





हमने गुरु दीक्षा साधना व पूजन का अर्थ यही तक सोच रखा है, कि हमने न्यौछावर अनुदान देकर अपने पाप धो लिए है और दुःख के शिकंजे से अपने को मुक्त कर लिया है। इसी भ्रम में रहते हुये जब हमें दुःख के बादल आ घेरते हैं, तब हमें होश आता है और फिर शुरू हो जाता है तनाव व उलाहनाओं का दौर! हम हाय-तौबा मचाते हैं, कि हम तो परम पूज्य गुरुदेव के शिष्य है फिर हमें तकलीफ कैसी? ये तकलीफ तो होगी ही, क्योंकि हमने गुरु और गुरु के महत्व को समझा ही कहां है? हमने तो गुरु को दर्द निवारक दवा समझ रखा है, जो एक बार ली, तो जीवन भर कोई समस्या ही नहीं! शिष्यत्व के अधिकारी हम आसानी से बन गए है, इसी कारण हमें इसका मूल्य नहीं मालूम?
छत्तीसगढ़ी बोली में एक कहावत है- ‘फोकट के पाए, ते भरत ले खाए’ अर्थात् आसानी से मिलने वाली वस्तु का मूल्य, हमें उससे विछोह होने पर ही मालूम होता है। हम शिष्यत्व प्राप्ति के लिए न तो तलवार की धार पर ही चले है और न ही हमने एकलव्य की भांति अंगुष्ठ को काटकर गुरु दक्षिणा ही दी है।
दुःख और सुख, तो एक सिक्के के दो पहलू है। जीवन-मृत्यु की तरह दुःख और सुख भी शाश्वत और सनातन है, फिर इससे भय कैसा? और फिर आग में तप कर ही, तो सोना चमकता है। दुःख तो स्वयं भगवान राम, श्री कृष्ण ने भी सहे है। उनका तो सारा जीवन दुःख के घने जंगलों में बीता और सुख का सूर्य उस जंगल में प्रकाश की भांति टिमटिमाता रहा। वे तो स्वयं ब्रह्मा है, फिर हम तो मानव है और हम वह मानव है जो गुरु की गुरुता पर नहीं अपितु शिष्य की नीचता पर दम भरने वाले मानव है।
गुरु दीक्षा का यह अर्थ नहीं है, कि दुःख विषाद के क्षण हमें भोगने न पड़े अपितु गुरु तो वह व्यक्तित्व है, जो घोड़े को पानी तक ले जा सकते है, किन्तु पानी पीना या न पीना, तो घोडे़ पर निर्भर करता है। आपके सामने थाली में लड्डू रखे हैं और उठाकर खाने है बल्कि लड्डू से ही विनती करने लगें कि वह आपके मुह में स्वतः ही चला जाए, तो यह व्यक्ति की मूर्खता है।
गुरु तो मार्ग की कठिनाइयों में आपके सहयोगी है, आपके तारणहार हैं। वे पथ प्रदर्शक हैं, राह का पुल नहीं। आपकी राह में गढ्ढ़े खड्ड़े और कांटे आयेंगे ही क्योंकि आपने सत्य का पथ चुना है, किन्तु आपने यदि गुरु को अंगीकार किया, तो वे जरूर आपको आगाह करेंगे, कि बेटा! अमुक जगह संभलकर जाना, खड्ड़े है या अमुक स्थान पर रास्ता ठीक नहीं है। वे आपके रास्ते के गढ्ढ़े को समतल नहीं करेंगे, वे आपके रास्ते की कठिनाइयों को हटायेगे नहीं, अपितु आपको सावधान ही करेंगे।
लेकिन हम तो उल्टे ही गुरु से गुरुत्व का प्रमाण मांगते है। हर व्यक्ति को, चाहे वह किसी भी क्षेत्र से सम्बन्धित हो, उसे पथ प्रदर्शक या गुरु की आवश्यकता तो पड़ती ही है। चाहे छोटे से छोटा कार्य भी क्यों न हो, उसे उस क्षेत्र के गुरु से लगन, धैर्य, श्रद्धा और समर्पण से ही सीखा जा सकता है।
फिर तो हम समाज के प्रबुद्ध जन है, प्रसिद्ध वैज्ञानिक है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्सटन का कहना था ‘दुनिया में कुछ भी असम्भव नहीं है, अगर दृढ़ निश्चय और लगन हो।’
