





दो तरह के व्यक्ति होते है – एक व्यक्ति सद्गुणों का आगार होता है, भण्डार होता है, जिसकी भावना निरन्तर सद्कार्य करने की रहती है और एक व्यक्ति षडयंत्र का भण्डार होता है जो कि चौबीसों घण्टे यही सोचता कि मैं कैसे छल करूं? कैसे झूठ बोलूं? कैसे प्रपंच रचूं, कैसे इनको फुसलाऊं? कैसे इनमें फूट डालूं? कैसे इन दोनों को लड़ाऊ। कैसे अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करूं?
जीवन में उंचा उठना है और यदि नहीं उठते हैं तो यह जीवन व्यर्थ है, क्योंकि ऊंची सीढ़ी पर चढ़ना बहुत कठिन है, नीचे फि़सलना बहुत आसान है। दस सीढि़यों से नीचे उतरने में एक सेकण्ड लगता है, परन्तु दस सीढ़ी चढ़ने में आपको बीस सेकण्ड लगेंगे। एक-एक सीढ़ी चढ़नी पड़ेगी, आपको निरन्तर-निरन्तर यही चिंतन करना पड़ेगा कि मैं शिष्य बन रहा हूं या नहीं बन रहा हूं। क्या मेरे अन्दर राक्षस प्रवृति पनप रही है या सद्गुणों का विकास हो रहा है? मेरा जीवन कैसा व्यतीत हो रहा है – अपने आप में विश्लेषण करना जीवन की श्रेष्ठता है, महानता है, और यह वह व्यक्ति कर सकता है जो अपने आप में बिल्कुल शिष्यवत बनकर गुरू से एकाकार होने की सामर्थ्य रखता है, और शंकराचार्य कहते है, ऐसे ही व्यक्ति गुलाब के फ़ूल बनते है, जो सही अर्थों में गुरू के लिये अपने आपको समर्पित कर देते है।
चिंतन में एक संघर्ष है अन्दर। जो भी आप चिंतन करते है, उससे आप जूझते हैं, लड़ते हैं, एक आन्तरिक लड़ाई चलती है। आप अपनी सारे अतीत की स्मृति और सारे अतीत के विचारों को उसके खिलाफ खड़ा कर देते है। फिर भी अगर हार जाते हैं, तो मान लेते हैं, लेकिन मानने में एक पीड़ा, एक कांटा चुभता रहता है। वह मानना मजबूरी का है। उस मानने में कोई प्रफुल्लता घटित नहीं होती। उस मानने से आपका फूल खिलता नहीं है, मुर्झाता है। चिंतन और चिंता में कोई गुणात्मक फर्क नहीं है। सब चिंतन चिंता का ही रूप है। बेचैनी है उसमें छिपी हुई एक तनाव है। क्योंकि एक भीतरी संघर्ष है, कलह है, लड़ाई है एक। इसलिये विचारक बूढ़ा होते-होते झुक जाता है बोझ से! विचार के ही बोझ से झुक जाता है। मनन् और चिंतन का फर्क है चिंतन शुरू होता है तर्क से, मनन शुरू होता है श्रवण से। चिंतन शुरू होता है संघर्ष से, मनन शुरू होता है श्रवण से। श्रवण ग्राहकता है, कोई संघर्ष नहीं है। तो मनन और चिंतन का पहला फर्क है। मनन्, जीवन का जो शुभ्र शुक्ल पक्ष है, उससे शुरू होता है। चिंतन, जीवन का जो कृष्ण अंधेरा पक्ष है, उससे शुरू होता है। विचार, तर्क बड़े सहयोगी हैं तब पूरी निष्ठा से युक्ति की जा सकती है और युक्ति से फिर नुकसान नहीं होता। फिर युक्ति सहयोगी बन जाती है।
संसार और परमात्मा में विरोध नहीं हैं, कोई राक्षस नहीं है और परमात्मा के विपरीत कोई शक्ति नहीं है। फिर यह संसार कैसे है? परमात्मा की आभा में ही है -जिसको माया कहा जाता हैं- परमात्मा की छाया है संसार। जैसे कोई आदमी खड़ा हो और उसकी छाया बने। छाया का कोई अस्तित्व तो नहीं होता- तलवार से काटें तो कट नहीं सकती, आग से जलाएं तो जल नहीं सकती, पानी में डुबाना चाहें, डूब नहीं सकती, अस्तित्व नहीं होता, फिर भी छाया तो होती है। आपके पीछे चलती है। दौड़े तो आपके पीछे दौड़ती है, रूकें तो रूक जाती है। जब भी कोई चीज अस्तित्ववान युक्त होती है, तो उसकी छाया भी होती है। कोई भी चीज बिना छाया के नहीं होती। जो भी चीज होती है, उसकी छाया होती है। अगर ब्रह्म है, तो उसकी छाया होगी और उस छाया को कहते है माया। ब्रह्म की छाया संसार है।
