





गुरु पूर्णिमा शिष्यों के लिये पूर्णोत्सव के बोध से परिचित होने का दिवस होता है। जब प्रत्येक शिष्य अपने गुरु की प्राणशः चेतना से संयुक्त होने की अभिलाषा लिये सद्गुरुदेव की स्तुति, आराधना, पूजन करता है। उनके दिव्य चरणों का वंदन करते हुये सदा-सदा के लिये अपने गुरु में लीन होने की क्रिया सम्पन्न करता है। जिससे उसका जीवन निरन्तर उर्ध्व स्थिति को प्राप्त करता रहे, भौतिक सुखों के साथ-साथ जप-तप, साधना का मार्ग प्रशस्त होता रहे, ऐसे ही दिव्य भावों से भरा यह दिवस माता जी व सद्गुरुदेव के अभिनंदन के लिये है। वे सभी साधक जो स्वयं को शिष्य की उपमा से विभूषित होने की आंकाक्षा रखते हैं, उनका तो यह नैतिक कर्म है कि गुरु पूर्णिमा दिवस पर विधि- विधान सहित अपने गुरु का वंदन करें।
इस गुरु पूर्णिमा पर भगवती-नारायण का संयुक्त पूजन सम्पन्न कर शिष्य-शिष्यायें माँ भगवती-नारायण से आत्मिक जुड़ाव को स्थायित्व भाव से बनाये रखने में सफल होंगे साथ ही संयुक्त रूप से भगवती-नारायण के आशीर्वाद से युक्त हो सकेंगे, और जिनके जीवन में मां का आशीर्वाद हो, गुरु की कृपा हो, उनका जीवन सफल, श्रेष्ठ होना निश्चित है। साधना सम्पन्न करने से पूर्व स्नान करें तथा शुद्ध वस्त्र धारण करें। उसके बाद अपने साधना कक्ष में उत्तराभिमुख होकर आसन पर बैठें। अपने सामने एक चौकी पर श्वेत वस्त्र बिछा लें। साथ ही पूजन की आवश्यक सामग्री पास रख लें।
सिद्धाश्रम वन्दन-
इसके बाद सिद्धाश्रम स्थिति समस्त ऋषि, मुनि, योगियों व दिव्य पुरुषों को हाथ जोड़कर नमन करते हुये परम स्मरणीय भगवत्पाद स्वामी सच्चिदानन्द जी को नमन करें-
सिद्धाश्रमो प्राण सदैव चिन्त्यं, योगीश्वरोऽयं दिव्यं प्रणम्यं।
सचितस्वरूपं भगवन्त मूर्तिं, प्रणम्यं शरण्यं प्रण्म्यं नमामि।।
भगवती-नारायण प्राण प्रतिष्ठित चित्र स्थापन करें-
इसके बाद चौकी पर बिछे श्वेत वस्त्र पर कुंकुम में रंगे हुये अक्षत द्वारा श्रीं बीज और ह्रीं बीज बनायें, उस पर पूजनीय माता जी एवं सद्गुरुदेव नारायण का चित्र स्थापित करें। इसके बाद इस मंत्र से धूप तथा दीप दिखायें-
ऊँ अं ब्रह्माण्ड स्वरूपाय निखिलेश्वराये सशक्तिकाय हंसः सोऽहं गुरुदेवाय नमः।
माँ भगवती से प्रार्थना करें-
दोनों हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक परम वन्दनीय माता जी से प्रार्थना करें हिन्दी भावार्थ भी पढ़े-
भगवती भरोगात् पीडि़तं दुष्कृतौघात्, सुतदुहितृकलत्रेपद्रवैर्व्याप्यमानम।
विलसदमृत दुष्टया वीक्ष्य विभ्रान्त चित्तं, सकल भुवनमातस त्रहि मां त्वां नमस्ते।।
हे भगवती जननि! अपने पाप समूहों के कारण भवरोग से पीडि़त, अपने पुत्र, पौत्र आदि पारिवारिक समस्याओं से ग्रस्त हूं, मुझ पर अपनी अमृत दृष्टि पात कर के मुझे कृतार्थ करें, मेरी यही कातर प्रार्थना है।
भावपूर्ण आवाहन करें-
ब्रह्म स्वरूपममलं च निरञ्जनं तं, ज्योति प्रकाश मनिशं महतो महन्तम्।
कारूण्य रूपमति बोधकरं प्रसन्नम्, नित्यं भजामि निखिलेश्वर भावगम्यम।।
