





सवाल करती इन आंखों के साथ जाने कितनी आंखें याद हो आती हैं कृष्ण को—वसुदेव के साथ गोकुल भेजती देवकी की आंखें, ऊखल से बांधती यशोदा की आंखें, गोकुल में ग्वाल और गोपियों की आंखें, राजसभा में पुकारती द्रौपदी की आंखें, कुरूक्षेत्र में खड़े अर्जुन की आंखें, प्रभास उत्सव के लिये विदा करती रूक्मिणी की आंखें, यमुना की आंखें और यमुना की धार में विलीन होती परम प्रिया की आंखें। उन आंखों का जल कृष्ण की आंखों से बहने लगता है- ‘तुमसे अलग होकर कहां जाऊंगा—-? छाया से काया कैसे अलग हो सकती है भला! जहां तुम हो वहां मैं हूं, कृष्ण की एकमात्र शरण तुम ही तो हो।’ ‘ऐसा परिहास न करो—मेरी शरण की तुम्हें क्या आवश्यकता कान्हा? कहां मैं एक साधारण सी ग्वालिन और कहां तुम जैसा असाधारण पुरुष—तुम तो सारी सृष्टि को शरण देते हो, तुम मेरे शरणार्थी कैसे हो सकते हो?’ परिहास नहीं सखी! जन्म लेते ही जिसे मां के आंचल को छोड़कर भवसागर की लहरों के बीच उतरना पड़ा, उसकी पीड़ा को तुम्हारे अतिरिक्त कौन हर सकता है? सारी सृष्टि को शरण देने की सामर्थ्य भले हो कृष्ण में, लेकिन कृष्ण को शरण देने की सामर्थ्य केवल तुम्हारे हृदय में है!
कौन है, जिसकी शरण का आकांक्षी है तीनों लोकों को तारने वाला असाधारण पुरुष? कृष्ण को शरण देने की सामर्थ्य रखने वाला ये हृदय किसका है?
कृष्ण को शरण देने वाला ये हृदय उसी आराधिका का है, जो पहले राधिका बनी और फिर राधिका से कृष्ण की आराध्या हो गई। कृष्ण आराधना करते हैं, इसलिये ये राधा है या ये कृष्ण की आराधना करती है, इसीलिये राधिका कहलाती है। बहुत कठिन है इसको परिभाषित करना, क्योंकि इसकी परिभाषा स्वयं कृष्ण हैं। खुद को असाधारण होने की सीमा तक साधारण बनाये रखने वाली ये किशोरी कृष्ण को अनायास ही मिली थी भागवत में। भागवत, रस का गीत है, उस गीत का रस भी और कोई नहीं, यही आराधिका है।
कृष्ण राधा से पूछते हैं, ‘राधे! भागवत में क्या भूमिका होगी तुम्हारी।’ राधा कहती है, ‘मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिये कान्हा! मैं तो बस तेरी छाया बनकर रहूंगी, तेरे पीछे-पीछे।’ ‘छाया—’ हां, कृष्ण के प्रत्येक सृजन की पृष्ठभूमि में यही छाया ही तो है। कृष्ण की बांसुरी का राग भी यही छाया है। गोवर्द्धन को धारण करने वाली तर्जनी का बल भी यही छाया है। और यही छाया है लोकहित के लिये मथुरा से द्वारिका तक की विषम यात्रा करने वाले कृष्ण की आत्मशक्ति।
संपूर्ण ब्रज रंगा है कृष्ण रंग में, कदंब से लेकर कालिंदी तक सब ओर कृष्ण ही कृष्ण— लेकिन इस कृष्ण की आत्मा बसती है राधा में। वृंदावन की कुंज गलियां हो या मथुरा के घाट हर ओर, हर तरफ बस एक नाम, एक रट, राधा—राधा— राधा— बांके का बांकपन भी राधा है और योगेश्वर का ध्यान भी राधा है।
कृष्ण के विराट को समेटने के लिये जिस राधा ने अपने हृदय को इतना विस्तार दिया कि सारा ब्रज ही उसका हृदय बन गया। उसी राधा के बारे में भागवत में गोपियां पूछती हैं कि ये आराधिका आखिर है कौन? पहले तो कभी दिखी नहीं— कौन है वो मानिनी, जिसकी वेणी गूंथता है उसका श्याम, जिसके पैर दबाता है सलोना घनश्याम और हां जब वो रूठ जाती है तो मोर बनकर नृत्य भी करता है। गोपियां ही नहीं, कृष्ण भी पूछते हैं, ‘बूझत श्याम, कौन तू गौरी—’, लेकिन राधा को बूझना इतना सरल नहीं और राधा को बूझ पाने से भी कठिन है- राधा के प्रेम की थाह बूझ पाना। इसी अथाह प्रेम की थाह पाने के लिये एक बार लीलाधर ने एक लीला रची।
हर ओर खुशी का सैलाब, हास-परिहास के बीच अचानक पीड़ा से छटपटाने लगे कृष्ण। ढोल, ढप, मंजीरे खामोश होकर मधुसूदन के मनोहारी मुख पर आती-जाती पीड़ा की रेखाओं को पढ़ने लगे। चंदन का लेप—शूलांतक वटी—कोमलांगी स्पर्श—सब व्यर्थ। वैद्य लज्जित होकर एक-दूसरे को निहार रहे थे। सत्या ने डबडबाती आंखों से पूछा तो उत्तर मिला, ‘मेरे किसी परम प्रिय की चरण धूलि के लेप से ही मेरी पीड़ा ठीक हो सकती है।’ कृष्ण की पीड़ा बढ़ती ही जा रही है।