छाया और व्यक्तित्व के कारण आदमी दो टुकड़ों में टूट जाता है। कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि सामान्य आदमी में दो व्यक्तित्व होते है। ऐसा मालूम पड़ता है कि एक आदमी के भीतर दो आदमी हैं। कहता कुछ है, करता कुछ है, कोई तालमेल नहीं दिखाई पड़ता। जैसे भीतर दो आदमी है। कभी बड़ा शांत, कभी बड़ा अशांत, कभी मौन, कभी बड़ा मुखर, दो हिस्से हो गए हैं। आपका एक छाया व्यक्तित्व है, जिसमें जो-जो आप इन्कार कर देते हैं आपके अन्दर वह एकत्र होता जाता है। कभी-कभी मौका पाकर, कोई कमजोर क्षण पाकर, कोई संधि पाकर, छाया व्यक्तित्व अपने को प्रकट कर देता है। हर चीज के विपरीत चीजें है। कोई चीज इस धरातल में बिना विपरीत के नहीं होती। जैसे प्रकाश है, तो अंधेरा है, जीवन है, तो मृत्यु है, गर्मी है, तो सर्दी है, स्त्री है तो पुरूष है। सारा जगत दोहरी व्यवस्था से युक्त है।
माया ब्रह्म की छाया है। और बड़े विराट पैमाने पर माया है छाया ब्रह्म के विपरीत है। उसी तरह व्यक्ति के छोटे से तल पर अविद्या है। अविद्या साधारण मनुष्य के पैमाने पर माया है। आपके आस-पास अविद्या भी है। अब क्या किया जा सकता है? यदि परम अस्तित्व भी माया से घिरा है, तो छोटे-छोटे व्यक्ति, कैसे अविद्या को छोड़ पायेगे! ब्रह्म नहीं छोड़ पाया माया को तो साधारण मनुष्य अविद्या को कैसे छोड़ पाएंगे! और अगर नहीं छोड़ पा सकते, तो सारी धर्म की चेष्टा व्यर्थ हो जाती है। मनुष्य अविद्या को तभी छोड़ सकते है, जब वह मिटने को राजी हो जायें। यदि मिटने को राजी नहीं है, तो अविद्या नहीं मिट सकती, मनुष्य में द्वंद्व जारी रहेगा। दोनों रहेंगे या दोनों मिट जायेंगे। एक ही रास्ता है कि मैं मिट जाऊं तो मेरी छाया भी मिट जायेगी। इसलिये अहंकार को मिटाने पर इतना जोर दिया है।
मैं ब्रह्म में लीन होकर एक हो जाता हूं। मैं की तरह नहीं, शून्य की तरह ब्रह्म में लीन हो जाता हूं। मेरी अविद्या का क्या होता होगा? जब मैं मिटता हूं, मैं ब्रह्म में लीन हो जाता हूं, मेरी अविद्या माया में लीन हो जाती है। मैं खो जाता हूं ब्रह्म में, अविद्या खो जाती है माया में। जब भी मैं निर्मित होता हूं, मैं निकलता हूं ब्रह्म से, अविद्या निकलती है माया से। माया दुख देती है, अविद्या पीड़ा देती है, ब्रह्म से मतलब कोई व्यक्ति नहीं, यह विराट अस्तित्व! ब्रह्म के तल पर माया का होना स्वीकृत है। उसका कोई इनकार नहीं है। इसलिए कोई पीड़ा नहीं है। हमारे तल पर पीड़ा है। अगर हम भी स्वीकार कर लें तो वहां भी कोई पीड़ा नहीं है। जहां अविद्या स्वीकृत है वहां नष्ट करने की कोई जरूरत नहीं है। जहां स्वीकृत नहीं है, वहां अविद्या नष्ट करनी पडे़गी। ‘जिसका मन ब्रह्म में लीन हुआ हो, वह निर्विकार और निष्क्रिय रहता है। ब्रह्म और आत्मा शोधा हुआ, और दोनों के एकत्व में लीन हुई वृत्ति विकल्परहित और मात्र चैतन्य रूप बनती है, तब प्रज्ञा कहलाती है। यह प्रज्ञा जिसमें सर्वदा होती है, वह जीवन मुक्त है। ज्ञानी जब देखता है तो देह दिखाई ही नहीं पड़ती, अज्ञानी जब देखता है तो आत्मा का कोई पता नहीं चलता। अज्ञानी के देखने का ढंग ऐसा है कि देह ही पकड़ में आती है, और ज्ञानी का देखने का ढंग ऐसा है कि आत्मा ही पकड़ में आती है। ज्ञानी को देह दिखाई पड़नी असम्भव है, अज्ञानी को आत्मा दिखाई पड़नी असंभव है। त्याग के दो मार्ग एक तो मिट जायें, अविद्या मिट जाये। दूसरा मार्ग राजी हो जाये, स्वीकार कर लें जो है उसके बाहर जाने की आकांक्षा छोड़ दें, तब जो शेष रह जाता है वही ब्रह्म है।
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