





भारतीय ऋषियों, मुनियो, सिद्ध महापुरुषों ने गुरु रूप में अपनी भूमिका का निर्वाह कर इस गौरवमय परम्परा को निरन्तरता प्रदान की है। अतः गुरु देव तुल्य एवं परिपूर्ण ईश्वर ही हैं। गुरु के चरणाविन्द (चरणकमल) में शिष्य का भाव समर्पण ही लक्ष्य प्राप्ति की अनुकूल अवस्था है। सिद्ध सद्गुरु कुबेर तुल्य होकर मुक्त हाथों से जब अपनी ज्ञान गंगा प्रवाहित करते हैं, तब भक्त की, शिष्य की, सामान्य जन की यह प्रतिक्रिया इतनी सटीक प्रतीत होती है कि जिस प्रकार उछलती, इतराती, छलांग लगाती हुयी विभिन्न नदियां अपने स्वतंत्र अस्तित्व में होती हैं तब तक ही उनकी अलग-अलग भूमिकायें होती हैं, परन्तु जैसे ही वे समुद्र में विलीन होकर उसमें एकाकार हो जाती हैं, तो उनकी स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो जाती है और वे धीर, गंभीर मर्यादित समुद्र का अभिन्न अंग बन कर मानो कबीर की वाणी को सार्थक करती हैं-
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं।
गुरु का सही परिचय प्रकृति ही है। प्रकृति के माध्यम से ही उनका सही परिचय प्राप्त किया जा सकता है। जब व्यक्ति अपनी सामान्य जीव अवस्था से ऊपर उठता हुआ साधक बनता है, शिष्य बनता है, तभी उसे जीवन के और गुरु के विभिन्न रंग, विभिन्न आयाम देखने को मिलते हैं, निहारने की कला आती है और अपने सद्गुरुदेव को समझने की शैली विकसित होती है।
तब उसके लिये प्रकृति का सारा व्यापार उस विराट पुरुष की प्रार्थना हो जाती है। वह देखने लगता है कि वह अकेला ही नहीं, उसके साथ-साथ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नित्य प्रार्थना में तल्लीन है और ऐसा देखना ऐसा अनुभव करना ही अनहद का श्रवण है। जो वृक्षो की झूमती टहनियों व बहते जल की कल-कल ध्वनि से अपने अन्दर की छुपी सुप्त वीणा को झंकृत कर देता है। जब उसकी दृष्टि सामान्य दृष्टि नहीं रह जाती, वह आम व्यक्ति की तरह जीवन की स्थितियों को नहीं देखता है। वह गुरु को एक देह के रूप में नहीं देखता, वह उन्हें आत्म स्वरूप देखता है। उसका द्वैत भाव समाप्त होने लगता है। वह गुरु के सामने खड़ा होता है, तो उसे ऐसा आभास होता है मानो वह एक शुद्ध, निर्मल, दर्पण में अपना ही चेहरा देख रहा हो। उसका व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है और गुरु का व्यक्तित्व ही उसका व्यक्तित्व बन जाता है।
वह एक ऐसी उन्मुक्त्ता में विलीन हो जाता है, जहां किसी भी पद या सम्बन्ध का अर्थ रह ही नहीं जाता, क्योंकि जिन पदों व सम्बन्धों के द्वारा कुछ प्राप्त किया जा सके वे सब कुछ बौने से सिद्ध होने लगते हैं और तब सम्बन्धों के संज्ञा की आवश्यकता रह भी कहां जाती है? सम्बन्ध तो जब दो होते हैं, तभी व्यक्ति किये जाते हैं, जहां केवल एक का ही अस्तित्व हो, जहां केवल गुरुदेव का व्यक्तित्व ही आकर व्याप्त हो गया हो, वहां शिष्य की संज्ञा भी आवश्यक नहीं रह जाती। जिस प्रकार प्रकृति स्पन्दित रहती हुयी उसी विराट की अभ्यर्थना में सदैव तल्लीन रहती है, शिष्य भी उसी प्रकार प्रतिक्षण अभ्यर्थना में सदैव तल्लीन हो जाता है, और यही जीवन की सर्वोच्च स्थिति है तब वह भी सौन्दर्यमय हो जाता है, रूपमय हो जाता है और अपने गुरु की तरह, प्रतिक्षण प्रकृति की तरह बदलने की कला आत्मसात कर लेता है। यह ऐसे ही प्रकृतिमयता के आन्दोलन को प्रारम्भ करने का अवसर है।
