





प्रकाश के संबंध में कोई भी तर्क नहीं है समझाने का कि हम उसे समझा पाये कि प्रकाश है। यदि आप सोचते है कोई तर्क है, जो नेत्रहीन आदमी को भरोसा दिला दे कि प्रकाश है। अब तक कोई तर्क नहीं खोजा जा सका। नेत्रहीन आदमी को प्रकाश का भरोसा तो दिलाना दूर, अंधेरे का भी भरोसा नहीं दिलाया जा सकता कि अंधेरा भी है। आमतौर से हम सोचते हैं कि शायद नेत्रहीन को अंधेरा रहता होगा। पर हम गलत सोचते हैं। नेत्रहीन को अंधेरा भी नहीं दिखायी पड़ता है। क्योंकि अंधेरा देखने के लिए भी आंख ही चाहिए। ऐसा मत सोचना आप कि नेत्रहीन अंधेरे में जीता है। अंधेरे को देखना भी आंख के ही द्वारा संभव है। प्रकाश और अंधेरा, दोनों ही आंख के अनुभव हैं।
कभी देखा होगा आकाश में थोड़े बादल हैं, थोड़ी वर्षा हो रही है, एक कोने से सूरज निकल आया है बादलों को चीरकर और इंद्रधनुष बन गया है। क्या आपने कभी यह सोचा है अपने मन में कि अगर आप आंख बंद कर लें, तो भी इंद्रधनुष आकाश में रहेगा कि नहीं रहेगा? आप निश्चित ही कहेंगे कि मेरी आंख से क्या लेना-देना? मैं आंख बंद करूं, तो इंद्रधनुष रहेगा। किन्तु विज्ञान कहता है कि आपके आंख बंद करते ही इंद्रधनुष नहीं रहेगा। क्योंकि इंद्रधनुष के बनने के लिए सूरज की किरण चाहिए, पानी की बूंद चाहिए और आंख चाहिए। तीन चीजें चाहिए। सूरज की किरण एक खास कोण पर पानी की बूंद से गुजरे और आंख पर एक खास कोण पर गिरे तो इंद्रधनुष निर्मित होता है। इंद्रधनुष आप वहां देखते हैं ऐसा मत समझना, आपकी आंख भागीदार है उसको निर्माण करने में।
किसी कमरे में आप बैठे हुये होते हैं। कई रंग के पर्दे लटके हुए हैं, कुर्सियां, दीवारों पर रंग हुआ हैं, किताबें बहुत रंग की रखी हुई हैं, कई रंग हैं। क्या कभी आपने सोचा कि जब आप प्रकाश बुझा देते हैं, तो आपकी लाल कुर्सी लाल नहीं रह जाती और आपके हरे पर्दे हरे नहीं रह जाते? आप सदा रात को सोते होंगे तब यही सोचते होंगे आप अंधेरे में, अपने कमरे का जो पर्दा है वह अभी भी हरा होगा, तो आप गलती में हैं। ये तथ्य मैं कह रहा हूं, इनका धर्म से कुछ लेना-देना नहीं है। पर्दे के हरे होने के लिए सूरज की किरण चाहिए, आदमी की आंख चाहिए। अगर ये दोनों मौजूद न हों, पर्दा हरा नहीं होता। क्योंकि जो पर्दा आपको हरा दिखायी पड़ता है, वह हरा होता नहीं है-या किसी भी प्रकार की किरण पड़ती है, तो किरण में सात रंग हैं। जब भी किसी चीज पर किरण पड़ती है, तो वापिस लौटती है। और हर वस्तु-कोई वस्तु रंगीन नहीं है-हर वस्तु इन सात किरणों में से कुछ किरणों को आत्मसात कर लेती है और कुछ किरणों को वापिस लौटा देती है।
आप जो भी सोचते हैं, वह आपकी इंद्रियों के द्वारा दिया अनुभव होता है। मन इंद्रियों का राजा नहीं है, इंद्रियों का अनुगामी है। केवल इंद्रियों की छाया है। आंख देती है, कान देता है, हाथ देता है, नाक देती है, जबान देती है, यह सारे अनुभव व्यक्ति का मन एकत्रित करता है। और उनके पीछे चलता है। आपकी पांच इंद्रियां हैं, उन्होंने जो-जो आपको दिया है, क्या मन ऐसी कोई चीज कभी सोच सकता है जो इन पांच इंद्रियों से संबंधित न हो? एक भी बात नहीं सोच सकता। क्योंकि जमीन पर बहुत तरह के प्राणी हैं। कुछ प्राणी हैं जिनके पास चार इंद्रियां हैं। उनके पास आंख नहीं है। तो उन प्राणियों के चिंतन में प्रकाश कभी भी रूप नहीं लेगा। कुछ प्राणी के पास तीन इंद्रियां हैं, उनके पास कान नहीं है। तो उन प्राणियों के जीवन में प्रकाश और ध्वनि का कभी कोई चिंतन, विचार, स्वप्न अनुभव नहीं होगा।
