





हिन्दू पैदा होते से ही वेद की पूजा में लग जाता है। मुसलमान पैदा होते से ही कुरान की रटन में लग जाता है। जैन पैदा होते से महावीर को कण्ठस्थ कर लेता है।
अब ये जो लकीरे छूट गई हैं जमीन, पर ये तुम्हारी आत्मा पर खि्ांच जाती हैं। इनके कारण तुम कभी खाली नहीं हो पाते और मजा यह है, कि ये सभी शास्त्र ध्यान की बाते करते हैं, शून्य की बात करते हैं। तुम भी शून्य और ध्यान की बात करने लगते हो। लेकिन वह बात ही होती है, बातों में से बात निकलती जाती है, लेकिन तुम कोरे के कोरे रह जाते हो।
तुम्हारा जीवन तो तभी समृद्ध हो, जब तुम्हारा वेद तुम्हारे भीतर पैदा हो जाये, वह उधार न हो। उस वेद को ही हम असली वेद कहते हैं, जो तुम्हारे ध्यान में जन्मेगा। निश्चित ही जिस दिन तुम्हारा वेद जन्म जायेगा, उस दिन पुराने वेद को भी तुम अगर पढ़ोगे तो समझोगे कि ठीक है। तुम गवाही हो जाओगे।
इस बात को थोड़ा ठीक से समझ लेना, क्योंकि नाजुक है। वेद से तुम्हें ज्ञान नहीं मिलेगा। लेकिन ज्ञान अगर तुम्हें अपने ध्यान में मिल जाये, तो तुम वेद के गवाह हो जाओगे कि वह ठीक है। तुमने भी वैसा ही जाना। तुमने भी वही जाना, जो ऋषियों ने कहा है। लेकिन ऋषियों ने क्या कहा है, इसको कंठस्थ कर के कोई कभी ज्ञान को उपलब्ध नहीं होता। ज्ञान को उपलब्ध होकर ऋषियों ने जो कहा है वह ठीक है, सम्यक है, यह प्रतीति आती है। तब सभी शास्त्र सच हो जाते हैं।
और इस फर्क को भी समझ लो। अगर तुमने वेद को कंठस्थ किया तो कुरान गलत रहेगा। सही नहीं हो सकता। क्योंकि सत्य का तो तुम्हें पता नहीं है। तुम्हें शब्दों का पता है। वेद अलग शब्दों का उपयोग करता, कुरान अलग शब्दों का उपयोग करता है। उन शब्दों में मेल न होगा। बाइबिल और अलग शब्दों का उपयोग करती है। तालमुद और अलग शब्दों का उपयोग करता है, उनमें मेल न होगा। तुम पाओगे कि वेद सही, सब गलत। शेष सब गलत। महावीर सही, तो कृष्ण गलत। कृष्ण सही तो बुद्ध गलत। सब के सही होने का तुम्हें पता नहीं चल सकता। इसलिये तुम शास्त्र से बंधे रहोगे। जिस दिन तुम्हारा वेद पैदा हो जायेगा, तुम्हारा कुरान जागेगा भीतर, तुम्हारे प्राण का गीत पैदा होगा, तुम्हारी गीता पैदा होगी, वही भगवद्गीता है। जब तुम्हारा भगवान गा उठेगा, तभी भगवद्गीता। उस दिन तुम अचानक पाओंगे कि वेद ही नहीं, कुरान भी एकदम सही है। बाइबिल, तालमुद सब एक साथ सही है।
जिसे यह होश आना शुरु हो गया कि मौत है, उसी के जीवन में धर्म की किरण उतरती है। मौत का स्मरण धर्म की प्राथमिक भूमिका है। अगर मृत्यु न होती तो संसार में धर्म भी न होता। मृत्यु है, इसलिये धर्म की संभावना है और जब तक तुम मृत्यु को झूठलाओगे तब तक तुम्हारे जीवन में धर्म की किरण न उतरेगी।