एक नये संवत का आरम्भ है, किसी विक्रमी संवत या शक संवत् की तरह बस एक दिन बीतने पर ही बदल जाने वाला संवत नहीं है, बदल तो यह भी जाता है, एक पल में लेकिन उछाह और उमंग के साथ, दैन्य-दुःख को अपरिचित बनाने के साथ-साथ, खिल-खिलाहटों, नृत्य और संगीत के साथ, यौवन और प्रेम के साथ क्योंकि यह सद्गुरुदेव का संवत् है। जीवन की पूर्णता और रसमयता का संवत है, यही अनादि संवत् है और यही नित्य संवत् भी, अंको से बंधा हुआ नहीं, किसी नाम या पहचान से जुड़ा नहीं, क्योंकि यह नित्य नूतन है।
और फिर नदी ने बूंदो का हिसाब कब रखा, कोयल ने कूकों की गणना कब की और पुष्पों ने सुगन्ध बिखरते समय उसका बही-खातें में हिसाब कब लिखा, उछाल देना, बिखेर देना और बिखर जाना, प्रकृति ने बस इतना ही सिखाया और इसी से वह चिरयौवनवती बनी रही क्योंकि एक बीज खोया और दाने बन गये, एक बूंद खोई और पूरा समुद्र बन गया।
सद्गुरुदेव ने भी जीवन में बिखेरा ही बिखेरा है और इसी से चिरनूतन बने रहे, यौवनवान बने रहे, अपने ही रस और गंध से यौवन का संचार करते रहे, शिष्यों के शरीर और मन को थपकी दे-देकर जगाते रहे, 21 अप्रैल बहाना बना लिया उन्होंने, क्योंकि गुरुदेव के जन्मदिन से भी अधिक शिष्यों को जगाना, बूंदो में उछाह भरना उनकी प्राथमिकता है। सुप्त पड़े जीवन में जीवन्तता प्रदान करना उनका चिन्तन है।
सही तो कहा गया है, शरीर ढ़ोना केवल जीवन की परिभाषा नहीं हो सकती, जब तक उसमें जीवन्तता ना हो, उत्साह, उमंग ना हो, यही तो प्रदान करते हैं सद्गुरुदेव इस दिव्य चैतन्य दिवस पर, जब पूरे भारतवर्ष के शिष्य जीवट शक्ति से आपूरित हो निखिलमय, नारायणमय हो जाते हैं। फिर कहां भान होता है, स्वयं का, सब कुछ गुरुमय ही प्रतीत होने लगता है।
वास्तव में जीवन के वही क्षण सार्थक व उपयोग युक्त हैं, जब हम उन्हें गुरु गरिमा से विभूषित कर सकें। गुरु गौरव को स्वयं में समाहित करने की ओर उन्मुख हो सकें। दिवस तो सैकड़ो हैं, चैतन्य भी, परन्तु पूर्ण सद्गुरुमय, निखिलमय दिवस की बात ही कुछ ओर है, यही तो वह दिवस है, जो शिष्यों के जीवन की अंधकारमय स्थितियों का शमन कर उसे हृदय में प्रकाश का स्पंदन करता हुआ, उसके जीवन को ज्वलन्त चिंतन प्रदान करता है, प्रेम, स्नेह, आत्मीयता के सागर में डूबने का अवसर प्रदान करता है। उसे अपनत्व का अनुभव कराता है।
यह अवसर है, स्वयं को सिद्धाश्रम शक्ति से आपूरित करने का, यह अवसर है अपने ईष्ट के प्रति अभिनंदन व्यक्त करने का, जीवन का वह सब कुछ जिससे घुटन अनुभव होती, जिसमें मृत्यु प्रायः की अनुभूति होती है, जो पशुवत् है, घृणा युक्त है, जहां केवल स्वार्थ, ईर्ष्या, छल, झूठा प्रेम, प्रपंच का ताना-बाना दृश्य होता है, इन सभी स्थितियों से मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त होता है, केवल और केवल प्रकृतिमय सद्गुरु चरणो में, जहां पर अपने मन की वेदना-पीड़ा व्यक्त कर शिष्य उन्मुक्त बनता है, क्योंकि यही वह अवसर है, जब सद्गुरु करूणामय, प्रकृतिमय, वात्सल्यमय होकर शिष्यों के कल्याण हेतु इस धरा पर अवतरित हुये, शिष्यों के कल्याण के लिये, वास्तविक प्रेम, अपनत्व का बोध कराने, जीवन की वास्तविकता से परिचित कराने, दुखःदीनता, वेदना का हरण करने, यही तो है वह प्रकाशोत्सव जब हम निखिल ज्योति से जीवन को स्वः को प्रकाशित कर परमानन्द की प्राप्ति कर सके—-!!! इंतजार है आपका इस चैतन्य दिवस पर—–आवाहन है आपका सपरिवार प्रेममय दिवस पर——-ध्यान रहे नारायण भगवतीमय होने का यही दिव्य अवसर है——!!
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