





इच्छाओं के होने से ही आज समस्त संसार में दुःख के बीच में आनन्द की हल्की-सी झलक दिखाई पड़ती है, इस अज्ञान के घोर अन्धकार में भी ज्ञान की रश्मि समाप्त नहीं हुई। इसलिए मृत्युलोक में रहकर भी काल के प्रचंड आघात का अनुभव करके भी मनुष्य का हृदय भीतर ही भीतर अमृतपान करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है। मनुष्य की यह इच्छा निरर्थक है- ऐसा मत समझो सचमुच यह ऐसा तथ्य है, जिसे प्राप्त कर लेने पर सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं, सभी कामनाएं पूर्ण होती है और आशाएं साकार हो जाती है।
जिनके अन्तः प्राणों में दुःख है तथा जो जगत की अत्यधिक वेदना की अनुभूति से परिचित हैं, उन्हें संसार का आडम्बर और भोग-विलास भुलावें में कभी भी नहीं डाल सकता। यदि मनुष्य के जानने योग्य कुछ है, तो सर्वप्रथम उसे अपने दुःख के कारण का निदान करना होगा। मनुष्य जो कुछ चाहता है, उसी को पाने का प्रयत्न करता है और जिस उपाय से उसे सिद्धि मिलती है, वही उसका साधन है।
हमें कृतज्ञ होना चाहिए, उन अनेक ज्ञात-अज्ञात ऋषि-मुनियों का जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से न केवल अन्य क्रिया का अवलम्बन लेकर ज्ञान के सागर का मंथन किया और साधनात्मक ज्ञान की एक सम्पूर्ण परम्परा हमारे लिए छोड़ी। सम्भवतः इसी कारणवश आज भी मानव जाति का अस्तित्व है, अन्यथा जिस प्रकार घृणा, वैमनस्य, युद्ध, नरसंहार, रक्तपात का इतिहास मिलता है, उसके पश्चात् तो कदाचित् धरा पर मानव जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो गया होता।
जहां ज्ञान व व्यवहार का उचित अनुपात होता है, वहीं महासरस्वती का भी निवास होता है। दम्भ युक्त ज्ञानी अथवा ज्ञान रहित धनवान के समीप महासरस्वती का आगमन सम्भव नहीं होता। युगों से एक लोकोक्ति चली आयी है, कि लक्ष्मी और सरस्वती का परस्पर विरोध है, अतः धनवान व्यक्ति ज्ञान रहित एवं ज्ञानरहित व्यक्ति धन रहित होता है। ऐसा इसीलिए होता है मनुष्य ज्ञान, व्यवहार और धैर्य को संतुलन बनाने सक्षम नहीं हो पाता जिस कारण ऐसा घटित होता है। श्रेष्ठ मुनिजन भी कदाचित् इस लोक विश्वास को ग्रहण करने में असमर्थ रहें और फलस्वरूप उन्होंने इस दिशा में भी पर्याप्त मनन-चिन्तन किया। एक श्रेष्ठ मुनि अन्तः करण से एक श्रेष्ठ साधक तो होता है। साधनात्मक साहित्य में जहां एक ओर ज्ञान-धन-सम्पत्ति प्रदायक श्रेष्ठतम साधनाएं उपलब्ध होती है, वहीं ज्ञान पक्ष से सम्बन्धित विलक्षण साधनाएं भी प्राप्त होती हैं।
मेधावी और धनवान होने हेतु यह आवश्यक नहीं कि व्यक्ति ने शास्त्रों का अध्ययन किया हो अथवा किसी विशेष मापदण्ड पर खरा उतरता हो। कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी आयु-वर्ग का हो अथवा किसी भी व्यवसाय से सम्बन्धित हो, वह मेधावी की श्रेणी में आने का पात्र हो सकता है, यहां तक कि एक निरक्षर व्यक्ति भी मेधावी हो सकता है।
