





रामचरित मानस के प्रारम्भ में गोस्वामी तुलसीदास जी ने शंकर की गुरु रूप में वंदना करते हुये उन्हें बोधमय एवं नित्यरूप कहा है, जिनका आश्रय पाकर वक्र चन्द्रमा भी सर्वत्र पूजा जाता है। गुरु चरणों की रज को सुरुचि, सुगंधि सरसता और अनुराग उत्पन्न करने वाला कहा है, इस रज के मलने से मन का दर्पण निर्मल हो जाता है और उसका तिलक लगाने से सम्पूर्ण गुण स्वतः ही हो जाते हैं।
इसी संदर्भ में गुरु को सत सकर्मक और गोविंद को अकर्मक तत्व कहा गया है, राम या गोविंद तत्व यदि समरसता और अखण्ड आनन्द का निर्मल निर्विकार महासागर है तो सदगुरु उसका बोध कराने वाला, उस पथ को प्रशस्त करने वाला और वहां तक पहुंचाने वाला कारक है। इसीलिये भक्त कवि कबीर गोविंद से कहीं अधिक प्राथमिक महत्व गुरु को प्रदान करते हैं। गुरु शिष्य के पारस्परिक सम्बन्धों पर प्रकाश डालते हुये कबीर ने दोनों को ही चैतन्यमय होना आवश्यक माना है।
एक साखी में कबीर कहते हैं-
कबीर ने लिखा है कि यदि शिष्य में ही चूक है, तो गुरु को कोई दोष नहीं दिया जा सकता, यदि रंगने से पहले, साफ करते समय ही कपड़ा फट जाये, तो रंगरेज का क्या दोष शिष्य का मानस इतना अधिक मलिन व दोष पूर्ण हो सकता है, कि गुरु का ज्ञान ही ग्रहण नहीं कर पाये और ना ही गुरु रंग में रंग पाये।
गुरु कीजै जानकर और पानी पीजै छानकर इस कहावत में शायद यही अर्थ छिपा है लेकिन क्या संशय ग्रस्त मानस वाला जड़ शिष्य सद्गुरु की पहचान कर सकेगा और सद्गुरु रूपी पारस का सानिध्य पाकर बोध कंचन नहीं बना तो इसमें पारस कोणे काम वाली कहावत चरितार्थ हो जायेगी। इन दोनों संदर्भों को एक साथ हम श्रीमदभागवत गीता में देख सकते हैं। धर्म युद्ध से अर्जुन के विमुख होने का मूल कारण है कौरव पक्ष में आचार्याः पितरः पुत्रस्तधैव च पितामाहाः आदि की उपस्थिति अथवा भीष्म पितामह द्रोणाचार्य आदि पूजनीय एवं गुरुजनों से युद्ध करने की दुखद स्थिति। इस प्रसंग में अर्जुन का दुर्बल मन जो तर्क प्रस्तुत करता है, वह लौकिक दृष्टि से दुर्बल प्रतीत नही होता-
अर्थात् प्रियजनों को मारने की अपेक्षा मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न कल्याणकारी समझता हूं, क्योंकि प्रियजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुये असत् और ताम रूप मार्गों का ही तो भोग होगा।
इसी के बाद अज्ञानता, नपुंसकता, कायरता, हृदय की तुच्छ दुर्बलता आदि से युक्त धर्म के विषय में मोहित चित्त वाला अर्जुन श्री कृष्ण से पूर्ण निश्चित कल्याणकारी साधन जानने के लिये व्यग्र हो उठता है।
द्रोणाचार्य जैसे समर्थ गुरु को सामने देखकर अर्जुन कर्त्तव्यच्युत होकर मोहग्रस्त होता है, द्रोणाचार्य और अर्जुन के मध्य जो गुरु श्ष्यि के सम्बन्ध है, वे लौकिक या भौतिक धरातल पर स्थित है। यह भौतिकता द्रोणाचार्य को कौरव पक्ष की ओर से युद्ध करने के लिये विवश करती है, तो दूसरी ओर अर्जुन पूजनीय व्यक्तियों को न मारकर उन पर अनुग्रह करना चाहता है। इसमें भी अर्जुन का अह्म भाव दिखाई देता है। इसीलिए श्रीकृष्ण को अपना विराट स्वरूप दिखाना पड़ा।
सांसारिक या लौकिक गुरु केवल अक्षर ज्ञान कराता है, बौद्धिक स्तर पर भौतिक ज्ञान देता है, इस नाम रूप संसार से सम्बन्धित परिचयात्मक जानकारी बढ़ाता है। किन्तु वह जीवन के पूर्व निश्चित कर्म, प्रारब्ध की जानकारी नहीं दे पाता। वह कार्य तो केवल आध्यात्मिकता की परम स्थिति पर पहुंचा महान व्यक्तित्व ही कर सकता है और ऐसा ही दिव्य व्यक्ति जीवन रथ का विश्वसनीय सारथी होता है। इतना ही नहीं वह अपने शिष्य पर अनुग्रह भी करता है। योगानन्द, रामकृष्ण और सच्चिदानन्द परमहंस जैसे आत्म साक्षात्कार प्राप्त सद्गुरु हमेशा इस भूतल पर अवतरित होकर भूले-भटके आत्मिक पिपासुओं को त्रण देते आए हैं और सदा देते रहेंगे।