आवाहयामि मम् देह रूपम् आवाहयामि मम प्राण रूपम्।
चिन्त्यं विचिन्त्यं भवदेव रूपम्। आवाहयामि शरण्यं शरण्यं।।
माँ भगवती एवं सद्गुरुदेव के आसन हेतु चित्र के समीप एक-एक पुष्प का आसन प्रदान करें।
एतोस्मानं सकृते कल्याणत्वं आदौ पुष्पासनं समर्पयामि नमः।
इसके बाद सिद्धाश्रम चैतन्य यंत्र, शक्ति माला एवं दिव्य निखिल गुटिका को दोनों हाथों में लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
किसी ताम्र पात्र या थाली में कुंकम से स्वस्तिक बनाकर उसके ऊपर सिद्धाश्रम चैतन्य यंत्र को स्थापित करें। यंत्र के सामने चावल की एक ढ़ेरी बनाकर उस पर दिव्य निखिल गुटिका को स्थापित करें फिर यंत्र और गुटिका को आबद्ध करते हुये शक्ति माला पहना दें।
यंत्र पूजन-
अब यंत्र में सद्गुरुदेव व माता जी की दिव्य शक्ति का भाव-चिंतन करते हुये पूजन सम्पन्न करें-
स्नान-
शुद्ध जल को आचमनी में लेकर निम्न मंत्र बोलते हुये एक-एक आचमनी जल चढ़ायें-
गंगाजलेन स्नानं समर्पयामि नमः।
यमुनाजलेन स्नानं समर्पयामि नमः।
गोदावरीजलेन स्नानं समर्पयामि नमः।
सरस्वतीजलेन स्नानं समर्पयामि नमः।
नर्मदाजलेन स्नानं समर्पयामि नमः।
सिन्धुजलेन स्नानं समर्पयामि नमः।
कावेरीजलेन स्नानं समर्पयामि नमः।
श्री भगवति नारायणाभ्यां नमः।
तिलक-
निम्न मंत्रों को बोलते हुये यंत्र पर प्रत्येक मंत्र के साथ कुंकुम से तिलक करें-
ऊँ भगवत्यै नमः। ऊँ अपराजितायै नमः।
ऊँ नित्यायै नमः। ऊँ शुद्धायै नमः। ऊँ दिव्यायै नमः।
ऊँ सौभाग्यायै नमः। ऊँ सर्व मंगल मंगलायै नमः।
श्री भगवती नारायणाभ्यां नमः।
अक्षत-
निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये यंत्र पर अक्षत अर्पित करते जाएं-
ऊँ तद्बह्म। ऊँ तद्वायुः। ऊँ तदात्मा।
ऊँ तत्सत्यम्। ऊँ तत् सर्वम। ऊँ तत् पुरोर्नमः त्वमेव
प्रत्यक्षं तत्वमसि। त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं भर्तासि। त्वमेव केवल हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
श्री भगवति नारायणाभ्यां नमः।
पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करें-
निम्न श्लोकों का उच्चारण करते हुये यंत्र पर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य समर्पित करें-
नारायण स्वरूपाय परमार्थेकरूपिणे,
सर्वाज्ञानतमोभेद भाविने चिदघनायते।
गुरुर्ब्रह्म गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।
पुष्पांजलि-
निम्न मंत्र बोलते हुये पुष्पांजलि के रूप में बिल्व पत्र, खुले पुष्प और अक्षत यंत्र के ऊपर चढ़ावे-
ऊँ भवाय नमः पादौ पूजयामि।
ऊँ गुरुभ्यो नमः पादौ पूजयामि।
ऊँ परम गुरुभ्यो नमः पादौ पूजयामि।
ऊँ परात्पर गुरुभ्यो नमः पादौ पूजयामि।
ऊँ पारमेष्ठि गुरुभ्यो नमः पादौ पूजयामि।
सद्गुरुदेव व माता जी की स्तुति करें-
इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर माताजी एवं सद्गुरुदेव जी का अत्यन्त भाव से स्तुति पाठ करें, फिर उसके भावार्थ को श्रद्धानवत होते हुये पढ़ें-