जीवन में धन की महत्ता सर्वोपरि है, क्योंकि सारा विश्व धन के ऊपर ही आश्रित है और पिछले पांच हजार वर्षों में धन को ही सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। यह अलग बात है कि हम धन का सदुपयोग करें, दान दें, भूखों को भोजन करायें और जीवन को उन्नतिशील बनाने में धन का उपयोग करें अथवा दुरूपयोग करें, यह तो अपने-अपने विवेक की बात है। अगर साधक को पूरे संसार का वैभव प्राप्त करना है तो मां भगवती तारा का ध्यान चिंतन, पूजा, अर्चना पूर्ण विधि-विधान के साथ सम्पन्न करें और हमारे जीवन में अभाव, दरिद्रता, कष्ट और पीड़ा रह जाए ऐसा हो ही नहीं सकता। चूकि भगवती तारा ही धन और ज्ञान दोनों को प्रदान करती है।
प्रेरणा पुरूष निश्चय ही किसी न किसी गर्भ से जन्म लेते हैं, भगवान राम के जन्म से चली आ रही परम्परा राम नवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, बुद्ध जयंती और महावीर जयंती को इस संसार में अवतरण दिवस के रूप में मनाते है। अपनी अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार दिव्य पुरूषों के जन्म दिवस प्रत्येक क्षेत्रों में सम्पन्न होते है। जो कि उनका अवतरण दिवस होता है। वे इस संसार में देह रूप में दस वर्ष रहें अथवा सौ वर्ष वह अपना कार्य सम्पन्न कर देते हैं। और इसे जयंती इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन दिव्य पुरूषों ने इस दिवस को आकर संसार में जय का घोष प्रारम्भ किया। घटाटोप अंधकार के बाद जो सूर्योदय के समान है।
ऋर्षि वशिष्ठ ने आद्या तारा शक्ति की चेतना से ही सामान्य से बालक राम को अस्त्र-शस्त्र, धर्नुविद्या में पारगंत किया उसी के फलस्वरूप केवल राम ही धनुष को उठा सके और सीता का वरण किया। सोलह कला पूर्ण राम को पुरूषोत्तममय बनाया। उसी के फलस्वरूप भगवान श्रीराम जन-जन में वास करते हैं। पार्वती स्वरूपा सती का नेत्र जिस स्थान पर गिरा वही स्थान तारा पीठ नाम से प्रसिद्ध हुआ। सही स्वरूप में अपने जीवन को साधने के लिए निरन्तर साधनात्मक मार्ग पर चलने से मनुष्य अपनी सांसारिक और भौतिक कामनाओं को पूर्णता से प्राप्त कर सकता है।
अपने जीवन में धन, सम्पन्नता, ज्ञान चेतना को पूर्णता से प्राप्त करने व सर्वकामना पूर्ति हेतु सद्गुरूदेव कैलाश श्रीमाली जी के सानिध्य में पूर्ण शक्ति व तेजमय सिद्धि युक्त बंगाल की भूमि पर सर्वार्थ सिद्धि दुर्गति नाशक अष्टमी महापर्व पर पूर्ण सफलता प्राप्ति दीक्षायें, पूजन, हवन, अंकन, प्रवचन की क्रियाओं से आपका जीवन धन लक्ष्मी आयु वृद्धि से युक्त हो सकेगा। जिससे कि साधक अपने आप को ज्ञान और लक्ष्मी युक्त बना सके।
बंगाल की भूमि ही ऐसी दिव्यतम है कि इस पर बड़े-बड़े तांत्रिक शक्ति की उपासना करने में अपना सौभाग्य समझते हैं। कई श्रेष्ठ साधकों ने इस बंगाल की पावन भूमि पर जन्म लिया और अपने आध्यात्मिक बल और तप बल से सारी दुनिया को ये संदेश दिया कि जीवन में हर तरह की शक्ति जो कि सकाम् युक्त हो उसकी प्राप्ति केवल और केवल शक्ति की साधना, आराधाना करके ही पूर्णरूपेण स्वरूप में जीवन में उतारी जा सकती है। इसी हेतु पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी के जन्मोत्सव के पावन पर्व पर साधको को परागमविद्याम् अंकन दीक्षा और वैभव धन लक्ष्मी तारा शक्ति दीक्षा प्रदान करेगें, जिससे साधक अपने जीवन में सद्गुरु चिन्तन मनन में लीन होकर पूर्णता के साथ भौतिक सुखों को आत्मसात कर सकेंगे।
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