





यह विषय जो पिछले 8-10 वर्षों से मेरे लिये चिंतन का विषय है, मैं निरन्तर इस विषय पर गहन चिंतन करता रहा हूं। समय का ऐसा चक्र है, जहां पर व्यक्ति विवश हो जाता है। समाज में बढ़ रही कुरीतियों ने ऐसा माहौल बना दिया है, कि हम भी इस समाज में रहते हैं, हम लोग भी इस समाज के हिस्सा हैं, ऐसा सोचने में भी शर्मिदंगी महसूस होती है।
जो आज का समाज है, वर्तमान में जो विचारधारा लोगो की है, ऐसा समाज, ऐसा व्यक्तित्व निर्माण करने की मंशा हमारे पूर्वजो की नहीं थी। उन्होंने हमें ऐसे विचार नहीं दिये, उन्होंने जो आदर्श हमारे सामने स्थापित किया, वह उच्चकोटि का था, वे विचार मानवता के मापदण्ड पर उच्च शिखर पर स्थापित रहें। परन्तु जिस तरह मानवता आये दिन शर्मसार हो रही है, जिस तरह मानवीय मूल्य सबसे निचले पायदान पर पहुंचते जा रहें हैं, वह इस समाज, इस देश, इसकी संस्कृति, हमारे आने वाली पीढ़ी के लिये, हमारे परिवार के लिये घोर कष्टकारी होगा और इन मानवीय मूल्यों में यदि सबसे अधिक कोई पीडि़त है, किसी का शोषण हुआ है, तो नारियों का हुआ है।
कुछ लोग कहते हैं आज के लोग विकास के उच्च शिखर की ओर अग्रसर हैं, प्रगति की ओर बढ़ते जा रहें हैं। आधुनिक विचार, संसाधन, कार्यशैली समाज को प्रगति पर ले जा रहा है। लेकिन इसी समाज में, इसी आधुनिक युग में आठ माह की छोटी सी बच्ची के साथ रेप होता है, दिल्ली की निर्भया हो या हिमाचल की गुडि़या, चाहे जम्मू कश्मीर की आसिफा हो, इन सभी के पीछे यही समाज है, यहीं के लोग है, ऐसे घृणित कुकर्म करने वाले इसी समाज के हैं। आप सोचो! ऐसा समाज बना रहें हैं हम, ऐसी व्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहें हैं हम। आपने कभी कहीं सुना है, पढ़ा है? कि आज से 200 वर्ष पूर्व किसी 8 माह की बच्ची के साथ रेप हुआ हो? नहीं सुना होगा? मानवता इतनी शर्मसार नहीं थी पहले, अभी कुछ 10-15 वर्षो से ऐसे समाचार आने लगे हैं। गैंग रेप जैसा शब्द ही नहीं था पूर्व में, आपके आधुनिक समाज ने दिया है। क्या हमारा समाज ऐसी आधुनिकता चाहता है? जिस धर्म में, जिसकी संस्कृति में, जिस देश में नारी को शक्ति स्वरूपा कहा गया है, जहां पर नारी की पूजा की जाती है, जहां पर नारी को देवी का स्थान प्राप्त है, उस देश में, उस समाज में ऐसे घृणित कृत्य होते हैं।
नवरात्रि के दिनों में जिन बच्चियों को देवी का स्वरूप बताकर पूजा करते हैं, उन्हीं बच्चियों में इस समाज को कामुकता कैसे नजर आ जाती है? यह बहुत ही कष्टकारी है, पीड़ा देने वाला है और यदि इसे ही विकास कहते हैं, तो मैं कहूंगा ऐसा विकास नहीं होना चाहिये, ऐसा समाज नहीं चाहिये। आज का समाज, आज के लोग अपनी संतान को उच्च शिक्षा देना चाहते है, उन्हें डॉक्टर, वकील, इंजीनियर बनाना चाहते हैं, पर उच्च और अच्छे संस्कार के लिये कोई प्रयास नहीं। अरे! पहले इंसान तो बन जाओं डॉक्टर, इंजीनियर, वकील बाद में बन जाना। जो संतान अपने माता-पिता व पत्नी का सम्मान नहीं करता, वह भले ही कितने भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर ले, परन्तु वह श्रेष्ठ व्यक्तित्व युक्त नहीं बन सकता।
