





शिव सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म हैं। वे सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से स्थूल हैं। सारा जगत उन्हीं का रूप है। यह सृष्टि उन्हीं की लीला है। शंकर जन-जन के देव हैं। उनकी भक्ति से ऋषि-मुनि, देव, दनुज, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, किन्नर, मनुष्य, पितर, भूत-प्रेत, देवी अप्सरा तथा सिद्धि के आकांक्षी साधक आदि सभी को अभीष्ट फल की प्राप्ति हुयी है। उनकी निष्काम पूजा से अन्तः करण शुद्ध होकर मनुष्य को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है। सकाम पूजा से भक्त को भोग-ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं।
शिव का अर्थ ही कल्याण है, शुभ है, मंगलयुक्त है, जीवन में पूर्णता देने में शिव अग्रणी हैं, क्योंकि शिव भोग और पूर्णता दोनों के प्रदाता हैं, शिव औघढ़दानी हैं, जो क्षण में ही कृपा कर भक्तों को अभय कर देते हैं। भगवान शंकर आुशतोष हैं, जिन भक्तों की जैसी इच्छा होती है, उसी के अनुसार उनकी इच्छा तुरन्त पूर्ण करने में अग्रणी है, इसीलिये तो शंकर को ‘भोगश्च मोक्षश्च करस्यथ एव’ कह कर सम्बोधित किया है।
भगवान सदाशिव देवों के देव महोदव हैं, जिनकी कृपा तले यह चराचर विश्व गतिशील है, भगवान शिव को औघढ़दानी कहा गया है, जो कृपा कर अपने भक्तों को सदैव अभय वर एवं सामर्थ्य प्रदान करते हैं। भगवान शिव ही एक मात्र गृहस्थ देव हैं, जिनकी पूजा पूरे परिवार सहित की जाती है और जीवन में वह सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है, जिसकी आकांक्षा मानव अपने जीवन में रखता है।
महा-शिवरात्रि भगवान शिव की पूजा, अभिषेक करने का विशिष्ट दिवस है, उनकी कृपा प्राप्त कर जीवन को सुखमय बनाने का दिवस है, सृष्टि में शिवलिंग की उत्पत्ति महाशिवरात्रि की रात्रि को ही हुयी थी और इसी रात्रि को भगवान शिव ने भगवती पार्वती का वरण किया था। इसीलिये इसे शिव गौरी सौभाग्य दिवस भी कहा जाता है।
यह पर्व मस्ती, उल्लास और आनन्द का पर्व है। इस दिन प्रत्येक व्यक्ति को साधनात्मक क्रियायें, शिव पूजन, अभिषेक अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये। भगवान शिव को सांसारिक जीवन में आत्मसात करने हेतु सद्गुरु के सानिध्य में महाकालेश्वर के मूल स्वरूप का दर्शन, अभिषेक और साधनात्मक भाव को प्राप्त करना आवश्यक है।
शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि जो साक्षात् शिव स्वरूप सद्गुरुदेव के सान्निध्य में महाकाल शिव की साधना सम्पन्न कर लेता है, शिव-शक्ति तत्व की प्राप्ति अवश्य होती है। सद्गुरुदेव की कृपा से ही ज्योतिर्लिंग के मूल साधनात्मक चिंतन का सौभाग्य महाशिवरात्रि पर प्राप्त होता है।
महाकाल की नगरी में कालरूपी स्थितियों पर विजय प्राप्त करने का क्षण तो सद्गुरुदेव की कृपा से ही प्राप्त होता है, चाहे वह साधक हो, संन्यासी हो अथवा सद्गृहस्थ, चाहे किसी भी दृष्टि से कहें, कालजयी पूर्णता सद्गुरुदेव द्वारा ही सम्भव है। सिद्धाश्रम में जिस कर्म का अनुष्ठान होता है, उसमें काल का ध्वंस करने के लिये काल का ही आश्रय लेते हैं, दूसरे शब्दों में इसे अष्ट क्षण कहते हैं।
महाकाल की नगरी में महाशिवरात्रि लोक प्रचलित शिवरात्रि से अलग है, यह चतुर्वर्गदायिनी पूर्णतः आध्यात्मिक महाशिवरात्रि है। शिवरात्रि में जागरण होता है, जागरण अर्थात् आत्मानुसन्धान। यह आत्मानुसन्धान शिष्य को पूरे वर्ष में मात्र एक बार ही मिलता है, इसे खोना अपने जीवन के महत्वपूर्ण अवसर को खो देने के बराबर है, वास्तव में परा या अपरा सब कुछ तो स्वयं सदाशिव स्वरूप सद्गुरुदेव ही हैं।
सप्त मोक्षदायिनी नगरी उज्जैन महाकाल की नगरी है, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग जहां प्राकट्य है, उसके ठीक ऊपर श्री यंत्र प्रतिष्ठित है। कर्क रेखा भी ठीक महाकालेश्वर के शिखर पर से होकर गई है। महाकालेश्वर का ज्योति विग्रह दक्षिणमुखी है, यह शिवालय पूर्णतः तांत्रेक्त पीठ है।
ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर इसके ठीक सामने स्थापित है, अद्भुत, अनिवर्चनीय एवं अपने-आप में अन्यतम्। जहां ओंकारेश्वर को पृथ्वी का नाभि-स्थल कहा गया है वहीं दूसरी ओर महाकाल उज्जैन नगरी को भारत देश का नाभि-स्थल (केन्द्र बिन्दु) माना गया है, क्योंकि समस्त काल गणना भी उज्जयिनी नगरी में होती है।
