





क्योंकि मानव शरीर में सभी गुणों का समावेश है। इसी शरीर को धारण कर जीवात्मा ब्रह्मत्व को प्राप्त कर सकती है। जीवन के मूल तत्व से परिचित होने और सभी सुखों को भोगने का मात्र एक मानव शरीर ही मार्ग है। इसीलिये जीवात्मा को चौरासी लाख योनियों के बाद मानव शरीर प्राप्त होता है। जो व्यक्ति (जीवात्मा) अपने जीवन में चेतनावान रहते हैं वही अपने परम लक्ष्य को जीवन के धर्म, अर्थ, काम की पूर्णता प्राप्त करते हुये मोक्ष पाते हैं।
लेकिन इसी मानव जीवन में अनेक-अनेक कर्म फल से ही अधोगती व उन्नति और भविष्य के जन्म का निर्धारण विधाता तय करता है। इन्हीं कर्मों के कारण व्यक्ति दुःख, कष्ट, शोक, संताप, रोग, व्याधि, न्यूनता, दुर्भिक्षता आदि से पीडि़त होता है। शास्त्र वर्णित है कि सत्कर्म के माध्यम से जीवन का उद्धार किया जा सकता है। चेतनावान व्यक्ति अपने दुःखो कष्टों, पाप-ताप, संताप से निजात पाने के लिये निरन्तर साधना, मंत्र-जप, पूजन, तप, कीर्तन, योग, ध्यान, हवन आदि क्रियाओं में अनुरक्त रहता है।
इन सत्कर्मो में हवन क्रिया सर्वोत्तम मानी जाती है। हवन से देवता शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं, और साधक के अभीष्ट को पूर्ण करते हैं। हवन के माध्यम से सरलता पूर्वक देव शक्तियों को अपने अनुकूल बनाकर जीवन के न्यून पक्ष को सशक्त कर भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। प्राचीन समय से सनातन धर्म में यज्ञ का विशेष महत्व रहा है। हवन, यज्ञ के माध्यम से प्राचीन ऋषि-मुनि देव शक्ति और उनकी चेतना से युक्त होते थे। उनके जीवन में निर्विकार रूप से सुख, समृद्धि, उन्नति, प्रगति, हर्ष, उल्लास, आनन्द, प्रसन्नता तथा शान्ति बनी रहती थी। ये देव शक्तियां मानव जीवन के उत्थान-पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं या यों कहें इनके अनुकूल और प्रतिकूल होने पर ही मानव जीवन निर्भर होता है। सामान्य व्यक्ति भी अपने जीवन में हवन पद्धति को सम्मलित कर निश्चित रूप से प्रसन्नता, ओज, चेतना, देव-शक्ति, सुख-समृद्धि, हर्ष, उत्साह से युक्त हो सकता है। श्रेष्ठतम त्यौहार-पर्व और साधना दिवसो पर हवनादि की क्रियायें विशेष पद्धति और चैतन्य मंत्रें से सम्पन्न करना चाहिये।
विष्णु पुराण के अनुसार-
यज्ञाः कल्याण हेतवः।
अर्थात् यज्ञ के माध्यम से मानव जीवन का कल्याण होता है।
अथर्ववेद में वर्णित है कि-
यज्ञाः पृथिवीं धारयन्ति।
अर्थात यज्ञ कर्म के माध्यम से पृथ्वी को धारण किया गया है।
मतस्यपुराण के अनुसार-
यज्ञैश्च देवानाप्नोति।
अर्थात् यज्ञ के माध्यम से देवता को तृप्त किया जा सकता है।
अथर्ववेद के अनुसार-
यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः।
अर्थात् संसार के उत्पत्ति स्थान यज्ञ ही है।
शतपथ ब्राह्मण ग्रंथो के अनुसार-
यज्ञो वै श्रेष्ठतरं कर्मः।
अर्थात् यज्ञ ही सारे संसार का श्रेष्ठ कर्म है।
तैतिरीय संहिता के अनुसार
यज्ञो वै विष्णुः।