मृत्यु को ठीक से समझो, क्योंकि उसके आधार पर ही जीवन में क्रांति होगी। तुम्हें अगर पता चल जाये कि आज सांझ ही मर जाना है, तो क्या तुम सोचते हो, तुम्हारे दिन का व्यवहार वही रहेगा जो इस पता न चलने पर रहता? क्या तुम उसी भांति दुकान जाओगे? उसी भांति ग्राहकों का शोषण करोगे? क्या उसी भांति व्यवहार करोगे, जैसा कल किया था? क्या पैसे पर तुम्हारी पकड़ वैसी ही होगी, जैसे एक क्षण पहले तक थी? क्या मन में वासना उठेगी, काम जगेगा? सुंदर स्त्रियां आकर्षित करेंगी? राह से गुजरती कार मोहित करेगी? किसी का भवन देख कर ईर्ष्या होगी, नहीं सब बदल जायेगा।
अगर मौत का पता चल जाये कि आज ही सांझ हो जाने वाली है, तुम्हारे जीवन का सारा अर्थ, तुम्हारे जीवन का सारा प्रयोजन, तुम्हारे जीवन का सारा ढंग और शैली बदल जायेगी। मौत का जरा सा भी स्मरण तुम्हें वहीं न रहने देगा जो तुम हो। और जो तुम हो, बिलकुल गलत हो। क्योंकि सिवाय दुख के और तुम्हारे होने से कुछ भी फल नहीं आता। फल लगते हैं निश्चित, केवल दुख के लगते हैं। फल लगते हैं निश्चित। तुम्हारी आशाओं के अनुकूल नहीं, न तुम्हारे स्वप्नों के अनुसार। फल लगते हैं तुम्हारी आशाओं के विपरीत। तुम्हारे सपनो से बिलकुल उलटे।
जीवन के अंत में सिर्फ राख छूट जाती है हाथ में और एक विषाद और एक गहन पीड़ा, कि एक और अवसर खो गया। इसीलिये तो मरते वक्त लोग इतने दुखी और पीडि़त मरते हैं। अन्यथा अगर जीवन की चरितार्थता उपलब्ध हुई हो और जीवन की धन्यता को जाना हो और जीवन एक गीत बन गया हो, जिसे कबीर कहते हैं, सुमिरन बन गया हो, एक याददाश्त, कि मैं कौन हूं, तो मृत्यु तो एक महोत्सव हो जायेगी। क्योंकि वह तो सारे जीवन की परिपूर्णता है। वह तो सारे जीवन का निचोड़ है, सार है। तब मृत्यु समाधि हो जाती है। जो अनजान जीता है, उसका जीवन भी मृत्युवत है। जो होश से जीता है वह मरता ही नहीं। जो बेहोशी में जीता है वह कभी जीता ही नहीं। उसका जीवन एक प्रवंचना है। और स्वभावतः जिनके बीच तुम पैदा हुये हो वे ऐसे ही मुर्दे है और उनके पीछे ही तुम चल रहे हो। कबीर कहते हैं- पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि लोगों के पीछे चला जा रहा था, जहां लोग जा रहे थे वहां मैं चला जा रहा था। उनका अनुसरण कर रहा था। इस बात को बिना सोचे कि वे उतने ही अंधे हैं जितना मैं हूं। बिना यह सोचे कि इस सारी भीड़ का क्या अंत होता है, आदमी भीड़ के साथ चलता है। बड़े गहरे कारण हैं, वे समझ लेना जरुरी है।
मेले की भीड़ में बच्चा जब तक अपनों का हाथ पकड़ कर चलता है, उसे मेला बहुत सुन्दर और शानदार लगता है, पर ज्यों ही वह अपनो से बिछड़ जाये तो वहीं मेला उसे डरावना और नीरस लगने लगता है, दुनिया के मेले में हम सब की यह स्थिति है, जब तक हम अपनों से जुड़े हैं, उनका हाथ थामे हैं, दुनिया हमें बहुत सुन्दर लगती है, पर कोई अपना रूठ जाये, बिछड़ जाये तो दुनिया की सारी रौनकें खत्म हो जाती हैं। हम सभी एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। इसीलिये एक-दूसरे का हाथ थामें रखते हैं।