इतिहास के कुछ पन्ने कालिमा से भरे हैं, परन्तु पूरा इतिहास ही ऐसा नहीं है। 2000 वर्ष पूर्व का इतिहास आप देखिये, गौतम बुद्ध काल में इतनी वैमनस्यता नहीं थी, स्त्रियों पर इतने अत्याचार नहीं होते थे। इसके बाद जैसे-जैसे लोगो की महत्वाकाक्षायें बढ़ती गयी, वैमनस्यता, ईर्ष्या, अत्याचार, शोषण आदि में वृद्धि होती गयी। जब भी युद्ध हुआ, चाहे वह मुगल शासन के पहले का हो या मुगल कालीन हो या अभी किसी देश में युद्ध होता हो, इनमें सबसे अधिक पीडि़त महिलायें और बच्चे होते हैं। उन्हें सबसे अधिक कष्ट पहुंचाया जाता है। महिलाओं का मानसिक-शारीरिक शोषण होता है। उन पर क्रूरता की जाती है।
समय के हिसाब से कुछ चीजे बदली हैं, स्थितियां परिवर्तित हुयी, बल्कि मेरी समझ से और भयानक हो गयी हैं। पूर्व में या तो राज्य बहुत अच्छा था या बहुत बुरा, बुरा व्यक्ति बुरा ही बर्ताव करता था, वह अच्छा बनने का नाटक नहीं करता था। परन्तु आज परिवर्तन है, बुरे व्यक्ति की पहचान करना संभव ही नहीं। अच्छा व्यक्ति भी बुरा हो सकता है, इतना बुरा हो सकता है, जितना आप सोच भी नहीं सकते, लेकिन उसके चेहरे पर एक मुखौटा हो गया अच्छा होने का। विचारणीय विषय यह है कि मनुष्य की मनुष्यता कहां चली गयी? वह इतना अधिक विनाशकारी कैसे हो गया? यह रहस्य समझना होगा।
पहले में अब में यही अन्तर है, पहले लोग बुरे होते थे, तो उनकी पहचान होती थी, यह बुरा है, यह आदमी ठीक नहीं है, यह राजा ठीक नहीं है, क्योंकि उसके क्रिया-कलाप ही ऐसे होते थे, लोगों को पता चल जाता था। यह इंसान बुरा है, परन्तु अब ऐसा नहीं है बुरा व्यक्ति भी, बहुत अच्छा दिखने का नाटक करता है, बाहरी क्रिया-कलाप उसके बड़े सुन्दर लगते हैं, और वह हर बुरे काम को आड़ में करता है, छुपकर करता है, कि कहीं कोई देख ना लें, मुझे बुरा करते हुये। उसने मुखौटा लगा रखा है अच्छाई का। इसलिये पहचान ही नहीं हो पाती अच्छे-बुरे इंसान की।
आज से ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध इस धरा पर अवतरित हुये, उनका सन्देश लेकर उनके अनुयायी देश-विदेश भ्रमण करते रहे, लोगो को सदमार्ग पर बढ़ने की प्रेरणा प्रदान की, जिसके फलस्वरूप चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम, थाईलैंड, लाओस, कम्बोडिया और कई दूसरे देशों ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। एक चेतना का, शांति, अहिंसा का पथ बताया, लोगों में जन-जाग्रति लायी, उन्हें मनुष्य होने से अधिक उसमें मनुष्यता को जीवित करने की कला समझायी, वह विचार दिया। हमने नहीं किया, हमारे लोग मनुष्य तो हो गये, मनुष्य शरीर तो प्राप्त कर लिया, परन्तु उनमें मनुष्यता नहीं रही। उनमें वह चिंतन जो एक मनुष्य में होता है, जो मनुष्य को सभी जीवो से भिन्न बनाता है, वह खो दिया, उसे भूल गये। सत्य है!