योगेश्वर कृष्ण से अर्जुन स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि मैं आपका शिष्य हूं, शरणागत हूं मुझे बताइए क्या करना श्रेयस्कर है? किन साधनाओं से मेरी इन्द्रियों का शोक दूर होगा? लौकिक गुरु की सीमा है बुद्धि का विकास और आध्यात्मिक गुरु का क्षेत्र है मन, चेतना का उन्नयन, शिष्य को जीवन के सांसारिक कीचड़ में कमल की तरह निस्पृह और प्रफुल्लित रखना। लौकिक गुरु शिष्य के मन में कर्ता का भाव जाग्रत करता है और आध्यात्मिक गुरु अकर्ता का, लौकिक गुरु भोग को जाग्रत करता है और आध्यात्मिक गुरु योग को, एक जीवन को युद्ध क्षेत्र बना देता है और दूसरा युद्ध क्षेत्र में भी मुक्ति का विधान कर देता है। प्रथम सभ्यता, संस्कृति, धर्म आदि की परिभाषाओं को गढ़कर व्यक्ति को उनमें बांधता है और दूसरा-
का ज्ञान देता है। इस तरह लौकिक गुरु जीवन में सफलता की पहली सीढ़ी है और आध्यात्मिक गुरु सार्थकता की अन्तिम। लौकिक गुरु सत, असत, अंधकार, प्रकाश, मृत्यु, अमृत्यु आदि का शाब्दिक अर्थ बताता है, आध्यात्मिक गुरु तत्सम्बन्धी अन्तद्वन्द्वि और मानसिक सत की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमृत्यु की दशा में न केवल शिष्य की यात्रा प्रारम्भ कराता है वरन उसे जीवन की परम पूर्ण स्थिति या परात्पर ब्रह्म की चेतना तक पहुंचाने में भी योगदान देता है।
गुरु पूर्णिमा सद्गुरु से निरन्तर सम्पर्क स्थापित करने, अध्ययन, साधना और सत्संग से शरीर, मन और आत्मा परिशुद्ध करने का मार्ग है। बिना गुरु के निर्देशन और कृपा भाव के आत्म विकास के मार्ग में प्रगति करना संभव नहीं हो पाता। अनवरत अभ्यास और साधना से शिष्य अपने मन को शांत और स्थिर कर भी ले तब भी गुरु की सहायता के बिना उसकी दशा पानी में डूबते-उतरते आदमी की तरह ही हो जाती है।
वह चेतना की अज्ञात गहराईयों में खोना तो चाहता है, किन्तु कैसे यह नहीं जानता? अतः साधना की उच्च स्थिति में एक समय निश्चित रूप से आता है, जब साधक चौराहे पर किंकर्त्तव्य विमूढ़ होकर खड़ा हो जाता है। इतना ही नहीं उसे अपनी सामर्थ्य सीमा का भी बोध नहीं हो पाता। अतः बिना गुरु के या तो वह अतिरिक्त साधना के श्रम बोध से दब जाता है या फिर दिशा भ्रमित होकर भटक जाता है।
सद्गुरु का कर्तव्य- सद्गुरु परम तत्व का बोध कराने से पहले शिष्य की तरह-तरह से परीक्षा लेते हैं। वे उसकी रुचि, संस्कार, शक्ति, सामर्थ आदि के अनुसार ही मार्गदर्शन करते हैं और धीरे-धीरे ही उसे साधना की ऊंचाईयों तक ले जाते हैं। इस ऊर्ध्वगमन में भी शिष्य की सुरुचि, सुगंध, सरसता और अनुराग भी निरन्तर बढ़ता जाता है। अतः उसके यात्रा क्षय का परिहास होता रहता है और साधना की महत्त ऊंचाईयों से फिसलने का उसे भय भी नहीं रह जाता। इस तरह साधना के क्षेत्र में गुरु तत्व सफलता की अनिवार्य सीढ़ी है।
गुरु पूर्णिमा ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से भी एक महान पर्व है। इस दिन गुरु तत्व की आत्मिक चेतना अत्यन्त ऊर्जास्विता रूप में रहती है। उसके संस्पर्श मात्र से शिष्य के जीवन की अज्ञात जटिलताएं स्वयंमेव सुलझ जाती है और उसे उन्मनी स्थिति की सहज प्राप्ति सुलभ हो जाती है। इस दिन गुरु शिष्य के आन्तरिक, पवित्र और चैतन्य सम्बन्धों का नवीनीकरण होता है। सम्बन्धों के दर्पण पर साल भर की जमी हुई धूल साफ हो जाती है और साधक को पुनः नवीन प्रेरणा, नयी स्फूर्ति, नयी प्राण शक्ति, नये निर्देश और नयी चेतना प्राप्त हो जाती है।
शिष्य का साधना के क्षेत्र में डग-मगाना, भटक जाना, थक जाना या अपने लक्ष्यों को विस्मृत कर जाना, ऐसी स्थितियां जब आती हैं तब गुरु अपनी दिव्य शक्ति के अदृश्य संचार से ऐसे शिष्य को संभालता है, उसकी साधना यात्रा को क्रमबद्ध करता है।
गुरु पूर्णिमा का दिन गुरु की उसी परम स्फुर्तिमान दिव्य चेतना के धरती पर अवतरण का पुण्य पर्व है। इसीलिए सनातन काल से ही साधकों द्वारा गुरु कृपा एवं उनके सानिध्य लाभ प्राप्त करने की दृष्टि से यह दिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। यही कारण है कि हजारों की संख्या में शिष्य इस दिन गुरु आशीर्वाद्, दर्शन और मंत्र प्राप्त कर नये संकल्पों के साथ साधना के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं।
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