समाज व्यक्ति का शत्रु है। समाज तुम्हें भेड़ों की भांति चाहता है, व्यक्तियों की भांति नहीं। क्योंकि व्यक्ति के साथ ही बगावत का स्वर शुरु हो जाता है। व्यक्ति साथ ही होश और जैसे ही होश की पहली किरण उतरी, कि व्यक्ति अपने मार्ग को खोजने में लग जाता है। फिर वह भीड़ के पीछे नहीं चलता। कितना ही सुंदर राजपथ हो, कितना ही साफ-सुथरा हो, कंटकाकीर्ण न हो, फिर भी वह भीड़ के साथ नहीं चलता। वह अपना रास्ता बनाना शुरु करता है। होश जैसे ही आया, कि तुम समाज से टूट जाते हो। तुम पहली दफा स्वयं होते हो और स्वयं होने में बगावत है, विद्रोह है, क्रांति है। इसलिये कोई समाज बर्दाश्त नहीं करता उस व्यक्ति को जो सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयास करने हेतु समाज की रूढि़वादिता पर चोट करता है।
जन्म के पहले क्षण से लेकर मृत्यु की आखिरी घड़ी तक समाज व्यक्ति को नष्ट करने की कोशिश करता है, दबाता है। हर तरह से तुम्हें तोड़ता है। तुम कहीं आत्मवान न हो जाओ, क्योंकि तुम अगर आत्मवान हुये तो समाज का नियंत्रण तुम पर न हो सकेगा।
अब तक किसी आत्मवान व्यक्ति पर समाज नियंत्रण नहीं कर सका। सिर्फ मुर्दों को काबू में रख सकता है। जिंदा व्यक्ति एक आग है। उसे हाथ में बांध कर रखना आसान नहीं। उसके ऊपर कोई बंधन नहीं हो सकता। तुम जिंदा व्यक्ति को कारागृह में डाल सकते हो, लेकिन कैदी नहीं बना सकते। तुम जंजीरें पहना सकते हो, लेकिन तुम उसकी स्वतंत्रता नहीं छीन सकते। उसकी स्वतंत्रता आंतरिक है, होश की स्वतंत्रता है।
इसलिये सभी समाज, बिना किसी अपवाद के चाहे वह पूंजीवादी हो, या समाजवादी हो, चाहे साम्यवादी हो, व्यक्ति के दुश्मन हैं और समाज में होने वाली कोई भी क्रांति वास्तविक क्रांति नहीं है, धोखा है। चाहे प्रफ़ान्स में हो, चाहे रुस हो, चाहे चीन में सभी क्रांतियां धोखे हैं। क्योंकि क्रांति कुछ भी करती नहीं। समाज के एक ढांचे को दूसरे ढांचे से बदल देती है। एक गुलामी की जगह दूसरी गुलामी आ जाती है और स्वभावतः दूसरी गुलामी पहली गुलामी से अक्सर ज्यादा ताकतवर सिद्ध होती है, क्योंकि नई होती है। पुरानी गुलामी जरा-जीर्ण हो गई होती है। उसमें से छेद होते हैं निकलने के बाहर। उसकी दीवारें गिर गई होती हैं। उसके द्वार दरवाजे कमजोर हो गये होते हैं। उसके पहरेदार शिथिल हो गये होते हैं। कारागृह का मालिक आश्वस्त हो गया होता है कि सब ठीक चल रहा है, सो जाता है। नई गुलामी, पुरानी गुलामी से हमेशा ज्यादा मजबूत होती है। क्योंकि कारागृह नये बनते हैं। द्वार, दरवाजे मजबूत बनते हैं और नये समाज की व्यवस्था जाती है, कि जिस तरह हमने पुरानी व्यवस्था को तोड़ दिया है, कोई दूसरी बगावत इस व्यवस्था को न तोड़ दें। इसलिये नई व्यवस्था पुरानी से ज्यादा कुशल होती है।