जब मनुष्य, मनुष्यता भूल जाता है, तो वह पाशुविक बन जाता है, उसमें पाशुविकता आ जाती है। मनुष्य में और एक जंगली पशु में बस विचारों का डिफरेंस है, यदि मनुष्य की प्रवृत्ति भी पशुता जैसे हो जाये, उसके क्रिया-कलाप पशुवत् हो जायें, तो मनुष्य भी दो पैर, दो हाथ वाला पशु ही तो हुआ, पशु में चार पैर होते हैं और मनुष्य के दो बस अन्तर तो इतना ही हुआ ना! क्रिया-कलाप तो वैसे ही हैं, जैसे पशु के होते हैं। मांस का भक्षण वो भी करता है, मनुष्य भी करता है। किसी भी जीव पर जंगली पशुओं को दया नहीं आती, वह किसी को भी मार के खा जाता है, भेड़, बकरी, लोमड़ी कोई भी हो, वह उसे मार के खा जाता है, अपनी भूख शांत कर लेता है। फिर उसे भूख लगती है, तो फिर शिकार पर निकलता है, किसी जीव को मारता है और खा जाता है। हां जब उसे भूख नहीं होती तो वह शांत होकर बैठ जाता है।
लेकिन आज के मनुष्य की भूख ही शांत नहीं होती, वह अपने तुच्छ स्वार्थ को पूरा करने के लिये, ना जाने कितनों लोगो को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दुख देता रहता है। मनुष्य की भूख सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जाती है, मनुष्य स्वार्थ की पराकाष्ठा पर इतना आगे बढ़ चुका है, कि उसे कुछ भी सूझता ही नहीं। केवल एक ही उधेड़-बुन कितना और जोडूं, कितना और जोडूं? कहां जा रहे हो? अपने भीतर मनुष्य होने का गौरव जीवित रखो, अपने अन्दर मनुष्यता तो जीवित रखो। आखिर में और है भी क्या मनुष्य के पास? बाकी सब कुछ तो भूल ही चुके हो, अपनी संस्कृति, अपना धर्म, अपनी सभ्यता, अपनी ऋषित्व परम्परा, अपने ऋषियों का गौरव, कम से कम अपने भीतर मानवता तो जीवित रखो, मनुष्य होने का अंश मात्र चेतना तो बनाये रखो। देने वाला केवल ईश्वर है, गुरु है, देगा वही माध्यम कोई भी बने, जिसे भी माध्यम बनाना होगा वह बना देगा। तुम किसी से कुछ पाने के लिये झगड़ते क्यों हो? लड़ते क्यों हो?
निर्दयी हो जाना अपनी मनुष्यता की हत्या कर देने जैसा है, जिसको किसी पर दया ना आती हो, जो किसी को भी अपने पैरो तले रौंद देना चाहता है, या रौंद देता है, वह पशुवत् ही है, जंगली जानवर ऐसा करते है, राक्षसी वृत्तियां जिसके भीतर जाग जाती हों, वह ही ऐसा कर सकता है। अपने से किसी छोटे जीव पर, किसी निर्बल पर, असहाय-अबला पर अत्याचार करना, उन्हें दुख देना, उनके साथ दुराचार करना, मनुष्यता की श्रेणी में तो नहीं आती होगी! ये क्रियायें तो मनुष्य की नहीं हो सकती, ऐसा करने वाल जरूर राक्षसी सोच का होगा। मैं तुमसे कोई बहुत बड़ी बात नहीं कह रहा हूं, जिसे तुम कर ना सको, यदि मनुष्य के भीतर से मनुष्यता समाप्त हो जायेगी, तो समाज क्या बन जायेगा, कभी कल्पना की है, यदि तुम्हारे भीतर की संवेदना समाप्त हो जाये, मानवता समाप्त हो जाये, तो तुम कैसे जीवित रह पाओगे?