जहां भी ज्योतिर्लिंग है, वहां श्री यंत्र अवश्य होता है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग पांच जगह से टेढ़ा-मेढ़ा है, इसे अग्नि ज्योतिर्लिंग भी कहा गया है। उक्त शिवलिंग में 108 प्रकार के श्री यंत्र स्पष्ट अंकित हैं, साथ ही वे मंत्र एवं साधनायें, जिसे की आद्य शंकराचार्य जी को उनके गुरुदेव गोविन्द पादाचार्य जी ने प्रदान की थी। इसके विपरीत महाकाल ज्योतिर्लिंग तो सर्वथा एक अलग ही रहस्य को लिये हुये है। यह स्वरूप है- ‘विराट त्रिपुर सुन्दरी षोड़शी’ का।
काल को या मृत्यु को जीतने का अर्थ है, ऊर्ध्वगति प्राप्त करना और यह ऊर्ध्वगति, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से सम्भव है। अव्यक्त किन्तु व्यक्त मूर्ति (ज्ञान की दृष्टि से), महाकाल के नाभि-स्थल, से जो ब्रह्म नाल प्रकट होता है, उसी के ऊपर सुमंगला शक्ति श्री विद्या है, जो महाकाल, ज्योतिर्लिंग के ठीक ऊपर श्री यंत्र के रूप में प्रतिष्ठित है, बिना इस शक्ति के सहड्डार प्रवेश असम्भव है।
वस्तुतः ज्ञान स्वरूप सद्गुरुदेव के बिना ज्ञान का उदय नहीं हो सकता। मृत्युंजयी योगी बनने हेतु महाकाल की साधना जरूरी है। प्राण तथा चैतन्य दीक्षा प्राप्त होने पर भी काल का संहार क्रम लुप्त नहीं हो सकता। ज्ञान सम्पन्न पुरूष भी मृत्यु को नहीं जीत सके, उसकी देह का ध्वंस होना स्वाभाविक है। देह का चैतन्य होना मात्र ज्ञान प्राप्ति से असम्भव है।
मानव देह में जो कुछ चैतन्यता जीवन काल में दृष्टिगोचर होती है, वह आत्म-सत्ता या जीवात्मा स्वरूप है। जीवात्मा द्वारा इस देह का त्याग करते ही, यह शरीर निर्जीव हो जाता है। देह, काल के द्वारा ग्रसित हो जाती है, यही कारण है कि ज्ञान द्वारा देह प्रभावित नहीं हो सकती है। देह में अमरत्व का संचार हो सकता है, और यह संचार होता है मन के द्वारा।
देह, प्राण तथा मन में एक तारतम्य का होना नितान्त आवश्यक है। यह योग्यता केवल मात्र आद्या शक्ति मां द्वारा ही प्राप्त हो सकती है, यही महाकालेश्वर के श्री यंत्र का रहस्य है और यही मृत्यु या काल पर विजय प्राप्त करने का भी रहस्य है। चैतन्य मन ही निज स्वमन हैं भाव-शक्ति आद्या शक्ति मां की अपनी शक्ति है, जो मृत्युंजय हैं, उनकी देह में षोड़शी कला का पूर्ण प्रकाशन होता है। यह षोड़शी काल का शोषण कर लेती है, तथा काल द्वारा बाधित नहीं होती। जिस देह में षोड़शी कला स्थापित है, वह देह अमृत-स्वरूप है और महाकाल ही मृत्युंजय हैं, ठीक ऐसा ही स्वरूप दृष्टिगोचर होता है, महाकाल पीठ का।
इस बार ऐसा ही, सर्वश्रेष्ठ स्वरूप में होने जा रहा है, इस महाशिवरात्रि पर, महाकाल की नगरी में। आप समस्त शिष्यों का आह्वान है, परम पूज्य सद्गुरुदेव जी द्वारा, क्योंकि काल किसी के लिये रूकता नहीं है, काल का प्रभाव अमिट है।
भगवान सदाशिव के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग विग्रह के अर्चन का सौभाग्य यदि परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी के सान्निध्य में प्राप्त हो, तो गृहस्थ शिष्यों का परम सौभाग्य ही नहीं, जीवन का अहोभाग्य ही होगा, क्योंकि इस प्रकार के शिवलिंग का अर्चन सद्गुरु के सानिध्य में सामान्य अर्चन नहीं हैं, यह तो कई-कई जन्मों का पुण्योदय है। उसी के फलस्वरूप काल को अपने अनुकूल निर्मित करने का भाव ही महाशिवरात्रि पर्व है।
शिविर स्थल- नरसिंह घाट, महाकाल मंदिर प्रांगण, उज्जैन (म-प्र-) महाकालेश्वर महादेव गौरी की आराधना से जीवन की सभी कालरूपी स्थितियों का शमन निश्चित रूप से होता है, मनुष्य को अपने जीवन में जब-जब महाकाल शिव की उपासना, अभिषेक करने का अवसर प्राप्त हो, उसे उस चेतना, चिंतन, शक्ति को श्रेष्ठ जीवन्त जाग्रत सद्गुरु के सानिधय में आत्मसात करना चाहिये। जिससे वह शिव-गौरी परिवारमय गृहस्थ जीवन की सुस्थितियां प्राप्त कर सके और जीवन की कालिमा रूपी अभावों को प्रकाशित, चैतन्य, सुख-समृद्धि, पूर्ण आयु, आरोग्य, संतान सुख, धन लाभ से युक्त हो सके।
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