अर्थात् यज्ञ ही साक्षात् भगवान विष्णु का स्वरूप है। हवन के माध्यम से स्वर्ग रूपी सुख प्राप्ति और शत्रुओं को भी मित्र बनाया जा सकता है। समस्त कष्टों का विनाश करते हुये अटूट श्री-संम्पदा को प्राप्त कर सकते हैं। यज्ञ के माध्यम से सारे संसार का पालन-पोषण तथा कल्याण होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद गीता के माध्यम से द्रव्य यज्ञ, तप यज्ञ, योग यज्ञ, ज्ञान यज्ञ, कर्म यज्ञ, स्वाध्याय यज्ञ अनेक यज्ञों के बारें में विस्तार से वर्णन किये हैं। ब्रह्माण्ड़ के सारे कर्म यज्ञों से ही बनते हैं।
इस पवित्र भारत भूमि पर वैदिक काल से यज्ञ होते आ रहें हैं। सभी ऋषि-मुनि, राजा, श्रीराम, श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर आदि अवतरित महापुरूषों ने भी यज्ञ सम्पन्न कर ही दिव्यता और श्रेष्ठता प्राप्त की। प्रत्येक युग में मानव ने यज्ञ के द्वारा ही अपने मनोरथों को पूर्ण किया है। आज के वातावरण में अत्यन्त आवश्यक है, हवन क्रिया द्वारा कामना पूर्ति निश्चिन्त रूप से संभव है। वर्तमान में भी विभिन्न स्थानों पर सामूहिक रूप से विशाल यज्ञ का आयोजन होता है।
ऋग्वेद में भी वर्णन है कि-
तांत्रिक साधनाओं के दृष्टि कोण से विभिन्न कार्यों के अनुसार दस प्रकार के कुण्ड में हवन करने का विद्यान है।
चतुरर्श, योनि कुण्ड, अर्ध चंद्राकार, त्रिकोणकार, वृत्ताकार, पदमाकार, षडस्र, विषम षडस्र कुण्ड, अष्टास्र, विषम अष्टास्र इस प्रकार के दस कुण्डों का वर्णन है, ये सारे कुण्ड निर्माण करने का अनेक विधान कर्म काण्ड का वर्णन शास्त्रों में मिलता है।
कर्म के अनुरूप कुण्ड का परिमाप, विस्तार, मैंखला, गर्त, कण्ठ, योनि, नाभि तथा अग्नि का स्वरूप विचार कर हवन कुण्ड का निर्माण किया जाता है।
प्रत्येक कुण्ड में 1,3,5,7,10 तक मैखला होनी चाहिये और इन मैखलाओं को पंचवर्ण रंगो से सुशोभित करना शुभ होता है। कुण्ड की लम्बाई, चौड़ाई, गहराई एक समान होनी चाहिये अर्थात् लम्बाई 2 फिट, चौड़ाई 2 फिट, गहराई 2 फिट होना आवश्यक है। प्रत्येक कुण्ड में योनी के माध्यम से ही हवनाचार्य स्रुव से घृता आहुति करते हैं। क्योंकि हवन में घृत शक्ति को शिव का वीर्य कहा गया है, और कुण्ड में अग्नि आवाहन के उपरान्त ऋतुस्नाता बागीश्वरी के साथ ब्रह्मा-लक्ष्मी और नारायण का आवाहन किया जाता है,
आयुर्वेद के दृष्टि से शरीर में 13 प्रकार की अग्नि होती है। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र इत्यादि अग्नि होते हैं। शरीर पिण्ड में स्थित इन्हीं अग्नियों के कारण हम जीवित और गतिशील रहते हैं, इन्हीं ऊर्जा शक्तियों के कम और अधिक होने से मानव बीमार, अशक्त, कमजोर होता है। शरीर में उष्मा या अग्नि तत्व के उपलब्ध होने तक ही व्यक्ति जीवित रहता है। अग्नि तत्व को संतुलित रूप से धारण करने के लिये महीने में एक बार हवन करना चाहिये।
साधक अनेक-अनेक प्रकार की साधनायें सम्पन्न करते रहते हैं। जिससे उनके शरीर में अग्नि तत्व की वृद्धि हेतु हवन करना चाहिये।