जार के जमाने में रुस में जितनी आजादी थी, उतनी स्टैलिन के जमाने में न रही और च्यांग-काई-शेक के साथ चीन में जितनी स्वतंत्रता थी, उतनी माओं के साथ न रही। गर्दन और कस जाती है। क्योंकि क्रांति असली क्रांति से बचाव करने की व्यवस्था है- असली क्रांति सिर्फ एक है- कि व्यक्ति समाज से मुक्त हो जाये। मुक्त होने का यह अर्थ नहीं है, कि समाज में नियम है कि रास्ते में बीच में मत चलो, तो वह बीच में चलने लगे, वह तो मूढ़ता होगी, मुक्ति न होगी। मुक्त हो जाने का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है। क्योंकि जो स्वच्छंद होगा, वह समझा ही नहीं। स्वच्छंदता तो गुलामी की ही उल्टी तस्वीर है। स्वतंत्रता न तो स्वच्छंदता है और न गुलामी। वह दोनों के मध्य में एक परम जागरण है।
वैसा व्यक्ति समाज का दुश्मन नहीं होता। पर वैसा व्यक्ति समाज की छाया भी नहीं होता। जहां तक समाज की गौण व्यवस्था का सम्बन्ध है, वह हमेशा राजी होता है, क्योंकि उसका कोई मूल्य ही नहीं है।
रास्ते पर नियम है भारत में, कि बायें चलो, अमरीका में, कि दायें चलो, क्या फर्क पड़ता है? चाहे बायें चलो, चाहे दायें चलो। एक बात तय है, कि सभी लोग एक ही तरफ चलें, ताकि रास्ते पर सुविधा रहे। बायें चलने से भी काम चल जाता है, दायें चलने से भी काम चल जाता है। लेकिन सभी लोग बाये-दायें इकठ्ठा चलने लगे तो काम न चलेगा। तो अड़चन होगी, ये गौण नियम है। ये कोई शाश्वत नियम नहीं है और न ही इनमें कोई नीति है और न कोई इनमें परमात्मा का हाथ है, हस्ताक्षर है। समाज की सुविधा है।
स्वतंत्र व्यक्ति समाज की सुविधा में बाधा नहीं डालता, सहयोगी होता है। लेकिन समाज की सुविधा के लिये अपनी आत्मा को खोने को राजी नहीं होता। जहां तक बायें-दायें चलने का सवाल है, बिल्कुल राजी होता है। लेकिन जहां समाज आग्रह करता है, कि तुम अपनी आत्मा ही खो दो, वहां वह उस आग्रह को ठुकरा देता है।
लेकिन समाज को उससे कोई बाधा भी नहीं आती। क्योंकि आत्मा कोई रास्ते की ट्रैफिक नहीं है, वहां तुम बिल्कुल अकेले हो, वहां दूसरा है ही नहीं। इसलिये वहां समाज के नियम की कोई भी जरुरत नहीं है। लेकिन समाज को खतरा है। खतरा यह है, कि आत्मवान व्यक्ति दबाया नहीं जा सकता। आत्मवान व्यक्ति झुकाया नहीं जा सकता है। और आत्मवान व्यक्ति संक्रामक होता है। जो और भी बड़ा खतरा है, क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति आत्मवान व्यक्ति होता है। उसके आस-पास हवा फैलने लगती है आत्मवत्ता की, भगवत्ता की। दूसरे लोग भी आत्मवान होने लगते हैं और अगर बहुत लोग रास्ते को छोड़ कर अपने रास्ते और पगडंडियां खोजने लगें, तो वह जो राजपथ का बल है, वह टूट जाता है। समाज निर्बल हो जाता है। क्योंकि आत्मवान व्यक्ति मौलिक रूप से अराजक होता है, स्वच्छंद नहीं। लेकिन वह कोई शासन पसंद नहीं करता। इसलिये तो कबीर कहते है, कि जब अब मैं हरि ही हो गया तो किसके सामने सिर झुकाना? आत्मवान व्यक्ति एक दिन पाता है, कि वह स्वयं परमात्मा है। अब कैसे सिर झुकाना? कहां झुकाना? क्यों झुकाना?