ब्रह्मस्थान सरोज मध्य विलसच्छीतांशुपीठे स्थितिम्,
स्फूर्यत्सूर्य रूचिं वराभय करं कर्पूर कुण्डोज्वलं।
श्वेतः सृग्वसानानुलेपनयुतं विद्युद्रूचाकान्तया,
संश्लिष्टार्ध तनुं प्रसनवदनं श्रीमद्गुरु सादरं।।
भावार्थ- ब्रह्मरन्ध्र स्थित खिले हुये कमल में विराजमान सूर्य के समान कान्ति युक्त वर और अभय मुद्रा से युक्त कपूर के समान समुज्जवल श्वेत वस्त्र धारण किये हुये भगवद्पाद सद्गुरुदेव तथा विद्युत कान्ति युक्त माता जी को मैं नमन करता हूं।
व्याप्तं यन्महसा जगत्त्रयमिदं तत्त्वप्रबोधोदयं
तं वन्दे शिरूपिणं निज गुरुं निखिलार्थ सिद्धिप्रदम्।
भावार्थ- जो अपने दिव्य ज्ञान और चेतना से तीनों लोकों में शिव रूप में व्याप्त हैं, ऐसे सद्गुरुदेव को मैं बारम्बार नमन करता हूं।
मातंगी भुवनेश्वरी च बगला धूमावती भैरव,
तारा, छिन्न शिरोधरा भगवती श्यामा रामा सुन्दरी।
दातु न प्रभवन्ति वांछित फलं यस्यप्रसादं बिना,
तं वन्दे शिवरूपिणं निज गुरुं निखिलार्थ सिद्धिप्रदम्।
भावार्थ- मातंगी भुवनेश्वरी आदि दस महाविद्याएं जिनकी कृपा के बिना किसी को भी वांछित फल प्रदान नहीं कर सकती, ऐसे सद्गुरुदेव को मैं भावपूर्ण नमन करता हूं।
काशी द्वारवती प्रयाग मथुरायोध्या गयावंतिका,
मायापुष्कर कांचिकोत्कलगिरी श्री शैलेविन्ध्यादयः।
नैतेतारयितुं भवन्ति कुशलाः यस्य प्रसादं बिना,
तं वन्दे शिव रूपिणं निज गुरुं निखिलार्थ सिद्धि प्रदम्।।
भावार्थ- काशी, द्वारका, प्रयाग आदि तीर्थ जिनकी कृपा के बिना किसी को भी संसार सागर से पार करने के लिये समर्थ नहीं हो सकते, ऐसे सद्गुरुदेव नारायण को मैं पनुः पुनः प्रणाम करता हूं।
सेवा सिन्धु सरस्वति त्रिपथगा सूर्यात्मजा कौशिकी,
गंगा सागर संगमाद्रितनया लौहित्य शोणादयः।
नालंप्रोक्त फल प्रदान समये यस्य प्रसादं बिना
तं वन्दे शिवरूपिणं निज गुरुं निखिलार्थ सिद्धि प्रदम।
भावार्थ- गंगा, यमुना आदि नदियां भी जिनकी कृपा के बिना किसी को पावन नहीं कर सकती, ऐसे भगवद् पूज्यपाद सद्गुरुदेव को मैं बारम्बार नमन करता हूं।
जय जय जगदम्ब भक्तवश्ये
जय जय सान्द्र कृपावशान्तंरगे।
जय जय निखलार्थ दान दक्षे
जय जय हे ललिताम्ब चित्सुधाब्धे।
श्री भगवती नारायणाभ्यां नमः।
भावार्थ- हे भगवति जननी! आप वात्सल्यमयी हैं, आप सारे जगत की माता हैं। निरन्तर अपने पुत्रों पर कृपा करते हुये उन्हें वांछित फल प्रदान करती हैं। आपके श्री चरणों में मैं बारम्बार भावपूर्ण नमन करता हूं।
इसके बाद शक्ति माला से निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप सम्पन्न करें-
इस विशेष मंत्र के बाद गुरु मंत्र की 1 माला मंत्र जप करना अनिवार्य है। इसके बाद आरती सम्पन्न करें और प्रसाद ग्रहण करें। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर घर में अपने इष्ट मित्रों, गुरु भाईयों व परिवार के साथ सम्भव हो तो भोज करें।
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