





इसी बीच इनका परिचय राम-भक्त साधुओं से हुआ और इन्हें ज्ञानार्जन का अवसर मिला। बड़े होने पर रामबोला का विवाह रत्नावली से हुआ, उन्हें एक पुत्र तारक की प्राप्ति हुई। रामबोला अपनी पत्नी की ओर बेहद आकर्षित थे। उन्हें अपनी पत्नी के अलावा कभी कुछ और सूझता ही नहीं था। दिन रात बस उसी में खोये रहते थे। इसी बात से परेशान होकर रत्नावली उन्हें छोड़ अपने मायके चली गई। वह चाहती थी कि रामबोला जीवन में उन्नति पाने के लिये कुछ करे लेकिन पत्नी के मोह ने तो उन्हें बावला सा बना दिया था। जिस दिन रत्नावली उन्हें छोड़कर अपने मायके गई उसी रात रामबोला भी वहाँ उनके पीछे-पीछे पहुँच गये। यह देख इनकी पत्नी ने इन्हें धिक्कारते हुये कहा कि, ‘जितना प्रेम तुम हाड़ मांस से बने मेरे शरीर से करते हो उसका आधा भी यदि भगवान से कर सको तो तुम्हारा कल्याण हो जायेगा।’ पत्नी की कटु किन्तु सत्य बात सुनकर इनके मन में वैराग्य जाग गया और वे तुरंत श्री राम की खोज में निकल गये। वे वहाँ से सीधे प्रयाग आ गये।
रामबोला चौदह वर्षों के वनवास पर निकल गये, सत्य की खोज में। इसी दौरान रामबोला, तुलसीदास बन गये। बताया जाता है कि तुलसीदास जी पूजन व नित्यकर्म के लिये गंगा पार जाया करते थे और लौटते समय लोटे का बचा हुआ जल एक वृक्ष की जड़ में डाल दिया करते थे। उस पेड़ पर एक प्रेत रहता था, जो एक श्राप के कारण वहाँ फँसा हुआ था। पवित्र जल के गिरने से उसे मुक्ति मिल गई। उसने तुलसीदास के प्रति आभार भाव व्यक्त किया और उनकी मनोकामना पूछी। पूछने पर तुलसीदास जी ने बताया कि वे श्रीराम की खोज में निकले हैं। तभी उस मुक्त हो चुकी आत्मा ने उन्हें पास ही स्थित हनुमान जी के एक मंदिर के बारे में बताया। उसने बताया कि उस मंदिर में रोजाना रामायण का पाठ सुनाया जाता है, जिसे सुनने के लिये स्वयं भगवान हनुमान एक कोढ़ी के वेश में वहाँ आते हैं। उसने तुलसीदास से कहा कि ‘आप वहाँ जाकर हनुमान जी को पहचानकर उनके पाँव पकड़ लीजिये वे अवश्य ही आपको श्रीराम के दर्शन पाने का मार्ग दिखायेंगे।’ यह सुन तुलसीदास अगले ही दिन मंदिर गये।
मंदिर में पहुंचने के कुछ समय बाद रामायण का पाठ आरंभ हो गया। तुलसीदास की दृष्टि मंदिर में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर टिकी थी। तभी उन्होंने भक्तों की भीड़ से थोड़ा अलग बैठे हुये एक कोढ़ी को देखा, जो पाठ में बेहद मगन था। तुलसीदास जी समझ गये कि हो ना हो यही भगवान हनुमान हैं, वे तुरन्त आगे बढ़े और कोढी के वेश में बैठे हनुमान जी के पांव पकड़ लिये। हनुमान जी ने उन्हें अपने असली रूप में आकर दर्शन दिये और कहा कि जल्द ही उनकी भेंट श्रीराम जी से होगी। हनुमान जी ने चित्रकूट में भगवान राम के दर्शन कराने का इन्हें आश्वासन दिया। चित्रकूट के घाट पर बैठकर तुलसीदास भगवान श्रीराम की प्रतिमा के तिलक के लिये चंदन घिस रहे थे, तब स्वयं श्रीराम ने उन्हें दर्शन दिये तथा अपने हाथों से आशीर्वाद स्वरूप तुलसीदास जी को तिलक किया। भगवान श्रीराम के दर्शन पाकर तुलसी दास प्रसन्न हो गये थे, उनकी जन्म-जन्मांतर की मनोकामना पूर्ण हो गई।
श्रीराम के दर्शन पाने के बाद ही तुलसीदास जी ने रामायण सहित 12 पुस्तकें लिख डाली। यह भगवान श्री राम की ही तुलसीदास पर कृपा थी, जो वे महान ग्रंथों के रचयिता बने।
श्री हनुमान की आज्ञा से तुलसीदास जी ने विक्रमी संवत् 1631 की चैत्र शुक्ल रामनवमी, मंगलवार को श्री रामचरित मानस का प्रणयन आरंभ किया। दो वर्ष सात माह छब्बीस दिन में यह ग्रंथ तैयार हुआ। इनके जीवन में भगवत्कृपा से अनेक चमत्कार हुये। एक बार जब तुलसीदास जी नदी के किनारे स्नान करने गये तब कुछ चोरों ने उनकी लिखी पुस्तकें चुरा लीं। परन्तु पुस्तकें चुराने के बाद वे चोर जैसे ही तुलसीदास जी के आश्रम से कुछ ही दूरी पर गये होंगे, तभी उन्होंने देखा कि एक सांवले रंग का व्यक्ति, हाथ में धनुष बाण पकड़े उनका पीछा कर रहा है।
वे जैसे-जैसे आगे बढ़ते गये, वह व्यक्ति उनके पीछे ही आता रहा। निरंतर प्रयास करने के पश्चात् भी वे उस व्यक्ति से पीछा ना छुड़ा सके। अंत में उन चारों ने भयभीत होकर सभी पुस्तकें तुलसीदास जी को पुनः लौटा दी और उन्हें भी यह वाकया सुनाया। तब तुलसीदास जी समझ गये कि वे प्रभु राम ही हैं, जो पल-पल उनकी रक्षा कर रहे हैं।
तुलसीदास जी ने अपने जीवन काल में बहुत भ्रमण किया और इसी तरह से समाज की तत्कालीन स्थिति से इनका सीधा संपर्क हुआ। इसी दीर्घकालीन अनुभव और अध्ययन का परिणाम इनकी अमूल्य कृतियां हैं, जो उस समय के भारतीय समाज के लिये तो उन्नायक सिद्ध हुई साथ ही ये आज भी जीवन को मर्यादित करने में उतनी ही उपयोगी हैं। रामचरित मानस के अतिरिक्त उनके द्वारा लिखे गये ग्रंथों में कवितावली, विनय पत्रिका, दोहावली, गीतावली, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
तुलसीदास जी ने कुल बाईस कृतियों की रचना की है, जिनमें से पाँच बड़ी एवं छः मध्यम श्रेणी में आती हैं। इन्होंने विक्रमी संवत् 1680 की श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार को राम-राम कहते हुये अपने नश्वर देह का त्याग किया।
निधि श्रीमाली
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