इसलिये नहीं, कि वह कोई अहंकारी है, नहीं। आत्मवान होता ही तब है, जब अहंकार खो जाता है। नहीं लेकिन अब कुछ बचा ही नहीं, जहां सिर झुकाना। सिर झुकाने वाला भी नहीं बचा। सिर भी नहीं बचा। सब खो गया है। तो न तो राज्य पंसद करता है आत्मवान व्यक्ति को, न तुम्हारे तथाकथित धर्म पसंद करते हैं आत्मवान व्यक्ति को, क्योंकि मंदिर, मस्जिद वह छोड़ देगा। कहां सिर पटकना? आदमी की बनाई हुई मूर्तियो के सामने सिर पटकने से होगा भी क्या? वे गुलामी के जाल है, जो समाज ने सब तरफ फैला रखे हैं। कारागृह भी उसी का कारागृह है और जिसे तुम मंदिर कहते हो वह भी उसी का कारागृह है। जिसको तुम पुलिस का आदमी कहते हो, वह भी समाज का नौकर है और जिसको तुम पुजारी, पुरोहित कहते हो वह भी उसी समाज का उतना ही नौकर है। एक तुम्हारे शरीर के ऊपर नियंत्रण रखता है, दूसरी तुम्हारी आत्मा पर नियंत्रण रखता है। तुम छूट न जाओ।
और जैसा मैंने कहा, जन्म के पहले क्षण से समाज का हस्तक्षेप शुरु हो जाता है, तुम्हें मारने का। वह बच्चा पैदा नहीं हुआ, कि समाज मौजूद है। जैसे ही बच्चा पैदा होता है, नवीनतम खोजें कहती हैं विज्ञान की कि जैसे ही बच्चा पैदा होता है सारी दुनिया में दाइयां, डाक्टर, नर्सेस बच्चे की नाल को तत्क्षण काट देते हैं और नवीनतम विज्ञान की खोजें कहती हैं, कि बच्चे की नाल को तत्क्षण काटना सदा के लिये उसे कमजोर बना देना है। सदा के लिये, वह कभी बलवान न हो सकेगा और सदा उसकी ऊर्जा क्षीण प्रवाह की होगी।
उसके पीछे कारण है, मां के पेट में बच्चा श्वास खुद नहीं लेता। नाभि से जुड़े नाल से मां ही उसके लिये श्वास लेती है। मां की श्वास पर ही बच्चा जीता है। बच्चे का हृदय धड़कता है लेकिन बच्चा स्वयं श्वास नहीं लेता। श्वास, आक्सीजन, वायु, प्राण नाभि से भीतर जाते हैं। वह बच्चे की व्यवस्था है मां के पेट के बाहर आया, एकदम से श्वास नहीं ले सकता। क्योंकि नये यंत्र को चलने में थोड़ा वक्त लगेगा। भीतर एक बड़ा रूपांतरण घटेगा। अभी तक नाशि से सांस ली थी, अब नाक से सांस लेगा। एक नई व्यवस्था शुरु होगी। इसमें कोई पांच मिनट, सात मिनट लगते हैं। लेकिन हम बच्चे की नाल तत्क्षण काट देते हैं। जब कि बच्चा मां से अभीनाल के द्वारा सांस ले ही रहा था। पांच-सात मिनट रूपांतरण हो जायेगा।
बच्चा सांस लेने लगेगा, उसका हृदय धड़कने लगेगा, तब तुम नाल को काटना। क्योंकि अब बच्चा स्वयं अपनी ऊर्जा को पाने लगा। ज्यादा देर नहीं लगती, पांच-सात मिनट का ही मामला है, लेकिन धैर्य नहीं है समाज को। बड़े से बड़े अस्पताल में, कुशल से कुशल डाक्टर के नीचे भी वही हो रहा है, जो एक गैर-कुशल दाई गांव में कर रही है। वे पढ़ी-लिखी दाई गांव में कर रही है। उनके काटने के ढंग बदल गये हैं।
