





विज्ञान का अर्थ होता है किसी चीज को कैसे किया जा सकता है, उस प्रक्रिया को जानना, जिससे कुछ निर्माण किया जा सके। सत्य तो यही है, जो कुछ कर सके, कोई बदलाहट, परिवर्तन ला सके। और धर्म ऐसा ही सत्य है। इसलिये धर्म चिन्तन, विचार तक सीमित ना होकर एक रूपांतर है, म्यूटेशन है। अपनी ऊर्जा के रूपांतर की प्रक्रिया को धर्म का परम विज्ञान कहते हैं। सुप्रीम साइंस कहते हैं। धर्म उस चेतना को रूपांतरित करता है जिसे देखा भी नहीं जा सकता और छुआ भी नहीं जा सकता, इसलिये धर्म को परम विज्ञान कहा है।
मनुष्य के भीतर जो ऊर्जा है, वह नीचे से ऊपर जा सकती है। जब कोई व्यक्ति कामवासना से भरा होता है तो वह ऊर्जा नीचे की ओर जाती है। जब जीवन से भरा होता है, तो वह ऊर्जा ऊपर की ओर जाती है, और मरण से भरा होता है तो मृत्यु के निकट आती है। शक्ति एक ही है, जो नीचे से ऊपर बहा करती है। जिस रास्ते से हम बाहर जाते हैं उसी से भीतर जा सकते हैं। जिस सीढ़ी से हम नीचे उतरते हैं उसी से ऊपर भी चढ़ सकते हैं रास्ता वही है, सीढ़ी वही है, सिर्फ दिशा बदलना होता है। आप जिस मार्ग से यहां तक आये उसी से अपने घर भी जा सकते हैं। सिर्फ अपना मुंह, अपना रूख बदलना है।
जिस रास्ते से आप बाहर के जगत में सर्वाधिक आकर्षित होते हैं और खिंचे चले जाते हैं। वह चाहे आंख हो, चाहे स्वाद हो, चाहे ध्वनि हो, चाहे सुगन्ध हो, चाहे काम हो, चाहे कुछ भी हो, जिस रास्ते से आप बाहर जाते हैं, वही रास्ता आपके संयम की दिशा में सहयोगी बनेगा। उसी से आपको वापस लौटना होगा। इसलिये उससे आप लड़ना मत। लड़कर तो आप उसे तोड़ देगें, जिससे फिर आपको वापस लौटना बड़ा मुश्किल होगा। मेरे पास लोग आकर कहते हैं- मैं इन्द्रियों के कारण बाहर भटक गया। लेकिन आप इन्द्रियों के कारण नहीं भटके, आप तो वमन और दमन के कारण भटके हो। भगवान महावीर ने कहा है इन्द्रियों को संयम के द्वारा वश में किया जा सकता है लड़कर नहीं। क्योंकि जो जिस चीज से जितना लड़ता है, उसे उस चीज में उतना ही अधिक रस आने लगता है। जो व्यक्ति काम से लड़ता है, उसके आस-पास कामवासना सदा के लिये खड़ी हो जाती है। उसे कामवासना घेर लेती है। वह जिससे लड़ता है, उसी के लिये वातावरण निर्मित कर रहा होता है। क्योंकि मन का नियम ही है कि जिस चीज को आप मन से मिटाने की कोशिश करोगे, वह बार-बार सामने आयेगा। इसलिये कहा जाता है जो भुलाना हो उसे याद ही न करो। यदि कामवासना को भुलाना है तो उसे याद ही मत करो। चित्त से दमन और वमन दोनों निकाल दो। क्योंकि दमन आदमी को रूग्ण करता है, स्वस्थ नहीं रहने देता।
