





मानव कल्याणार्थ जब द्वापर युग के अन्त में देवता और दानव ने समुद्र-मंथन किया तो उस समय मन्दराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को अरणी बनाया गया। अनेक अवतार समुद्र-मन्थन के समय हुये, जिनमें एक ज्येष्ठा देवी भी हैं, जिनका नाम दरिद्रा देवी भी है।
समुद्र मंथन से लाल नेत्रों वाली, अत्यन्त बूढ़ी, दन्त विहीन, पिंगल केश वाली तथा जिह्ना को बाहर निकाले हुए, घट के समान पेट वाली ज्येष्ठा देवी उत्पन्न हुयीं, जिन्हें देखकर सभी घबरा गये। जिन्हें लक्ष्मी जी की बड़ी बहिन ज्येष्ठा अर्थात् अलक्ष्मी दरिद्रता के नाम से जाना जाता है।
भगवान विष्णु द्वारा लक्ष्मी के वरण का समय जब निकट आया तब लक्ष्मी जी ने कहा ज्येष्ठा बहिन का विवाह हुये बिना छोटी बहिन का विवाह शास्त्र सम्मत नहीं है। तब भगवान विष्णु ने उद्दालक ऋषि को ज्येष्ठा से विवाह करने के लिए प्रेरित किया। भगवान के बहुत समझाने पर ऋषि विवाह के लिए सहमत हो गये, तब कार्तिक माह की द्वादशी तिथि को समुद्र द्वारा ज्येष्ठा देवी का कन्यादान सम्पन्न हुआ। उद्दालक ऋषि दरिद्रा देवी को लेकर अपने आश्रम आ गये। ऋषि का आश्रम वेद ध्वनि से गुंजित था। इस पर ज्येष्ठा देवी ने कहा कि जहां वेद ध्वनि, अतिथि सत्कार, यज्ञ, दान आदि धार्मिक कार्य, अनुष्ठान होता हो, वहां मेरा निवास नहीं हो सकता है।
अतः हे स्वामी! आप मुझे किसी ऐसे स्थान पर ले चलिये, जहां इन कार्यों के विपरीत कार्य होता हो। इस पर ऋषि ने कहा- देवि! तुम इस पीपल वृक्ष के पास बैठी रहो, मैं तुम्हारे अनुरुप आवास खोज कर आता हूं।
ज्येष्ठा देवी के लिए आवास खोजते हुए उद्दालक ऋषि को बहुत समय हो गया, किंतु कोई स्थान नहीं मिला। इधर ज्येष्ठा अलक्ष्मी देवी उसी पीपल वृक्ष के नीचे बैठी रहीं। जब उन्हें कई दिन तक पीपल वृक्ष के नीचे बैठे रहने से भूख-प्यास ने सताया तो वे व्याकुल होकर रोने लगीं। उनके रुदन से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। उनके रोने की आवाज को जब लक्ष्मी जी ने सुना तो वे भगवान विष्णु के साथ उनसे मिलने आयीं। ज्येष्ठा ने अपना सम्पूर्ण वृतांत सुनाया तो भगवान् विष्णु ने कहा- हे ज्येष्ठे! तुम सदा इसी वृक्ष के मूल में निवास करो, तुमसे मिलने मैं लक्ष्मी के साथ प्रत्येक शनिवार यहां आऊंगा और उस दिन जो पीपल वृक्ष का पूजन करेगा, मैं उसके घर लक्ष्मी के साथ निवास करूंगा। इसके बाद भगवान विष्णु लक्ष्मी के साथ बैकुण्ठ चले गये और तभी से ज्येष्ठा देवी पीपल के नीचे निवास करने लगीं।
पप्रपुराण के उत्तराखण्ड में बताया गया है कि- जब मंथन करने से ज्येष्ठा देवी का आविर्भाव हुआ तो उन्होंने देवताओं से पूछा कि मेरे लिये क्या कार्य है और मेरा निवास कहां होगा? तब देवताओं ने कहा- हे देवि! जिसके घर में सदा कलह होता हो, जो नित्य कटु भाष्य एंव झूठ बोलता हो।
जहां गुरु, देवता का पूजन, ध्यान, साधना, हवन ना होता हो हे अशुभे! जहां स्त्री-पुरुष में निरंतर लड़ाई होता हो, पितरों का श्राद्ध ना होता हो, जो दूसरो का धन छीन लेते हों, जहां स्त्रियों का सम्मान ना होता हो और जो पुरुष स्त्री को भोग्य पदार्थ मानता हो हे अशुभ दरिद्रे! तुम वहां चिर स्थिर रूप से निवास करो।
महाभारत ग्रंथ के दान-धर्म विषय पर एक महत्वपूर्ण प्रकरण है, जिसमें रूक्मणि भगवती लक्ष्मी से पूछती हैं, कि हे सर्वलाभ प्रदायिनी देवि! आप कहां और किन पुरुषों के यहां निवास करती हैं। इस पर महालक्ष्मी कहती हैं- हे देवि! मैं निरन्तर ऐसे पुरुष में निवास करती हूं, जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, कार्य कुशल, कर्म परायण, क्रोध रहित, देव आराधना में तत्पर तथा सत् गुणों से युक्त हो।