दाई बेहूदे ढंग से काटती है, उसके पास उतने कुशल औजार नहीं। डाक्टर बड़ी कुशलता से काटता है। उसके पास सुविधा सम्पन्नता है। सारे कुशल औजार है, लेकिन दोनों एक ही काम कर रहे हैं। जैसे ही तुम नाल काट देते हो, बच्चे का जीवन तंत्र कंपकपा जाता है, हड़बड़ा जाता है और इसलिये बच्चा रो उठता है, चीखता है। क्योंकि एक नई सांस की व्यवस्था उसको लेनी पड़ती है घबराहट से सांस लेता है और पहली सांस जिसने घबराहट से, भय से, कंपन से ली हो, उसमें जीवन भर भय और कंपन प्रविष्ट हो जायेगा। क्योंकि श्वास जीवन है। भय पहली ही श्वास से जुड़ गया। अब पूरा जीवन वह भयभीत आदमी होगा।
पांच मिनिट रूका जा सकता है। पांच मिनिट के बाद अपने आप नाभि से जुड़ा हुआ नाल और उसका कंपन बंद हो जाता है। पांच मिनिट तक कंपन जारी रहता है। क्योंकि धड़कन जारी रहती है, श्वास जारी रहती है। पांच मिनट में नाल अपने आप बंद हो जाती है। प्रकृति के द्वारा ही उसका कंपन बंद हो जाता है। पांच मिनिट तक कंपन जारी रहता है। क्योंकि धड़कन जारी रहती है, श्वास जारी रहती है। पांच मिनट में नाल अपने आप बंद हो जाती है। प्रकृति के द्वारा ही उसका कंपन बंद हो जाता है। उसकी गर्मी और ऊर्जा खो जाती है। यंत्र बदल गया।
अब तुम काट सकते हो, अब तुम मुर्दा चीज को काट रहे हो। पांच मिनिट पहले तुम जिंदा चीज को काट रहे थे और तुमने बच्चे को पहला धक्का दे दिया और बच्चा बहुत कोमल है, अति कोमल है। नौ महीने मां के पेट में उसने कोई कष्ट नहीं जाना। कोई पीड़ा नहीं जानी। किसी तरह का दुख नहीं जाना। एकदम स्वर्ग से, आदम के बगीचे से बाहर आ रहा है और तुमने उसे पहला धक्का दे दिया। मनौवैज्ञानिक कहते हैं, यह जो धक्का है, यह सारी दुनिया को कमजोर बनाये हुये है।
डाक्टर को जल्दी है। शायद वह कहेगा, कि पच्चीस और बच्चे होने वाले हैं। हड़बड़ाहट है, बेचैनी है, उसका खुद मन तना हुआ है और उसे पता नहीं, वह क्या कर रहा है। अब तो यह अचेतन का हिस्सा हो गया, कि बच्चा पैदा हुआ, नाल काट दी। जन्म की पहली घड़ी से भय समाविष्ट हो गया। अब तुम्हें कोई भी डरा सकेगा। पुलिस का डंडा डरा सकेगा। पुरोहित की आवाज डरा सकेगी, कि नरक चले जाओगे। अब तुम्हें कोई प्रलोभित कर लेगा। क्योंकि प्रलोभन भय का ही दूसरा रूप है। और यह चलती है समाज की व्यवस्था अंतिम क्षण तक, आखरी दम तक, तुम जीना चाहो तो भी तुम स्वतंत्र नहीं, हस्तक्षेप है। तुम मरना चाहो तो भी हस्तक्षेप है, मरने की स्वतंत्रता नहीं है।
यूरोप और अमेरिका में जहां चिकित्सा ने बहुत विकास कर लिया है, लाखों लोग अस्पतालों में पड़े है, जो मरना चाहते हैं। जो सरकारों को आवेदन करते हैं, कि हम मरना चाहते हैं। कोई सौ साल के करीब पहुंच गया है। जीवन जी लिया गया, जो जानना था जान लिया, जो भटकना था भटक लिया, जो देखना था देख लिया, अब न कुछ देखने को बचा, न जानने को। न अब कोई जीने में रस रह गया है।
लेकिन डाक्टरों को आज्ञा नहीं है किसी को मरने में सहायता देने की। न केवल यही, बल्कि डाक्टरों को आज्ञा है, कि जब तक बन सके आदमी को जिंदा रखने की कोशिश करें। तो लोग टंगे है अस्पतालों में। टांगे बंधी है, हाथ बंधे हैं, आक्सीजन की नली लगी है। ग्लूकोज दिया जा रहा है। न उन्हें ठीक से होश है, न जीवन जैसी कोई चीज बची है। वे मरना चाहते हैं क्योंकि यह पीड़ा है अब। लेकिन मरने की किसी दुनिया के कानून में आज्ञा नहीं है। मरने की भी तुम्हें आजादी नहीं है।
