदन लेकर यंत्र पर लगायें-
इमं गन्धं श्रीकृष्णाय निवेदयामि नमः
अक्षत- हल्दी या कुंकुम से रंगे चावल यंत्र पर चढ़ाएं-
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुंकुंमाक्ताः सुशोभिताः
मया निवेदिता भक्तत्या गृहाणा परमेश्वर।
श्रीकृष्णाय नमः अक्षतान् समर्पयामि।
पुष्पहार- सुगन्धित नाना प्रकार के पुष्प तथा पुष्प माला
यंत्र पर चढ़ायें और निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
इमानि पुष्पाणि श्रीकृष्णाय निवेदयामि नमः।
तुलसी दल- तुलसी दल पर चन्दन लगाकर निम्न मंत्र का
उच्चारण करते हुए चढ़ायें-
इदं सचन्दनं तुलसी दलं श्रीकृष्णाय निवेदयामि नमः
धूप- निम्न मंत्र बोलते हुए अर्पण करें-
इमं धूपं श्रीकृष्णाय निवेदयामि नमः
दीप- गोविन्दम् यंत्र को दीप दिखायें –
इमं दीपं श्रीकृष्णाय निवेदयामि नमः
नैवेद्य- स्वच्छ थाली में भोज्य पदार्थ और पानी का गिलास
सजाकर भगवान के सामने रखें और निम्न मंत्र भी बोलें।
ऊँ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजन वल्लभाय स्वाहा।
इस मंत्र का उच्चारण करके निम्न मंत्र बोलें-
इदं नैवेद्यं श्रीकृष्णाय निवेदयामि नमः।
इसके बाद इन मंत्रें से पांच बार आचमन करायें।
ऊँ प्राणाय स्वाहा। ऊँ अपानाय स्वाहा। ऊँ व्यानाय
स्वाहा। ऊँ उदानाय स्वाहा। ऊँ समानाय स्वाहा।
फ़ल- अनेक प्रकार के ताजे और मीठे फल थाली में
सजाकर भगवान को अर्पित करें-
इदं फलं मया देव स्थापित पुरतस्तव,
तेन मे सफला वाप्तिः भवेज्जन्मनि जन्मनि।
ताम्बूल- मुख शुद्धि के लिए ताम्बूल भगवान को अर्पित करें-
एतत् ताम्बूलं श्रीकृष्णाय निवेदयामि नमः।
पुष्पांजलि- आरती के बाद फिर दोनों हाथ में पुष्प लेकर
भगवान कृष्ण को अर्पित करें-
नाना सुगन्ध पुष्पाणि यथा कालोद्भवानि च,
पुष्पांजलि र्मया दत्ता गृहाण परमेश्वर।
श्रीकृष्णाय पुष्पांजलि समर्पयामि नमः।
नमस्कार
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः।
श्रीकृष्णाय नमः नमस्कारोमि।
इसके बाद निम्न मंत्र ‘कृष्णत्व माला’ से आधा
घण्टा जाप करें।
विशेषार्ध्य- आचमनी में अक्षत, पुष्प एवं कुंकुम लेकर
निम्न सन्दर्भ को बोलते हुए भगवान को अर्पित करें।
अनाया पूजया श्रीकृष्णः परमात्मा देवता प्रीयन्ताम्।
ऊँ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु।
इसके बाद अपने समस्त स्वजनों के साथ प्रसाद ग्रहण करें।
भगवान कृष्ण ही सौन्दर्य प्रदायक पुरूषोत्तम हैं, कृष्ण ही आकर्षण प्रदायक मन्मथ, कृष्ण ही सम्मोहन, वशीकरण के देव केशव है इच्छा पूर्ति गोविन्दम् हैं। कृष्ण ही शत्रुबाधा, ग्रहबाधा, विजय सिद्धि प्रदायक मधुसुदन, देवेश जर्नादन हैं। कृष्ण का ही स्वरूप ऋषिकेश स्वरूप है जो पूर्ण गृहस्थ सुख प्रदायक है। कृष्ण साधना से ही श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति होती है और उस रूप में वे बाल गोपाल कहे जाते है। ऐसे भगवान श्री कृष्ण की साधना के लिए जन्माष्टमी पर्व ही श्रेष्ठ है। भगवान श्री कृष्ण की साधना कर अपने भौतिक जीवन में सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अर्थात् धर्म-अर्थ-काम की पूर्णता हेतु जो भी हम सुकर्म करे उसमें निरन्तर वृद्धि के साथ श्रेष्ठ फ़ल की प्राप्ति हो सके तथा संग्राम रूपी जीवन के महाभारत में विजयश्री प्राप्त हो सके। अपनी ज्ञान बुद्धि से सभी को आकर्षित सम्मोहित कर सकें । इस हेतु गोविन्दम् आकर्षण शक्ति चैतन्य दीक्षा और साधना सामग्री किन्ही पांच पत्रिका सदस्य बनाने पर आपको यह उपहार गुरुदेव स्वयं आपको प्रदान करेंगे।
दिल्ली कैलाश सिद्धाश्रम में सांध्य बेला में कृष्ण जन्मोत्सव पर्व का पूजन गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी के सानिध्य में सम्पन्न होगा साथ ही महाप्रसाद की व्यवस्था भी साधकों के लिए की गयी है। आप सपरिवार आमंत्रित है।
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