मनुष्य को तो संवेदना से भरा प्राणी बताया गया है, जिसे दर्द होता है, पीड़ा होता है, आंसू होते हैं। वह अपनों के लिये रो देता है और किसी दुखीयारी को भी देख कर दुखी हो जाता है। लेकिन यदि किसी दुखीयारी को देखकर आपके हृदय में संवेदना नहीं उठती तो आप समझ लेना आप कौन हो? यदि किसी की पीड़ा देख कर आपको सुख मिलता है, आपको प्रसन्नता होती है, तो आपको अपने मनुष्यता की जांच करने की आवश्यकता है, फिर आपको यह समझने की आवश्यकता है कि आपमें मनुष्यता जीवित है या नहीं।
और यदि आपके भीतर समाज के लिये, दूसरों के लिये संवेदना नही है, तो आप मानकर चलिये आपके जीवन में एक दिन ऐसा भी आयेगा जब आपके भीतर अपने आप के प्रति भी संवेदना नहीं बचेगी, ना अपनी पत्नी के लिये, ना बच्चो के लिये ना किसी और के लिये। ऐसा हो सकता है, यदि आप इस पथ पर बहुत आगे बढ़ते गये, तो किसी के लिये कुछ नहीं बचेगा, आपके स्वयं के लिये भी कुछ नहीं बचेगा। इसलिये संवेदनहीन नहीं होना है, संवेदनाओं से भर जाना है, आपके हृदय का कोना-कोना संवेदना से भरा होना चाहिये। ये आवश्यक नहीं है कि आप दूसरों का दुख देख कर रोये, आप उसकी मदद करें, तो ही पता चलेगा कि आप संवेदनशील हैं। ऐसी आवश्यकता नहीं है, लेकिन इसके साथ यह भी कहूंगा आप से जो बनता है, वह करें, अपने मनुष्य होने का धर्म निभायें, आप मनु की संतान हैं, स्वयं के लाभ और राजनीति से ऊपर उठकर मानवता का धर्म निभायें।
और यदि आप से कुछ नहीं होता, तो भी आपके भीतर संवेदना होनी चाहिये, आप निर्दयी ना बनें, और संवेदना इसलिये होनी चाहिये, कि आपके द्वारा, आपसे किसी का अहित ना हो। यदि आपके भीतर संवेदना है, तो आप किसी का अहित नहीं कर पायेंगे, आपसे नहीं होगा, आप किसी को भी प्रताडि़त करने से बचेंगे। आपके भीतर का मनुष्य आपको रोकेगा, इसलिये आप संवेदना से भर जायें, उसमें समाहित हो जायें, और यदि आपका हृदय संवेदना से भर गया तो, इससे किसी का भला हो ना हो, पर आपके द्वारा किसी को हानि नहीं होगी, आपके कारण कोई दुखी नहीं होगा।
एक बार महर्षि याज्ञवल्क्य महाराज जनक के पास गये। जनक ने उनका स्वागत करने के पश्चात् कहा- महर्षे! एक बहुत गम्भीर प्रश्न है, उसका उत्तर जानना चाहता हूं। याज्ञवल्क्य बोले- पूछिये महाराज! जनक ने कहा- मैं जानना चाहता हूं, कि मनुष्य किस ज्योति वाला है? किस प्रकार से इसे प्रकाश मिलता है? महर्षि बोले- यह तो बच्चे जैसा प्रश्न है। सब लोग जानते हैं कि सूर्य के प्रकाश से मनुष्य अपने सारे कार्य चलाता है। सूर्य की ज्योति से ही मनुष्य ज्योति वाला है, सूर्य न हो, चन्द्रमा हो तो वह भी सूर्य का प्रकाश देता है। जनक ने कहा- ठीक है कि वह चन्द्रमा भी सूर्य का प्रकाश ग्रहण करता है। परन्तु महर्षे! सूर्य न हो, चन्द्रमा न हो, अमावास्या की घनी काली रात हो, आकाश में बादल हों, बादलों में विद्युत न हो, तब मनुष्य किस ज्योति से काम चलाता है?