मीरा के गुरु ने तो उसे कान्हा के नाम का पथ मात्र ही दिखाया था पथ तय कर परमपद मीरा ने स्वयं ही प्राप्त किया था। सिकंदर महान अपने गुरु अरस्तु के साथ कही जा रहे थे, तो राह में नाला आने पर अरस्तु ने सलाह दी ‘तुम मेरी पीठ पर सवार होकर नाला पार करो’ तो सिंकदर का जवाब था ‘अगर आप जीवित रहे, तो मेरे जैसे हजार सिंकदर बना सकते हैं किन्तु अगर मैं जीवित रहा, तो मेरे जैसे हमार सिकंदर भी अरस्तु को नहीं बना सकते हैं। बहुत कम साधक सोचते है कि वे असफल क्यों हो जाते हैं- क्योकि हम जल्दबाज और धैर्य रहित हैं। अज्ञानी क्यों हैं?- क्योंकि हममें कार्य और गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा ही नहीं, तो फिर सफलता का प्रश्न ही नहीं उठता है।
जिसका गृहस्थ जीवन दुःखमय होता है, उसको जीवन में ही नारकीय पीड़ा भोगनी पड़ती है। कहने का तात्पर्य है, कि गृहस्थ जीवन में व्यक्ति को कई प्रकार के समझौते करने पड़ते हैं, नित्य प्रति तनाव झेलना पड़ता है। पचासों प्रकार के कर्त्तव्य निभाने पड़ते हैं और इन सब को निभाते हुये, जो साधना मार्ग पर आगे बढ़ता है, वही तो वास्तविक साधक है। केवल जंगलों में भटकने से अथवा जीवन से भागकर साधना नहीं की जा सकती। गृहस्थ जीवन के कर्म क्षेत्र में रहते हुये साधनायें कर जीवन को, जो सुखमय, सुन्दर बनाने का प्रयास करता है वही तो वास्तव में सच्चा साधु है, जो गृहस्थ जीवन को साक्षीभाव से जीता हुआ, उसे चलचित्र की भांति देखता हुआ, अपने साधना मार्ग पर अग्रसर होता है वही वास्तविक संन्यासी है।
यह हमारा सौभाग्य है कि हमें दादा जी परम पूज्य सद्गुरुदेव डॉ नारायण दत्त श्रीमाली जी जैसे महामानव के आशीर्वाद तले अपना जीवन व्यतीत कर रहे है जो स्वयं ब्रह्म है और ब्रह्म के सानिध्य में रहकर भी हम अज्ञानी है, तो यह हमारा दुर्भाग्य ही है वे यहां अपना चमत्कार दिखाने अवतरित नहीं हुये उनका अवतरण, तो स्वार्थ साधना की आंधी में नव युग निर्माण के लिए हुआ था। उनका अवतरण, तो वैदिक धर्म की रक्षा हेतु हुआ था। उनका अवतरण, तो दरिद्रो के उत्थान के लिए हुआ है, फि़र बीच में ये अहं की दीवार कैसी? तोड़ डालिए ऐसी जंजीरों को, जो आपके गुरु के प्रति विश्वास को तोड़ती हो। छोड़ दीजिए उन मान्यताओं को, जो आत्मा के परमात्मा से मिलन में बाधक है। अपने हृदय में झांक कर देखिये, सद्गुरुदेव बाहे फ़ैलाए आपके आलिंगन के लिए तैयार है।
गुरु अपने आप में समस्त ऐश्वर्य के अधिपति होते हैं, उनके विभिन्न अंगों में समस्त देवी देवता स्थापित होते है। सभी देवों के वे समन्वित रूप होते हैं, सर्व देवमय होने के कारण प्रथम आराध्य एवं पूजनीय हैं। वे परमेश्वर के साक्षात् मूर्तरूप हैं, मानव रूप में ये समस्त साधनाओं के सूत्रधार है। साधनाओं में सफलता के लिए अन्य साधनाओं से पूर्व गुरु साधना अपेक्षित होती है। कई बार साधकों को अनेक प्रयासों के बाद भी सफलता नहीं मिल पाती, कोई अनुभूति भी नहीं होती, इस स्थिति में भी गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा एवं समर्पण की भावना तथा दृढ़ निष्ठा होनी चाहिये।
किसी भी शिष्य के जीवन का सबसे अधिक महत्वपूर्ण पर्व होता है उसके गुरुदेव का जन्म दिवस! जब वह न केवल उनके चरणों में अपना सब कुछ निवेदित करते हुये अपना मनोवांछित अवसर प्राप्त करने का अवसर पा जाता है।
आपका अपना
विनीत श्रीमाली
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,