कामवासना ने आपको दुख दिया और यदि आप कामवासना के विपरीत चले गये तो दमन हो गया। यदि आपने कहा कामवासना ने मुझे दुख दिया है, मेरी प्रज्ञा में कामवासना इस भांति प्रविष्ट हो गई कि मन कामवासना से शान्त ही नहीं होता, तो आप अपने को उसके विपरीत लेकर चले गये। कामवासना से छूटना आसान है क्योंकि वह प्रकृति है। लेकिन जो कामवासना के विपरीत, विरोध से बंध गया हो, तो उसे छूटना बड़ा मुश्किल है। क्योंकि वह प्रकृति से और भी एक कदम आगे निकल जाता है। जो हमें मिली है वह है प्रकृति। जिसमें हमने कुछ नहीं किया, जो स्वभाव से मिली है, नैसर्गिक है। लेकिन जो हम गलत करते हैं उसका नाम है विकृति। और यदि हम कुछ ठीक करें तो वह जो होगा उसका नाम संस्कृति है। तो प्रकृति पर हम खड़े होते हैं। और उसमें जरा सी भूल की तो विकृति में चले जाते हैं। और संस्कृति में जाना कोई बहुत बड़ी प्रक्रिया नहीं है सिर्फ संयम और धैर्य से यदि आप विकृति से बचते हुये प्रकृति से ऊपर बढ़े तो निश्चिन्त ही प्रकृति को पा सकेंगे। और यदि विकृति से लड़ने की कोशिश की तो विकृति में फंस जाओगे। और फिर विकृति संस्कृति से और एक कदम दूर ले जायेगी। क्योंकि प्रकृति मात्र बीच में मध्य में खड़ी होती है। आप उससे नीचे हटे, दूर हटे तो विकृति और उससे ऊपर गये तो संस्कृति।
आज दुनिया में पशु-पक्षी कामवासना से उतने नहीं भरे जितने मनुष्य भरे हैं। पशु-पक्षी के काम का तो एक निश्चित समय और मौसम होता है, क्योंकि वह प्रकृति पर ठहरा हुआ है। वह सभी से प्रेम करता है। वे सेक्सुअल्स नहीं होते। परन्तु मनुष्यों का कोई निश्चित समय नहीं है। दिन हो या रात, अन्दर हो या बाहर, प्रतिदिन हर समय उसका मन विषय वासनाओं में ही लगा रहता है। सदैव उसका चित्त सेक्सुअल्स होता है। संयम, साधना, तप का मूल सूत्र यही है कि आप जहां शक्ति को इकठ्ठा नहीं करना चाहते वहां ध्यान मत दो। वहां से ऊपर उठो। यदि कामवासना से मुक्त होना है तो कामवासना पर ध्यान ही मत दो। पक्ष में भी नहीं, विपक्ष में भी नही। इसे स्वीकार कर लो इससे लड़ो मत। क्योंकि जिसे हम स्वीकार कर लेते हैं उस ओर हमारा ध्यान देना बंद हो जाता है। जब आप किसी स्त्री के प्रेम में होते हैं तो आपका सारा ध्यान उसी पर केन्द्रित होता है। लेकिन विवाह के बाद जब उसे पूर्णतः स्वीकार कर लिया तो फिर ध्यान हट जाता है। जैसे एक कार आपके पास नहीं है, तो जब भी वह सड़क से चमकती हुई निकलती है कि आपका ध्यान चला जाता है। लेकिन फिर वह मिल जाती है, आप बैठ गये होते हैं, तो थोड़े ही दिनों में आपको ख्याल ही नहीं आता है कि वह कार भी है, क्योंकि जो चारों ओर से ध्यान को खींचती थी वह स्वीकार हो गयी, प्राप्त हो गयी। जो चीज स्वीकृत हो जाती है। उस ओर से ध्यान बन्द हो जाता है। बुरे भावो को भी स्वीकार कर लेना चाहिये। धीरे-धीरे वह अपने आप अनुपयोग व क्षीण होकर टूट जायेगा और फिर जो ऊर्जा, चेतना बचेगी, उसका प्रवाह अपने आप ऊपर की ओर, सहस्त्रार की ओर होना शुरू हो जायेगा। यही वह क्रिया जिसके माध्यम से कामवासना की ऊर्जा को रूपांतरण कर सूर्य के समान दैदीप्यमान उज्ज्वल जीवन प्राप्त किया जा सकता है।