महर्षि बोले- तब वह अग्नि से, दीपक से और ऐसी ही अन्य वस्तुओं से प्रकाश प्राप्त करता है और उनकी ज्योति से ज्योति ग्रहण करता है। जनक ने कहा- और जब यह सब कुछ न हो, सूर्य, चन्द्र, दीपक, अग्नि, विद्युत, कुछ भी न रहे तब मनुष्य किस ज्योति वाला है? याज्ञवल्क्य बोले तब वाणी ही उसकी ज्योति बनती है। वाणी की ज्योति से वह ज्योति वाला होता है।
घोर घना जंगल हो, घटाटोप अंधेरा, आकाश में तारे नहीं, दूर-दूर तक कोई प्रकाश नहीं और कोई यात्री मार्ग भटक जाये, और वह ऊंची आवाज में कहे कोई है? मैं मार्ग भटक गया हूं, किधर जाऊं? और दूर से कोई आवाज देता है- ओ जाने वाले! इधर आ जाओ। इस ध्वनि की ओर आ जाओं, मैं तुम्हें मार्ग बताता हूं और इस ध्वनि से, इस आवाज से, इस वाणी से उसे ज्योति मिल जाती है। जनक ने फिर कहा- परन्तु जब ध्वनि का प्रकाश भी न हो, तब मनुष्य किस ज्योति वाला होता है?
बहुत पहले की बात है, एक बार मैं एक पहाड़ी क्षेत्र में गया, कोई साथ में नहीं था, मैं अकेला ही था, मार्ग भूल गया। तभी मैंने देखा कि सामने एक छोटा सा मकान है। उसके बाहर एक युवक बैठा है। मैंने उसके पास जाकर पूछा- क्यों भाई! यह पगडण्डी किधर जाती है? वह मेरी ओर देखता रहा, बोला नहीं। मैंने फिर पूछा- अरे भाई! मैं तुमसे पूछता हूं, यह मार्ग किधर जाता है? उसने उत्तर नहीं दिया। तीसरी बार मैंने पूछा, तब भी वह बोला नहीं। तभी मकान के भीतर से एक आदमी आया, बोला, क्या चाहते हैं आप? मैंने कहा मैं मार्ग भूल गया हूं। इस युवक से पूछता हूं, यह तो उत्तर ही नहीं देता। उस व्यक्ति ने कहा- उत्तर कैसे देता? यह तो गूंगा है। मैं बोला- परन्तु संकेत तो कर सकता है? उस व्यक्ति ने कहा नहीं यह बहरा भी है, सुन नहीं सकता। मैंने आश्चर्य से कहा- परन्तु यह मुझे देखता तो है। वह बोला, नहीं श्रीमान्! यह देखता भी नहीं है, अन्धा है। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, मैंने पूछा- तब यह अपना काम कैसे चलाता है? वह बोला – यह मुझे पता नहीं परन्तु चलाता अवश्य है। ठीक समय पर प्रातः उठ जाता हे, पशुओं को जंगल में ले जाता है, शाम को उन्हें वापस ले आता है। वह युवक सूर्य की ज्योति से ज्योति वाला नहीं, चन्द्रमा और दीपक की ज्योति से ज्योति वाला नहीं, वाणी की ज्योति से ज्योति वाला नहीं था। तब वह किसकी ज्योति से ज्योति वाला होता था।
इस पर महर्षि याज्ञवल्क्य कहते है- जब कुछ भी न हो, तब मनुष्य आत्मा की ज्योति से ज्योति वाला होता है। और इस आत्मा के बिना शरीर का कोई भी अंग कार्य नहीं कर सकता। इसका अनुभव हम कई बार करते हैं, आत्मा शरीर से निकल जाये, तो भी आंख विद्यमान रहती है, पर देखती नहीं, कान रहते हैं, परन्तु सुनती नहीं, हाथ रहते हैं, परन्तु हिलते नहीं, पैर रहते हैं, परन्तु चलते नहीं। आत्मा की शक्ति से ये सब के सब कार्य करते हैं, आत्मा के बिना ये कुछ भी नहीं है। इस शरीर का प्रत्येक अंग आत्मा की शक्ति से क्रियाशील है, उसे चलाने वाली आत्मा है और हमारे सभी कार्य इस शरीर के लिये ही होते हैं, इस शरीर को सुख पहुंचाने के लिये होता है। हम इस देह के लिये कार्य करते हैं। हमारा कार्य हमारी आत्मा के लिये नहीं होता। हम आत्मा को प्रसन्न करने का उपाय नहीं करते। वास्तव में मनुष्य का प्रयास आत्मा के लिये होना चाहिये पर होता नहीं है। हम अपनी आत्मा के प्रकाश में चलने का प्रयास करें, तो हमें सदैव सन्मार्ग की प्राप्ति होती है, परन्तु प्रश्न वही है, राजा जनक जैसा कि यह प्रतीत क्यों नहीं होता? यह दिखता क्यों नहीं?
