





जब गुरु तुम्हारी भाषा में समझाने लगता है, फिर तुम्हारी बुद्धि तोल-मोल शुरू कर देती है। तुम अपनी बुद्धि से गुरु के व्यक्तित्व को तोलने लगते हो, उनको अपने जैसा ही समझने लगते हो, फिर तुम्हारा हाल माया मिली ना राम जैसा हो जाता है। ना ही तुम राम को पाते हो, ना ही माया मिल पाती है।
आज के समय में सारा खेल बुद्धि का है, बुद्धि तक ही मनुष्य सीमित हो रहा है। उसके आगे के तथ्य की ओर पहुंचना उसके लिये मुश्किल है और मुश्किल होना भी स्वभाविक है, क्योंकि बुद्धि और ज्ञान का कोई मेल-जोल नहीं है। सत्य भी यही है कि बुद्धि ने ही तुम्हारा सारा खेल बिगाड़ा है, तुम गुरु के पास, ईश्वर के पास जाते हो बुद्धि लेकर, बुद्धि से ताल-मेल बनाते हुये वापस भी आ जाते हो। कितनी मूढ़तापूर्ण बात है, जहां से तुम हीरे-मोती ला सकते हो, वहां से केवल और केवल कंकड़-पत्थर लेकर वापस आ जाते हो। तुम जाते हो गुरु के पास संतोष पाने, सुख पाने के लिये। कोई व्यक्ति संताप पाने के लिये गुरु के पास नहीं जाता। जबकि अध्यात्म की कसौटी पर पहला साक्षात्कार संताप से ही होता है।
मेरा केवल इतना ही समझाने का प्रयास है कि राम या माया में किसी को तो चुन लो, किसी के बन जाओ, किसी एक को अपना बना लो, और दोनो में से किसी को भी पाने के लिये अपना सबकुछ न्यौछावर करना पड़ेगा, राम को पाना है, तो भी न्यौछावर करना पड़ेगा, माया को पाना है तो भी। क्योंकि सृष्टि संचालन का यह सिद्धान्त है कि पाने से पहले खोना पड़ेगा, कुछ प्राप्त करने से पूर्व अपना जो कुछ भी है, उसे देना पड़ेगा।
एक व्यापारी जब व्यापार करने निकलता है, तो अपने पुरखों के द्वारा एकत्रित किया हुआ सारा धन, अपने जीवन भर की मेहनत की कमाई सब उस व्यापार में लगा देता है, पैसा कमाने में लगा देता है, कुछ भी नहीं बचाता अपने पास, और उसका दिमाग, दिनचर्या, सोना-उठना-बैठना सब उसी व्यापार में ही होता है। फिर वह धन कमाने में सफल हो पाता है।
ऐसा ही सिद्धान्त राम-माया दोनों में चलता है, किसी को भी पाने के लिये अपना सब कुछ दांव पर लगाना पड़ेगा। लेकिन गुरु के पास इस बात की गारण्टी है, कि घाटा नहीं होगा, तुम्हारा अहित नहीं होगा, सांसारिक व्यापार में हो सकता है, वहां कोई गारण्टी नहीं है, लेकिन गुरु के पास कोई नुकसान नहीं होगा। इसलिये तुम बुद्धि पक्ष के लोग गुरु के साथ व्यापार कर सकते हो, गुरु तैयार है तुम्हारे साथ व्यापार करने को, लेकिन व्यापार की नीति अपनानी पड़ेगी, गुरु नहीं चाहता व्यापार करना, गुरु का काम है भी नहीं व्यापार करना, गुरु को तो निश्छल हृदय चाहिये, लेकिन आते हैं, सभी बड़े बुद्धिमान, बुद्धि वाले लोग। और केवल बुद्धि के साथ ही नहीं, अपने साथ अपना तराजू, पैमाना सब लेकर आते हैं, नाप-तौल-मोल सब करते हैं।
गुरु भी देखता है कि यह कितना बड़ा बनिया है, और बनिया डाल-डाल, तो गुरु पात-पात, फिर या तो बनिया अपनी बनियागिरी छोड़े या गुरु को छोड़े, बड़ा मुश्किल हो जाता है। फिर वही टिक पाते हैं, जो दांव लगाना जानते हैं, जिनमें साहस होता है, और उससे बड़ी बात जिनको अपने गुरु पर अपार, असीम श्रद्धा, विश्वास होता है। बाकी छोटे-मोटे तो ऐसे ही भाग जाते हैं, उनका टिकना संभव भी नहीं हो पाता।