तो पश्चिम में एक नया आंदोलन चल रहा है। आत्म-मरण की स्वतंत्रता का आंदोलन। अथनासिया उसको वे कहते हैं, कि लोग मरना चाहते हैं दुनिया में, कोई उन्हें रोकने का किसी को हक नहीं है। होना भी नहीं चाहिये। जिंदगी मेरी है, मैं मरना चाहता हूं, मरने की आज्ञा नहीं है।
अगर अपने को मारने की कोशिश में पकड़े गये तो सरकार तुम्हें मार डालेगी। मगर तुम्हें आजादी नहीं है। यह बहुत मजे की बात है। अगर मैं चला जाऊं और पहाड़ से गिर कर मरने की कोशिश करुं और पकड़ लिया जाऊं, तो सरकार मुझे फांसी देगी। क्योंकि मैंने गलत काम करने की कोशिश की। मैं भी यही काम कर रहा था, लेकिन उसमें स्वतंत्रता निहित थी। वह आज्ञा तुम्हें नहीं है। वह सरकार करे तो ठीक है, तुम करो तो नहीं। क्योंकि अगर मरने की तुम्हें आजादी हो जाये तो तुम जल्दी ही जीने की आजादी भी मांगोगे, वह संयुक्त है, दोनों आजादियां तुम्हें दी नहीं जा सकतीं।
पैदा हुआ बच्चा, कि समाज की पूरी चेष्टा है, कि वह समाज का अनुसरण करे, पीछे चले, हमेशा आगे देख ले कि कोई पीठ है या नहीं। अगर कोई पीठ न हो तो ठिठक कर खड़ा हो जाये। खतरा है, गलत रास्ते पर जा रहा है, जब तक आगे पीठ दिखाई पड़ती रहे, तभी तक रास्ता ठीक है। ये कबीर के वचन बड़े अनूठे हैं। कबीर कहते हैं- पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि समाज यानि लोक और वेद यानी शास्त्र। दो के पीछे चला जा रहा था। पीठ भर दिखाई पड़ रही थी। पीछे से धक्के थे, आगे पीठ थी। एक भीड़ चली जा रही है। बड़ी भीड़ है, कोई सात अरब आदमी जमीन पर है। भारी, भयंकर प्रवाह चल रहा है। तुम्हारी छोटी सी लहर की किसको चिंता है। भयंकर तूफान है। बड़ी लहरें उठ रहीं है और भागी जा रही हैं। तुम भी पीछे लगे चले जा रहे हो। सोचते हो, कि जब तक पीठ दिखाई पड़ती है, सब ठीक ही होगा।
मैंने सुना है, कि एक व्यक्ति एक रात ज्यादा पी कर मधुशाला से निकला। ठीक-ठाक दिखाई नहीं पड़ रहा था कहां जाये। बामुश्किल से मधुशाला के नौकरों ने उसे कार तक पहुंचाया। बामुश्किल आधे घंटे मेहनत करके किसी तरह उसने चाबी कार में लगाई। फिर किसी तरह गाड़ी को पुरानी आदतवश चला भी लिया। लेकिन तब सवाल उठा कि जाना कहां है? घर कहां है? यह गांव कौन सा है? बड़े दार्शनिक सवाल उठने लगे। तब एक ही उपाय था, कि किसी के पीछे हो लूं और तो कोई उपाय नहीं। जाना कहां है? आ कहां से रहे हैं? कौन है? कहां घर है? यही तो चिंता है सारे मनुष्यों की। सीधा सुगम उपाय है, किसी के पीछे हो लो। एक कार के पीछे हो लिया। प्रसन्न था, अब सब ठीक है, कहीं जा रहे हैं और न केवल धीमी गति से जा रहे हैं, बड़ी तेज गति से जा रहे हैं। चित्त प्रसन्न था और क्या चाहिये? गति चाहिये। जरुर पहुंच जायेंगे। क्योंकि इतनी तेज गति से जा रहे हैं। और जो होना था, वह हुआ। आखिर में जा कर वह उस कार से टकरा गया। तो उसने चिल्ला कर कहा, कि क्या मामला है? इशारा क्यों नहीं दिया, कि गाड़ी खड़ी करते हो? उस आदमी ने बाहर सिर निकाल कर कहा कि अपने ही गैरेज में इशारा देने की जरुरत है?
