





दीपावली का दिवस प्रारम्भ कैसे हों इस विषय पर बहुत कम विचार किया गया। दीपावली पर्व जब प्रारम्भ होता है तो उसके साथ ही साथ एक नववर्ष प्रारम्भ होता है, दिवस के प्रातः से ही स्नान ध्यान कर सर्वप्रथम तीन प्रकार के विशेष पूजन सम्पन्न अवश्य करने चाहिये। प्रथम पूजन अपने गुरू का, दूसरा पूजन अपने माता-पिता का और तृतीय पूजन अपने कुलदेवता का सम्पन्न करना चाहिये, मनुष्य के जीवन में ये तीन व्यक्तियों की पूर्ण कृपा से ही जीवन बनता है और इस विशेष दिवस पर उनका सम्मान करना आह्नान करना उनके प्रति नमन होना आवश्यक कर्तव्य है।
सामान्यतः परिवार के सभी सदस्य साथ मिलकर दीपावली पूजन सम्पन्न करते हैं। श्रेष्ठ वस्त्र के साथ-साथ श्रेष्ठ व्यंजन भी ग्रहण करते हैं। जहां तक संभव हो सके, बाजार से लाये हुयें व्यजंनों की अपेक्षा घर में बनाये गये व्यजंनों को ग्रहण करें व घर के बने हुए व्यजंन ही देवताओं को अर्पित करना चाहिये।
घर में सब स्थानों पर और घर के बाहर दीपक प्रज्जवलित करने का रिवाज है, यह कोई नया सामान्य परम्परा नहीं है, अग्नि मनुष्य की शक्ति का प्रतीक है। अमावस्या की रात्रि को सर्वाधिक कृष्ण रात्रि या काली रात्रि मानी जाती हैं ऐसी रात्रि में भी प्रकाश के द्वारा अंधकार को दूर किया जा सकता है। इसके पीछे यह संकल्प भावना है। कैसी भी कुसीब परेशानी की अंधकार युक्त कालीमा आ जायें वह स्वयं अपने प्रयासों द्वारा इस अंधकार को दूर कर सकता है।
लक्ष्मी की पूजा आराधना तो सभी व्यक्ति करते हैं और यह प्रार्थना भी करते हैं कि हमारे घर में लक्ष्मी सदैव विद्यमान रहे, लेकिन इसके साथ यह बात ध्यान में रखना आवश्यक है कि लक्ष्मी की उत्पत्ति कैसे हुई, लक्ष्मी सहसा प्रकट नहीं हो गई, लक्ष्मी समुद्र मंथन के पश्चात् उत्पन्न हुई जिसे भगवान विषणु ने वरण किया अतः जीवन में लक्ष्मी उत्पत्ति मंथन के पश्चात ही हो सकती है।
भाग्य अवश्य ही श्रेष्ठ स्थिति लाता है, लेकिन कार्य सिद्धि हेतु जीवन में हर समय मंथन आवश्यक है। जहां जहां भी मंथन होगा वहां श्रेष्ठ वस्तु की प्राप्ति होगी। मंथन का तात्पर्य है मन में उस संकल्प शक्ति को प्रबल करना जिससे बुद्धि एकाग्र और तीव्र हो सकें। लक्ष्मी के सम्बन्ध में कहा गया है। कि ‘कर्म प्रभाव प्रकाशिनी’ जहां कर्म होता है उसका प्रकाश और प्रभाव लक्ष्मी के रूप में प्रकट होता है। जो व्यक्ति अपने जीवन में निरन्तर मंथन नहीं करते आलसी, कामचोर, व्यसनी होते हैं उनकी बुद्धि कुंठित हो जाती है। कुंठित बुद्धि वाला व्यक्ति लक्ष्मी प्राप्त नहीं कर सकता है।
लक्ष्मी अपनी शक्तियों से अपने प्रकटीकरण से संसार को बांधे रखती है वह विद्या लक्ष्मी ही है जो ज्ञान के जिज्ञासुओं को ज्ञान प्रदान करती है। लक्ष्मी के बिना सन्यासी भी अपना कार्य नहीं कर सकते है। वास्तव में गृहस्थ से अधिक संन्यासियों को लक्ष्मी की आवश्यकता होती है क्यों कि उन्हें स्वयं के हित की अपेक्षा परमार्थ के हित के कार्य अधिक करने पड़ते हैं। स्थान-स्थान पर भ्रमण करना पड़ता है। सांसारिक व्यक्तियों के भीतर छाये हुये अंधकार को दूर करना पड़ता है।
आज संसार में जितने भव्य देवालय, सार्वजनिक स्थान, उद्यान, आश्रम जो अपंग व्यक्तियों से लेकर, पशु-पक्षियों की सेवा में रत रहते हैं उन्हें ऋषियों-संन्यासियों ने ही बनाया। उनके माध्यम से किसी लक्ष्मीवान ने क्रिया सम्पन्न की लेकिन प्रेरणा के स्रोत संन्यासी और ऋषि, गुरू इत्यादि रहे हैं। इसलिये गृहस्थ हो या सन्यासी हो लक्ष्मी की आवश्यकता तो सभी को रहती है। कोई अपने ज्ञान से संसार को जाग्रत करता है तो कोई अपने धन से संसार को जाग्रत करता है। दोनों लक्ष्मी के ही स्वरूप है।