हर साधक-शिष्य की यह धारण होती है कि वह अपने सद्गुरू की दिव्य तपस्यांश शक्ति, चेतना को आत्मसात कर आध्यात्मिक और भौतिक जीवन की उच्चता को प्राप्त करें। जिससे उसका गृहस्थ जीवन नारायण लक्ष्मीमय स्वरूपों में पूर्ण हो सके। श्रेष्ठ और लक्ष्य प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील साधक ही लक्ष्मी को चिर स्थायीत्व रूप से अपने घर में स्थापित कर सकें। सद्गुरूदेव को उनके ही जन्म भूमि खरटियाँ मठ जोधापुर में 10-11 नवम्बर को अपने शरीर के रोम-रोम में स्थापित कर सद्गुरूदेव के सभी साधनात्मक सिद्धियों के तपस्यांश शक्ति से युक्त हो सकेंगे। देवत्व शक्ति से पूर्णतः चैतन्य नारायण जन्मभूमि में अहम् ब्रह्मास्मि स्वरूप कुण्डलिनी जागरण की क्रियायें सम्पन्न होगीं। ऐसी दिव्यतम कुण्डलिनी जागरण युक्त अष्ट महालक्ष्मी दीपावली महोत्सव की चेतना को आत्मसात कर निश्चिन्त रूप से धन, प्रसन्नता, आनन्द, प्रेम, कीर्ति, सम्मान प्रतिष्ठा, भू-भवन, आर्थिक सुदृढ़ता में सुवृद्धि के साथ ही लक्ष्मी के सभी 108 स्वरूपों से युक्त हो सकेंगे।
संन्यस्त महोत्सव को त्रिशक्ति स्वरूप में अर्थात् जीवन में संन्यस्त भाव अहम् ब्रह्मास्मि स्वरूप में आत्मसात कर सके। यह चिंतन भाव गुरू के सानिध्य में योग के माध्यम से निश्चिन्त रूप से पूर्ण हो सकता है और अहम् ब्रह्मास्मि से युक्त जीवन की पूर्णता का भास विष्णु स्वरूप में प्राप्त कर सकें। पूर्ण आनन्द और चैतन्य युक्त क्रियाओं की प्राप्ति शिव-शक्ति के माध्यम से आत्मसात कर सकें। ऐसे ही तीनों ब्रह्मा, विष्णु, महेश की चेतना को स्वयं में समाहित करने के लिये सद्गुरूदेव के संन्यस्त महोत्सव के दिवसों पर साधनात्मक व्यवस्था की गयी है। अक्षय नवमी और संन्यस्त महोत्सव के दिव्य दिवस पर पाटणेश्वरी की चैतन्य भूमि पर कार्तिकेय समलेश्वरी धनदा साधना महोत्सव 19-20 नवम्बर 2015 को बालांगीर उड़ीसा में होगा।
अपने समस्त पाप ताप दोषों के शमन और गृहस्थ जीवन में सुख सौभाग्य वृद्धि हेतु गृहस्थ संन्यस्त चेतना प्राप्ति साधना महोत्सव 24-25 नवम्बर को बरही कटनी म-प्र में सम्पन्न होगी। जिससे साधक अपने गृहस्थ जीवन की अनेक-अनेक बाधाओं को पार करते हुये आर्थिक सम्पन्नता की ओर अग्रसर हो सकेगें। साथ ही संन्यास महोत्सव के चैतन्य वातावरण में संकल्प धारण कर निरन्तर निरन्तर मंथन के द्वारा अपने प्राण स्वरूप सद्गुरूदेवमय जीवन की प्राप्ति हो सके।
अक्षय रूप से लक्ष्मी गौरी कार्तिकेय की चेतना को आत्मसात कर अक्षय लक्ष्मी की चेतना व चन्द्रिका मन-कामेश्वर की शक्तियों से जीवन सराबोर हो सके भारत की हृदय स्थली लखनऊ में 28-29 नवम्बर को चन्द्रिका मन कामेश्वर सद्गुरू पूर्णता साधना महोत्सव सम्पन्न होगा। जिससे नववर्ष का प्रत्येक दिवस सुमंगलमय स्थितियों से युक्त हो सकेगा। और भौतिक तथा आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर पायेंगे।
दीपावली महोत्सव गुरूधाम में सपरिवार आगमन पर आपका हृदय से स्वागत है।
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