शिष्य गुरूदेव से अनेक प्रकार की विशेष शक्तिपात दीक्षा प्राप्त कर के शक्ति से युक्त होते हैं। शक्तिपात ऊर्जा का क्षय ना हो इस हेतु हवानादि की क्रियायें सम्पन्न करते रहना चाहिये।
हम जिस भूमि पर रहते है, उस भूमि पर सैकड़ों अस्थियां, मूर्ति विसर्जन, भूत-प्रेत, पिशाच, आदि मलिन शक्तियों से भूमि दूषित हो जाती है। जिसके कारण घर में तनाव, क्लेश, अशांति, अभाव, रोग, रात में दुस्वप्न, भय लगना, बच्चों का बार-बार बीमार पड़ना, अकारण और अचानक लड़ाई-झगड़ा-दुर्घटना, दो भाईयों, पिता-पुत्र के मध्य भीषण कलह आदि का होने में भूमि दोष प्रमुख कारण है। विशेष शुभ मुहूर्त में हवन करने से भूमि दोष समाप्त होता है। जिससे भवन में शुद्धता आती है और सुफल प्राप्त होता है।
साधना सम्पन्न, पुरश्चरण अनुष्ठान, मंत्र जप के पश्चात् हवन इसलिये आवश्यक है कि आपके और देव मंत्र शक्ति के बीच में आ रही बाधाओं का अग्नि तत्व के माध्यम से शमन हो सके, और आप उस शक्ति तत्व को पूर्णता के साथ आत्मसात कर सकें। यही कारण है कि वैदिक काल से आज तक पूजा, साधना, तप के उपरांत हवन किया जाता है।
विज्ञान के अनुसार जन संख्या वृद्धि व विभिन्न कारखानों और पेड़-पौधों के कम होने आदि के कारण जलवायु में अत्यधिक परिर्वतन हो रहा है। और वायु मण्डल में स्थित ओजोन परत जो कि सूर्य के प्रतिकूल किरणों के होने वाले नुकसान से बचाता है। ओजोन परत कई जगहों पर क्षतिग्रस्त हो गया। हवन की अग्नि से उत्पन्न किरणों से ओजोन परत में सुधार होता है।
अग्नि को ब्रह्म कहा गया है, नाभि मण्डल में स्थित जठराग्नि के माध्यम से जैसे पूरे शरीर की पोषण क्रिया सम्पन्न होती है, ठीक उसी तरह अग्नि यज्ञ के माध्यम से ब्रह्माण्ड के सारे कर्म सम्पन्न होते हैं। अग्नि को सभी देव शक्तियों का मुख कहा जाता है। अग्नि के माध्यम से सभी देवताओं को यज्ञ भाग प्राप्त होता है। जो कामना और भावना के अनुसार फल देते हैं।
आज के भौतिकतावादी युग में जब मनुष्य का झुकाव पाश्चात्य संस्कृति की ओर उन्मुख हो गया है। ऐसे में यज्ञ की मूल क्रिया पद्धति विलुप्त हो गई। वर्तमान समय में कुछ सामग्री को अग्नि में मिश्रित या डाल देने को ही हवन या यज्ञ मान लिया गया है। अब ऐसे पंडितों और पुरोहित भी नहीं रह गये जो यज्ञ को पूर्ण वैधानिक रूप से सम्पन्न कर उसके वास्तविक अर्थ को स्पष्ट कर सकें।
हवन एवं यज्ञ का आध्यात्मिक विवेचन किसान बड़े प्रयत्न से मिट्टी में अन्न के बीज बोता है, परन्तु उसे कोई गारण्टी नहीं दे सकता कि खेत में डाला हुआ यह अन्न अवश्य ही उसे निबार्धरूप से वापस प्राप्त होगा ही, फिर भी परिश्रमी कृषक भगवान के भरोसे पर ही पीढि़यों से अपना कर्तव्य पालन करता चला आ रहा है। उसे विश्वास रहता है, कि मिट्टी में मिला प्रत्येक अन्नकण हजार गुणित होकर पुनः प्राप्त होगा।
