





हनुमान जी बाल्यकाल में बहुत नटखट थे, वे वन में ऋषि-मुनियों के आश्रम के पेड़-पौधे उखाड़ कर उनकी कुटिया में फेंक देते क्योंकि इसमें उन्हें आनंद की अनुभूति होती थी। ऋषियों को उनकी यह शरारत अप्रिय थी, लेकिन उन्हें हनुमान के भविष्य का ज्ञान था, इसलिए वे उन्हें बालक देख क्षमा कर देते परन्तु एक दिन इसी शरारत के चलते बाल हनुमान ने मातंग मुनि की तपस्या में व्यवधान डाल दिया, तपस्या भंग हो जाने के कारण मुनि मातंग ने क्रोधवश हनुमान को श्राप दे दिया कि हनुमान अपनी सारी शक्तियां भूल जायेंगे और इस शाप से वे तब ही मुक्त हो पायेंगे जब उन्हें उनकी शक्ति का अहसास दिलाया जायेगा, तब उन्हें सब स्मरण हो जायेगा और वे महावीर हो जायेगें और ऐसा ही हुआ सागर पार कर माता सीता का पता लगाने का जब समय आया तब हनुमान जी को जामवंत ने उनकी शक्तियों के बारे में याद दिलाया था और वे उड़ कर समुद्र पार कर लंका पहुंच गये थे।
कुछ इस प्रकार की घटना हनुमान जी की माँ अंजनि के साथ भी हुई थी। एक पौराणिक कथा के अनुसार, हनुमान जी की माता अंजनी इंद्र की सभा में अप्सरा थीं। वे अत्यंत सुन्दर और चंचल स्वभाव की थी, उनका नाम पुंजिकस्थला था। एक बार भूलवश पुंजिकस्थला ने तप कर रहे एक ऋषि के ऊपर फल फेक दिया। अचानक तीव्र गति से लगे फल के कारण उत्पन्न तप में व्यवधान से ऋषि की समाधि टूट गई, जिससे वे बहुत क्रोधित हो गये। क्रोधित होकर ऋषि ने पुंजिकस्थला को श्राप दे दिया कि अगले जन्म में वह वानरी बनेगी। ऋषि के श्राप को सुनकर पुंजिकस्थला ऋषि के चरणों में गिर गई और उनसे क्षमा मांगने लगी। ऋषि को उन पर दया आ गई, तब ऋषि ने कहा कि वानरी होने पर भी तुम्हारा रूप परम शोभायमान होगा और तुम्हारी कोख से ऐसे पुत्र का जन्म होगा जिसकी प्रभुता और ख्याति से तुम्हारा नाम युगो-युगो तक चिरंजीवी रहेगा। तुमसे एक ऐसे पुत्र का जन्म होगा, जिसकी कीर्ति और यश से तुम्हारा नाम अमर हो जायेगा। इस तरह पुंजिकस्थला को धरती पर जन्म लेने पर एक वीर पुत्र प्राप्त करने का आशीर्वाद् मिल गया।
देवराज इंद्र की सभा में हजारों सुन्दर अप्सराएं थी, जिनमें से एक थी पुंजिकस्थला। इंद्र ने एक बार जब पुंजिकस्थला को मनचाहा वरदान मांगने को कहा, तब उन्होंने हिचकिचाते हुए उनसे कहा कि उन पर तपस्वी साधु का श्राप है अगर हो सके तो इंद्र देव उन्हें उस श्राप से मुक्ति दिलवा दें। इंद्र देव ने कहा कि वे उन्हें श्राप के बारे में विस्तृत से बताएं। तब पुंजिकस्थला ने बताया कि किशोरावस्था में वन में खेलते समय भूलवश उनके द्वारा एक फल किसी महान तपस्वी को लग गया था, जिससे उनकी तपस्या भंग हो गई और क्रोधवश उन्होंने श्राप दे दिया कि जब भी मुझे किसी से प्रेम होगा तो मैं वानर बन जाऊंगी। क्षमा-याचना करने पर ऋषिवर को दया आ गई और उन्होंने कहा कि मेरा चेहरा वानर समान होने पर भी उस व्यक्ति का प्रेम मेरी तरफ कम नहीं होगा। सब कुछ इंद्र देव को सुना देने के बाद पुंजिकस्थला ने कहा कि अगर इंद्र देव उन्हें इस श्राप से मुक्ति दिलवा सकें तो वह उनकी बहुत आभारी होंगी। इंद्र देव ने पुंजिकस्थला से कहा कि इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए धरती पर जाकर वास करना होगा, जहां वे अपने पति से मिलेंगी। शिव के अवतार को जन्म देने के बाद अंजनि को इस श्राप से मुक्ति मिल जायेगी। इंद्र देव की बात मानकर पुंजिकस्थला अंजनि के रूप में धरती पर चली आई, उनके श्राप का प्रभाव शिव के अंश को जन्म देने के बाद ही समाप्त होना था।