अगर कहीं किसी उपग्रह पर कहीं जीवन हो और वहां जो व्यक्ति हों उनके पास छः इंद्रियां हों, तो उसकी छठीं इंद्रियां की तुम कल्पना भी नहीं कर सकते कि उससे वह क्या जानते होंगे। अगर चार इंद्रियां हो सकती हैं तो तीन भी हो सकती हैं, छः भी, सात भी और दस भी हो सकती हैं। अगर दस इंद्रियों वाला प्राणी तुम्हें कहीं मिल जाए तो तुम सोच भी नहीं सकते कि वह क्या सोचता होगा। और वह हमसे कहे भी तो हमारी समझ में कुछ भी न आएगा। उसके शब्द ही हमें अलग, अर्थहीन लगेंगे। हमारे पास पांच हैं तो हम सोचते हैं, पांच इंद्रियों पर जगत समाप्त हो गया। जिनके पास चार हैं, वह सोचते हैं चार अनुभव में जगत की समाप्ति हो गयी। जिनके पास तीन हैं, वह समझते हैं तीन में जगत पूर्ण है। जो आदमी इन्कार करता हो कि मैं नहीं हूं, उसका इन्कार ऐसा ही होगा। इन्कार करने में भी तो मैं मौजूद हो जाता है। लेकिन इस मैं का आपको पता कैसे चलता है? कौन-सी इंद्रिय ने, किस माध्यम से आपको ज्ञात हुआ कि आप हैं? तब तुम बड़ी मुश्किल में पड़ जाओगे। लेकिन इंद्रिय से यह ज्ञात नहीं हुआ। निश्चित ही जो आपका अनुभव है, वह इंद्रियों से उत्पन्न नहीं होता। आप अपने को जानते हैं कि मैं हूं, बिना किसी कारण के!
इसीलिए आप ख्याल में ले लें, अगर सारी इंद्रियां भी किसी व्यक्ति से अलग कर दी जाएं तो भी उसके होने का बोध नहीं लुप्त होता। अगर किसी व्यक्ति का हाथ गया तो भी उसके होने के बोध में कमी नहीं पड़ती। आंखें, जबान किसी दुर्घटना में चली गई। आपने देखा होगा जो व्यक्ति अपंग होते है उनके होने से भी कभी उनके होने के बोध में कमी नहीं होती। लेकिन एक बात है, इससे व्यक्ति के होने के बोध में इंच भर भी कमी नहीं होती। क्योंकि अगर व्यक्ति होने का बोध आंख से मिला ही नहीं था तो आंख के हटने से खोएगा भी क्यों? लेकिन व्यक्ति की आत्मा छोटी नहीं होती और कभी-कभी तो बड़ी होती है। बड़ी का मतलब है कि जगत छोटा होता है, इसलिए ध्यान बंटने के लिए बाहर का कम उपाय होता है, तो ध्यान भीतर की तरफ प्रवेश करने लगता है।
इंद्रियों से उसका बोध नहीं होता। उसके बोध का कोई संबंध इंद्रियों से नहीं है। इसलिए मनुष्य की सारी इंद्रियां भी हट जाएं तो भी वह उतना ही होता हैं जितना था। जिसका बोध इंद्रियों से नहीं होता। अगर आप मुझे दिखायी पड़ रहे हैं तो प्रकाश चाहिए। अभी पिछले शिविर में प्रकाश बुझ गया था, आप मुझे दिखायी नहीं पड़ रहे थे। लेकिन सारा प्रकाश जगत से बुझ जाये, तो भी क्या ऐसा हो सकता है कि मैं स्वयं को दिखायी न पडूं? सारे जगत का प्रकाश बुझ जाये, गहन अंधकार हो जाये, कुछ भी मुझे न दिखायी पड़े, तो भी एक तो मुझे दिखायी पड़ता रहेगा, वह मैं स्वयं हूं। यह जो मेरे भीतर का अस्तित्व है। आपके भीतर भी जो है वह अस्तित्व ही है।
जीवन के गणित को अगर हम समझे तो जीवन सदा ही द्वंद के बीच एक संतुलन है। उस दो में से हम एक को घटाने की इच्छा करते हैं। तो हमें पता नहीं है कि जीवन का संतुलन बिखर जाएगा तत्काल। जीवन एक संतुलन है। यहां भलाई और बुराई के दो पलड़े हैं एक ही तराजू के। और इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि बुराई मिट जाए, असली सवाल यह नहीं है कि भलाई बढ़ जाए, असली सवाल यह है कि बुराई और भलाई जिस सूत्र से जुडे़ हैं वह सूत्र हमें ज्ञात हो जाए। तो फिर न बुराई बुराई रह जायेगी, न भलाई भलाई रह जायेगी। जैसे कि अगर हम एक मकान में एक ‘आर्च’ बनाते हैं, एक दरवाजा बनाते हैं गोल, तो दोनों तरफ उलटी ईंटे लगाते हैं। और उन्हीं उलटी ईंटों के सहारे पूरा भवन खड़ा हो जाता है। एक-सी ईंटें एक दूसरे को साध लेती है। और उन्हीं उलटी ईंटों का वजन जब संतुलित हो जाता है, तो महाशक्ति पैदा हो जाती है।