आत्मा बहुत ही सूक्ष्म कड़ी है, इसे देखने के लिये गहराई में उतरना पड़ेगा, इतनी गहराई में कि आप अच्छे-बुरे कर्मों के विषय पर मनन कर सकें। आत्मा ईश्वर द्वारा प्रेरित तत्व है, मन संसार की क्रियाओं द्वारा प्रेरणा ग्रहण करती है। संसार में जो कुछ घटित होता है, मन उसी ओर भागता है। उसी ओर आकर्षित होता है, यदि मन काम वासना देखेगा तो कामुकता से भर जायेगा, यदि अच्छे दृश्य, चिंतन से देखेगा तो अच्छे विचारों, चितनों से भरेगा। इसलिये यह महत्वपूर्ण है कि आप देखते क्या हैं? सुनते क्या हैं? समझते क्या हैं? और यह निर्भर करता है कि आपकी संगति कैसी है? आपके संस्कार कैसे हैं? आपकी संगत कैसी है? जैसी संगत होगी, वैसी ही संस्कार, भाव व विचार बनेंगे और इन्हीं के फलस्वरूप जीवन की क्रियायें होंगी। अतः आपकी संगत अच्छे लोगों से होगी तो निश्चिन्त रूप से आपके संस्कार श्रेष्ठ होंगे। इसके विपरीत संगत ही बुरी है, तो भाव-विचार, संस्कार क्रूर ही होंगे। यह आप पर निर्भर है और यह कुसंगत या सुसंस्कार आपकी संतान पर भी प्रभाव डालती है।
मुझसे अक्सर ऐसे माता-पिता मिलने आते हैं, जो अपनी संतानों की बुरी संगत से परेशान होते हैं। एक बार जोधपुर में इन्दौर से एक परिवार आया, उस समय जोधपुर में साधकों से मिलने का समय चल रहा था। दोपहर के समय वे माता-पिता मुझसे कहने लगे गुरु जी मेरा बेटा कोटा में पढ़ता है और अभी MCA की तैयारी कर रहा है, दूसरा वर्ष है। हमारा इकलौता बेटा है, गाड़ी भी खरीद कर दे दी है। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था, पर पता नहीं कहां से एक लड़की ने इसको फंसा दिया। इस पर रेप केस करने की धमकी दे रही है, उस लड़की के दोस्त भी इसे धमकी देते हैं। गुरु जी हम तो बहुत बुरे फंस गये हैं, आप कोई रास्ता बतायें, कोई उपाय बता दें, नहीं तो बड़ी मुसीबत हो जायेगी और इसमें भी रहस्य की बात यह है कि उनका लड़का गुरु जी को मानता ही नही है।
अब गुरु जी भी क्या करें, वो भी बेचारे फंसे मां-बाप के चक्कर में, क्योंकि लड़का तो उन्हीं का है, जो गुरु जी को मानते हैं। गुरु जी के लिये भी ऐसी स्थितियों में बड़ी मुसीबत हो जाती है। क्योंकि ऐसे मामलों में जाने भी नहीं देते बनता, क्योंकि शिष्य अपना, और जब शिष्य अपना है, तो उसके बच्चे भी अपने ही हुये। फिर मैंने उनसे पूछा अच्छा बताओं हकीकत क्या है? पहले तो वो बहुत हिच-किचायें, तीन-चार बार ऑफिस से अन्दर-बाहर होते रहें, मां-बाप-बेटे ने आपस में सलाह, मशवरा करके फिर कहने लगे- गुरु जी इन लोगो ने सभी दोस्तों के साथ मिलकर पार्टी रखी थी, सबने खूब खाया-पीया, किसी ने कोल्ड ड्रिंक में शराब मिलाकर इन लोगों को पिला दिया, उसी में ऊंच-नीच हो गया। मैंने फिर पूछा- सच-सच बताओ हुआ क्या?