जो स्त्री बिना विचारे कार्य करती हो, अपने पति के प्रतिकूल कार्य करती हो, असभ्य व लज्जा विहीन हो उसका मैं त्याग कर देती हूं और वह ज्येष्ठा अलक्ष्मी की शरण प्राप्त करता है। जो पुरुष अकर्मण्य, नास्तिक, दुराचारी, क्रूर, चोर, दुर्गुणों से युक्त गुरु में दोष देखने वाला हो, उसके यहां मैं निवास नहीं करती वहां ज्येष्ठा अलक्ष्मी निवास करती हैं।
इसी तरह जो स्त्रियां सद्गुणों से युक्त, सेवा में तत्पर, घर, बर्तन को स्वच्छ, सुन्दर रखने वाली तथा धन्य संग्रह करने में तत्पर रहती हाें, उसके पास मैं निवास करती हूं। एक बार की बात है दानवीर बलि को भी लक्ष्मी ने इसलिए त्याग दिया कि उन्होंने उच्छिष्ट भक्षण और ऋषि-मुनियों का विरोध किया। इसका कारण स्पष्ट करते हुए लक्ष्मी ने देवराज इन्द्र को बताया, भूमि (वित्त), तीर्थ (जल), हवन (अग्नि), ज्ञान (विद्या) ये चार स्थान मुझे प्रिय हैं। जहां सत्य, दान, व्रत, उपासना, साधना एवं धर्म वास करते हैं वहीं मैं निवास करती हूं।
ऐसे ही महाभारत शान्ति पर्व में बताया गया है कि- एक बार प्रहलाद ने अपना शील एक ब्राह्माण को प्रदान कर दिया था। जिसके कारण उनका तेज, धर्म, सत्य एवं अन्त में लक्ष्मी भी उनको छोड़कर चली गयी थी। पुनः लक्ष्मी ने प्रहलाद को साक्षात दर्शन देकर कहा कि- तेज, धर्म, तपस्या, सत्य, पुरुषार्थ कर्म एवं शील आदि गुणों में मेरा निवास होता है। इनमें से भी शील एवं चरित्र मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं, इसी कारण शीलवान स्त्री-पुरुष के पास रहना मुझे अच्छा लगता है। जिनके पास शील और चरित्र नहीं उनके पास अलक्ष्मी निवास करती है।
उपरोक्त सभी कथन का तात्पर्य यही है कि जीवन में अभाव केवल धन, द्रव्य, वाहन, भवन के रूप में ही नहीं होता है। अभाव चिंतन, विचार स्वरूप में भी विद्यमान हो सकता है जो जीवन को सभी तरह से दीन-हीन स्वरूप में निर्मित करता है। इसलिए मनुष्य को विचार, सोच, कर्म, गुण, चरित्र, धर्म, सत्य, ईश्वर भक्ति, गुरु समर्पण आदि में भी योग्य स्वरूप में धनी बनना चाहिए अन्यथा उनके जीवन में दरिद्रता ही बनी रहेगी।
संन्यास को जीवन का उमंग, उत्साह और पूर्ण आनन्द व परम पौरुष कहा गया है, क्योंकि संन्यास तो वही है, जहां धार्म के अनुरुप कर्म हो, पालन-पोषण के लिए पर्याप्त अर्थ (धान) हो, काम रूप में जीवन के प्रति उमंग, जोश, ऊर्जा हो और इन सभी माधयमों से जीवन के परम लक्ष्य की पूर्ति हो सके।
यह सभी क्रियायें गृहस्थ सांसारिक जीवन में ही पूर्ण होती हैं, यदि सांसारिक जीवन को सुव्यस्थित कर मनुष्य अपने कर्तव्य कर्म का पूर्णतः से निर्वाह करे और ईश्वरीय गुरुत्व चेतना का आश्रय लेकर अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर प्रयासरत बना रहे तो वह सर्व स्थितियों को प्राप्त कर सकता है, जो सांसारिक जीवन की अनिवार्यता है, जिसके आधाार पर गृहस्थ जीवन को संन्यस्त भाव से अभिसिंचित किया जा सकता है और अपने सांसारिक जीवन में धार्म, अर्थ, काम का पूर्ण रसपान कर संन्यस्त भाव की प्राप्ति करने में सफ़ल होता है। धार्म से ही अर्थ की प्राप्ति होती है व बिना कर्म के अर्थ नहीं मिलता तथा जब धार्म, अर्थ, काम तीनों एक रूप में होते हैं तब ही पूर्णता रूपी मोक्ष की प्राप्ति होती है।
महामाया दारिद्रय नाशिनी साधाना महोत्सव 17-18 नवम्बर कांकेर छ-ग- में धानहीनता, अभाव, न्यूनता के साथ-साथ विचार व कर्महीनता रूपी अलक्ष्मी का नाश हो सकेगा और जीवन में सत् चित् आनन्द, प्रसन्नता हर्ष, उल्लास स्वरूप में सभी सुलक्ष्मियों की प्राप्ति हो सकेगी। उक्त सभी स्थितियां अपने इष्ट व सद्गुरु की कृपा से सिद्धाश्रम संस्पर्शित संन्यस्त शक्ति नारायण भगवती महामाया चेतनामय साधानात्मक क्रियाओं के द्वारा सम्पन्न होगा।
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