वही गति तुम्हारी है। किसी के पीछे लगे जा रहे हो, पीछे इसलिये नहीं लगे हो कि जिसके पीछे लगे हो, वह जानता है। पीछे सिर्फ इसलिये लगे हो कि तुम नहीं जानते हो कि कहां जाना है और जब तुम नहीं जानते हो तो तुम किसी के भी पीछे लगो, कैसे पहुंच जाओंगे? और तुम थोड़ा ये भी तो विचार करो, कि वह दूसरा भी किसी के पीछे लगा है। इस जगत में थोड़े से लोग कहीं पहुंचते हैं, वे वे ही लोग हैं, जो किसी के पीछे नहीं चलते। बुद्ध कहीं पहुंचते हैं क्योंकि लोगों के पीछे नहीं चलते। बेहतर है न चलना, बेहतर है बैठ जाना। बेहतर है निश्चित कर लेना ठीक से, कि जाना भी है या नहीं।
गंतव्य का ही पता न हो, अपना भी ठौर-ठिकाना न हो कि कौन हूं! इसका भी कोई पक्का पता न हो कि जाना भी है या नहीं जाना है? या कहां जाना है? तब तुम किसी के पीछे लग कर कितने ही चलते रहो, तुम्हारी यात्रा कोल्हू के बैल की यात्रा सिद्ध होगी। चलोगे बहुत, पहुंचोगे कहीं भी नहीं। चलोगे बहुत क्योंकि गोल घेरे में चलते रह सकते हो, जितना चलना चाहो। थकोगे रोज, सांझ थक कर फिर गिर जाओगे। सुबह उठ कर फिर लोक वेद के साथ हो जाओगे। लोक, मौजूद भीड़ है और वेद, जो भीड़ जा चुकी। मुर्दों की भीड़ है। दो भीड़ें तुम्हें घेरे हुये हैं। जिंदा तो तुम्हें पकड़े ही हुये हैं, जो मर गये उनके हाथ भी तुम्हारी गर्दन पर हैं। वेद का अर्थ है, जो अब नहीं हैं, उनके वचन तुम्हें सता रहे हैं। उनको तुम छाती से लगाये बैठे हो। जरूर उन्होंने कुछ जाना होगा, जरूर उन्होंने कुछ पहचाना होगा।
लेकिन दूसरे की आंख से देखे गये दृश्य तुम कैसे देख सकते हो? और दूसरे ने जो भोजन किया है, उससे तुम्हारी भूख की तृप्ति न होगी और जल की कितनी ही चर्चा चले, इससे कहीं किसी की प्यास बुझी है? कोई तुम्हें बिलकुल लिख कर ही दे दे जल का सूत्र- एच-टूओ, तुम उस कागज को लिये जिंदगी भर घूमते फिरों, तो भी कंठ की प्यास उससे न बुझेगी। तुम उस कागज के मंत्र को घोल कर पी जाओ, तो भी तुम्हारी प्यास न बुझेगी। एच-टू-ओ- से प्यास नहीं बुझती।
एच-टू-ओ- यानी वेद। जिन्होंने जाना, उन्होंने सूत्र लिख दिये। लेकिन किसी सूत्र में उनका ज्ञान समाविष्ट नहीं होता। कोई सूत्र जो उन्होंने जाना है, उसे प्रकट नहीं कर सकता। कोई शब्द सत्य को प्रकट करने में समर्थ नहीं है। यहीं फर्क है सद्गुरु और वेद में। वेद सद्गुरुओं के वचन हैं। लेकिन सद्गुरु जा चुका। अब खाली वचन रह गये हैं। ऐसा समझों कि सांप तो जा चुका, उसकी खाल पड़ी रह गई है। ऐसा समझों कि बुद्ध तो जा चुके हैं, उनके चरण चिन्ह रेत पर बने रह गये हैं। तुम उन चरण चिन्हों पर सिर रखे पड़े हो। जीवित भीड़ से सावधान होना जरूरी है। जो अब नहीं रहे, उनसे भी सावधान होना जरूरी है। वस्तुतः जो नहीं रहे, उनकी पकड़ और भी गहरी है।
क्योंकि वे तुम्हें दिखाई भी नहीं पड़ते। उनसे तुम बचना भी चाहो तो कहां जाओ? वे बाहर नहीं है, वे तुम्हारे भीतर हैं। गुरु के ज्ञान को समझना होगा, उनकी चेतना को आत्मसात अर्थात अपनी आत्मा के अन्दर उतारना होगा, उनका ज्ञान ब्रह्माण्ड में विद्यमान हो गया है, एक साधक ने मन रूपी ब्रह्माण्ड में उसे कितना उतारा है यह देखना होगा।
परम पूज्य सद्गुरुदेव
कैलाश श्रीमाली जी
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,