फिर लड़के के पिता ने बोला गुरु जी ये किसी की सुनता नहीं, फीस के पैसे लेकर पार्टी करता है। कुछ कहो तो लड़ता है, जवान लड़का हो गया है, हाथ उठाते भी नहीं बनता, इसकी आदते गलत हो गयी हैं, एक महीने में तीन-चार बार पैसे मंगाता है। और इस सारे कृत्य के जिम्मेदार माता-पिता भी हैं, उनका भी योगदान है। क्योंकि संतान की परवरिश की जिम्मेदारी तो माता-पिता की होती है, उनमें अच्छे संस्कार विकसित करने का दायित्व भी इन्हीं का है। लेकिन ये लोग पुत्र-पुत्री मोह में अपनी ही संतानों का अहित करते हैं। जिस संतान को अर्नगल क्रिया करने से रोकना चाहिये, उसकी आप परोक्ष रूप से मदद करते हो, उसका उत्साह वर्द्धन करते हो। जिससे आपका बच्चा और अधिक बिगड़ जाता है। ऐसा नहीं है कि अचानक ही वह ऐसी क्रियाओं में शामिल हो गया, पहले भी हुआ होगा, पहले भी शराब पीया होगा, आपने रोका नहीं, आपने टोका नहीं, आपने उसे दण्डित नहीं किया। आपने उसकी संगत नहीं बदली। आपने उसे बचाने का प्रयास किया। यदि कोई बच्चा चोरी कर ले और पकड़ा जाये, उससे पूछ-ताछ हो तो वह यही कहेगा, नहीं मैने चोरी नहीं की है और उसी की हां में हां मिलाते हुये माता-पिता भी यही कहते हैं, नहीं मेरा बेटा चोरी नहीं कर सकता है और आप उस समय उसे बचा लेते हैं। सिर्फ इसलिये कि आपकी बदनामी होगी, लेकिन आप उस समय यह भूल जाते हैं, कि इसकी ये छोटी-छोटी हरकते किसी दिन बड़ी मुसीबत बन जायेगी।
माता यशोदा भगवान कृष्ण को पेड़ से बांध देती थी धूप में, जब वे ग्वालों के घर से माखन चुरा कर खा जाते थे। केवल इसलिये कि वह मां चाहती थी कि उसका लल्ला बिगड़े नहीं। पर आज की मां अपने लल्ले को बचाने का सारा जतन करती है और यही लल्ला एक दिन ऐसी मुसीबत घर लाता है, कि पूरा परिवार जीवन भर दुख से त्रस्त हो जाता है। और आज-कल के लल्ले तो वैसे भी तीन के तेरह हैं, शादी हो गयी तो मां-बाप को एक गिलास पानी देंगे या नहीं इसकी गारण्टी नहीं हैं। गारण्टी यदि कोई ले सकता है, तो आप उसे जो संस्कार देंगी, केवल वह ही गारण्टी ले सकता है। यदि आपकी संतान श्रेष्ठ गुणों से सुसंस्कारित है तो उससे आप अपेक्षा कर सकते हैं, अन्यथा ईश्वर ही जाने। मुझसे सैकड़ो लोग मिलते हैं, अपनी संतानों का दीक्षा कराते हैं, अधिकतर लोग यही कहते हैं, गुरु जी मेरा बच्चा पढ़ने में तेज हो जाये, इसका दिमाग पढ़ाई में लगे, खूब आगे बढ़े आदि-आदि, लेकिन कोई यह नहीं कहता कि गुरु जी मेरा बेटा-मेरी बेटी अच्छे श्रेष्ठ गुणों से विभूषित हो, इनमें अच्छे सुसंस्कार विकसति हों, ऐसी मांग गिनती के लोगों की होती है और वास्तव में पुत्र-पुत्रियां दोनों में श्रेष्ठ संस्कारों की आवश्यकता है।