आज का युग अर्थ प्रधान युग है, इस युग में अर्थ की प्रधानता है। पहले के युग में साधना, सेवा की प्रधानता थी। पहले के लोग कर्म करते थे, ईश्वरत्व चेतना प्राप्त करने के लिये, जीविकोपार्जन की आवश्यकता भर ही वे अर्थ को महत्व देते थे, बाकी का समय उनका ईश्वरत्व पर केंद्रित होता था। अब ऐसा नहीं है, आज के लोग जीविकोपार्जन नहीं, ऐशो-आराम, एक-दूसरे से बड़ा कमाऊ बनने के लिये कर्म करते हैं, अर्थोपार्जन के लिये कर्म करते हैं। जीविकापार्जन अब अर्थोपार्जन बन चुका है। अब व्यक्ति के केन्द्र में केवल अर्थ ही रह गया है। ईश्वर, गुरु पीछे वाली पंक्ति में है। और लोग अर्थ अर्जित करने के लिये कर्म करते हैं, ईश्वरत्व के लिये साधना कर्म करने वाले नाम मात्र लोग ही बचे हैं।
अध्यात्म जगत में कर्म की प्रधानता है, कर्म के द्वारा ही कुछ प्राप्त किया जा सकता है। जो व्यक्ति कर्म से अर्जित संग्रह को परमात्मा अथवा सद्गुरु की चरणों में श्रद्धा पूर्वक अर्पित करता है। वही उनसे कुछ प्राप्त करने का अधिकारी है। अंहकार से अर्पित किया गया चढ़ावा ना ही ईश्वर स्वीकार करते हैं, ना ही सद्गुरु, ऐसे में अहंकारी का चढ़ावा भी व्यर्थ जाता है, और वह कुछ प्राप्त भी नहीं कर पाता। इसलिये परमात्मा के शरण में जब भी जाओ श्रद्धा पूर्वक, अटल विश्वास के साथ जाओ, बनिया बनकर जाओगो, तो कुछ ना मिलेगा।
परमात्मा सबके लिये है, सबकी सुनता है, भिन्नता सुनाने वाले के भाव में होता है, जैसा भाव लेकर वह जाता है, वैसा ही पाता है। इसलिये सभी ग्रथों, व्यक्तित्व में अहंकार रहित आराधना की बात कही गयी है। जीवन में यदि श्रेष्ठता प्राप्त करना है, तो अहंकार को त्यागना पड़ेगा। सेवक भाव में की गयी प्रार्थना ही परमात्मा स्वीकार करता है। गुरु को जो तुम दिखाते हो, वह नहीं देखता, उसकी आंखे पारदर्शी हैं, उसकी आंखे एक्स-रे हैं, वह तो तुम्हारे भीतर देखता है, वहां से क्या मिला, चढ़ावे से तुम सौदेबाजी कर सकते हो, कृपा तो भीतर से जो भाव निकलता है, उससे प्राप्त होता है। अर्थात् तुमने जो भी श्रद्धा पूर्वक अर्पित किया उसे ही वह स्वीकार करता है। इसलिये हमेशा ये ध्यान रखना कि परमात्मा के पास जब भी जाओ तो निश्छल हृदय लेकर जाना, तभी कुछ प्राप्त होने की संभावना रहेगी।
समय परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है, एक तरह से कहा जाये नवीन निर्माण की ओर समाज बढ़ रहा है। नई पीढ़ी के समाज के साथ सामंजस्य बनाना सभी वर्गो के लिये आवश्यक है। नये समाज में नई नीतियों का भी विकास होगा। लेकिन यह ध्यान रखना अध्यात्म वही रहेगा, साधना की क्रियायें वही रहेंगी। ईश्वत्व को प्राप्त करने का मार्ग वही रहेगा। यह सदा से ऐसा ही है, और सदा ऐसा ही रहेगा। इसमें कोई परिवर्तन ना हुआ है और ना होगा। सद्गुरुदेव नारायण ने जो मार्ग प्रदान किया है, जो चेतना, ज्ञान, चिंतन उन्होंने प्रदान की है, उसी मार्ग पर सतत् रूप से चलते रहो—- बढ़ते रहो—!! कल्याण का मार्ग वही है, ईश्वरत्व का मार्ग वही है, धैर्य-संयम बनाये, रखना, भटकना नहीं, मैं इस मार्ग पर सदा तुम्हारे साथ हूं—!!!
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