जीवन में अगर मलिनता और बोझिलता रहेगी तो जीवन नीरस ही रहेगा। अपने जीवन को आनन्द और सांसारिक क्रियाओं के साथ मन-विचार और भावों को अपने सद्गुरुदेव के चरणों में लीन करना और भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सर्व श्रेष्ठ है। सुखी जीवन की आकांक्षा सभी को होती है, पर उसकी उपलब्धि तभी संभव है जब हम अपने दृष्टिकोण की त्रुटियों को समझें और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करें। सुधरा हुआ दृष्टिकोण साधनों और परिस्थितियों में भी शांत और संतोष को कायम रख सकता है। वर्ष भर में अपने इष्ट अपने गुरु के लिए क्या सद्कार्य किये। इस क्रिया में कहाँ न्यूनता और कमी रही है। इसका विवेचन कर, इन न्यूनताओं को समाप्त करें। जिससे आने वाला नूतन वर्ष पूर्णरूपेण आनन्दमय बन सकें।
मैं संदेश देता हूं कि अपने भीतर झांक कर एक आत्म विश्लेषण की प्रक्रिया प्रारम्भ कर अपने आपको हृदय के आनन्द भरे दर्पण में देखकर मेरे हृदय से लगने के लिये आ जाओ— नववर्ष की ज्योर्तिंमय नूतन चेतना से आप्लावित करने हेतु सद्गुरुदेव के सानिध्य में नववर्ष पूर्ण लक्ष्मी वृद्धि साधना महोत्सव 1-2-3 जनवरी को त्रिवेणी भवन व्यापार बिहार, बिलासपुर (छ-ग) में सम्पन्न होगा। नव महालक्ष्मी भाग्य निर्माण चण्डी दीक्षा, सहस्त्रार चक्र जागरण कुण्डलिनी दीक्षा, सम्मोहन वशीकरण दीक्षा, स्वः रूद्राभिषेक, हवन, अकंन, प्रवचन की श्रेष्ठतम क्रियायों के माध्यम से साधक का जीवन उमंग, जोश, उत्साह, स्फूर्ति, सफलता, आर्थिक सृजन की चेतना से आपूरित होकर नववर्ष के प्रथम दिवस से ही श्रेष्ठता की ओर गतिशील हो सकेंगे।
जगदम्बा के ‘तारा’ स्वरूप की साधना मंत्र जप, दीक्षा, साधना सम्पन्न करने से सभी विपदाओं पर सरलता से विजय प्राप्त होती है। इसीलिये तारा को विपदा विदारिणी कहा गया है। जीवन में अविद्या, द्वैष, अस्मिता, राग, अभिनिवेश और इसी से निर्मित दैहिक दैविक भौतिक तापो से साधक को महाविद्या तारा शक्ति पीठ मुक्त करने में सहायक है। सद्गुरु जन्मोत्सव के पावन पर्व पर सद्गुरुदेव के सानिध्य में बंगाल की चैतन्य तांत्रेक्त भूमि पर 52 शक्ति पीठों में श्रेष्ठतम तारा शक्ति की तपोभूमि पर तारा वैभव लक्ष्मी साधाना महोत्सव 16, 17 जनवरी आसनसोल (W.B) में सम्पन्न होगा। साथ ही स्व-रूद्राभिषेक भी सम्पन्न कराया जायेगा। जिससे साधक धन, यश, सुख-समृद्धि से युक्त हो सकें।
इस नववर्ष में घर के प्रत्येक कार्य में सर्व प्रथम सद्गुरु का स्मरण कर आशीर्वाद प्राप्त करे, जैसे आपके भाव विचार होते है वैसी ही क्रिया रूप में कार्य होते है और जैसा कार्य हम करते है उसका वैसा ही फल हमें मिलता है इसीलिए अपने आप को श्रेष्ठमय ज्ञानवान हर दृष्टि से जीवन को उन्नतिशील बनाने हेतु सांसारिक क्रियाओं के साथ मन विचार और भावों के रूप में विद्यमान सद्गुरुदेव के ज्ञान के प्रसार के लिए क्रियाशील रहेंगे तो सद्गुरुदेव भी निरन्तर-निरन्तर आपके श्रेष्ठ कार्यों में पूर्ण सहयोगी बन सकेगें। 31 दिसम्बर कैलाश नारायण धाम दिल्ली में नववर्ष पर आप सभी से मिलकर मुझे खुशी होगी।
Happy New Year 2016
मेरे सभी मानस पुत्र-पुत्रियों को नववर्ष 2016 की हार्दिक मंगलमय शुभकामनाएं।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,