सोलह हजार रानियां-पटरानियां, करोड़ों भक्त, सखा, सहोदर— सब प्राण होम करके भी अपने प्रिय की पीड़ा हरने को तैयार हैं, लेकिन प्रभु के मस्तक पर अपनी चरण धूलि लगाकर नर्क का भागी कोई नहीं बनना चाहता। सबने अपने पांव पीछे खींच लिये। राधा ने सुना तो नंगे पांव भागती चली आई—आंसुओं में चरण धूलि का लेप बनाकर लगा दिया कृष्ण के भाल पर। सब हतप्रभ थे। ये कैसी आराधिका है, इसे नर्क का भी भय नहीं। कृष्ण मुस्कुरा दिए, ‘जिसने मुझमें ही तीनों लोक पा लिये हों, वो अन्यत्र किसी स्वर्ग की कामना करे भी तो क्यों— सारे संसार को मुक्त करने वाला इसीलिये तो बंधा है इस आराधिका से।’
कृष्ण सबको मुक्त करते हैं, लेकिन राधा कभी मुक्त नहीं करती कृष्ण को। कृष्ण स्वयं भी कहा मुक्त होना चाहते हैं, ब्रज की इस गोरी के मोह-पाश से। द्रोपदी, सत्यभामा, सत्या, लक्षम्णा और मित्रवंदा सब आतुर-सी देख रही हैं, उस राधा को, जिसके बगैर आधे हैं कृष्ण— सूर्योपराग के समय कुरुक्षेत्र में सब उपस्थित हुये हैं। राधा भी आई है, नंद-यशोदा, गोप-ग्वाल, गोपियों के साथ।
रूक्मिणी आश्चर्य में हैं इस राधा के आते ही सारा परिवेश कैसे एकाएक नीला हो गया है! और कृष्ण का नीलवरण राधा के वसंत से मिलकर कैसे सावन-सावन हो उठा है। यों रूक्मिणी खुद स्वागत कर रही हैं राधा का, लेकिन कैसे बावले हुये जाते हैं कृष्ण—एक जलन-सी उठती है मन में और यही जलन रूक्मिणी सौंप देती है, राधा को गर्म दूध में। कृष्ण का स्मरण कर एक सांस में पी जाती है राधा—सारा द्वेष, सारी जलन, सारी पीड़ा, लेकिन कृष्ण नहीं झेल पाते। कृष्ण के पैर दबाते समय रूक्मिणी ने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में छाले हैं। मानो गर्म खौलते तेल से जल गये हों।
ये क्या हुआ द्वारिका नाथ— ये फफोले कैसे? कृष्ण बोले, प्रिय, राधा के हृदय में बसता हूं मैं। तुम्हारे मन की जिस जलन को राधा ने चुपचाप पी लिया देखो वही मेरे तन में फूट पड़ी है—! राधा को बड़भागिनी कहता है ये संसार, लेकिन बड़भागी तो कृष्ण हैं, जिन्हें राधा जैसी आराधिका मिली। जिसने उन्हें प्रेम, समर्पण और त्याग की वर्णाक्षरी सिखाई। तभी तो दानगढ़ में दान मांगते हैं कृष्ण! ‘हे राधे! बड़ी दानी है तू, सुना है तेरे बरसाने में जो भी आता है, वो खाली हाथ नहीं जाता। मुझे भी दान दे। प्रथम दान अपनी रूप माधुरी का। दूसरा दान तेरे अनंत रस और विलास का’
दानगढ़ में कृष्ण को दिया गया, ये महादान ही पाथेय बन जाता है कृष्ण का, गैया चराने वाले गोपाल से द्वारिकाधीश बनने तक की लंबी यात्रा में। कुरूक्षेत्र से लेकर प्रभास तक राधा का यही प्रेम तो जीवन रसधार बनकर बहता रहा कृष्ण के भीतर। गीता का आधार भी यही प्रेम है और महारास का रस भी। वेणु हो या पांचजन्य, दोनों में एक ही स्वर फूटता हैं एक ही पुकार उठती है, ‘राधे, तेरे नैन बिंधो री बान—’ कृष्ण से जुड़ा हर कोई राधा होना चाहता है।
सच तो है, भगवान बसता ही है हृदय में, उस हृदय में जो निश्छल हो, जो प्रेम की अंनत गहराईयों में भी असीमित हो, जहां कोई राग-लपेट ना हो, ऐसा ही तो प्रेम ढूढ़ता है कान्हा! ऐसे ही प्रेम के प्यासे हैं योगेश्वर, जब कोई राधा मिल जाती है, किसी मोड़ पर उसी के शरण में चले जाते हैं मोहन! राधा का तात्पर्य ही प्रेम की साकार मूर्ति है, जिसे तुम स्त्री मत समझना, राधा एक भाव है विशुद्ध प्रेम का—!!! जो हृदय में बसता, आत्मा रमता है, ऐसा प्रेम कर तुम भी पा सकते हो अपने कान्हा को, अपने मोहन को, अपने योगेश्वर को—–!!!
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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