वह वन में एक शिकारन के रूप में जीवन यापन करने लगीं। एक दिन उन्होंने जंगल में एक बड़े बलशाली युवक को शेर से लड़ते देखा और उसके प्रति आकर्षित हो गई। जैसे ही उस युवक ने उनकी ओर देखा, उनका चेहरा वानरी में बदल गया, वह अपना मुख छिपाकर जोर-जोर से रोने लगीं। तब वह युवक उनके समीप आया और उनके रोने का कारण पूछने लगा। तब अंजनि ने देखा उस युवक का मुख भी वानर की तरह ही थ। वह युवक और कोई नहीं वनराज केसरी थे।
अंजनि ने अपना मुख छिपाते हुये उसे बताया कि वह कुरुप हो गई है और ऋषि के वचनों के अनुरुप अंजनि का वानर जैसा मुख उन दोनों को प्रेम करने से नहीं रोक सका। वानर राज केसरी ने अंजनि को बताया कि वे जब चाहे, मानव रूप में आ सकते हैं और जब चाहे वानर स्वरूप में आ सकते हैं। राजा केसरी और अंजनि ने विवाह कर लिया।
केसरी और अंजनि ने विवाह तो कर लिया परन्तु वे संतान सुख से वंचित थे। अंजनि अपनी इस पीड़ा को लेकर मंतग ऋषि के पास गई तब मतंग ऋषि ने उन्हें पप्पा सरोवर के पूर्व में स्थित नरसिंह आश्रम की दक्षिण दिशा में नारायण पर्वत पर स्थित स्वामी तीर्थ पर जाकर उसमें स्नान करके 12 वर्ष तक तप एवं उपवास करने को कहा और कहा कि ऐसा करने पर उन्हें पुत्र सुख की प्राप्ति होगी।
अंजनि ने मतंग ऋषि और अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर 12 वर्षों तक तप किया और वे केवल वायु पर ही जीवित रहीं। वायु देव उनकी कठोर तपस्या देख प्रसन्न हुये, उन्होंने अंजनि के कान में प्रवेश कर वरदान दिया कि तुम्हारे यहां सूर्य, अग्नि एवं सुवर्ण के गुणों से युक्त तेजस्वी वेद-वेदाज्ञ में निपुण महाबली पुत्र का जन्म होगा। इस आशीष के बाद वे शिव की आराधना व तपस्या में लीन रहीं, तब प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुये और उन्हें वरदान मांगने को कहा, अंजनि ने शिव जी को कहा कि ऋषिवर के श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्हें भगवान शिव के अवतार को जन्म देना है, इसलिए शिव बालक के रूप में उनकी कोख से जन्म लें, तथास्तु कहकर शिव अंतर्ध्यान हो गये।
इस घटना के बाद अंजनि एक दिन शिव की आराधना कर रहीं थीं और दूसरी ओर अयोध्या में महाराज दशरथ अपनी तीनों रानियां कौशल्या, सुमित्र और कैकेयी के साथ पुत्र प्राप्ति के लिये श्रृंगी ऋषि के साथ यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ की पूर्णाहुति पर स्वयं अग्नि देव ने प्रकट होकर ऋषि श्रृंगी को खीर का एक स्वर्ण पात्र दिया और कहा ऋषिवर यह खीर तीनों रानियों को प्रसाद रूप में दें, राजन की इच्छा अवश्य पूर्ण होगी। तीनों रानियों द्वारा खीर ग्रहण कर लेने के बाद एक पक्षी ऊपर आकाश की ओर से आया और थोड़ा खीर अपनी चोंच में भर ले गया। उस पक्षी ने खीर को तपस्या में लीन अंजनि के हाथ में गिरा दिया। अंजनि ने शिव का प्रसाद समझ कर उसे ग्रहण कर लिया।
परिणाम स्वरूप चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को अंजनि को पुत्र की प्राप्ति हुई। वायु के द्वारा उत्पन्न इस पुत्र को ऋषियों ने वायु पुत्र नाम दिया। अंजनि के पुत्र होने के कारण हनुमान जी को आंजनेय नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है अजंना द्वारा उत्पन्न। इस तरह माता अंजनि ने केवल और केवल भगवान हनुमान को जन्म देने के लिए पृथ्वी पर अवतरण लीं थीं।
माता अंजनि भगवान हनुमान को जन्म देने के लिए स्वर्ग से पृथ्वी पर आयी थीं, पूर्व में वे अद्वितीय सौन्दर्यवान, सद्गुणो से युक्त रूपवती अप्सरा पुंजिकस्थला के नाम से जानी जाती थी। माता अंजनि ने 12 वर्ष तक केवल वायु ग्रहण कर प्रचण्ड तपस्या की, जिसके उपरान्त उन्हें परम पराक्रमी, बल, बुद्धि प्रदाता हनुमान जैसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी।
निधि श्रीमाली
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,