सुरक्षा का भय आज समाज में है, तो इसका मूल कारण ही हमारे संस्कार हैं, हमारी विचारधारा है, हमारा चिंतन है। हमने धर्म अनुकूल जीवन का त्याग किया, जिसका परिणाम हमारे सामने है। हमने अपने सांस्कृतिक विचारों का त्याग किया परिणाम में हमारे भीतर ईर्ष्या, धूर्तता, छल, विश्वासघात, महिलाओं का सम्मान ना करना आदि-आदि विचार आ चुके हैं। ऐसा नहीं है कि आप अपनी संस्कृति के अनुरुप जीवन अपनायेंगे, तो आप मॉडर्न नहीं कहलायेंगे, आपकी मॉडर्नता में कमी आ जायेगी, आप तकनीक में पीछे रह जायेंगे। सनातन संस्कृति एक जीवनशैली है, एक विचार है, एक चिंतन है, हमारे बाहरी जीवन की आत्मा है हमारी संस्कृति। जिसमें प्रेम है, अपनापन है, आत्मीय लगाव है, सम्मान है, दया है, करूणा है, सद्भावना है, संवेदना है, पारिवारिक-सामाजिक सम्बन्धों के प्रति समर्पण है, त्याग की भावना है। अपने जीवन के निजी स्वार्थो से ऊपर उठकर जन कल्याण के लिये कुछ करने की समझ प्रदान करती है हमारी संस्कृति। भारतीय संस्कृति का तात्पर्य केवल भक्ति-भाव में डूब जाना भी नहीं है। भक्ति मार्ग प्रेरणा देता है, जीवन में उच्च आदर्श स्थापित करने की और जिनके आदर्श, जिनके सिद्धांत ऊंचे होते हैं, वे कभी भी किसी के अहित के लिये कार्य नहीं करते, वे किसी महिला को, किसी दुर्बल पुरुष को, किसी जीव-जन्तु को प्रताडि़त नहीं करते, लेकिन शर्त यही है कि वास्तविक रूप से आपके सिद्धांत उच्च होने चाहिये, उसमें कोई बनावटीपन, दिखावापन ना हो, जो भी हो वह गहराई से हो।
इसलिये आप अपने मन से यह ख्याल निकाल दें, कि आप भारतीय संस्कृति अपनायेंगे तो पीछे रह जायेंगे, आप भक्ति मार्ग पर, आध्यात्म मार्ग पर चलेंगे तो आपकी मॉडर्नता में कोई कमी आ जायेगी। वास्तव में हमें जो अपनाना था, वह विदेशी तकनीक थी, टैलेंट था, परन्तु हम उनकी संस्कृति, उनका रहन-सहन, उनका खान-पान अपनाते रहे। परिणाम में ना हम संस्कृति के रहे, ना हम तकनीक से परिपूर्ण हो पाये, हम दोनो ही स्थितियों में अपूर्ण रह गये। इसलिये आधुनिक तकनीक अपनाओ, जीवन जीने का सलीका नहीं, और यदि अभी भी तुम नहीं संभले तो, कुरीतियों से भर जाओगे।
अपने सांस्कृतिक जीवनशैली का सम्मान करो, उसे अपनाओ, इनके विचारों पर अमल करो, तुम्हें प्रगति, सुख-समृद्धि, शांति, प्रसन्नता सब कुछ इसी मार्ग पर मिल जायेगा—- –आपका कल्याण हो—–!
परम पूज्य सद्गुरुदेव
कैलाश चन्द्र श्रीमाली
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,