धन लक्ष्मी, भू-लक्ष्मी, सरस्वती लक्ष्मी, प्रीति लक्ष्मी, कीर्ति लक्ष्मी, शान्ति लक्ष्मी, तुष्टि लक्ष्मी, पृष्टि लक्ष्मी। इस प्रकार की लक्ष्मी के ये आठ स्वरूप इस माया रूपी संसार को अर्थात् मनुष्य के जीवन को आनन्द पूर्व चलाने के लिये अत्यन्त आवश्यक है। लक्ष्मी के सहयोग से ही मनुष्य के जीवन में धन, सम्पदा, सांसारिक वस्तुयें, सरसता आनन्द प्राप्त हो सकता है। लक्ष्मी की कृपा से ही मनुष्य सांसारिक जीवन में अपने तीसरे पुरूषार्थ काम को पूर्ण रूप से उपयोग कर वह मोक्ष मार्ग पर गतिशील हो सकता है। लक्ष्मी का यह स्वरूप जो कि विद्या माया स्वरूप है। वह मनुष्य को निरंतर कर्म पथ पर अग्रसर करते हैं।
लक्ष्मी के स्वरूप को अगर हम देखे तो वह स्वरूप समृद्धि प्रदान करने वाला और जीवन को सुरक्षित रखने वाला आनन्द देने वाला, धन आभूषणों से परिपूर्ण है। जिसके दोनों ओर गज विद्यमान है। जो कि राज्य शक्ति को प्रकट करते हैं। वहीं लक्ष्मी कमल पर विराजमान है तथा अपने हाथ में पूर्ण विकसित कमल लिये हुये हैं ये कमल जीवन की पूर्णता को प्रकट करते हैं साथ ही पूरा स्वरूप एक ज्ञान आभा के रूप में प्रकट होता है।
रिद्धि का तात्पर्य है पूर्णता जो नौ कलाओं की सर्वोच्च स्थिति है। और इस नौ कलाओं में प्रत्येक कला दूसरी कला से जुड़ी है। सांसारिक कर्त्तव्य करते हुये दान रूपी कर्त्तव्य जहां होता है वहीं लक्ष्मी की पहली कला विभूति उपस्थित होती है। विभूति से ही व्यक्ति में नम्रता का आगमन होता है जो लक्ष्मी की दूसरी पीठ शक्ति है। इन दोनों के संयोग से साधक में स्वतः ही कांति का प्रादुर्भाव होता है और तब उसके चेहरे पर दिव्य सौन्दर्य, जो अलौकिक सा लगे, झिलमिला उठता है। तीन कलाओं की प्राप्ति के बाद पुष्टि नामक चतुर्थ कला का आगमन होता है, वाणी सिद्धि, कार्य सिद्धि, पुत्र-पौत्र आदि सुख, जीवन मे गति आदि इसी कला से प्राप्त होती है। जिसके फलस्वरूप पांचवी कला कीर्ति का प्रादुर्भाव होता है। व्यक्ति को समाज में और अपने कार्यों में सम्मान मिलता है। उसके जीवन धन्यता आती है।
कीर्ति साधना से उन्नति मुग्ध होकर विराजमान होती है ओर इसके बाद आगमन होता है। पुष्टि नामक सातवीं कला का जिससे साधक जीवन में एक सन्तुष्टि अनुभव करता है। तथा वह उत्कृष्टि नामक आठवीं कला को धारण करने की पात्रता प्राप्त कर लेता है। उत्कृष्टि का जब जीवन में आगमन हो जाता है। जब व्यक्ति के जीवन मे क्षय दोष समाप्त हो जाता है, फलस्वरूप फिर जीवन में वृद्धि ही वृद्धि होती है और लक्ष्मी स्थायित्व ग्रहण करते हुये रिद्धि रूप से पूर्णता के साथ विद्यमान हो जाती है।
लक्ष्मी के रिद्धि-सिद्धि स्वरूप को पूर्णता से आत्मसात करने की क्रिया सद्गुरूदेव की जन्म भूमि जो देवत्व चेतना शक्ति से आपूरित है ऐसी दिव्यतम तपोभूमि खरटियाँ मठ में ग्यारह कुण्डीय कनक धारा लक्ष्मी मंत्रों से हवन सम्पन्न किया जायेगा। नव महालक्ष्मी युक्त रूद्राभिषेक, सुख-समृद्धि प्रदायक साधना अहम् ब्रह्मास्मि स्वरूप कुण्डलिनी जागरण की क्रियायें उसी तेजमय दिव्य भूमि पर सम्पन्न होगीं। साथ ही रूप अनंग शक्ति दीक्षा, कामदेव चैतन्य पूर्णत्व दीक्षा, कर्ण पिशाचिनी श्रीं शक्ति दीक्षा और शाकम्भरी अष्ट लक्ष्मी दीक्षा प्रदान की जायेगी। जिससे साधक सद्गुरूदेव की तपः शक्ति चेतना को पूर्णरूपेण आत्मसात कर सके साथ ही धन की सुदृढ़ता, प्रसन्नता, आनन्द, प्रेम, जीवन में सुवृद्धि, आरोग्यता, दीर्घायु जीवन, कीर्ति, सम्मान, प्रतिष्ठा और अन्य सभी लक्ष्मियों से युक्त हो सके। और अपने जीवन को कुण्डलिनी शक्ति युक्त सद्गुरूमय चेतना से आप्लावित कर सके।
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