यही बात यज्ञों के साथ भी है। किसान का यज्ञ पार्थिव यज्ञ है और तेजस है! एक आधिभौतिक है तो दूसरा आधिदैविक! कृषि दोनों हैं। एक का फल अल्पकाल तक पोषण करने वाला अनाज का ढेर है, तो दूसरे का फल देवताओं के प्रसाद से प्राप्त होने वाली अनन्तकालीन तृप्ति है। कृषि दोनों ही हैं। देवता सूक्ष्मदेह में उपस्थित होते हैं, इस हेतु द्रव्य अर्थात् सामग्री को विधिवत् अग्नि में होमकर उसे सूक्ष्म रूप में परिवर्तित किया जाता है। अग्नि में डाली हुई वस्तु का स्थूल भाग भस्म के रूप में भूमि पर ही रह जाता है। स्थूल-सूक्ष्म सम्मिलित भाग यज्ञ-धूम्र (धुआं) बनकर वायुमण्डल में व्याप्त हो जाता है, जो बाद में बादल बनकर जल रूप में बरस जाने से वह भी धरती पर वापस लौट आता है। इसकी तुलना में जो हवन सामग्री के ज्वलन से जो सूक्ष्मता (गन्ध, तरंग, इत्यादि) भाग होता है, वह देवताओं को परितृप्त करता है।
जिस तरह से ऊपर फेंका हुआ पत्थर पुनः भूमि पर आकर ही स्थिर होता है। जल प्रवाह अपने आदिम उद्गम समुद्र में पहुंचकर ही रहता है। इसी प्रकार हवनाग्नि की प्रत्येक क्रिया मूल केन्द्र सूर्य में पहुंचे बिना समाप्त नहीं होती।
पदार्थ विज्ञान के अनुसार जिस तरह अन्न कण विधिवत् मिट्टी में मिला देने से सौ गुना हो जाता है, अग्नि में मिला लाख गुणित हो जाता है। अग्नि के संसर्ग से पदार्थ की व्यापकता का अनुमान मात्र इसी तथ्य से लगाया जा सकता है, कि गांवों में गुड़ पकने की सुगंध एक मील की दूरी तक भी लोगों की लार टपकने के लिये काफी होती है। अग्नि में डाली वस्तु के लाख गुना हो जाने से यहां यही तात्पर्य है।
इसी प्रकार हवन में जो द्रव्य डाले जाते हैं, वे सब अनन्त गुणित होकर देवगण को परितृप्ति करते हुये, अतं में कर्ता को अनेक प्रकार से भोग एवं ऐश्वर्य के रूप में उपलब्ध होते हैं।
इसी हेतु शिष्यों और साधको के जीवन को प्रत्येक दृष्टि से सुखी-समृद्धिशाली बनाने हेतु पूज्य गुरूदेव के सानिध्य में निरन्तर साधना शिविर और दीक्षा महोत्सव के कार्यक्रम में हवन, यज्ञ का आयोजन होता है। ऐसे दिव्य शिविर और दीक्षा महोत्सव में भाग लेकर साधक यज्ञाग्नि के माध्यम से देव शक्तियों की चेतना को आत्मसात कर जीवन की जड़ता, धनहीनता, आरोग्यता, कर्महीनता, कार्य शिथिलता जैसी समस्याओं से निजात पाकर सभी मनोरथों को पूर्ण करने की ऊर्जा और चेतना प्राप्त कर सकेंगे। जिससे जीवन हर प्रकार से सुखी और सम्पन्न हो सकेंगा।
वर्तमान में नियमित विशेष दिवसों पर इतना विशाल शुद्ध पवित्र स्थान मिलना सम्भव नही हो पाता और बहुत ही अधिक धन व्यय के साथ-साथ सैंकड़ो व्यक्तियों का सहयोग भी नहीं मिल पाता इसीलिये सामान्य जन या साधक इस तरह के हवन कुण्डों का निर्माण और आहूति की क्रिया सम्पन्न नहीं कर पाते इसी के फ़लस्वरूप साधना में पूर्णता का भास प्राप्त नहीं हो पाता इसी समस्या के निदान हेतु पूर्ण मंत्र चैतन्य शुद्ध ताम्र पात्र से युक्त हवन कुण्ड निर्मित किये गये हैं। इनका आप घर में मांगलिक कार्य अथवा साधना सफ़लता के लिये उपयोग में ला सकते हैं।
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